Monday, November 27, 2017

राज योग (Raj Yogas)

राज योग (Raj Yogas)
राजयोग कोई विशिष्ट योग नहीं है यह कुण्डली में बनने वाले कई योगों का प्रतिफल है.  कुण्डली में जब शुभ ग्रहों का योग बनता है तो उसके आधार पर राजयोग का आंकलन किया जाता है.  इस ग्रह के आंकलन के लिए लग्न के अनुसार ग्रहों की शुभता, अशुभता, कारक, अकारक, विशेष योगकारक ग्रहो को देखना होता है साथ ही ग्रहों की नैसर्गिक शुभता/अशुभता का ध्यान रखना होता है.  राज योग के लिए केन्द्र स्थान में उच्च ग्रहों की उपस्थिति, भाग्य स्थान पर उच्च का शुक्र, नवमेश एवं दशमेश का सम्बन्ध बहुत महत्वपूर्ण होता है.  कुण्डली में अगर कोई ग्रह अपनी नीच राशि में मौजूद है तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह फलदायी नहीं होगा क्योंकि जहां नीच राशि में ग्रह की स्थिति होगी वहीं से सप्तम उस ग्रह की दृष्टि अपने स्थान पर रहेगी.  गौर करने के बात यह है कि इसका क्या फल होगा यह अन्य ग्रहों से सम्बन्ध पर निर्भर करेगा.

कुण्डली में राजयोग किसी ग्रह विशेष से नहीं बनता है बल्कि इसमें सभी ग्रहों की भूमिका होती है.  ज्योतिषशास्त्र के नियामानुसार कुण्डली में चन्द्रमा अपनी स्थिति से योगों को काफी प्रभावित करता है.  चन्द्रमा के निर्बल होने पर योगकारक ग्रह भी अपना फल नहीं दे पाते हैं.  केन्द्र या त्रिकोण भाव में चन्द्रमा यदि पूर्ण बली शुक्र या बृहस्पति से दृष्टि होता है तो यह राजयोग का फल देता है और व्यक्ति को राजा के समान सुख प्रदान करता है.
राजयोग के प्रकार (Types of Rajyoga)
विपरीत राजयोग (Vipreet Rajyoga)त्रिक स्थानों के स्वामी त्रिक स्थानों (If the Trikha lorda are in the Trika houses) में हों या युति अथवा दृष्टि सम्बन्ध बनते हों तो विपरीत राजयोग बनता है.  इसे उदाहरण से इस प्रकार समझा जा सकता है कि अष्टमेश व्यय भाव या षष्ठ भाव में हो एवं षष्ठेश यदि अष्टम में, व्ययेश षष्ठ या अष्टम में हो तो इन त्रिक भावों के स्वामियों की युति दृष्टि अथवा परस्पर सम्बन्ध हो और दूसरे सम्बन्ध नहीं हों तो यह व्यक्ति को अत्यंत धनवान और खुशहाल बनाता है.  इस योग में व्यक्ति महाराजाओं के समान सुख प्राप्त करता है.  ज्योतिष ग्रंथों में यह भी बताया गया है कि अशुभ फल देने वाला ग्रह जब स्वयं अशुभ भाव में होता है तो अशुभ प्रभाव नष्ट हो जाता है.
 केन्द्र त्रिकोण राजयोग (Kendra Trikon Rajyoga)
कुण्डली में जब लग्नेश का सम्बन्ध केन्द्र या त्रिकोण के स्वामियों से होता है तो यह केन्द्र त्रिकोण सम्बन्ध कहलाता है.  केन्द्र त्रिकोण में त्रिकोण लक्ष्मी का व केन्द्र विष्णु का स्वरूप होता है.  यह योग जिस व्यक्ति की कुण्डली में पाया जाता है वह बहुत ही भाग्यशाली होता है.  यह योग मान सम्मान, धन वैभव देने वाला होता है.

नीचभंग राजयोग (Neechbhang Raj yoga)
कुण्डली में जब कोई ग्रह नीच राशि का होता है और जिस भाव में वह होता है उस भाव का राशिश अगर उच्च राशि में हो अथवा लग्न से केन्द्र में उसकी स्थिति हो तब यह नीचभंग राजयोग कहा जाता है.  उदाहरण के तौर बृहस्पति मकर राशि में नीच का होता है लेकिन मकर का स्वामी शनि उच्च में है तो यह भंग हो जाता है जिससे नीचभंग राजयोग बनता है.

कलानिधि योग (Kalanidhi Yoga)
जन्म कुण्डली (Kundli) में द्वितीय अथवा पंचम भाव में गुरू के साथ बुध या शुक्र की युति होने पर कलानिधि योग (Kalanidhi Yoga) बनता है. गुरू यदि द्वितीय अथवा पंचम में हो और शुक्र या बुध उसे देख रहे हों तब भी कलानिधि योग का निर्माण होता है. यह योग राजयोग की श्रेणी में आता है. जिस व्यक्ति की कुण्डली में यह योग बनता है वह कलाओं में निपुण होता है. अपनी योग्यता से धन-दौलत अर्जित करता है. वाहन सुख तथा समाज में इन्हें प्रतिष्ठित भी मिलती है. राजनीति में भी यह सफल हो सकते हैं.

काहल योग (Kahal Yoga)
गुरू एवं चतुर्थेश एक दूसरे से केन्द्र में हों और लग्नेश बलवान हों तो काहल योग (Kahal Yoga) बनता है. काहल योग तब भी बनता है जब चतुर्थेश एवं लग्नेश दोनों एक दूसरे से केन्द्र भाव में विराजमान हों. काहल राजयोग जिस व्यक्ति की जन्म कुण्डली में होता है वह बहादुर एवं साहसी होता है. वह जहां भी कार्य करता है उसकी भूमिका नेता के समान होती है. यह राजनेता अथवा किसी संस्थान के प्रमुख हो सकते हैं. आर्थिक स्थिति मजबूत रहती है.

अमारक योग (Amarak Yoga)
सप्तमेश एवं नवमेश में गृह परिवर्तन योग होने पर अमारक योग (Amarak Yoga) बनता है. अमारक योग में सप्तमेश एवं नवमेश दोनों का बलवान होना जरूरी होता है. इस राजयोग वाले व्यक्ति को विवाह के पश्चात भाग्य का पूर्ण सहयोग मिलता है. इनका जीवनसाथी गुणवान होता है तथा वैवाहिक जीवन खुशहाल रहता है. धर्म-कर्म में इनकी गहरी आस्था होती है. विद्वान के रूप में इन्हें सम्मान मिलता है. वृद्धावस्था आन्नद एवं सुख से बिताते हैं

