Sunday, February 11, 2018

ज्योतिष में नाम के पहले अक्षर का महत्व काफी अधिक है।

ज्योतिष में नाम के पहले अक्षर का महत्व काफी अधिक है। व्यक्ति के जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि में होता है, उसी राशि के अनुसार नाम का पहला अक्षर तय होता है। सभी 12 राशियों के लिए अलग-अलग अक्षर बताए गए हैं। नाम के पहले अक्षर से राशि मालूम होती है और उस राशि के अनुसार व्यक्ति के स्वभाव और भविष्य से जुड़ी कई जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
यहां जानिए किस राशि के अंतर्गत कौन-कौन से नाम अक्षर आते हैं, किस राशि के व्यक्ति का स्वभाव कैसा है और किस राशि के लोगों की क्या विशेषता है...
*मेष राशि:– चू , चे, चो, ला, ली, लू , ले, लो, अ, इन अक्षरों से आने वाले नाम मेष राशि में आते हैं।*
1. मेष राशि चक्र की सबसे प्रथम राशि मेष है। जिसके स्वामी मंगल है। धातु संज्ञक यह राशि चर (चलित) स्वभाव की होती है। राशि का प्रतीक मेढ़ा संघर्ष का परिचायक है।
2. मेष राशि वाले आकर्षक होते हैं। इनका स्वभाव कुछ रुखा हो सकता है। दिखने में सुंदर होते है। यह लोग किसी के दबाव में कार्य करना पसंद नहीं करते। इनका चरित्र साफ -सुथरा एवं आदर्शवादी होता है।
3. बहुमुखी प्रतिभा के स्वामी होते हैं। समाज में इनका वर्चस्व होता है एवं मान सम्मान की प्राप्ति होती है।
4. निर्णय लेने में जल्दबाजी करते है तथा जिस कार्य को हाथ में लिया है उसको पूरा किए बिना पीछे नहीं हटते।
5. स्वभाव कभी-कभी विरक्ति का भी रहता है। लालच करना इस राशि के लोगों के स्वभाव मे नहीं होता। दूसरों की मदद करना अच्छा लगता है।
6. कल्पना शक्ति की प्रबलता रहती है, सोचते बहुत ज्यादा हैं।
7. जैसा खुद का स्वभाव है, वैसी ही अपेक्षा दूसरों से करते हैं। इस कारण कई बार धोखा भी खाते हैं।
8. अग्रि तत्व होने के कारण क्रोध अतिशीघ्र आता है। किसी भी चुनौती को स्वीकार करने की प्रवृत्ति होती है।
9. अपमान जल्दी भूलते नहीं, मन में दबा के रखते हैं। मौका पडऩे पर प्रतिशोध लेने से नहीं चूकते।
10. अपनी जिद पर अड़े रहना, यह भी मेष राशि के स्वभाव में पाया जाता है। आपके भीतर एक कलाकार छिपा होता है।
जानिए शेष राशियों की खास बातें...
*वृष राशि:– ई, उ, ए, ओ, वा, वी, वू , वे, वो, इन अक्षरों से आने वाले नाम वृष राशि में आते हैं*
वृषभ राशि
1. इस राशि का चिह्न बैल है। बैल स्वभाव से ही अधिक पारिश्रमी और बहुत अधिक शक्तिशाली होता है, साधारणत: वह शांत रहता है, किन्तु क्रोध आने पर वह उग्र रूप धारण कर लेता है।
2. बैल के समान स्वभाव वृष राशि के जातक में भी पाया जाता है। वृष राशि का स्वामी शुक्र ग्रह है।
3. इसके अन्तर्गत कृत्तिका नक्षत्र के तीन चरण, रोहिणी के चारों चरण और मृगशिरा के प्रथम दो चरण आते हैं।
4. आपके जीवन में पिता-पुत्र का कलह रहता है, जातक का मन सरकारी कार्यों की ओर रहता है। सरकारी ठेकेदारी का कार्य करवाने की योग्यता रहती है।
5. पिता के पास जमीनी काम या जमीन के द्वारा जीविकोपार्जन का साधन होता है। जातक अधिकतर तामसी भोजन में अपनी रुचि दिखाता है।
6. गुरु का प्रभाव जातक में ज्ञान के प्रति अहम भाव को पैदा करने वाला होता है, वह जब भी कोई बात करता है तो स्वाभिमान की बात करता है।
7. सरकारी क्षेत्रों की शिक्षा और उनके काम जातक को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
8. किसी प्रकार से केतु का बल मिल जाता है तो जातक सरकार का मुख्य सचेतक बनने की योग्यता रखता है। मंगल के प्रभाव से जातक के अन्दर मानसिक गर्मी प्रदान करता है।
9. कल-कारखानों, स्वास्थ्य कार्यों और जनता के झगड़े सुलझाने का कार्य जातक कर सकता है, जातक की माता के जीवन में परेशानी ज्यादा होती है।
10. ये अधिक सौन्दर्य प्रेमी और कला प्रिय होते हैं। जातक कला के क्षेत्र में नाम करता है।
*मिथुन राशि:- का, की, कू घ, ड़ ,छ, के को, हा अक्षरों से आने वाले नाम मिथुन राशि मे आते है।*
मिथुन राशि
1. यह राशि चक्र की तीसरी राशि है। राशि का प्रतीक युवा दम्पति है, यह द्वि-स्वभाव वाली राशि है।
2. मृगसिरा नक्षत्र के तीसरे चरण के मालिक मंगल-शुक्र हैं। मंगल शक्ति और शुक्र माया है।
3. व्यक्ति के अन्दर माया के प्रति भावना पाई जाती है, जातक जीवनसाथी के प्रति हमेशा शक्ति बन कर प्रस्तुत होता है। साथ ही, घरेलू कारणों चलते कई बार आपस में तनाव रहता है।
4. मंगल और शुक्र की युति के कारण जातक में स्त्री रोगों को परखने की अद्भुत क्षमता होती है।
5. जातक वाहनों की अच्छी जानकारी रखता है। नए-नए वाहनों और सुख के साधनों के प्रति अत्यधिक आकर्षण होता है। इनका घरेलू साज-सज्जा के प्रति अधिक झुकाव होता है।
6. मंगल के कारण जातक वचनों का पक्का बन जाता है।
7. गुरु आसमान का राजा है तो राहु गुरु का शिष्य, दोनों मिलकर जातक में ईश्वरीय ताकतों को बढ़ाते हैं।
8. इस राशि के लोगों में ब्रह्माण्ड के बारे में पता करने की योग्यता जन्मजात होती है। वह वायुयान और  सेटेलाइट के बारे में ज्ञान बढ़ाता है।
9. राहु-शनि के साथ मिलने से जातक के अन्दर शिक्षा और शक्ति उत्पादित होती है। जातक का कार्य शिक्षा स्थानों में या बिजली, पेट्रोल या वाहन वाले कामों की ओर होता है।
10. जातक एक दायरे में रह कर ही कार्य कर पाता है और पूरा जीवन कार्योपरान्त फलदायक रहता है। जातक के अन्दर एक मर्यादा होती है जो उसे धर्म में लीन करती है और जातक सामाजिक और धार्मिक कार्यों में अपने को रत रखता है।
*कर्क राशि:- ही, हू, हे, हो, डा, डी, डू, डे डो इन अक्षरों से आने वाले नाम कर्क राशि मे आते है।*
कर्क राशि
1. राशि चक्र की चौथी राशि कर्क है। इस राशि का चिह्न केकड़ा है। यह चर राशि है।
2. राशि स्वामी चन्द्रमा है। इसके अन्तर्गत पुनर्वसु नक्षत्र का अन्तिम चरण, पुष्य नक्षत्र के चारों चरण तथा अश्लेषा नक्षत्र के चारों चरण आते हैं।
3. कर्क राशि के लोग कल्पनाशील होते हैं। शनि-सूर्य जातक को मानसिक रूप से अस्थिर बनाते हैं और जातक में अहम की भावना बढ़ाते हैं।
4. जिस स्थान पर भी वह कार्य करने की इच्छा करता है, वहां परेशानी ही मिलती है।
5. शनि-बुध दोनों मिलकर जातक को होशियार बना देते हैं। शनि-शुक्र जातक को धन और जायदाद देते हैं।
6. शुक्र उसे सजाने संवारने की कला देता है और शनि अधिक आकर्षण देता है।
7. जातक उपदेशक बन सकता है। बुध गणित की समझ और शनि लिखने का प्रभाव देते हैं। कम्प्यूटर आदि का प्रोग्रामर बनने में जातक को सफलता मिलती है।
8. जातक श्रेष्ठ बुद्धि वाला, जल मार्ग से यात्रा पसंद करने वाला, कामुक, कृतज्ञ, ज्योतिषी, सुगंधित पदार्थों का सेवी और भोगी होता है। वह मातृभक्त होता है।
9. कर्क, केकड़ा जब किसी वस्तु या जीव को अपने पंजों को जकड़ लेता है तो उसे आसानी से नहीं छोड़ता है। उसी तरह जातकों में अपने लोगों तथा विचारों से चिपके रहने की प्रबल भावना होती है।
10. यह भावना उन्हें ग्रहणशील, एकाग्रता और धैर्य के गुण प्रदान करती है।
*सिंह राशि:- मा ,मी, मू ,मो, टा, टी, टू, टे इन अक्षरों से आने वाले नाम सिंह राशि मे आते है।*
