Sunday, February 4, 2018

अनजाने कर्म का फल


What is Karma? How it works?

अनजाने कर्म का फल

एक राजा ब्राह्मणों को लंगर में महल के आँगन में भोजन करा रहा था।

राजा का रसोईया खुले आँगन में भोजन पका रहा था।

उसी समय एक चील अपने पंजे में एक जिंदा साँप को लेकर राजा के महल के उपर से गुजरी।

तब पँजों में दबे साँप ने अपनी आत्म-रक्षा में चील से बचने के लिए अपने फन से ज़हर निकाला।

तब रसोईया जो लंगर ब्राह्मणो के लिए पका रहा था, उस लंगर में साँप के मुख से निकली जहर की कुछ बूँदें खाने में गिर गई।

किसी को कुछ पता नहीं चला।

फल-स्वरूप वह ब्राह्मण जो भोजन करने आये थे उन सब की जहरीला खाना खाते ही मौत हो गयी।

अब जब राजा को सारे ब्राह्मणों की मृत्यु का पता चला तो ब्रह्म-हत्या होने से उसे बहुत दुख हुआ।

ऐसे में अब ऊपर बैठे यमराज के लिए भी यह फैसला लेना मुश्किल हो गया कि इस पाप-कर्म का फल किसके खाते में जायेगा

(1) राजा: जिसको पता ही नहीं था कि खाना जहरीला हो गया है
या
(2 ) रसोईया: जिसको पता ही नहीं था कि खाना बनाते समय वह जहरीला हो गया है
या
(3) वह चील: जो जहरीला साँप लिए राजा के उपर से गुजरी
या
(4) वह साँप: जिसने अपनी आत्म-रक्षा में ज़हर निकाला

बहुत दिनों तक यह मामला यमराज की फाईल में अटका रहा...

फिर कुछ समय बाद कुछ ब्राह्मण राजा से मिलने उस राज्य मे आए और उन्होंने किसी महिला से महल का रास्ता पूछा।

उस महिला ने महल का रास्ता तो बता दिया पर रास्ता बताने के साथ-साथ ब्राह्मणों से ये भी कह दिया कि "देखो भाई ....जरा ध्यान रखना .... वह राजा आप जैसे ब्राह्मणों को खाने में जहर देकर मार देता है।

बस जैसे ही उस महिला ने ये शब्द कहे, उसी समय यमराज ने फैसला ले लिया कि उन मृत ब्राह्मणों की मृत्यु के पाप का फल इस महिला के खाते में जाएगा और इसे उस पाप का फल भुगतना होगा।

यमराज के दूतों ने पूछा - प्रभु ऐसा क्यों ??
जब कि उन मृत ब्राह्मणों की हत्या में उस महिला की कोई भूमिका भी नहीं थी।

तब यमराज ने कहा कि - भाई देखो, जब कोई व्यक्ति पाप करता हैं तब उसे बड़ा आनन्द मिलता हैं।
पर उन मृत ब्राह्मणों की हत्या से ना तो राजा को आनंद मिला, ना ही उस रसोइया को आनंद मिला, ना ही उस साँप को आनंद मिला और ना ही उस चील को आनंद मिला।

पर उस पाप-कर्म की घटना का बुराई करने के भाव से बखान कर उस महिला को जरूर आनन्द मिला।
इसलिये राजा के उस अनजाने पाप-कर्म का फल अब इस महिला के खाते में जायेगा।

बस इसी घटना के तहत आज तक जब भी कोई व्यक्ति जब किसी दूसरे के पाप-कर्म का बखान बुरे भाव से (बुराई) करता हैं तब उस व्यक्ति के पापों का हिस्सा उस बुराई करने वाले के खाते में भी डाल दिया जाता हैं।

अक्सर हम जीवन में सोचते हैं कि हमने जीवन में ऐसा कोई पाप नहीं किया, फिर भी हमारे जीवन में इतना कष्ट क्यों आया??