गजकेशरी योग (Gajakesari Yoga)
गजकेशरी योग को केशरी योग के नाम से भी जाना जाता है. यह योग गुरू चन्द्र के एक दूसरे से केन्द्र में स्थित होने पर बनता है. यह उच्च कोटि का राजयोग होता है. जिनकी कुण्डली में यह राजयोग होता है वह सुखी जीवन जीते हैं. इनके सगे-सम्बन्धियों की संख्या अधिक होती है तथा उनसे पूरा सहयोग मिलता है. गजकेशरी योग से प्रभावित व्यक्ति अपने नेक एवं नम्र स्वभाव के कारण प्रतिष्ठित होते हैं तथा आत्मविश्वास एवं मजबूत इरादों से मुश्किल हालातों एवं चुनौतियो का सामना भी आसानी से कर पाते हैं. इनका यह गुण इन्हें कामयाबी दिलाता है.
गजकेशरी योग (Gajkesari Yoga)
ज्योतिष शास्त्र में कई शुभ और अशुभ योगों का वर्णन किया गया है| शुभ योगों में गजकेशरी योग को अत्यंत शुभ फलदायी योग के रूप में जाना जाता है|
गजकेशरी योग (Gajkesari Yoga) को असाधारण योग की श्रेणी में रखा गया है। यह योग जिस व्यक्ति की कुण्डली में उपस्थित होता है उस व्यक्ति को जीवन में कभी भी अभाव नहीं खटकता है।  इस  योग के साथ  जन्म लेने वाले व्यक्ति की ओर धन, यश, कीर्ति स्वत:  खींची चली आती है।  जब कुण्डली में गुरू और चन्द्र पूर्ण कारक प्रभाव के साथ होते हैं तब यह योग बनता है। लग्न स्थान में कर्क, धनु, मीन, मेष या वृश्चिक हो तब यह कारक प्रभाव के साथ माना जाता है। हलांकि अकारक होने पर भी फलदायी माना जाता परंतु यह मध्यम दर्जे का होता है। चन्द्रमा से केन्द्र स्थान में 1, 4, 7, 10 बृहस्पति होने से गजकेशरी योग बनता है। इसके अलावा अगर चन्द्रमा के साथ बृहस्पति हो तब भी यह योग बनता है। कभी-कभी इन ग्रहों कि क्षमता कम होने पर जैसे ग्रह के बाल्या, मृता अथवा वृद्धावस्था इत्यादि में होने पर इस योग के प्रभाव को बढ़ाने हेतु ज्योतिषीय उपाय करने से इस राजयोग में वृद्धि होती है एवं व्यक्ति और अधिक लाभ प्राप्त कर पाता है |

लक्ष्मी योग (Laxmi Yoga)
राजयोग की श्रेणी में लक्ष्मी योग का नाम भी लिया जाता है. नवमेश की युति लग्नेश अथवा पंचमेश के साथ होने पर यह योग (Gaja Kesari Yoga) बनता है. लक्ष्मी राज योग वाले व्यक्ति काफी धन अर्जित करता है. मान्यता है कि जिस व्यक्ति की जन्म कुण्डली में यह योग होता है वह धन-सम्पत्ति एवं वैभव से परिपूर्ण सुखमय जीवन जीवन जीते हैं. समाज में इन्हें सम्मान मिलता है. परिवार में यह आदरणीय होते हैं.

अमला योग (Amala Yoga)
चन्द्रमा जिस भाव में हो उससे दसवें घर में कोई शुभ ग्रह होने पर अमला योग बनता है. शुभ ग्रह पर किसी पाप ग्रह का प्रभाव नहीं होना चाहिए. कुण्डली में यह स्थिति बन रही हो तो जीवन भर सुख एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है. ज्योतिषशास्त्र में इस योग के विषय में कहा गया है कि जो व्यक्ति इस योग के साथ जन्म लेता है वह भले ही गरीब परिवार में जन्म ले परंतु गरीबी का साया उस पर नहीं रहता है.

राजयोग (Raja Yoga)
उपरोक्त योग राजयोग की श्रेणी में रखे गये हैं परंतु मूल रूप से जिसे राजयोग कहते हैं वह तब बनता है जब केन्द्र अथवा त्रिकोण के स्वामी एक दूसरे के घर में बैठें अथवा दो केन्द्र भाव के स्वामी गृह परिवर्तन करें और त्रिकोण भाव के स्वामी की उनपर दृष्टि हो. यह राजयोग जिस व्यक्ति की कुण्डली (Kundli) में होता है वह राजा के समान वैभवपू्र्ण जीवन जीता है. इनकी आयु लम्बी होती है. जबतक जीते हैं सम्मान से जीते हैं मृत्यु के पश्चात भी इनकी ख्याति व नाम बना रहता है.

मानव शरीर का वास्तु के पंच-तत्वों से संबंध

मानव शरीर का वास्तु के पंच-तत्वों से संबंध

नाड़ी शास्त्र के अनुसार, मानव शरीर में स्थित चक, जिनमें मूलाधार चक, स्वाधिष्ठान चक, मणिपूरक चक, अनाहत चक, विशुद्ध चक, आज्ञा चक एवं सहस्त्रार चक विद्यमान है। इन चकों का संबंध वास्तु विषय के जल तत्व, अग्नि तत्व, वायु तत्व, पृथ्वी तत्व एवं आकाश तत्व से संबंधित है। वास्तु में पृथक दिशा के लिये अलग-अलग तत्व दिये गये हैं जैसे : ईशान के लिये जल तत्व, आग्नेय के लिये अग्नितत्व, वायव्य के लिये वायु तत्व, नैऋत के लिये पृथ्वी तत्व एवं ब्रह्मस्थल के लिये आकाश तत्व का महत्व है।

जल तत्व : वास्तु के अनुसार, भूमिगत पानी के स्त्राsत ईशान में ही होने चाहिये। जिससे सुबह के समय सूर्य से मिलने वाली अल्ट्राव्हायलेट किरणों से जल की शुद्धि होती है एवं यह सूर्य रश्मियां जीवन को स्वास्थपद रखती है।

अग्नि तत्व : सूर्य को सृष्टि का संचालक कहा जाता है, क्योंकि सूर्य से मिलने वाली ऊर्जा शक्ति का हमारे जीवन में अत्याधिक महत्व है। सूर्य की सकारात्मक ऊर्जा का पभाव भवन की पूर्व, उत्तर, ईशान, पश्चिम-वायव्य एवं दक्षिण-आग्नेय दिशा से पाप्त होता है। अत इन ऊर्जा शक्तियों से शुभ परिणाम पाप्त करने के लिए उपरोक्त दिशाओं को खुला रखना अत्यंत आवश्यक होता है।

इसके विपरीत दक्षिण, पश्चिम-नैऋत, उत्तर-वायव्य एवं पूर्व-आग्नेय को खुला एवं खाली रखने से सूर्य की हानीकारक एवं नकारात्मक ऊर्जा का पवेश होता है, जो स्वास्थ्य एवं समृद्धि के लिये अत्यंत हानीकारक होती है।

वायु तत्व : पाण वायु (आक्सीजन) के बिना सृष्टि का चलना असंभव है। क्योंकि पाण वायु के बिना जीव, निर्जीव हो जायेगा। मकान में वायु के आवागमन हेतु उचित स्थान बनाया जाना चाहिये। क्योंकि स्वच्छ एवं शुद्ध वायु का सेवन जीवन के स्वास्थ्य एवं दीर्घायु हेतु बहुत आवश्यक है। इसके विपरीत पदूषण युक्त एवं दूषित वायु के सेवन से अनेक पकार की बीमारियां पनपने का अंदेशा रहता है। अत रोगमुक्त एवं स्वास्थ्यवर्द्धक जीवन व्यतीत करने के लिये मकान में शुद्ध वायु का पवेश होना अत्यंत ही आवश्यक है।