सिंह राशि
1. सिंह राशि पूर्व दिशा की द्योतक है। इसका चिह्न शेर है। राशि का स्वामी सूर्य है और इस राशि का तत्व अग्नि है।
2. इसके अन्तर्गत मघा नक्षत्र के चारों चरण, पूर्वा फाल्गुनी के चारों चरण और उत्तराफाल्गुनी का पहला चरण आता है।
3. केतु-मंगल जातक में दिमागी रूप से आवेश पैदा करता है। केतु-शुक्र, जो जातक में सजावट और सुन्दरता के प्रति आकर्षण को बढ़ाता है।
4. केतु-बुध, कल्पना करने और हवाई किले बनाने के लिए सोच पैदा करता है। चंद्र-केतु जातक में कल्पना शक्ति का विकास करता है। शुक्र-सूर्य जातक को स्वाभाविक प्रवृत्तियों की तरफ बढ़ाता है।
5. जातक का सुन्दरता के प्रति मोह होता है और वे कामुकता की ओर भागता है। जातक में अपने प्रति स्वतंत्रता की भावना रहती है और किसी की बात नहीं मानता।
6. जातक, पित्त और वायु विकार से परेशान रहने वाले लोग, रसीली वस्तुओं को पसंद करने वाले होते हैं। कम भोजन करना और खूब घूमना, इनकी आदत होती है।
7. छाती बड़ी होने के कारण इनमें हिम्मत बहुत अधिक होती है और मौका आने पर यह लोग जान पर खेलने से भी नहीं चूकते।
8. जातक जीवन के पहले दौर में सुखी, दूसरे में दुखी और अंतिम अवस्था में पूर्ण सुखी होता है।
9. सिंह राशि वाले जातक हर कार्य शाही ढंग से करते हैं, जैसे सोचना शाही, करना शाही, खाना शाही और रहना शाही।
10. इस राशि वाले लोग जुबान के पक्के होते हैं। जातक जो खाता है वही खाएगा, अन्यथा भूखा रहना पसंद करेगा, वह आदेश देना जानता है, किसी का आदेश उसे सहन नहीं होता है, जिससे प्रेम करेगा, उस मरते दम तक निभाएगा, जीवनसाथी के प्रति अपने को पूर्ण रूप से समर्पित रखेगा, अपने व्यक्तिगत जीवन में किसी का आना इस राशि वाले को कतई पसंद नहीं है।
*कन्या राशि:-टो ,पा,पी, पू, ष, ण, ठ, पे, पो इन अक्षरों से आने वाले नाम कन्या राशि मे आते है।*
कन्या राशि
1. राशि चक्र की छठी कन्या राशि दक्षिण दिशा की द्योतक है। इस राशि का चिह्न हाथ में फूल लिए कन्या है। राशि का स्वामी बुध है। इसके अन्तर्गत उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के दूसरे, तीसरे और चौथे चरण, चित्रा के पहले दो चरण और हस्त नक्षत्र के चारों चरण आते हैं।
2. कन्या राशि के लोग बहुत ज्यादा महत्वाकांक्षी होते हैं। भावुक भी होते हैं और वह दिमाग की अपेक्षा दिल से ज्यादा काम लेते हैं।
3. इस राशि के लोग संकोची, शर्मीले और झिझकने वाले होते हैं।
4. मकान, जमीन और सेवाओं वाले क्षेत्र में इस राशि के जातक कार्य करते हैं।
5. स्वास्थ्य की दृष्टि से फेफड़ों में शीत, पाचनतंत्र एवं आंतों से संबंधी बीमारियां जातकों मे मिलती हैं। इन्हें पेट की बीमारी से प्राय: कष्ट होता है। पैर के रोगों से भी सचेत रहें।
6. बचपन से युवावस्था की अपेक्षा जातकों की वृद्धावस्था अधिक सुखी और ज्यादा स्थिर होता है।
7. इस राशि वाल पुरुषों का शरीर भी स्त्रियों की भांति कोमल होता है। ये नाजुक और ललित कलाओं से प्रेम करने वाले लोग होते हैं।
8. ये अपनी योग्यता के बल पर ही उच्च पद पर पहुंचते हैं। विपरीत परिस्थितियां भी इन्हें डिगा नहीं सकतीं और ये अपनी सूझबूझ, धैर्य, चातुर्य के कारण आगे बढ़ते रहते है।
9. बुध का प्रभाव इनके जीवन मे स्पष्ट झलकता है। अच्छे गुण, विचारपूर्ण जीवन, बुद्धिमत्ता, इस राशि वाले में अवश्य देखने को मिलती है।
10. शिक्षा और जीवन में सफलता के कारण लज्जा और संकोच तो कम हो जाते हैं, परंतु नम्रता तो इनका स्वाभाविक गुण है।
*तुला राशि:- रा , री, रे, रो ,ता, ती, तू, ते इन अक्षरों से आने वाले नाम तुला राशि में आते है।*
तुला राशि
1. तुला राशि का चिह्न तराजू है और यह राशि पश्चिम दिशा की द्योतक है, यह वायुतत्व की राशि है। शुक्र राशि का स्वामी है। इस राशि वालों को कफ की समस्या होती है।
2. इस राशि के पुरुष सुंदर, आकर्षक व्यक्तित्व वाले होते हैं। आंखों में चमक व चेहरे पर प्रसन्नता झलकती है। इनका स्वभाव सम होता है।
3. किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होते, दूसरों को प्रोत्साहन देना, सहारा देना इनका स्वभाव होता है। ये व्यक्ति कलाकार, सौंदर्योपासक व स्नेहिल होते हैं।
4. ये लोग व्यावहारिक भी होते हैं व इनके मित्र इन्हें पसंद करते हैं।
5. तुला राशि की स्त्रियां मोहक व आकर्षक होती हैं। स्वभाव खुशमिजाज व हंसी खनखनाहट वाली होती हैं। बुद्धि वाले काम करने में अधिक रुचि होती है।
6. घर की साजसज्जा व स्वयं को सुंदर दिखाने का शौक रहता है। कला, गायन आदि गृह कार्य में दक्ष होती हैं। बच्चों से बेहद जुड़ाव रहता है।
7. तुला राशि के बच्चे सीधे, संस्कारी और आज्ञाकारी होते हैं। घर में रहना अधिक पसंद करते हैं। खेलकूद व कला के क्षेत्र में रुचि रखते हैं।
8. तुला राशि के जातक दुबले-पतले, लम्बे व आकर्षक व्यक्तिव वाले होते हैं। जीवन में आदर्शवाद व व्यवहारिकता में पर्याप्त संतुलन रखते हैं।
9. इनकी आवाज विशेष रूप से सौम्य होती हैं। चेहरे पर हमेशा एक मुस्कान छाई रहती है।
10. इन्हें ऐतिहासिक स्थलों की यात्रा करना बहुत भाता है। ये एक अच्छे साथी हैं, चाहें वह वैवाहिक जीवन हो या व्यावसायिक जीवन।
*वृश्चिक राशि:- तो, ना, नी ,नू , ने नो या यी , यु इन अक्षरों से आने वाले नाम वृश्चिक राशि मे आते है।*
वृश्चिक राशि
1. वृश्चिक राशि का चिह्न बिच्छू है और यह राशि उत्तर दिशा की द्योतक है। वृश्चिक राशि जलतत्व की राशि है। इसका स्वामी मंगल है। यह स्थिर राशि है, यह स्त्री राशि है।
2. इस राशि के व्यक्ति उठावदार कद-काठी के होते हैं। यह राशि गुप्त अंगों, उत्सर्जन, तंत्र व स्नायु तंत्र का प्रतिनिधित्व करती है। अत: मंगल की कमजोर स्थिति में इन अंगों के रोग जल्दी होते हैं। ये लोग एलर्जी से भी अक्सर पीडि़त रहते हैं। विशेषकर जब चंद्रमा कमजोर हो।
3. वृश्चिक राशि वालों में दूसरों को आकर्षित करने की अच्छी क्षमता होती है। इस राशि के लोग बहादुर, भावुक होने के साथ-साथ कामुक होते हैं।
4. शरीरिक गठन भी अच्छा होता है। ऐसे व्यक्तियों की शारीरिक संरचना अच्छी तरह से विकसित होती है। इनके कंधे चौड़े होते हैं। इनमें शारीरिक व मानसिक शक्ति प्रचूर मात्रा में होती है।
5. इन्हें बेवकूफ बनाना आसान नहीं होता है, इसलिए कोई इन्हें धोखा नहीं दे सकता। ये हमेशा साफ-सुथरी और सही सलाह देने में विश्वास रखते हैं। कभी-कभी साफगोई विरोध का कारण भी बन सकती है।
6. ये जातक दूसरों के विचारों का विरोध ज्यादा करते हैं, अपने विचारों के पक्ष में कम बोलते हैं और आसानी से सबके साथ घुलते-मिलते नहीं हैं।
7. यह जातक अक्सर विविधता की तलाश में रहते हैं। वृश्चिक राशि से प्रभावित लड़के बहुत कम बोलते होते हैं। ये आसानी से किसी को भी आकर्षित कर सकते हैं। इन्हें दुबली-पतली लड़कियां आकर्षित करती हैं।
8. वृश्चिक वाले एक जिम्मेदार गृहस्थ की भूमिका निभाते हैं। अति महत्वाकांक्षी और जिद्दी होते हैं। अपने रास्ते चलते हैं मगर किसी का हस्तक्षेप पसंद नहीं करते।