ये कष्ट और कहीं से नहीं, बल्कि लोगों की बुराई करने के कारण उनके पाप-कर्मो से आया होता हैं जो बुराई करते ही हमारे खाते में ट्रांसफर हो जाता हैं|||

Saturday, February 3, 2018

ऋण रोग शत्रु हावी रहेगे

ऋण रोग शत्रु जातक पर हावी रहेगे या जातक
मित्रों आज के समय में अधिकतर लोग अपने विरोधियों से परेशान रहते है तो आज ज्योतिष में आप अपने विरोधियों पर हावी रहेगे या आपके विरोधी आपके उपर हावी रहेगे उसको देखने के लिए ज्योतिषीय फार्मूला लिख रहा हूँ | |
इसका अध्ययन करने के लिए आप अपनी कुंडली के लग्न और लग्नेश के साथ छटशेष यानी की रोगेश और रोग भाव का अध्ययन करे | यदि आपकी कुंडली में लग्न और लग्नेश रोगेस और छटा भाव से मजबूत है तो आप अपने शत्रु पर हावी रहेगे अन्यथा विपरीत सिथ्ती में आपके विरोधी आपके उपर हावी रहेगे |
लग्न के बली होने के लिए उसके उपर लग्नेश की दृष्टी हो या लग्न में ही लग्नेश हो लग्न के उपर पाप ग्रह की दृष्टी न हो और शुभ ग्रह की दृष्टी लग्न पर हो तो लग्न बलि होगा | साथ ही लग्न की डिग्री अच्छी हो वो डिग्री के हिसाब से बलि हो | इसी प्रकार यदि लग्नेश मित्र या उंच राशि में हो शुभ ग्रह से द्रिस्ट या युक्त हो और पाप ग्रह के प्रभाव से मुक्त हो , जिस भाव में सिथत हो उसमे अस्ठ्क वर्ग में पर्याप्त बिंदु लिए हुवे हो तो लग्नेश बली होगा |
इसी प्रकार छ्टे भाव का कमजोर होना आवश्यक है उसका स्वामी नीच राशि में या अपनी शत्रु राशि में हो , छटे भाव में शुभ ग्रह हो आदि कारण से यदि छटा भाव कमजोर हो लग्नेश की अपेक्षा तो जातक हमेशा अपने शत्रु पक्ष पर हावी रहता है | चूँकि ये भाव ऋण रोग को भी दर्शाता है इसिलिय जातक को ऋण रोग भी परेशान नही कर पाते |.
रोगेश और लग्नेश के साथ होने पर जो भी इनमे अपेक्षाकृत ज्यादा बली होगा उसका प्रभाव जातक पर ज्यादा रहेगा |
यदि इस से विपरीत सिथ्ती हो तो फल भी विपरीत समझना चाहिए |

Thursday, February 1, 2018

कुंडली में मंगल है मजबूत तो मिलेंगे ये शुभ परिणाम

कुंडली में मंगल है मजबूत तो मिलेंगे ये शुभ परिणाम

ज्योतिष के आधार नवग्रहों में से प्रत्येक की हमारे जीवन संचालन में एक विशेष भूमिका होती है परंतु इसमें भी मंगल हमारी जन्मकुंडली में कुछ ऐसे विशेष घटकों को नियंत्रित करता है जिनसे हमें अपने जीवन के संघर्षों और बाधाओं का सामना करने की हिम्मत और प्रेरणा मिलती है। ज्योतिष में मंगल अग्नि तत्व ग्रह है जो लाल रंग और क्षत्रिय वर्ण के गुण रखने वाला है, मेष और वृश्चिक राशि पर मंगल का आधिपत्य है अर्थात मंगल मेष और वृश्चिक राशि का स्वामी है, मकर राशि में मंगल उच्चस्थ तथा कर्क मंगल की नीच राशि है। सूर्य, बृहस्पति और चन्द्रमाँ मंगल के मित्र ग्रह हैं तथा शनि, शुक्र, बुध और राहु से मंगल की शत्रुता है। मंगल किसी भी राशि में लगभग 45 दिन अर्थात डेढ़ महीना गोचर करता है और फिर अगली राशि में प्रवेश करता है।