यद्यपि वायु का आवागमन पत्येक दिशा से होता है, लेकिन स्वास्थ्य की दृष्टि से भवन निर्माण में वायु पवेश का विशेष ध्यान रखना परम आवश्यक है। इसके लिये उत्तर-पश्चिम दिशा, जिसे वायव्य कोण कहा जाता है। इस वायव्य कोण की पश्चिम-वायव्य दिशा, वायु के संचारण हेतु मुख्य रूप से उपयोगी मानी गयी है। इस दिशा से वायु-तत्व की पाप्ति करना, पाणियों के स्वास्थ्य, दीर्घायु एवं भवन के टिकाऊपन के लिये महत्वपूर्ण है।

पृथ्वी तत्व : समस्त संसार आकर्षण और विकर्षण से पभावित होता है। पृथ्वी के उत्तर-दक्षिण दिशा में चुंबकीय ध्रुव विद्यमान रहते हैं। इससे हमें गुरुत्वाकर्षण की शक्ति मिलती है। यह चुंबकीय ऊर्जा शक्ति उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव की तरफ चलती है और इस ऊर्जा शक्ति का पभाव सभी जड़-चेतन पर समान रूप से पड़ता है। उत्तरी ध्रुव के पास दक्षिणी ध्रुव आने से विकर्षण पैदा होता है।

मानव शरीर के मस्तिष्क में उत्तरी ध्रुव विद्यमान है, इसलिये वास्तु विषय में दक्षिण में मस्तिष्क एवं उत्तर दिशा की तरफ पांव करके सोने के लिये निर्देश दिया गया है। जिससे हमारे शरीर को चुंबकीय शक्ति एवं नैसर्गिक ऊर्जा शक्ति का लाभ मिलता है। आवास स्थल में उत्तम चुंबकीय किरणों का पभाव बनाये रखने के लिये पूर्व, उत्तर व ईशान दिशा में जगह का खुला एवं ढलान तथा दक्षिण, पश्चिम व नैऋत दिशा को ऊंचा, मजबूत एवं ढका हुआ होना अत्यंत आवश्यक है।

आकाश तत्व : आकाश तत्व एक मूल तत्व माना गया है। अत वास्तु विषय में इसे ब्रह्म स्थल (मध्य स्थान) कहा जाता है। इस तत्व की पूर्ति करने के लिये पुराने जमाने में मकान के मध्य में खुला आंगन रखा जाता था, ताकि अन्य सभी दिशाओं में इस तत्व की आपूर्ति हो सके।

आकाश तत्व से अभिपाय यह है कि गृह निर्माण में खुलापन रहना चाहिये। मकान में कमरों की ऊँचाई और आंगन के आधार पर छत का निर्माण होना चाहिये। अधिक व कम ऊँचाई के कारण आकाश तत्व पभावित होता है। कई मकानों में दूषित वायु (भूत-पेत) का पवेश एवं आवेश देखा गया है। इसका मूल कारण वायु तत्व और आकाश तत्व का सही निर्धारण नहीं होना ही पाया गया है। मानसिक रोगों का पनपना भी आकाश तत्व के दोष का ही नतीजा पाया जाता है।

Sunday, November 26, 2017

सूर्य-शनि युति फलादेश

सूर्य-शनि युति फलादेश
सूर्य सुलभ दृष्ट, प्रकाशवान व ज्वलंत ग्रह है। वह जीवनी शक्ति, पिता, सफलता, सत्ता, सोना, लाल कपड़ा, तांबा, ऊर्जा, स्वास्थ्य, आरोग्य, औषधि आदि का कारक है। इसका आंखों की ज्योति, शरीर के मेरूदंड, तथा पाचन क्रिया पर प्रभुत्व है। सूर्य के तेज के कारण अन्य ग्रह- चंद्र, मंगल, शनि, शुक्र, बृहस्पति व बुध उसके पास आने पर अस्त होकर प्रभावहीन हो जाते हैं, परंतु राहु व केतु सूर्य के समीप आने पर उसे ग्रहण लगाते हैं। सूर्य को ग्रहों का राजा माना गया है। वह 24 घंटे में भचक्र में 10 प्रगति कर एक राशि का गोचर 30 दिन में पूरा करता है। सूर्य सिंह राशि का स्वामी है, मेष में उच्च तथा तुला राशि में नीचस्थ होता है।
उसकी विंशोत्तरी दशा छः वर्ष की होती है। सूर्य के विपरीत शनि ग्रह प्रकाशहीन, दूरबीन से दृष्ट और ठंडा ग्रह है। वह आलस, दासता, गरीबी, लंबी बीमारी और मृत्यु का मुख्य कारक है। शनि काले तिल, तेल, उड़द, लोहा, कोयला व काले वस्त्र आदि का कारक है। भचक्र में शनि दो राशियों- मकर व कुंभ का स्वामी है। वह तुला राशि में उच्च तथा मेष राशि में नीचस्थ होता है। शनि एक राशि का गोचर ढाई वर्ष में पूरा करता है।
वह कुंडली  में षष्ठ, अष्टम और द्वादश (त्रिक) भावों का कारक है जो कष्ट, दुःख और हानि दर्शाते हैं। अतः उसे नैसर्गिक पापी ग्रह की संज्ञा दी गई है, परंतु वह तुला, मकर, कुंभ और वृष लग्नों में शुभकारी होता है। बलवान शनि जातक की प्रगति में पूर्ण सहायक होता है।

अन्य ग्रहों पर शनि के दुष्प्रभाव से उनके कारकत्व में न्यूनता आती है। सूर्य से अस्त होने पर शनि अधिक कष्टकारी बन जाता है। हृदय को खून ले जाने वाली नाड़ियों के संकुचित होने से जातक हृदय रोग से ग्रस्त होता है। शनि ग्रह के बारे में हिंदू धार्मिक ग्रंथों में अनेक महत्वपूर्ण तथ्य प्राप्त होते हैं।
जैसे शनि सूर्य के पुत्र हैं। इनका सूर्य की पत्नी की छाया से जन्म होने के कारण ये कृष्ण वर्ण, कुरूप तथा पिता समान ज्ञानी और बलवान ग्रह हैं। इनकी हानिकारक दृष्टि से बचने के लिए पिता सूर्य द्वारा जन्म के तुरंत बाद ब्रह्मांड में बहुत दूर फेंके जाने के कारण यह प्रकाश रहित और शीतल ग्रह है। कुंडली  में अशुभ भाव में स्थित होने पर शनि शीत-जनित और दीर्घकालीन रोग व कष्ट देता है।
इनका अपने पिता सूर्य से शत्रुवत व्यवहार है। शनि शिवजी के परम प्रिय शिष्य हैं। शनि के धार्मिक, सात्विक और निष्पक्ष आचरण से प्रसन्न होकर शिवजी ने इन्हें सभी प्राणियों के कर्मफल का निर्णायक बनाया था। विंशोत्तरी दशा में शनि को 19 वर्ष प्राप्त हैं। सप्तम दृष्टि के अतिरिक्त शनि की तीसरी और दसवीं पूर्ण दृष्टि होती है। शनि जिस भाव में स्थित हों उसमें स्थिरता तथा दृष्ट ग्रह व भावों के कार्यकाल को हानि पहुंचाते है।