9. लोगों की गलतियों और बुरी बातों को खूब याद रखते हैं और समय आने पर उनका उत्तर भी देते हैं। इनकी वाणी कटु और गुस्सा तेज होता है मगर मन साफ होता है। दूसरों में दोष ढूंढने की आदत होती है। जोड़-तोड़ की राजनीति में चतुर होते हैं।
10. इस राशि की लड़कियां तीखे नयन-नक्ष वाली होती हैं। यह ज्यादा सुन्दर न हों तो भी इनमें एक अलग आकर्षण रहता है। इनका बातचीत करने का अपना विशेष अंदाज होता है।
*धनु राशि:– ये, यो, भा, भी, भू , धा, फा, ड़ा, भे, इन अक्षरों से आने वाले नाम धनु राशि में आते है।*
धनु राशि
1. धनु द्वि-स्वभाव वाली राशि है। इस राशि का चिह्न धनुषधारी है। यह राशि दक्षिण दिशा की द्योतक है।
2. धनु राशि वाले काफी खुले विचारों के होते हैं। जीवन के अर्थ को अच्छी तरह समझते हैं।
3. दूसरों के बारे में जानने की कोशिश में हमेशा करते रहते हैं।
4. धनु राशि वालों को रोमांच काफी पसंद होता है। ये निडर व आत्म विश्वासी होते हैं। ये अत्यधिक महत्वाकांक्षी और स्पष्टवादी होते हैं।
5. स्पष्टवादिता के कारण दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुंचा देते हैं।
6. इनके अनुसार जो इनके द्वारा परखा हुआ है, वही सत्य है। अत: इनके मित्र कम होते हैं। ये धार्मिक विचारधारा से दूर होते हैं।
7. धनु राशि के लड़के मध्यम कद काठी के होते हैं। इनके बाल भूरे व आंखें बड़ी-बड़ी होती हैं। इनमें धैर्य की कमी होती है।
8. इन्हें मेकअप करने वाली लड़कियां पसंद हैं। इन्हें भूरा और पीला रंग प्रिय होता है।
9. अपनी पढ़ाई और करियर के कारण अपने जीवन साथी और विवाहित जीवन की उपेक्षा कर देते हैं। पत्नी को शिकायत का मौका नहीं देते और घरेलू जीवन का महत्व समझते हैं।
10. धनु राशि की लड़कियां लंबे कदमों से चलने वाली होती हैं। ये आसानी से किसी के साथ दोस्ती नहीं करती हैं।
*मकर राशिः– भो, जा, जी, खी, खू , खे, खो, गा, गी, इन अक्षरों से आने वाले नाम मकर राशि में आते हैं।
मकर राशि
1. मकर राशि का चिह्न मगरमच्छ है। मकर राशि के व्यक्ति अति महत्वाकांक्षी होते हैं। यह सम्मान और सफलता प्राप्त करने के लिए लगातार कार्य कर सकते हैं।
2. इनका शाही स्वभाव व गंभीर व्यक्तित्व होता है। आपको अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए बहुत कठिन परिश्रम करना पड़ता है।
3. इन्हें यात्रा करना पसंद है। गंभीर स्वभाव के कारण आसानी से किसी को मित्र नहीं बनाते हैं। इनके मित्र अधिकतर कार्यालय या व्यवसाय से ही संबंधित होते हैं।
4. सामान्यत: इनका मनपसंद रंग भूरा और नीला होता है। कम बोलने वाले, गंभीर और उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों को ज्यादा पसंद करते हैं।
5. ईश्वर व भाग्य में विश्वास करते हैं। दृढ़ पसंद-नापसंद के चलते इनका वैवाहिक जीवन लचीला नहीं होता और जीवनसाथी को आपसे परेशानी महसूस हो सकती है।
6. मकर राशि के लड़के कम बोलने वाले होते हैं। इनके हाथ की पकड़ काफी मजबूत होती है। देखने में सुस्त, लेकिन मानसिक रूप से बहुत चुस्त होते हैं।
7. प्रत्येक कार्य को बहुत योजनाबद्ध ढंग से करते हैं। गहरा नीला या श्वेत रंग प्रधान वस्त्र पहने हुए लड़कियां इन्हें बहुत पसंद आती हैं।
8. आपकी खामोशी आपके साथी को प्रिय होती है। अगर आपका जीवनसाथी आपके व्यवहार को अच्छी तरह समझ लेता है तो आपका जीवन सुखपूर्वक व्यतीत होता है।
9. आप जीवन साथी या मित्रों के सहयोग से उन्नति प्राप्त कर सकते हैं।
10. मकर राशि की लड़कियां लम्बी व दुबली-पतली होती हैं। यह व्यायाम आदि करना पसंद करती हैं। लम्बे कद के बाबजूद आप ऊंची हिल की सैंडिल पहनना पसंद करती हैं।
*कुंभ राशि:– गू , गे, गो, सा, सी, सू , से, सो, दा, इन अक्षरों से आने वाले नाम कुंभ राशि में आते हैं।*
कुंभ राशि
1. राशि चक्र की यह ग्यारहवीं राशि है। कुंभ राशि का चिह्न घड़ा लिए खड़ा हुआ व्यक्ति है। इस राशि का स्वामी भी शनि है। शनि मंद ग्रह है तथा इसका रंग नीला है। इसलिए इस राशि के लोग गंभीरता को पसंद करने वाले होते हैं एवं गंभीरता से ही कार्य करते हैं।
2. कुंभ राशि वाले लोग बुद्धिमान होने के साथ-साथ व्यवहारकुशल होते हैं। जीवन में स्वतंत्रता के पक्षधर होते हैं। प्रकृति से भी असीम प्रेम करते हैं।
3. शीघ्र ही किसी से भी मित्रता स्थपित कर सकते हैं। आप सामाजिक क्रियाकलापों में रुचि रखने वाले होते हैं। इसमें भी साहित्य, कला, संगीत व दान आपको बेहद पसंद होता हैं।
4. इस राशि के लोगों में साहित्य प्रेम भी उच्च कोटि का होता है।
5. आप केवल बुद्धिमान व्यक्तियों के साथ बातचीत पसंद करते हैं। कभी भी आप अपने मित्रों से असमानता का व्यवहार नहीं करते हैं।
6. आपका व्यवहार सभी को आपकी ओर आकर्षित कर लेता है।
7. कुंभ राशि के लड़के दुबले होते हैं। आपका व्यवहार स्नेहपूर्ण होता है। इनकी मुस्कान इन्हें आकर्षक व्यक्तित्व प्रदान करती है।
8. इनकी रुचि स्तरीय खान-पान व पहनावे की ओर रहती है। ये बोलने की अपेक्षा सुनना ज्यादा पसंद करते हैं। इन्हें लोगों से मिलना जुलना अच्छा लगता है।
9. अपने व्यवहार में बहुत ईमानदार रहते हैं, इसलिये अनेक लड़कियां आपकी प्रशंसक होती हैं। आपको कलात्मक अभिरुचि व सौम्य व्यक्तित्व वाली लड़कियां आकर्षित करती हैं।
10. अपनी इच्छाओं को दूसरों पर लादना पसंद नहीं करते हैं और अपने घर परिवार से स्नेह रखते हैं।
*मीन राशि:– दी, दू , थ, झ, ञ, दे, दो, चा, ची इन अक्षरों से आने वाले नाम मीन राशि में आते हैं।*
मीन राशि
1. मीन राशि का चिह्न मछली होता है। मीन राशि वाले मित्रपूर्ण व्यवहार के कारण अपने कार्यालय व आस पड़ोस में अच्छी तरह से जाने जाते हैं।
2. आप कभी अति मैत्रीपूर्ण व्यवहार नहीं करते हैं। बल्कि आपका व्यवहार बहुत नियंत्रित रहता है। ये आसानी से किसी के विचारों को पढ़ सकते हैं।
3. अपनी ओर से उदारतापूर्ण व संवेदनाशील होते हैं और व्यर्थ का दिखावा व चालाकी को बिल्कुल नापसंद करते हैं।
4. एक बार किसी पर भी भरोसा कर लें तो यह हमेशा के लिए होता है, इसीलिये आप आपने मित्रों से अच्छा भावानात्मक संबंध बना लेते हैं।
5. ये सौंदर्य और रोमांस की दुनिया में रहते हैं। कल्पनाशीलता बहुत प्रखर होती है। अधिकतर व्यक्ति लेखन और पाठन के शौकीन होते हैं। आपको नीला, सफेद और लाल रंग-रूप से आकर्षित करते हैं।
6. आपकी स्तरीय रुचि का प्रभाव आपके घर में देखने को मिलता है। आपका घर आपकी जिंदगी में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
7. अपने धन को बहुत देखभाल कर खर्च करते हैं। आपके अभिन्न मित्र मुश्किल से एक या दो ही होते हैं। जिनसे ये अपने दिल की सभी बातें कह सकते हैं। ये विश्वासघात के अलावा कुछ भी बर्दाश्त कर सकते हैं।
8. मीन राशि के लड़के भावुक हृदय व पनीली आंखों वाले होते हैं। अपनी बात कहने से पहले दो बार सोचते हैं। आप जिंदगी के प्रति काफी लचीला दृटिकोण रखते हैं।
9. अपने कार्य क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने के लिये परिश्रम करते हैं। आपको बुद्धिमान और हंसमुख लोग पसंद हैं।
10. आप बहुत संकोचपूर्वक ही किसी से अपनी बाह पाते हैं। एक कोमल व भावुक स्वभाव के व्यक्ति हैं। आप पत्नी के रूप में गृहणी को ही पसंद करते है।