ज्योतिष में वैसे तो मंगल को बहुत सी चीजों का करक माना गया है जैसे तकनीकी कार्यो का कारक मंगल होता है इंजीनियरिंग और शल्यचिकित्सा के क्षेत्र में मंगल की अहम भूमिका होती है धातु, हथियार, बड़े भाई, विधुत, अग्नि, भूमि, सेना, पुलिस, सुरक्षा कर्मी, लड़ाई झगड़ा, रक्त, मांसपेशियां, पित्त, दुर्घटना और स्त्रियों का मांगल्य आदि बहुतसे घटकों का कारक मंगल होता है, परंतु यहाँ हम मंगल के उन कुछ विशेष कारकतत्वों का वर्णन करना चाहते हैं जो हमारे प्रवाह में हमारे विशेष सहायक होते हैं वे हैं - "हिम्मत, शक्ति, पराक्रम, उत्साह, साहस और प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति"

अच्छा और बलि मंगल व्यक्ति को हिम्मत शक्ति और पराक्रम से परिपूर्ण एक उत्साही और निडर  व्यक्ति बनाता है। जिन लोगों की कुंडली में मंगल स्व या उच्च राशि (मेष, वृश्चिक, मकर) में हो या अन्य प्रकार बली हो तो ऐसा व्यक्ति बहुत साहसी और किसी से ना दबने वाला अटल प्रवर्ति का व्यक्ति होता है, बलवान मंगल व्यक्ति को किलिंग स्प्रिट देता है जिससे व्यक्ति जिस काम को करने की ठान ले उसे पूरा करके ही दम लेता है। कुंडली में मंगल बलवान होने पर व्यक्ति अपने कार्य के प्रति बहुत पैशन रखने वाला होता है और ऐसा व्यक्ति विपरीत परिस्थिति में भी मेहनत करना नहीं छोड़ता। कुंडली में बलवान मंगल व्यक्ति को परिस्पर्धा की कुशलता भी देता है जिससे वह अपने विरोधियों पर सदैव हावी रहता है।

ज्योतिष में मंगल को किशोरावस्था का कारक माना गया है जो कभी वृद्ध नहीं होता, फलित ज्योतिष में कोई भी ग्रह किसी राशि में 1 से 30 डिग्री के बीच कितनी डिग्री पर है इसका फलित पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है कोई भी ग्रह जब अधिक डिग्री का विशेषकर 30 डिग्री के आसपास का हो तो वह वृद्धावस्था का होकर कमजोर माना जाता है परंतु एक ऐसा ग्रह है जो अधिक डिग्री का होने पर भी बलि ही रहता है क्योंकि यह किशोरावस्था का कारक है, अतः जिन लोगों की कुंडली में मंगल बहुत बलवान होता है वे 50 की उम्र में भी 25 - 30 के सामान प्रतीत होते हैं। मंगल के इन्ही विशेष गुणधर्मों के कारण सेना, नेवी, एयर फ़ोर्स, पुलिस, सुरक्षा गार्ड, एथलीट, स्पोर्ट्समैन, आदि लोगो के जीवन में उनकी कुंडली में स्थित बलवान मंगल की अहम भूमिका होती है
हमारे स्वास्थ पक्ष में भी मंगल अपनी विशेष भूमिका निभाता है मुख्य रूप से रक्त, मांसपेशियां, और पित्त को मंगल नियंत्रित करता है यदि कुंडली में मंगल छटे, आठवे भाव में हो, नीच राशि में हो या अन्य प्रकार पीड़ित हो तो ऐसे में व्यक्ति को रक्त से जुडी समस्याएं, मसल्सपेन, एसिडिटी, गॉलब्लेडर की समस्याएं, फुंसी फोड़े और मुहासे आदि की समस्याएं अधिक होती हैं इसके आलावा पीड़ित या कमजोर मंगल व्यक्ति को कुछ भयभीत स्वाभाव का भी बनाता है और व्यक्ति प्रतिस्पर्धा से घबराता है।

कुंडली में मंगल कमजोर होने पर " हनुमान चालीस और सुन्दरकाण्ड का पाठ तथा ॐ अंग अंगारकाय नमः का नियमित जाप बहुत लाभकारी होता है।