शनि कष्टकारी होने पर शिवजी तथा हनुमान जी की आराधना लाभकारी होती है। कुंडली  में इन दो विपरीत प्रकृति वाले शक्तिशाली ग्रहों की युति स्वभावतः जातक का जीवन कठिनाईयों से भरा और हताशापूर्ण बनाती है। इस बारे में कुछ मानद ज्योतिष  ग्रंथों का मार्गदर्शन इस प्रकार है:- फलदीपिका (अ. 18) के अनुसारः ‘सूर्य व शनि साथ-साथ हो तो जातक धातु के बर्तन निर्माण और व्यापार द्वारा अपना निर्वाह करता है अर्थात् मेहनत से जीवन यापन करता है। सारावली (अ. 15.7) के अनुसार: जातक धातुशिल्पी होता है। यह युति 6, 8, 12 (त्रिक) भावों में होने पर जातक पारिवारिक क्लेशों से घिरा रहता है। पुनश्च, (अ. 31, 22.25) के अनुसार: लग्न में सूर्य-शनि की युति होने पर जातक की माता का चरित्र संदिग्ध होता है। जातक स्वयं दुश्चरित्र, मलिन और दुष्कर्मी होता है। चतुर्थ भाव में धन की कमी, रिश्तेदारों से खराब संबंध और माता का सुख कम प्राप्त होगा।

सप्तम भाव में युति से जातक आलसी, मंदबुद्धि, दुर्भागी और नशे का सेवन करता है तथा पति-पत्नी के संबंधों में कटुता रहती है। दशम भाव में युति होने पर जातक विदेश में या स्वदेश में निम्न स्तर की नौकरी से धन कमाता है, और वह भी चोरी चला जाता है जिससे जातक धनहीन और दुःखी रहता है। सूर्य-शनि की युति के फलादेश का अध्ययन दर्शाता है कि शनि के दुष्प्रभाव से युति वाले भाव तथा उससे सप्तम भाव के फलादेश में न्यूनता आती है। यह युति सूर्य के कारकत्व पिता की स्थिति, उनका स्वास्थ्य तथा जातक के अपने कार्यक्षेत्र तथा मान-सम्मान में कमी करती है। जातक के अपने पिता से संबंध अच्छे नहीं रहते। सूर्य के अधिक निर्बल होने पर पिता का साया जल्दी उठ जाता है या जातक अपने पिता से अलग हो जाता है। इसी प्रकार संबंधियों से भी अलगाव होता है। अतः कुछ आचार्य इस युति को ‘विच्छेदकारी योग’ की संज्ञा देते हैं।

उपाय 1. सूर्य को बल देने के लिए जातक को सूर्योदय से पहले जागकर अपने पिता के चरण  स्पर्श कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। पिता की उम्र के व्यक्तियों का आदर करना चाहिए।
2. स्नान के बाद उगते सूर्य को तांबे के बर्तन में जल, थोड़ा गंगाजल, रोली, खांड और लाल फूल डालकर ‘ऊँ’ आदित्याय नमः। ‘ऊँ’ भास्कराय नमः। ‘ऊँ’ सूर्याय नमः का उच्चारण करते हुए धीरे-धीरे सूर्य को अघ्र्य देना चाहिए। ध्यान रखें कि छींटे पैर पर न पड़ें तथा चढ़े हुए जल से अपना तिलक करना चाहिए। उसके बाद एक माला ‘ऊँ आदित्याय नमः’ मंत्र का जप करना चाहिए।

 3. प्रत्येक रविवार को अनार फाड़कर सूर्य को अघ्र्य के बाद भोग अर्पण करते समय सूर्य मंत्र का धीरे-धीरे जप करना चाहिए। कुछ अनार के दाने प्रसादस्वरूप ग्रहण करना चाहिए। साथ ही शनि की शांति के लिए
1. प्रत्येक शनिवार सायंकाल शनिदेव का तैलाभिषेक करके कुछ तेल को मिट्टी के दीपक में डालकर समीपस्थ पीपल के पेड़ की जड़ के पास प्रज्ज्वलित करना चाहिए और ‘ऊँ शं शनैश्चराय नमः’ मंत्र का कुछ समय जप करना चाहिए।
2. उसके बाद मंदिर के सामने बैठे अपाहिज भिखारियों को उड़द दाल-चावल की खिचड़ी या उड़द दाल के बड़े यथाशक्ति बांटना चाहिए। धन का दान नहीं देना चाहिए।

 3. अपने नौकरो और सफाई कर्मचारियों से अच्छा व्यवहार और सामथ्र्य अनुसार कभी-कभी उनकी सहायता करते रहना चाहिए। उपरोक्त उपाय श्रद्धापूर्वक कुछ माह करने से जीवन में सुख-शांति का अनुभव होना आरंभ हो जाएगा।