चतुर्थ भाव प्रॉपर्टी के लिए मुख्य रुप से देखा जाता है.

चतुर्थ भाव प्रॉपर्टी के लिए मुख्य रुप से देखा जाता है. चतुर्थ भाव से व्यक्ति की स्वयं की बनाई हुई सम्पत्ति को देखा जाता है. यदि जन्म कुंडली के चतुर्थ भाव पर शुभ ग्रह का प्रभाव अधिक है तब व्यक्ति स्वयं की भूमि बनाता है.
जन्म कुंडली में मंगल को भूमि का मुख्य कारक माना गया है. जन्म कुंडली में चतुर्थ भाव या चतुर्थेश से मंगल का संबंध बनने पर व्यक्ति अपना घर अवश्य बनाता है. जन्म कुंडली में जब एकादश का संबंध चतुर्थ भाव से बनता है तब व्यक्ति एक से अधिक मकान बनाता है लेकिन यह संबंध शुभ व बली होना चाहिए.
जन्म कुंडली में लग्नेश, चतुर्थेश व मंगल का संबंध बनने पर भी व्यक्ति भूमि प्राप्त करता है अथवा अपना मकान बनाता है. जन्म कुंडली में चतुर्थ व द्वादश भाव का बली संबंध बनने पर व्यक्ति घर से दूर भूमि प्राप्त करता है या विदेश में घर बनाता है.
जन्म कुंडली में यदि चतुर्थ, अष्टम व एकादश भाव का संबंध बन रहा हो तब व्यक्ति को पैतृक संपति मिलती है. जन्म कुंडली में बृहस्पति ग्रह का संबंध अष्टम से बन रहा हो तब भी व्यक्ति को पैतृक संपत्ति मिलती है.
जन्म कुंडली में मंगल व शनि का संबंध चतुर्थ भाव या भावेश या दशाओं से बने बिना घर का निर्माण नही होता है. इसलिए गृह निर्माण में मंगल व शनि की भूमिका मुख्य मानी गई है. मंगल भूमि का कारक है तो शनि निर्माण हैं इसलिए घर बनाने में इनका अहम रोल होता