कमजोर बुध उत्पन्न करता है ये स्वास्थ समस्याएँ

कमजोर बुध उत्पन्न करता है ये स्वास्थ समस्याएँ -

फलित ज्योतिष में बुध अपनी बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और हमारे जीवन के बहुत विशेष घटकों को नियंत्रित करता है बुध को सबसे कम आयु का ग्रह माना गया है इस लिए इसे राजकुमार का पद दिया गया है, बुध का रंग हरा है वर्ण वैश्य  है बुध मिथुन और कन्या राशि का स्वामी है कन्या राशि बुध की उच्च राशि भी है और मीन राशि में बुध नीचस्थ अर्थात सबसे कमजोर होता है, शनि, शुक्र और राहु  बुध के मित्र ग्रह हैं और गोचरवश बुध किसी भी राशि में लगभग एक माह रहता है।

ज्योतिष में बुध को वैसे तो बुद्धि, कैचिंग पॉवर, तर्कशक्ति, निर्णय क्षमता, याददास्त, सोचने समझने की क्षमता,  वाणी, बोलने की क्षमता, उच्चारण, व्यव्हार कुसलता, सूचना, संचार, यातायात, व्यापार, वाणिज्य, गणनात्मक विषय, लेखन,  कम्युनिकेशन और गहन अध्ययन का कारक माना गया है और ये सभी घटक हमारे जीवन में बहुत अहम भूमिका निभाते हैं विशेषतः बुद्धि क्षमता की तो आज के समय में सर्वाधिक और हर जगह आवश्यकता होती है
पर इन सब के अलावा बुध का हमारे स्वास्थ और शरीर पर भी बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है बुध हमारे शरीर के बहुत विशेष घटकों को नियंत्रित करता है ज्योतिष की चिकित्सीय शाखा में बुध को मष्तिष्क, नर्वस-सिस्टम, गला, नसें, त्वचा, बोलने की क्षमता, याददाश्त आदि का प्रतिनिधित्व बुध ही करता है इसलिए यदि कुंडली में बुध कमजोर या पीड़ित हो तो व्यक्ति को कुछ विशेष
स्वास्थ समस्यायों का सामना करना पड़ता है –

यदि कुंडली में बुध नीच राशि (मीन) में हो, छटे या आठवे भाव में स्थित हो, केतु या मंगल से पीड़ित हो, सूर्य के साथ समान अंश पर होने से पूर्णासत हो, षष्टेश अष्टमेश से पीड़ित हो या अन्य किसी भी प्रकार जब बुध बहुत कमजोर या पीड़ित हो ऐसे में व्यक्ति को मष्तिष्क से जुडी समस्यायें और न्यूरो प्रॉब्लम्स रहती हैं, मष्तिष्क से ही शरीर की सभी गतिविधियां नियंत्रित होती हैं इसलिए फिट्स पड़ने वाली समस्या भी कुंडली में बुध पीड़ित होने के कारण ही होती है, बुध पीड़ित होना ही नर्वससिस्टम और नसों से जुडी समस्याएं उत्पन्न करता है, कुंडली में पीड़ित बुध के कारण व्यक्ति को त्वचा संबंधी समस्याएं (स्किन प्रॉब्लम्स) और स्किन एलर्जी की समस्या बहुत होती है इसके अलावा कुंडली में बुध का पीड़ित होना उच्चारण को लेकर भी समस्याएं देता है हकलाहट या शब्दों को स्पष्ट रूप से ना बोल पाने की समस्या भी कमजोर या पीड़ित बुध के कारण ही होती है, गले से जुडी समस्याएं जल्दी जल्दी टॉन्सिल होना भी पीड़ित बुध के ही लक्षण हैं, जिन लोगों की कुंडली में बुध पीड़ित स्थिति में होता है उन्हें याददाश्त से जुडी समस्याएं भी बहुत परेशान करती हैं ऐसे लोगो को बातों को भूलने की समस्या भी रहती है इन सबके अतिरिक्त बुध का पीड़ित होना व्यक्ति को हेजिटेशन की समस्या भी देता है।

वैसे तो प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली के ग्रहयोग भिन्न होने के से सबके लिए व्यक्तिगत उपाय अलग होते हैं पर यहाँ पीड़ित बुध से उत्पन्न स्वास्थ समस्याओं के लिए हम ऐसे उपाय बता रहे हैं जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति कर सकता है –
उपाय -

1. ॐ बुम बुधाय नमः का रोज सामर्थ्यानुसार 1, 2 या 3 माला जाप करें।

2. गणेश जी की उपासना करें।

3. प्रत्येक बुधवार को गाय को हरा चारा खिलाएं।

4. पेड़ पौधों का पालन पौषण करें।

5. किसी योग्य ज्योतिषी से सलाह के बाद पन्ना रत्न भी धारण किया जा सकता है।

आपकी राशि के हिसाब से आपकी सबसे बड़ी समस्या क्या है.