कर्ज की समस्या और ज्योतिषीय कारण

कर्ज की समस्या और ज्योतिषीय कारण:-
जन्म होते ही हम अपने प्रारब्ध के चक्र से बंधे होते हैं, और जन्मकुंडली हमारे इसी प्रारब्ध को सूचित करती है। हमारे जीवन में सभी घटनाएं नवग्रह द्वारा ही सूचित होती हैं। आज के समय में जहाँ आर्थिक असंतुलन हमारी चिंता का एक मुख्य कारण है, वहीँ एक दूसरी स्थिति जिसके कारण अधिकांश लोग चिंतित और परेशान रहते हैं वह है “कर्ज की स्थिति” धन चाहे व्यक्तिगत लिया गया हो, या सरकारी लोन के रूप में, ये दोनों ही स्थितियां व्यक्ति के ऊपर एक बोझ के समान बनी रहती हैं, कई बार ना चाहते हुये भी परिस्थितिवश व्यक्ति को कर्ज रुपी बोझ का सामना करना ही पड़ता है, वैसे तो आज के समय में अपने कार्यो की पूर्ती के लिए अधिकांश लोग कर्ज लेते हैं, परन्तु जब जीवन पर्यन्त बनी रहे या बार-बार यह स्थिति सामने आये तो वास्तव में यह भी हमारी कुंडली में बने कुछ विशेष ग्रहयोगों के द्वारा ही सूचित होती है।कुंडली में “छटा भाव” कर्ज का भाव माना गया है, अर्थात कुंडली का छटा भाव ही व्यक्ति के जीवन में कर्ज की स्थिति को सूचित करता है, जब कुंडली के :-
छटे भाव में कोई पाप योग बना हो, या षष्टेश ग्रह बहुत पीड़ित हो तो व्यक्ति को कर्ज की समस्या का सामना करना पड़ता है जैसे –
यदि छटे भाव में कोई पाप ग्रह नीच राशि में भावस्थ हो, छठ्ठेे भाव में राहु-चन्द्रमाँ की युति हो, राहु-सूर्य के साथ होने से ग्रहण योग बन रहा हो, छठ्ठेे भाव में राहु मंगल का योग हो, छठ्ठे भाव में गुरु-चाण्डाल योग बना हो, शनि-मंगल या केतु-मंगल की युति छठ्ठे भाव में हो तो …ऐसे पाप या क्रूर योग जब कुंडली के छटे भाव में बनते हैं तो व्यक्ति को कर्ज की समस्या बहुत परेशान करती है और री-पेमेंट में बहुत समस्यायें आती हैं।
छठ्ठे भाव का स्वामी ग्रह भी जब नीच राशि में हो अष्टम भाव में हो या बहुत पीड़ित हो तो कर्ज की समस्या होती है । इसके अलावा “मंगल” को कर्ज का नैसर्गिक नियंत्रक ग्रह माना गया है ! अतः यहाँ मंगल की भी महत्वपूर्ण भूमिका है यदि कुंडली में मंगल अपनी नीच राशि (कर्क) में हो आठवें भाव में बैठा हो, या अन्य प्रकार से अति पीड़ित हो तो भी कर्ज की समस्या बड़ा रूप ले लेती है”
विशेष: – यदि छठ्ठे भाव में बने पाप योग पर बलवान बृहस्पति की दृष्टि पड़ रही हो तो कर्ज का रीपेमेंट संघर्ष के बाद हो जाता है या व्यक्ति को कर्ज की समस्या का समाधान मिल जाता है परन्तु बृहस्पति की शुभ दृष्टि के आभाव में समस्या बनी रहती है।
छठ्ठे भाव में पाप योग जितने अधिक होंगे उतनी समस्या अधिक होगी, अतः कुंडली का छठा भाव पीड़ित होने पर लोन आदि लेने में भी बहुत सतर्कता बरतनी चाहिये।
बहुत बार व्यक्ति की कुंडली अच्छी होने पर भी व्यक्ति को कर्ज की समस्या का सामना करना पड़ता है, जिसका कारण उस समय कुंडली में चल रही अकारक ग्रहों की दशाएं या गोचर ग्रहों का प्रभाव होता है, जिससे अस्थाई रूप से व्यक्ति उस विशेष समय काल के लिए कर्ज के बोझ से घिर जाता है।
उदाहरणार्थ : अकारक षष्टेश और द्वादशेश की दशा व्यक्ति को कर्ज की समस्या देती है। अतः प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में अलग-अलग ग्रह-स्थिति और अलग-अलग दशाओं के कारण व्यक्तिगत रूप से तो कुण्डली विश्लेषण के बाद ही किसी व्यक्ति के लिए चल रही कर्ज की समस्या के लिए सटीक ज्योतिषीय उपाय निश्चित किये जा सकते हैं। अतः यहाँ हम कर्जमुक्ति के लिए ऐसे कुछ मुख्य उपाय हैं, जिन्हें कोई भी व्यक्ति कर सकता है:-
उपाय :-
1. मंगल यन्त्र को घर के मंदिर में लाल वस्त्र पर स्थापित करें, और प्रतिदिन इस मंत्र का एक माला जाप करें :- ॐ क्राम क्रीम क्रोम सः भौमाय नमः।
2. प्रति दिन *ऋणमोचन मंगल स्तोत्र* का पाठ करें।
3. *हनुमान चालीसा* का पाठ करें।

जीवन में सर्वत्र सफलता , यश, कीर्ति हेतु कुछ खास उपाय l

जीवन में सर्वत्र सफलता , यश, कीर्ति हेतु कुछ खास उपाय l

1. जीवन में मनवांछित सफलता प्राप्त करने के लिए नियमित रूप से अपने माता - पिता और बड़े बुजर्गो का आशीर्वाद लें कर ही अपने दिन की शुरुआत करें और तभी घर से कहीं बाहर जाएँ ,याद रखिये उनका कभी भी किसी भी दशा में दिल न दुखाएं ।

2.स्त्रियों को देवी का स्वरुप माना गया है घर की सभी स्त्रियों(एवं किसी भी स्त्री को )पूर्ण सम्मान दें ,शास्त्रों में भी लिखा है जिस घर में स्त्रियाँ प्रसन्न रहती है वहां पर सौभाग्य स्वयं खिंचा चला आता है ।

3.जीवन में स्थाई सुख और सफलता तभी प्राप्त होती है जब हमारे कर्म शुभ होते है , क्रोधी , लालची, अभिमानी , शक्ति का दुरूपयोग करने वाला , गलत तरीके से धन संग्रह करने वाले को यदि धन, शक्ति और सत्ता का आस्थाई सुख मिलता भी है तो उसको पारिवारिक जीवन का सुख नहीं मिलता है उसका बुडापा कष्टमय बीतता है , उसके जीवन में निरंतर अस्थिरता बनी रहती है , उसके परिवार में कोई न कोई रोग बना ही रहता है इसलिए हम सभी को अपने कर्म अवश्य ही अच्छे करने चाहिए ।

4.यदि जीवन में लगातार कार्यों में बाधाएं आती है तो किसी भी दिन किसी मंदिर में अनाज के दाने चड़ाकर सच्चे मन से अपनी मनोकामना को कहिये , काम अवश्य ही निर्विघ्न रूप से पूर्ण और सफल होगा ।

5.सुबह उठते ही सर्वप्रथम अपने दोनों हाथों की हथेलियों को जोड़कर गौर से देखें , फिर उसे ३ बार चूम कर अपने चेहरे पर फिराएं , उसके बाद अपने इष्टदेव को मन ही मन में प्रणाम करते हुए अपना दाहिना पावँ जमीन पर रखें , तत्पश्चात अपने माता - पिता के चरण छू कर उनसे आशीर्वाद लें उनका अभिवादन करें तभी कुछ और बोलें ..यह दिन की शुरुआत बहुत ही चमत्कारी मानी जाती है , इससे आप निश्चित ही पूरे दिन उत्साह और प्रसन्नता का अनुभव करेंगे ।

6.प्रतिदिन प्रातः काल कुल्ला करके सर्वप्रथम थोडा शहद चख लें , तत्पश्चात नियमित रूप से सुबह नहाने के बाद सूर्य देवता को ताम्बें के बर्तन में गुड़ / चीनी , फूल मिश्रित जल से अर्ध्य दिया करें , इससे जीवन में समस्त बाधाएँ दूर होती है एवं मान सम्मान ,ऐश्वर्य और सफलता की प्राप्ति होती है ।

7.मंगलवार के दिन मिट्टी के एक बर्तन में शुद्ध शहद भरकर किसी एकांत स्थान में चुपचाप रख आईये,कार्य निर्विघ्न रूप से बनने लगेंगे,ऐसा करने से पहले या बाद में इसे किसी को भी न बताएं ।