कुंडली में श्राप योग /श्रापित कुंडली

कुंडली में श्राप योग /श्रापित कुंडली
================
श्रापित दोष का मतलब हुआ किसी व्यक्ति को श्राप मिला हुआ होना। श्रापित दोष तब होता है, जब किसी की कुंडली के एक ही स्थान पर शनि और राहु दोनों उपस्थित होते हैं। यह व्यक्ति द्वारा पूर्व में किए पापों का नतीजा होता है, जो अब सामने आता है। अगर किसी की कुंडली में श्रापित दोष हो तो उसे अच्छा फल नहीं मिलता है, भले ही उसकी कुंडली में अच्छे ग्रहों का समूह मौजूद हो। लेकिन कालसर्प दोष की ही तरह प्राचीन ज्योतिषशास्त्रों में श्रापित योग की जड़ों का जिक्र भी नहीं किया गया है। लाल किताब के अनुसार, जब राहु और केतु साथ आ जाएं, तो इस स्थिति को नागमणि (नाग का रत्न) कहा जाता है, जिसे अच्छा माना जाता है। ऐसी स्थिति जिसकी कुंडली में होती है, उस व्यक्ति के पास अपार काला धन होता है।
1- पितृ दोष- यह किसी जातक की जन्मकुण्डली में सूर्य-राहु, सूर्य-शनि दोषों के कारण दोष हो तो इसके लिए नारायण बलि नाग बलि, गया श्राद्ध, अश्विन कृष्ण पक्ष में अपने दिवंगत पितरों का श्राद्ध, पितृ तर्पण, ब्राह्मण भोजन व दानादि करना चाहिए।
2- मातृ दोष- यदि चंद्रमा पंचमेश होकर शनि, राहु, मंगल आदि क्रूर ग्रहों से युक्त या आक्रांत हो और गुरु अकेला पंचम या नवम भाव में हो तो मातृ दोष के कारण संतान सुख में कमी आती है। इस दोष की शांति के लिए गोदान अथवा चांदी के पात्र में गो दुग्ध भरकर दान देना शुभ होता है। इसके अलावा एक लाख गायत्री मंत्र का जप करवाकर हवन, ब्राह्मण भोजन, वस्त्रादि का दान एवं दशमांस का तर्पण करने से दोष शांत होता है। पीपल वृक्ष का 28 हजार परिक्रमा का विधान भी बताया गया है।
3- भातृशाप- तृतीय भावेश मंगल राहु युक्त होकर पंचम भाव में हो और पंचमेश व लग्नेश दोनों अष्टम भाव में हो तो भ्रातृ शाप के कारण कष्ट एवं हानि होती है। इसके उपास स्वरूप श्रीसत्यनारायण व्रत रखकर विधि पूर्वक विष्णु पूजन तथा विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर प्रसाद वितरण करना चाहिए।
4-सर्प शाप- यदि पंचम भाव में राहु हो और उसपर मंगल की दृष्टि हो तो सर्प शाप के कारण संतान की हानि होती है। इसके उपाय स्वरूप नारायण नागबलि विधि पूर्वक करवाना चाहिए तथा ब्राह्मणों को यथा शक्ति भोजन, वस्त्र, गौ, भूमि, चांदी व सुवर्ण आदि का दान करना चाहिए।
5-ब्राह्मण शाप- यदि गुरु की राशि (धनु या मीन) पर राहु हो, पंचम में गुरु, मंगल व शनि हो तथा नवमेश ग्रह अष्टम में हो तो ब्राह्मण शाप से संतान का क्षय होता है। इस शाप की शांति के लिए मंदिर में या सुपात्र ब्राह्मण को श्रीलक्ष्मीनारायण की मूर्तियों का दान तथा यथाशक्ति कन्यादान, बछड़े सहित गोदान, शैय्या दान दक्षिणा सहित करना शुभ होता है।
6- मातुल शाप- पांचवें भाव में मंगल, बुध, गुरु व राहु हों तो मामा के शाप से संतान की हानि होती है। उपाय स्वरूप किसी मंदिर में श्रीविष्णु प्रतिमा की स्थापना, लोक हितार्थ पुल, तालाब, नल या प्याऊ लगवाने से संतति व संपत्ति में वृद्धि होती है।
7- प्रेत शाप- जब किसी जातक की जन्मकुण्डली के पंचम भाव में शनि, रवि हों और सातवें में क्षीण चंद्रमा हो तथा लग्न में राहु व 12वें भाव में गुरु हो तो प्रेत शाप क९ कारण वंश वृद्धि में बाधाएं आती हैं।
विशेष- इसके अतिरिक्त यदि किसी जातक द्वारा अपने दिवंगत पितरों के श्रद्धादि कर्म ठीक से न किए जा सके हों अथवा दिवंगत माता-पिता की उचित सेवा न की जा सकी हो तो भी प्रेत-पिशाचादि के कारण वंश वृद्धि में बाधाएं आती हैं। उपाय स्वरूप भगवान शिव की पूजा करवाकर विधिवत रूद्राभिषेक करवाना चाहिए और ब्राह्मणों को दान देना चाहिए।
इन शापों के कारण व्यक्ति की उन्नति नहीं होती, पुरुषार्थ का फल उसे प्राप्त नहीं होता। उसकी संतान जीवित नहीं रहती, इत्यादि। इन सब बुरे प्रभावों का कारण शापित कुंडलियां हैं। शापित कुंडलियों में त्रिशूल योग के आधार पर कालसर्प योग की तरफ ज्योतिष विद्वानों का ध्यान खींचा गया है। शापित कुंडलियों और कालसर्प योग की कुंडलियों में काफी हद तक समानता पाई जाती है।
जन्मांग में किसी भी स्थान में राहु-मंगल, राहु-बुध, राहु-गुरु, राहु-शुक्र, राहु-शनि, राहु-रवि इनमें से एक भी युती हो तो उस कुंडली को शापित कुंडली कहना चाहिए। इसी तरह चंद्र-केतु, रवि-केतु, रवि-राहु, इन ग्रहों की युतियां या प्रतियोग, रवि-केतु युती या प्रतियोग, चंद्र, राहु युति, चंद्र-शनि-राहु, चंद्र-मंगल राहु ऐसी युतियां भी शापित कुंडलियों में देखने में आती हैं।सभी ग्रह राहु-केतु के बीच अटके हुए हों तो ‘पूर्ण कालसर्प योग’ बनता है और यदि कोई एक ग्रह राहु-केतु की पकड़ के बाहर हो तो ऐसी स्थिति को ‘कालसर्प योग छाया’ कहना चाहिए।‘कालसर्प योग’ वृषभ, मिथुन, कन्या एवं तुला लग्र के व्यक्तियों को विशेष रूप से प्रभावित करता है।कुंडली में राहु अष्टम  स्थान में और केतु द्वितीय स्थान में हो और ऐसी अवस्था में यदि ‘कालसर्प योग’ बने तो यह ‘योग’ कष्टकारक होता है। ऐसे व्यक्तियों को सपने में सांप दिखाई देते हैं और व्यक्ति नींद में घबराकर भयभीत हो उठ बैठता है।ग्रहों के गोचर भ्रमण का फलित ज्योतिष में बड़ा महत्व है। कुंडली में जब गोचर भ्रमण से राहु छठे, आठवें या बारहवें स्थान में भ्रमण करता है तब या राहु-केतु की दशा-अंतर्दशा में कालसर्प योग के फल तीव्रता के साथ अनुभव में आते हैं