हर इंसान की जिंदगी में कोई न कोई समस्या जरूर होती है. अगर समस्याएं ही नहीं तो फिर कैसा जीवन. संघर्ष और समस्या जीवन का अभिन्न हिस्सा है. आइए जानते हैं आपकी राशि के हिसाब से आपकी सबसे बड़ी समस्या क्या है....👇

मेष राशि- आपकी सबसे बड़ी समस्या है - मन की चंचलता .

इसके लिए आपको हनुमान जी की उपासना करना बहुत उत्तम होगा.

और आपको पूजा में लाल फूलों का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए.

वृष राशि- आपकी सबसे बड़ी समस्या है - जिद्दी स्वभाव .

इसके लिए आपको शिव जी की उपासना करना उत्तम होगा.

आपको पूजा में सफ़ेद चन्दन का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए.

मिथुन राशि- आपकी सबसे बड़ी समस्या है- दुविधा का होना.

इसके लिए आपको श्री कृष्ण की पूजा करना सर्वोत्तम होगा .

आपको पूजा में गुग्गल के धूप का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए.

कर्क राशि- आपकी सबसे बड़ी समस्या है - जरूरत से ज्यादा भावनात्मक होना.

इसके लिए आपको शिव जी की उपासना करना सर्वोत्तम होगा.

आपको पूजा में शंख का प्रयोग करना चाहिए , उसे जरूर बजाना चाहिए.

सिंह राशि- आपकी सबसे बड़ी समस्या है - जीवन में ज्यादा संघर्ष होना.

इसके लिए आपको सूर्य देव की उपासना करनी चाहिए.

आपको पूजा में रोली का प्रयोग जरूर करना चाहिए.

कन्या राशि- आपकी सबसे बड़ी समस्या है- जरूरत से ज्यादा धन के पीछे भागना.

इसके लिए आपको देवी माँ की आरधना करनी चाहिए.

आपको पूजा में शुद्ध घी का दीपक जरूर जलाना चाहिए.

तुला राशि- आपकी सबसे बड़ी समस्या है - लापरवाह होना .

इसके लिए आपको भगवान कृष्ण की उपासना करनी चाहिए.

आपको पूजा में सफ़ेद फूलों का प्रयोग जरूर करना चाहिए.

वृश्चिक राशि- आपकी सबसे बड़ी समस्या है - जिन्दगी का धीरे चलना

इसके लिए आपको हनुमान जी की उपासना करनी चाहिए.

और आपको पूजा में तुलसी दल का प्रयोग जरूर करना चाहिए.

धनु राशि- आपकी सबसे बड़ी समस्या है- आपकी वाणी.

इसके लिए आपको सूर्य की उपासना जरूर करनी चाहिए.

अपनी पूजा में सफ़ेद मिठाई का इस्तेमाल जरूर करें.

मकर राशि- आपकी सबसे बड़ी समस्या है- अपनी सेहत के प्रति लापरवाही.

इसके लिए आपको शिव जी की उपासना जरूर करनी चाहिए.

आपके लिए पूजा में पीले रंग के आसन का प्रयोग करना सर्वोत्तम होगा.

कुम्भ राशि- आपकी सबसे बड़ी समस्या है- जरूरत से ज्यादा दूसरों के चक्कर में रहना.

इसके लिए आपको श्री कृष्ण की उपासना जरूर करनी चाहिए.

आपको अपनी पूजा में चन्दन की सुगंध वाली धूप का प्रयोग जरूर करना चाहिए.

मीन राशि- आपकी सबसे बड़ी समस्या है- जिम्मेदारियों के प्रति लापरवाही.