8.यदि गृह स्वामी अपने भोजन से गाय , चिड़िया और कुत्ते के लिए कुछ अंश निकालकर उन्हें नियमित रूप से खिला दें तो उसके घर में सदैव सुख और सौभाग्य का वास बना रहता है ।

9.रविवार को छोड़कर रोजाना सुबह स्नान के बाद पीपल के पेड़ में सादा जल और शनिवार के दिन दूध, गुड / शक्कर , मिश्रित जल चड़ाकर और संध्या के समय धूप / कडवे तेल का दीपक अर्पित करके अपनी मनोकामना कहिये , हर कार्यों में शीघ्र ही सफलता मिलनी लगेगी ।

10.एक बिलकुल नया लाल सूती वस्त्र लेकर उसमें जटायुक्त नारियल बांधकर प्रभु का स्मरण करते हुए उस नारियल से अपनी मनोकामना 7 बार कहें फिर उसे बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें , कार्यों में आने वाली बाधाएं दूर होने लगेगीं ।

11. दाहिने हाथ में काला धागा और दाहिने हाथ की तर्जनी उंगली में सोने की अंगूठी धारण करें , इससे कार्य आसानी से बनेगें ।

12.यदि आपका कोई शत्रु है जो आपके कार्यों में रूकावट डालता है आपको हानि पहुंचाता सकता है तो मंगलवार के दिन एक नए लाल कपडे में 900 ग्राम लाल मसूर की दाल , सवा किलो गुड , एक कोई भी ताम्बें का बर्तन , चमेली के तेल की शीशी और 11 रुपये बांधकर उसे पहले हनुमान जी के चरणों से लगाकर अपनी सफलता के लिए प्रार्थना करें फिर किसी भी गरीब जरुरतमंद को दान दें दें ....ऐसा 3 मंगलवार तक अवश्य करें और उस दिन किसी पर भी क्रोध न करें ,शत्रु शांत होने लगेंगे ।

13.आर्थिक रुकावटें दूर करने के लिए धनतेरस से दीपावली तक लगातार तीन दिन संध्या के समय शुद्ध घी का दीपक जलाकर गणेश जी को लड्डू अर्पित करने और गणेश स्त्रोत्र का पाठ करने से सभी आर्थिक कार्य बनने लगते है ।

14.रात को सोते समय अपने सिरहाने में एक ताम्बे के बर्तन में जल भरकर उसमें शहद मिलकर कोई भी सोने / चाँदी की अंगूठी अथवा सिक्का रखकर उस बर्तन को बंद कर दें और सुबह अपने इष्ट देव एवं अपने माता - पिता को प्रणाम करने के बाद सर्वप्रथम निहार मुंह उसी जल को पियें , सभी कार्यों में आसानी से सफलता मिलने लगेगी ।

15.अपने घर की छत को हमेशा साफ करवाते रहे , पानी की टंकी दक्षिण , नैत्रतय कोण , दक्षिण या पश्चिम में ही रखवाएं और कोई भी भारी सामान इन्ही क्षेत्रों में रखें , याद रहे वावय्व कोण ,उत्तर , पूर्व और ईशान कोण हमेशा खाली या हल्का रहना चाहिए ।

16.यदि गोमती चक्र को लकड़ी की डिब्बी में पीले सिंदूर के साथ रख  दिया जाय तो व्यक्ति के कार्यों में बाधाएं खत्म होने लगती है उस व्यक्ति को जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त होनी शुरू हो जाती है ।

17. व्यापार या किसी भी खास काम में जाने से पहले 21/- रुपये किसी गुप्त जगह में ईश्वर का नाम लेते हुए रखकर चले जाएँ, आपको सफलता मिलने की पूरी सम्भावना बनेगी ...वापस आकर इन रुपये को बिना किसी को बताए हुए किसी गरीब को दान में दे दें ।

18. घर से बाहर जाते हुए सबसे पहले विपरीत दिशा में चार पग जाये उसके पश्चात पलट कर अपने कार्य में चले जाये कार्यों में सफलता मिलेगी।

19. रविवार को छोड़कर प्रतिदिन 2-3 तुसली के पत्ते ग्रहण करके घर से बाहर जाने पर सभी बाधाएँ दूर होती है ।

20. प्राता काल गणेश जी को दूर्वा अर्पित करके घर से बाहर जाएँ सभी कार्य निर्विघ्न रूप से संपन्न होंगे ।

21. 5 बत्तियों का दीपक किसी भी मंगलवार या शनिवार को हनुमान मंदिर में जला कर उनसे अपनी समस्या के निराकरण के लिए प्रार्थना करें सभी परेशानियाँ, मानसिक तनाव दूर हो जायेंगे ।

22. सुबह पूजा के बाद आरती करते हुए दीपक में दो लौंग डाल दें या कपूर में दो फूल वाले लौंग डालकरआरती करें दिन भर सारे कार्य सुगमता से बनेगें ।

23. शनिवार के दिन सरसों के तेल और काली उरद के दान देने से सभी बाधाएं दूर हो जाती है ।

24. यदि आये दिन आपके कार्यों में विघ्न आते है बने हुए काम बिगड़ जाते है तो किसी भी दिन सरसों के तेल के दीपक में एक अखंडित लौंग डालकर उस दीपक को निर्जन स्थान में जला दें और प्रभु से मन ही मन अपनी समस्या के निराकरण के लिए प्रार्थना करें .....सभी विघ्न बाधाएं शांत हो जाएगी।।।। कार्यों में सफलता मिलने लगेगी ।

25. रविवार को छोड़कर प्रतिदिन सुबह तुलसी के पौधे में जल चड़ाकर धूप से अर्ध्य देकर ही घर से बाहर जाएँ ...सभी दिशाओं से उत्साह वर्धक समाचार प्राप्त होंगे ।

26. महत्वपूर्ण कार्यों को करते समय लाल/नीले गहरे कलर के कपड़े पहनने से कार्यों में अवश्य ही सफलता प्राप्त होती है ।

27. घर से बाहर किसी महत्वपूर्ण कार्य में जाते समय मुख्य द्वार पर काली मिर्च डालकर उस पर पैर रखकर घर से बाहर निकलें फिर वापस न आएं कार्यों में सफलता मिलेगी ।

29. सिंदूर लगाये हुवे भेरवनाथ जी की मूर्ति से सिंदूर लेकर के अपने ललाट पर तिलक करे और अपने मन की सारी बात भेरवनाथ जी को कह दे एसा प्रत्येक रविवार के दिन करे कुछ ही सप्ताह में आपके सभी काम निर्विघ्न रूप से बनते ही जायेगे |

30. किसी शनिवार को, यदि उस दिन `सर्वार्थ सिद्धि योग’ हो तो अति उत्तम सांयकाल अपनी लम्बाई के बराबर लाल रेशमी सूत नाप लें। फिर एक पत्ता बरगद का तोड़ें। उसे स्वच्छ जल से धोकर पोंछ लें। तब पत्ते पर अपनी कामना रुपी नापा हुआ लाल रेशमी सूत लपेट दें और पत्ते को बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें। इस प्रयोग से सभी प्रकार की बाधाएँ दूर होती हैं और कामनाओं की पूर्ति होती है।