राहु-केतु: की शान्ति के उपाय

राहु-केतु: की शान्ति के उपाय
====================
राहू -केतु दोनों पापी ग्रह हैं जिनका स्वतंत्र भौतिक अस्तित्व तो नहीं है किन्तु यह सभी ग्रहों के प्रभावों को प्रभावित करते हैं |अधिकतर अशुभता व्यक्ति के जीवन में इनके ही कारण आती है यद्यपि कारण मूल ग्रहों से उत्पन्न होता है |यह छोटे से कारण को इतना बधा देते हैं की व्यक्ति के लिए वह धातक हो जाता है |इनके स्वतंत्र गुण न होने पर भी यह क्रूर कर्म और पाप प्रभाव को अधिक बढाते हैं |कभी कभी यह व्यक्ति को लाभ भी देते हैं किन्तु तरीका उल्टा होता है |धन भी देब्गे तो सही रास्ते से नहीं |इनके पाप प्रभावों के कारण ही इन्हें अधिकांश भयकारक माना जाता है |
राहु और केतु ग्रह से पीड़ित व्यक्ति को रोजाना कबूतरों को बाजरा और काले तिल मिलाकर खिलाना चाहिए। कुष्ठ रोगियों को दो रंग वाली वस्तुओं का दान करें। मोर पंख की पूजा करें या हो सके तो उसे हमेशा अपने पास रखें। गिलहरी को दाना डालें। दो रंग के फूलों को घर में लगाएं और गणेशजी को अर्पित भी करें। हर मंगलवार या शनिवार को चीटियों को मीठा खिलाएं।
राहु
१॰ ऐसे व्यक्ति को अष्टधातु का कड़ा दाहिने हाथ में धारण करना चाहिए।
२॰ हाथी दाँत का लाकेट गले में धारण करना चाहिए।
३॰ अपने पास सफेद चन्दन अवश्य रखना चाहिए। सफेद चन्दन की माला भी धारण की जा सकती है।
४॰ जमादार को तम्बाकू का दान करना चाहिए।
५॰ दिन के संधिकाल में अर्थात् सूर्योदय या सूर्यास्त के समय कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नहीम करना चाहिए।
६॰ यदि किसी अन्य व्यक्ति के पास रुपया अटक गया हो, तो प्रातःकाल पक्षियों को दाना चुगाना चाहिए।
७॰ झुठी कसम नही खानी चाहिए।: जौ या मूली या काली सरसों का दान करें या अपने सिरहाने रख कर अगले दिन बहते हुए पानी में बहाए ,
राहु के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु शनिवार का दिन, राहु के नक्षत्र (आर्द्रा, स्वाती, शतभिषा) तथा शनि की होरा में अधिक शुभ होते हैं।राहु के अशुभ होने पर हांथ के नाखून अपने आप टूटने लगे, राजक्ष्यमा रोग के लक्षण प्रगट होवे, दिमागी संतुलन ठीक न रहे, शत्रुओं के चाल पे चाल से मुश्किल बढ़ जावे ऐसी स्थिति में जौं या अनाज को दूध में धो कर बहते पानी में बहायें, कोयला को पानी में बहायें, मूली दान में देवें, भंगी को शराब,मांस दान में दें । सिर में चुटैया रखें, भैरव जी की की उपासना करें ।
राहु के लिए : समय रात्रिकाल
भैरव पूजन या शिव पूजन करें। काल भैरव अष्टक का पाठ करें।
राहु मूल मंत्र का जप रात्रि में 18,000 बार 40 दिन में करें।
मंत्र : 'ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम:'।
दान-द्रव्य : गोमेद, सोना, सीसा, तिल, सरसों का तेल, नीला कपड़ा, काला फूल, तलवार, कंबल, घोड़ा, सूप।
शनिवार का व्रत करना चाहिए। भैरव, शिव या चंडी की पूजा करें। 8 मुखी रुद्राक्ष धारण करें।
केतु
-----
१॰ भिखारी को दो रंग का कम्बल दान देना चाहिए।
२॰ नारियल में मेवा भरकर भूमि में दबाना चाहिए।
३॰ बकरी को हरा चारा खिलाना चाहिए।
४॰ ऊँचाई से गिरते हुए जल में स्नान करना चाहिए।
५॰ घर में दो रंग का पत्थर लगवाना चाहिए।
६॰ चारपाई के नीचे कोई भारी पत्थर रखना चाहिए।
७॰ किसी पवित्र नदी या सरोवर का जल अपने घर में लाकर रखना चाहिए।
केतु के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु मंगलवार का दिन, केतु के नक्षत्र (अश्विनी, मघा तथा मूल) तथा मंगल की होरा में अधिक शुभ होते हैं |इसके अशुभ प्रभाव में होने पर मूत्र एवं किडनी संबंधी रोग होवे, जोड़ों का रोग उभरे, संतान को पीड़ा होवे तब अपने खाने में से कुत्ते को हिस्सा देवें, तिल व कपिला गाय दान में दें, कान छिदवायें व श्री विघ्नविनायक की आराधना करें ।: मिट्टी के बने तंदूर में मीठी रोटी बनाकर 43 दिन कुत्तों को खिलाएँ या सवा किलो आटे को भुनकर उसमे गुड का चुरा मिला दे और ४३ दिन तक लगातार चींटियों को डाले, या कला सफ़ेद कम्बल कोढियों को दान करें या आर्थिक नुकासन से बचने के लिए रोज कौओं को रोटी खिलाएं. या काला तिल दान करे,|
केतु के लिए : समय रात्रिकाल
भगवान गणेशजी की पूजा करें। गणेश के द्वादश नाम स्तोत्र का पाठ करें। केतु के मूल मंत्र का रात्रि में 40 दिन में 18,000 बार जप करें।
मंत्र : 'ॐ स्रां स्रीं स्रौं स: केतवे नम:'।
दान-द्रव्य : लहसुनिया, सोना, लोहा, तिल, सप्त धान्य, तेल, धूमिल, कपड़ा, फूल, नारियल, कंबल, बकरा, शस्त्र।
बृहस्पतिवार व्रत एवं गणेशजी की पूजा करें। 9 मुखी रुद्राक्ष धारण करें।