इसके लिए आपको भगवान गणेश की उपासना करनी चाहिए.

आपको अपनी पूजा में लड्डू का भोग जरूर लगाना चाहिए।

धन और ज्योतिष और पैसे का डूबना

धन और ज्योतिष और पैसे का डूबना

आज के समय में धन होना सबसे आवश्यक माना गया है वैसे भी पुरानी कहावत है की पहला सुख निरोगी काया दूजा सुख घर में धन माया यानी धन को प्राचीन समय से ही प्रमुखता दी गई है | आप खुद देखिये की तीजा सुख सुलक्षना नारी चोथा सुख पुत्र आज्ञाकारी पांचवां सुख राज में पासा छ टा सुख देश में वासा और सातवां सुख संतोषी जीवन यानि इन सभी मुख्य सुखों में धन के सुख को दूसरा स्थान दिया गया है |

ज्योतिष में हमारी कुंडली का दूसरा भाव धन का भाव माना गया है तो ग्यारवाँ भाव आय लाभ का तो सप्तम भाव हमारी दैनिक आमदनी का |

यदि ये किसी प्रकार से दूषित हो रहे हो तो धन की समस्या रहती है |

दूसरा भाव हमारी पारिवारिक धन की सिथ्ती और संचित धन की सिथ्ती दर्शाता है जब ये भाव इसका मालिक और इस भाव का कारक ग्रह सभी दूषित हो तो जातक को धन की समस्या का सामना अवस्य करना पड़ता है |

इसी प्रकार यदि ११वा भाव दूषित हो तो जातक को आमदनी में समस्या का सामना करना पड़ता है |
इसी प्रकार कुंडली का चोथा भाव जातक द्वारा खुद की कमाई से बनाये हुवे मकान भूमि वाहन आदि का होता है और इस भाव की कमजोरी इन सब सुखों में कुछ न कुछ कमी करती है |

 जैसा की उपर बताया की पहला सुख निरोगी काया यानी हमारी कुंडली का लग्न लग्नेश और पहले भाव का कारक इन सब की सिथ्ती सही हो तभी जातक इन सब सुखो को भोग सकता है |
सबसे बड़ी समस्या जो की आजकल लोगों को उसका सामना करना पड़ता है वो है धन का डूब जाना |

जब भी हमारी कुंडली में दुसरे भाव और छ्टे भाव का सम्बन्ध आपस में स्थापित हो जाता है यानी की जब धनेश छ्टे भाव में हो या छ्टे भाव का मालिक दुसरे भाव में हो तब ऐसे जातक के दिए हुवे पैसे जल्दी से वापिस नही आते|

ऐसी सिथ्ती में जब आय भाव के मालिक भी त्रिक भाव में हो तो ये सिथ्ती और ज्यादा भयानक हो जाती है और ऐसे जातक के पैसे डूबता ही डूबता है |
इसिलिय ऐसे जातकों को विशेष सावधानी रखने की आवश्यकता होती है |

अब समस्या आती है की धन की समस्या को कैसे दूर किया जाए |

तो सबसे पहले तो हमे अपनी कुंडली में उपर लिखित भावों में से यदि कोई भाव दूषित उस से सम्बन्धित उपाय करके कुछ हद तक समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है | साथ ही कुंडली का १२व भाव हमारे व्यय का होता है और यदि ये भाव बली हो तो जातक को खर्च का अधिक सामना करना पड़ता है ये अलग बात है की इसमें यदि शुभ ग्रह हो तो शुभ कार्यों पर खर्च होता है और अशुभ ग्रह हो तो अशुभ कार्यों जैसे बिम्मारी आदि पर अधिक खर्च होता है |
अब बात आती है धन के सामान्य उपाय
सबसे पहले तो आप अपने घर में धन या तिजोरी जहाँ रखते है वो स्थान घर के दक्षिण पश्चिम कोने में हो तो आपके लिय सबसे अच्छा रहेगा |
दूसरी मुख्य बात ये की आपक धन रखने का स्थान कभी भी खाली न होना चाहिए उसमे कुछ न कुछ रूपए अवश्य रखे यदि रूपए न हो तो बादाम आदि सूखे मेवे उस स्थान में अवश्य रखे |
जिनकी भी कुंडली में विष योग बन रहा हो उसे कभी भी लोहे की अलमारी या चमड़े से बनी हुई किसी वस्तु में अपना धन नही रखना चाहिए |
जिनकी भी कुंडली में गुरु बुद्ध का योग हो उन्हें अपने सोने के जेवर किसी हरे रंग के वस्त्र में लपेट कर रखने चाहिए |