31. प्रत्येक प्रकार के संकट निवारण के लिये भगवान गणेश की मूर्ति पर कम से कम 21 दिन तक थोड़ी-थोड़ी जावित्री चढ़ावे और रात को सोते समय थोड़ी जावित्री खाकर सोवे। यह प्रयोग 21, 42, 64 या 84 दिनों तक करें।

32. बुधवार के दिन सुबह स्नान अदि करने के बाद समीप स्थित किसी गणेश मंदिर जाएं और भगवान श्रीगणेश को 21 गुड़ की ढेली के साथ दूर्वा रखकर चढ़ाएं। इस उपाय को करने से भगवान श्रीगणेश भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी कर देते हैं। ये बहुत ही चमत्कारी उपाय है।

यह कुछ ऐसे उपाय है जिनको सच्चे मन से अपनाकर कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में तमाम बाधाओं को दूर करते हुए अपने कार्यों में सफलता प्राप्त कर सकता है ।

नित्य प्रतिदिन घर से बाहर काम पर जाते समय अपनी माँ अथवा पत्नी के हाथ से थोड़ा मीठा दही या कुछ भी मीठा जैसे एक चुटकी चीनी ही खाकर फिर उस दिन के हिसाब से उपाय करके बाहर जाये आपको सर्वत्र सफलता मिलेगी।

किसी भी शुभ कार्य में जाने से पहले यदि सप्ताह के सभी दिन यथासंभव निम्न बातों का ध्यान रखें तो हर प्रकार से उन्नति एवं लाभ की प्राप्ति होती है । -