चन्द्र और चन्द्र लग्न का महत्व

चन्द्र और चन्द्र लग्न का महत्व:::-
-----------------------------------------
दक्षिण भारत को छोड़कर पूरे भारत में प्रत्येक जन्मपत्री में दो लग्न बनाये जाते हैं। एक जन्म लग्न और दूसरा चन्द्र लग्न। जन्म लग्न को देह समझा जाये तो चन्द्र लग्न मन है। बिना मन के देह का कोई अस्तित्व नहीं होता और बिना देह के मन का कोई स्थान नहीं है। देह और मन हर प्राणी के लिए आवश्यक है इसीलिये लग्न और चन्द्र दोनों की स्थिति देखना ज्योतिष शास्त्र में बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। सूर्य लग्न का अपना महत्व है। वह आत्मा की स्थिति को दर्शाता है। मन और देह दोनों का विनाश हो जाता है परन्तु आत्मा अमर है।
चन्द्र ग्रहों में सबसे छोटा ग्रह है। परन्तु इसकी गति ग्रहों में सबसे अधिक है। शनि एक राशि को पार करने के लिए ढ़ाई वर्ष लेता है, बृहस्पति लगभग एक वर्ष, राहू लगभग १४ महीने और चन्द्रमा सवा दो दिन - कितना अंतर है। चन्द्रमा की तीव्र गति और इसके प्रभावशाली होने के कारण किस समय क्या घटना होगी, चन्द्र से ही पता चलता है। विंशोत्तरी दशा, योगिनी दशा, अष्टोतरी दशा आदि यह सभी दशाएं चन्द्र की गति से ही बनती है। चन्द्र जिस नक्षत्र के स्वामी से ही दशा का आरम्भ होता है। अश्विनी नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक की दशा केतु से आरम्भ होती है क्योंकि अश्विनी नक्षत्र का स्वामी केतु है। इस प्रकार जब चन्द्र भरणी नक्षत्र में हो तो व्यक्ति शुक्र दशा से अपना जीवन आरम्भ करता है क्योंकि भरणी नक्षत्र का स्वामी शुक्र है। अशुभ और शुभ समय को देखने के लिए दशा, अन्तर्दशा और प्रत्यंतर दशा देखी जाती है। यह सब चन्द्र से ही निकाली जाती है।
ग्रहों की स्थिति निरंतर हर समय बदलती रहती है। ग्रहों की बदलती स्थिति का प्रभाव विशेषकर चन्द्र कुंडली से ही देखा जाता है। जैसे शनि चलत में चन्द्र से तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव में हो तो शुभ फल देता है और दुसरे भावों में हानिकारक होता है। बृहस्पति चलत में चन्द्र लग्न से दूसरे, पाँचवे, सातवें, नौवें और ग्यारहवें भाव में शुभ फल देता है और दूसरे भावों में इसका फल शुभ नहीं होता। इसी प्रकार सब ग्रहों का चलत में शुभ या अशुभ फल देखना के लिए चन्द्र लग्न ही देखा जाता है। कई योग ऐसे होते हैं तो चन्द्र की स्थिति से बनते हैं और उनका फल बहुत प्रभावित होता है।
चन्द्र से अगर शुभ ग्रह छः, सात और आठ राशि में हो तो यह एक बहुत ही शुभ स्थिति है। शुभ ग्रह शुक्र, बुध और बृहस्पति माने जाते हैं। यह योग मनुष्य जीवन सुखी, ऐश्वर्या वस्तुओं से भरपूर, शत्रुओं पर विजयी , स्वास्थ्य, लम्बी आयु कई प्रकार से सुखी बनाता है।
जब चन्द्र से कोई भी शुभ ग्रह जैसे शुक्र, बृहस्पति और बुध दसवें भाव में हो तो व्यक्ति दीर्घायु, धनवान और परिवार सहित हर प्रकार से सुखी होता है।चन्द्र से कोई भी ग्रह जब दूसरे या बारहवें भाव में न हो तो वह अशुभ होता है। अगर किसी भी शुभ ग्रह की दृष्टि चन्द्र पर न हो तो वह बहुत ही अशुभ होता है।
इस प्रकार से चन्द्र की स्थिति से १०८ योग बनते हैं और वह चन्द्र लग्न से ही बहुत ही आसानी के साथ देखे जा सकते हैं।
चन्द्र का प्रभाव पृथ्वी, उस पर रहने वाले प्राणियों और पृथ्वी के दूसरे पदार्थों पर बहुत ही प्रभावशाली होता है। चन्द्र के कारण ही समुद्र मैं ज्वारभाटा उत्पन्न होता है। समुद्र पर पूर्णिमा और अमावस्या को २४ घंटे में एक बार चन्द्र का प्रभाव देखने को मिलता है। किस प्रकार से चन्द्र सागर के पानी को ऊपर ले जाता है और फिर नीचे ले आता है। तिथि बदलने के साथ-साथ सागर का उतार चढ़ाव भी बदलता रहता है।
प्रत्येक व्यक्ति में ६० प्रतिशत से अधिक पानी होता है। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है चन्द्र के बदलने का व्यक्ति पर कितना प्रभाव पड़ता होगा। चन्द्र के बदलने के साथ-साथ किसी पागल व्यक्ति की स्थिति को देख कर इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
चन्द्र साँस की नाड़ी और शरीर में खून का कारक है। चन्द्र की अशुभ स्थिति से व्यक्ति को दमा भी हो सकता है। दमे के लिए वास्तव में वायु की तीनों राशियाँ मिथुन, तुला और कुम्भ इन पर अशुभ ग्रहों की दृष्टि, राहु और केतु का चन्द्र संपर्क, बुध और चन्द्र की स्थिति यह सब देखने के पश्चात ही निर्णय लिया जा सकता है।
चन्द्र माता का कारक है। चन्द्र और सूर्य दोनों राजयोग के कारक होते हैं। इनकी स्थिति शुभ होने से अच्छे पद की प्राप्ति होती है। चन्द्र जब धनी बनाने पर आये तो इसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता।
चन्द्र खाने-पीने के विषय में बहुत प्रभावशाली है। अगर चन्द्र की स्थिति ख़राब हो जाये तो व्यक्ति कई नशीली वस्तुओं का सेवन करने लगता है। जातक पारिजात के आठवें अध्याय के १००वे श्लोक में लिखा है चन्द्र उच्च का वृष राशि का हो तो व व्यक्ति मीठे पदार्थ खाने का इच्छुक होता है।

कैसे बचें जेल योग से.