ग्रहों के दुस्प्रभाव को दूर करने के लिय अपने भोजन में से गाय कुते और कोवे को खिलाना चाहिए { अपने प्रोशे गये भोजन में से एक हिसा अलग निकल कर रख लें }
घर में पत्नी शुक्र यानी साक्षात लक्ष्मी स्वरूप होती है अत: उसको भी खुस रखना आवश्यक है |

माता चन्द्र स्वरुप होती है जो की धनदायक माने गये है अत : माँ को खुश रखे बगैर सभी सुखों की कल्पना भी नही की जा सकती |
इसी प्रकार जिनकी कुंडली में चन्द्र चोथे भाव में हो उनको दिल खोलकर खर्च करना चाहिए क्योंकि लाल किताब में ऐसा माना गया है की ऐसा आदमी जितना खर्च करता है उसकी आमदनी उतनी ही ज्यादा बढती है |
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इन सबके साथ माँ लक्ष्मी जी की उपासना धन दायक मानी गई है

संतान योग में बाधा तथा उपाय

संतान योग में बाधा तथा उपाय ।
संसार में कोई भी ऐसा दंपति नहीं होगा, जो संतान सुख नहीं चाहता हो। चाहे वह गरीब हो या अमीर। सभी के लिए संतान सुख होना सुखदायी ही रहता है। संतान चाहे खूबसूरत हो या बदसूरत, लेकिन माता-पिता को बस संतान चाहिए। फिर चाहे वह संतान माता-पिता के लिए सहारा बने या न बने। किसी-किसी की संतान होती है और फिर गुजर जाती है। ऐसा क्यों होता है? ये सब ग्रहों की वजह से होता है। यहाँ पर हम इन्हीं सब बातों की जानकारी देंगे, जिससे आप भी जान सकें कि संतान होगी या नहीं।पंचम स्थान संतान का होता है। वही विद्या का भी माना जाता है।

 पंचम स्थान कारक गुरु और पंचम स्थान से पंचम स्थान (नवम स्थान) पुत्र सुख का स्थान होता है। पंचम स्थान गुरु का हो तो हानिकारक होता है, यानी पुत्र में बाधा आती है।सिंह लग्न में पंचम गुरु वृश्चिक लग्न में मीन का गुरु स्वग्रही हो तो संतान प्राप्ति में बाधा आती है, परन्तु गुरु की पंचम दृष्टि हो या पंचम भाव पर पूर्ण दृष्टि हो तो संतान सुख उत्तम मिलता है।पंचम स्थान का स्वामी भाग्य स्थान में हो तो प्रथम संतान के बाद पिता का भाग्योदय होता है। यदि ग्यारहवें भाव में सूर्य हो तो उसकी पंचम भाव पर पूर्ण दृष्टि हो तो पुत्र अत्यंत प्रभावशाली होता है। मंगल की यदि चतुर्थ, सप्तम, अष्टम दृष्टि पूर्ण पंचम भाव पर पड़ रही हो तो पुत्र अवश्य होता है।

पुत्र संततिकारक चँद्र, बुध, शुक्र यदि पंचम भाव पर दृष्टि डालें तो पुत्री संतति होती है। यदि पंचम स्थान पर बुध का संबंध हो और उस पर चँद्र या शुक्र की दृष्टि पड़ रही हो तो वह संतान होशियार होती है। पंचम स्थान का स्वामी शुक्र यदि पुरुष की कुंडली में लग्न में या अष्टम में या तृतीय भाव पर हो एवं सभी ग्रहों में बलवान हो तो निश्चित तौर पर लड़की ही होती है। पंचम स्थान पर मकर का शनि कन्या संतति अधिक होता है। कुंभ का शनि भी लड़की देता है। पुत्र की चाह में पुत्रियाँ होती हैं। कुछ संतान नष्ट भी होती है।

पंचम स्थान पर स्वामी जितने ग्रहों के साथ होगा, उतनी संतान होगी। जितने पुरुष ग्रह होंगे, उतने पुत्र और जितने स्त्रीकारक ग्रहों के साथ होंगे, उतनी संतान लड़की होगी।

 सप्तमांश कुंडली के पंचम भाव पर या उसके साथ या उस भाव में कितने अंक लिखे हैं, उतनी संतान होगी। एक नियम यह भी है कि सप्तमांश कुंडली में चँद्र से पंचम स्थान में जो ग्रह हो एवं उसके साथ जीतने ग्रहों का संबंध हो, उतनी संतान होगी।

संतान सुख कैसे होगा, इसके लिए भी हमें पंचम स्थान का ही विश्लेषण करना होगा। पंचम स्थान का मालिक किसके साथ बैठा है, यह भी जानना होगा। पंचम स्थान में गुरु शनि को छोड़कर पंचम स्थान का अधिपति पाँचवें हो तो संतान संबंधित शुभ फल देता है।

 यदि पंचम स्थान का स्वामी आठवें, बारहवें हो तो संतान सुख नहीं होता। यदि हो भी तो सुख मिलता नहीं या तो संतान नष्ट होती है या अलग हो जाती है। यदि पंचम स्थान का अधिपति सप्तम, नवम, ग्यारहवें, लग्नस्थ, द्वितीय में हो तो संतान से संबंधित सुख शुभ फल देता है। द्वितीय स्थान के स्वामी ग्रह पंचम में हो तो संतान सुख उत्तम होकर लक्ष्मीपति बनता है।

पंचम स्थान का अधिपति छठे में हो तो दत्तक पुत्र लेने का योग बनता है। पंचम स्थान में मीन राशि का गुरु कम संतान देता है। पंचम स्थान में धनु राशि का गुरु हो तो संतान तो होगी, लेकिन स्वास्थ्य कमजोर रहेगा। गुरु का संबंध पंचम स्थान पर संतान योग में बाधा देता है। सिंह, कन्या राशि का गुरु हो तो संतान नहीं होती। इस प्रकार तुला राशि का शुक्र पंचम भाव में अशुभ ग्रह के साथ (राहु, शनि, केतु) के साथ हो तो संतान नहीं होती।पंचम स्थान में मेष, सिंह, वृश्चिक राशि हो और उस पर शनि की दृष्टि हो तो पुत्र संतान सुख नहीं होता। पंचम स्थान पर पड़ा राहु गर्भपात कराता है। यदि पंचम भाव में गुरु के साथ राहु हो तो चांडाल योग बनता है और संतान में बाधा डालता है यदि यह योग स्त्री की कुंडली में हो तो। यदि यह योग पुरुष कुंडली में हो तो संतान नहीं होती।

नीच का राहु भी संतान नहीं देता। राहु, मंगल, पंचम हो तो एक संतान होती है। पंचम स्थान में पड़ा चँद्र, शनि, राहु भी संतान बाधक होता है। यदि योग लग्न में न हों तो चँद्र कुंडली देखना चाहिए। यदि चँद्र कुंडली में यह योग बने तो उपरोक्त फल जानें।पंचम स्थान पर राहु या केतु हो तो पितृदोष, दैविक दोष, जन्म दोष होने से भी संतान नहीं होती। यदि पंचम भाव पर पितृदोष या पुत्रदोष बनता हो तो उस दोष की शांति करवाने के बाद संतान प्राप्ति संभव है। पंचम स्थान पर नीच का सूर्य संतान पक्ष में चिंता देता है। पंचम स्थान पर नीच का सूर्य ऑपरेशन द्वारा संतान देता है। पंचम स्थान पर सूर्य मंगल की युति हो और शनि की दृष्टि पड़ रही हो तो संतान की शस्त्र से मृत्यु होती है।

 उपाय  उपाय - पंचम भाव में स्थित और पंचमेश कि स्थिति देखकर उसका जप इत्यादि कराये।
अथवा संतान गोपाल मंत्र के सवा लाख जप।