कैसे बचें कारावास योग से..?
  💐💐💐
यदि समय रहते आपको कारावास सम्बन्धी योग पता चलते हैं या इस तरह की स्थिति आपके सामने आती है, तो रेमेडियल एस्ट्रोलॉजी की सहायता से आप इस योग को समाप्त या उसकी तीव्रता को कम कर सकते हैं| इस प्रकार के योगों से बचने के लिए निम्नलिखित उपायों का सहारा लेना चाहिए :
1. सर्वप्रथम यह पता करें कि किन ग्रहों के कारण यह योग निर्मित हो रहा है| फिर उस ग्रह की शान्ति हेतु उसके चतुर्गुणित जप करवाएँ, हवन करें, निश्‍चित संख्या में उससे सम्बन्धित वार के व्रत करें और तदनुसार सम्बन्धित वस्तुओं का दान करें|
2. शुभ मुहूर्त में भगवान् शिव के नर्मदेश्‍वर शिवलिंग पर सात सोमवार तक सहस्रघट करवाएँ|
3. अपनी आयु वर्षों के चतुर्गुणित संख्या में किलोग्राम ज्वार लें और जिस ग्रह के कारण यह योग बन रहा हो, उस ग्रह के वार को या शनिवार को प्रारम्भ कर ज्वार एक-एक मुट्ठी डालते हुए कबूतरों को खिलाएँ|
4. यदि आपने वास्तव में अपराध किया है, तो यह निश्‍चित है कि आपको उसकी सजा मिलेगी, इतना अवश्य है कि उपाय करने से या प्रायश्‍चित से वह सजा कम हो जाएगी| जिस व्यक्ति के प्रति आपने अपराध किया है, उससे क्षमा मॉंगें| इसके अतिरिक्त शनिवार से प्रारम्भ कर किसी शिव मन्दिर में जाएँ और भगवान् के समक्ष अपने सारे अपराध स्वीकार करें| यह ध्यान रखें कि मन्दिर आपके घर के पास में नहीं हो, थोड़ा दूर हो और वहॉं आप नंगे पैर ही जाएँ|
5. शनिवार से प्रारम्भ कर चालीस दिनों तक मूँगा के हनूमान् जी की मूर्ति के समक्ष हनूमान् चालीसा के प्रतिदिन 100 पाठ करें या करवाएँ| पाठ से पूर्व संक्षेप में हनूमान् जी की पूजा भी करें|
6. शुभ मुहूर्त में प्रारम्भ कर ११ पण्डितों से ‘बन्दीमोचन स्तोत्र’ के 3100 पाठ करवाएँ|
7. जेल योग दूर करने के लिए यह टोटका अत्यन्त प्रसिद्ध और अनुभूत है| इसके अन्तर्गत अपनी जान-पहचान से या अन्य किसी की सहायता से एक दिन के लिए जेल जाएँ, वहॉं का भोजन करें और रात्रिकाल में वहीं शयन करें| इस उपाय से जेलयोग पूरा भी हो जाएगा और टल भी जाएगा|

कालसर्प योग

कालसर्प योग जन्म-कुण्डली मे बनने वाला एक योग है । बहुत से विद्वान इस योग को नहीं स्वीकार करते । समस्याएं हैं अगर तो उनका सस्ता प्रभावशाली स्वयं करने वाला जाप व उपाय भी है । दुनिया के बहुत सफल तथा प्रसिद्ध लोगो की कुण्डली में यह योग देखा गया है । काल सर्प योग कब दण्ड देता है -
१. जब-जब राहु की दशा , अन्तर्दशा,, प्रत्यन्तर्दशा आती है |
२. जब - जब भी गोचरवशात राहु अशुभ चलता हो |
३. जब भी गोचर से काल सर्प योग की सृष्टि हो

जब अन्य सभी ग्रह राहु-केतु के एक तरफ होते हैं तो कुण्डली में काल-सर्प योग (दोष) बनता है । मुख्य रूप से १२ कालसर्प दोष हैं -
१) अनन्त कालसर्प दोष- जब राहु प्रथम भाव में हो तथा केतु सातवें भाव में हो | जातक को जल्दी गुस्सा आता है | सफाई पसंद नहीं रहता | विवाहित जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ता है |
२) कुलिक कालसर्प दोष -जब राहु द्वितीय भाव में हो तथा केतु अष्टम भाव में हो | सम्पति पर बुरा प्रभाव पड़ता है | जुबान पर नियंत्रण नहीं रहता | दुर्घटना और शल्य-चिकित्सा भी करवा देता है |
३) वासुकी कालसर्प दोष -जब राहु तृतीय भाव में हो तथा केतु नवम भाव में हो | छोटे भाई-बहन से नहीं निभ पाती | कार्य के लिए संघर्ष नहीं कर पाता |
४) शंखपाल कालसर्प दोष -जब राहु चतुर्थ भाव में हो तथा केतु दशम भाव में हो | सुख-सुविधा में कमी आती है | कारोबार और नौकरी में परेशानी रहती है | माता सुख में कमी | अधिक गुस्सा |
५) पद्म कालसर्प दोष -जब राहु पंचम भाव में हो तथा केतु एकादश भाव में हो | शिक्षा प्रभावित होती है | औलाद होने में देरी | प्रेम-सम्बन्ध में समस्या |
६) महापद्म कालसर्प दोष -जब राहु छठे भाव में हो तथा केतु द्वादश भाव में हो | अधिक दुशमन | कर्जा , शारीरिक कमजोरी |
७) तक्षक कालसर्प दोष -जब राहु सातवें भाव में हो तथा केतु प्रथम भाव में हो | vivahik जीवन पर बुरा असर | विवाह में देरी | सिरदर्द ,उच्च रक्तचाप , क्रूरता |
८) कर्कोटक कालसर्प दोष -जब राहु अष्टम भाव में हो तथा केतु द्वितीय भाव में हो | बीमारी , bachat में कमी | ससुराल से झगड़ा | पैतृक़ सम्पति मिलने में रुकावट |
९) शंखचूड़ कालसर्प दोष -जब राहु नवम भाव में हो तथा केतु तृतीय भाव में हो | जुए,सट्टे की आदत | नास्तिक | रिश्तेदारों से झगड़ा | दुर्भाग्य |
१०) पातक कालसर्प दोष -जब राहु दशम भाव में हो तथा केतु चतुर्थ भाव में हो | सुविचारों में कमी | मानसिक अशांति |
११) विषधर कालसर्प दोष -जब राहु एकादश भाव में हो तथा केतु पंचम भाव में हो | पैसा कमाने में समस्या | अधिक यात्रा | भाई दुश्मन बन जाता है | बच्चे से भी परेशानी |
१२) शेषनाग कालसर्प दोष -जब राहु द्वादश भाव में हो तथा केतु छठे भाव में हो | कर्जा , सम्मान में कमी | दुश्मन से नुक्सान | बीमारी |