1. रविवार को पान खाकर या पान का पत्ता साथ रखकर जायें।

2. सोमवार को दर्पण में अपना चेहरा देखकर बाहर काम पर जाएँ।

3. मंगलवार को गुड़ या मिष्ठान खाकर घर से बाहर जायें।

4. बुधवार को हरा / सूखा धनिया खाकर घर से जायें ।

5. गुरूवार को जीरा या सरसों के कुछ दाने मुख में डालकर जायें।

6. शुक्रवार को दही खाकर काम जायें।

7. शनिवार को अदरक और घी खाकर जाना चाहिये। 

नक्षत्र माहीती


✳ *नक्षत्र माहीती*
नक्षत्र: अश्विनी
नक्षत्र देवता : अश्विनीकुमार
नक्षत्र स्वामी : केतु
नक्षत्र आराध्य वृक्ष : कुचला
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष : अडुळसा
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण मेष राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: घोडा
नक्षत्र तत्व : वायु
नक्षत्र स्वभाव : शुभ
पौराणिक मंत्र:
अश्विनी देवते श्वेतवर्णो तौव्दिभुजौ स्तुमः
lसुधासंपुर्ण कलश कराब्जावश्च वाहनौ ll
नक्षत्र देवता मंत्र:
अ)ॐअश्विनी कुमाराभ्यां नमः
आ) ॐ अश्विभ्यां नमः
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:
स्वर्वेद्यावश्वीनौ देवौव्दिभुजौ शुक्लवर्णकोl
सर्वारिष्ट विनाशाय अश्विभ्यांवै नमो नमः
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ अश्वयुगभ्यां नमःl
२) भरणी
नक्षत्र : भरणी
नक्षत्र देवता : यम - आद्य पितर
नक्षत्र स्वामी :शुक्र
नक्षत्र आराध्य वृक्ष : आवळा
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष : खैर
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण मेष राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी : हत्ती
नक्षत्र तत्व : अग्नी
नक्षत्र स्वभाव : क्रूर
पौराणिक मंत्र:
पाशदण्डं भुजव्दयं यमं महिष वाहनम l
यमं नीलं भजे भीमं सुवर्ण प्रतीमागतम् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ यमाय् नमः l
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
दंडहस्तघरं देवं महामहिष वाहनं l
सर्वारिष्टं विनाशय नैमिनित्यं ll
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ अपभरणीभ्यो नमःl
३) कृतिका
नक्षत्र: कृतिका
नक्षत्र देवता : अग्नी
नक्षत्र स्वामी : रवि
नक्षत्र आराध्य वृक्ष : उंबर, औदुंबर
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष : बेहडा
राशी व्याप्ती : १ले चरण मेष राशीमध्ये,
बाकीचे ३ चरण वृषभ राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: बकरी
नक्षत्र तत्व :अग्नी
नक्षत्र स्वभाव : क्रूर
पौराणिक मंत्र:
कृतिका देवतामाग्निं मेशवाहनं संस्थितम् l
स्त्रुक् स्तुवाभीतिवरधृक्सप्तहस्तं नमाम्यहम् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ आग्नेय नमः l
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
आग्नेयः पुरुषोरक्त सर्व देवमयोव्ययः ll
नक्षत्र नाम मंत्र :ॐ कृतिकाभ्यो नमःl
४) रोहिणी
नक्षत्र: रोहिणी
नक्षत्र देवता :ब्रम्हा
नक्षत्र स्वामी : चंद्र
नक्षत्र आराध्य वृक्ष :जांभळी, जांभूळ
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष: बेल
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण वृषभ राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: सर्प
नक्षत्र तत्व: पृथ्वी
नक्षत्र स्वभाव: शुभ
पौराणिक मंत्र:
प्रजापतीश्वतुर्बाहुः कमंडल्वक्षसूत्रधृत् l
वराभयकरः शुध्दौ रोहिणी देवतास्तु मे ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:-
अ) ॐ ब्रम्हणे नमःl
आ) ॐ प्रजापतये नमःll
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
त्रुवाक्ष मालाकरक पुस्तकाढ़यं चतुर्भुजं l
सर्वारिष्ट विनाशाय दातवत्क्रं नमामिच ll
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ रौहिण्यै नमःl
५) मृगशीर्ष
नक्षत्र: मृगशीर्ष
नक्षत्र देवता: चंद्र
नक्षत्र स्वामी: मंगळ
नक्षत्र आराध्य वृक्ष : खैर (कात)
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष: पिंपळ
राशी व्याप्ती : २ चरण वृषभ राशीमध्ये,
बाकीचे २ चरण मिथुन राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी :सर्प
नक्षत्र तत्व: वायु
नक्षत्र स्वभाव: शुभ
पौराणिक मंत्र:
श्वेतवर्णाकृतीः सोमो व्दिभुजो वरदण्डभृत् lदशाश्वरथमारूढो मृगशिर्षोस्तु मे मुदे ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र :-
अ) ॐ चंद्रमसे नमःl
आ) ॐ सोमाय नमःl
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
सर्व नक्षत्रं मध्येतु सोमोराजा व्यवस्थितःl
सर्वारिष्ट विनाशाय सोमाय सततं नमः ll
नक्षत्र नाम मंत्र :- ॐ मृगशीर्षाय नमःl
६) आर्द्रा
नक्षत्र: आर्द्रा
नक्षत्र देवता : रुद्र (शिव)
नक्षत्र स्वामी : राहु
नक्षत्र आराध्य वृक्ष : कृष्णागरू
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष : चंदन
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण मिथुन राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी : कुत्रा
नक्षत्र तत्व : जल
नक्षत्र स्वभाव : तीक्ष्ण
पौराणिक मंत्र:
रुद्र श्वेतो वृशारूढः श्वेतमाल्यश्चतुर्भुजःl
शूलखड्गाभयवरान्दधानो मे प्रसीदतु ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ रुद्राय नमः l
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
रुद्रोदेवो वृषारुढश्चतुर्बाहुस्त्रिलोचनःl
सर्वारिष्ट विनाशाय रुद्रायच नमोनमःll
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ आर्द्रायै नमःl
७) पुनर्वसु
नक्षत्र: पुनर्वसु
नक्षत्र देवता: अदिती
नक्षत्र स्वामी: गुरू
नक्षत्र आराध्य वृक्ष : वेळू/ बांबू
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष : वड
राशी व्याप्ती: 3 चरणे मिथुन राशीमध्ये,
बाकीचे १ चरण कर्क राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: मांजर
नक्षत्र तत्व: वायु
नक्षत्र स्वभाव: चर
पौराणिक मंत्र:
अदितीः पीतवर्णाश्च स्त्रुवाक्षकमण्डलून l
दधाना शुभदा मे स्यात पुनर्वसु कृतारव्या ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र :-
अ) ॐ आदित्यै नमःl
आ)ॐ आदितये नमःl
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
अदितीर्देवमाताच पुनर्वस्वधिपातया l
सर्वारिष्ट विनाशाय आदित्यैय नमोनमःll
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ आर्द्रायै नमःl
८) पुष्य
नक्षत्र: पुष्य
नक्षत्र देवता: गुरु
नक्षत्र स्वामी: शनि
नक्षत्र आराध्य वृक्ष: पिंपळ
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष : पळस
राशी व्याप्ती :४ हि चरण कर्क राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी :बकरी
नक्षत्र तत्व :अग्नी
नक्षत्र स्वभाव:शुभ
पौराणिक मंत्र:
वंदे बृहस्पतिं पुष्यदेवता मानुशाकृतिम् l
सर्वाभरण संपन्नं देवमंत्रेण मादरात् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र :- ॐ बृहस्पतये नमःl
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
देवमंत्री विशालाक्ष सदालोकहिते रतःl
सर्वारिष्ट विनाशाय धिषणाय नमोनमःll
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ पुष्याय नमःl
९) आश्लेषा
नक्षत्र:आश्लेषा
नक्षत्र देवता: सर्प
नक्षत्र स्वामी : बुध
नक्षत्र आराध्य वृक्ष: जुई (नागचाफा)
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष :उंडी
राशी व्याप्ती :४ हि चरण कर्क राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी : मांजर
नक्षत्र तत्व : जल
नक्षत्र स्वभाव: तीक्ष्ण,शोक
पौराणिक मंत्र: सर्पोरक्त स्त्रिनेत्रश्च फलकासिकरद्वयःl
आश्लेषा देवता पितांबरधृग्वरदो स्तुमे ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ सर्पेभ्यो नमःl
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
स्वर्वेद्यावश्वीनौ देवौ व्दिभुजौ शुक्लवर्णको lसर्वारिष्ट विनाशाय तुस्मै नित्यं नमोनमःll
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ आश्लेषायै नमःl
१०) मघा
नक्षत्र: मघा
नक्षत्र देवता: पितर
नक्षत्र स्वामी: केतु
नक्षत्र आराध्य वृक्ष: वड
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष: रिठा
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण सिंह राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: उंदीर
नक्षत्र तत्व: अग्नी
नक्षत्र स्वभाव :क्रुर, उग्र
पौराणिक मंत्र :
पितरः पिण्डह्स्ताश्च कृशाधूम्रा पवित्रिणःl
कुशलं द्घुरस्माकं मघा नक्षत्र देवताःll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ पितृभ्यो नमःl
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
पितरः कृष्णवर्नाश्च चतुर्हस्ता विमा नगाःl
सर्वारिष्ट विनाशाय तेभ्योनित्यं नमोनमःll
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ मघायै नमःl
११)पुर्वा (फाल्गुनी)
नक्षत्र: पुर्वा (फाल्गुनी)
नक्षत्र देवता : भग
नक्षत्र स्वामी : शुक्र
नक्षत्र आराध्य वृक्ष : पलाश (पळस)
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष: बेल
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण सिंह राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी:उंदीर
नक्षत्र तत्व: क्रुर
नक्षत्र स्वभाव : शुभ
पौराणिक मंत्र:
भगं रथवरारुढं व्दिभुंज शंखचक्रकम् l
फाल्गुनीदेवतां ध्यायेत् भक्ताभीष्टवरप्रदाम् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ भगाय नमःl
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
स्वर्वेद्यावश्वीनौ देवौ व्दिभुजौ शुक्लवर्णको lसर्वारिष्ट विनाशाय अश्विभ्यांवै नमो नमः
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ पुर्व फाल्गुनीभ्यां नमःl
१२) उत्तरा (फाल्गुनी)
नक्षत्र:उत्तरा (फाल्गुनी)
नक्षत्र देवता : अर्यमा
नक्षत्र स्वामी: रवि
नक्षत्र आराध्य वृक्ष : पायरी पिंपरी(प्लक्ष)
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष :अर्जुन
राशी व्याप्ती १ ले चरण सिंह राशीमध्ये,
बाकीचे ३ चरण कन्या राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: गाय
नक्षत्र तत्व :वायु
नक्षत्र स्वभाव: शुभ
पौराणिक मंत्र: संपूजयाम्यर्यमणं फाल्गुनी तार देवताम् l
गायत्री मंत्रः धुम्रवर्णं रथारुढं सुशक्तिकरसंयुतम् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र :- ॐ अर्यम्ने नमः
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
उत्तराधिपतिश्चैव लोकसंरक्षकस्तथा l
सर्वारिष्ट विनाशाय तस्मै नित्यं नमोनमःll
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ उत्तरा फाल्गुनीभ्यां नमःl
१३) हस्त
नक्षत्र :हस्त
नक्षत्र देवता : सुर्य
नक्षत्र स्वामी : चंद्र
नक्षत्र आराध्य वृक्ष : जाई,चमेली
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष: रिठा
राशी व्याप्ती :४ हि चरण कन्या राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी : म्हैस
नक्षत्र तत्व : वायु
नक्षत्र स्वभाव: शुभ, सत्वगुणी
पौराणिक मंत्र:
सवितारहं वंदे सप्ताश्चरथ वाहनम् l
पद्मासनस्थं छायेशं हस्तनक्षत्रदेवताम् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र :- ॐ सवित्रे नमःl
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
हस्तस्याधिपतीः सुर्यःजगदात्मा तथैवच l
सर्वारिष्ट विनाशाय अश्विभ्यांवै नमो नमःll
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ हस्ताय नमःl
१४) चित्रा
नक्षत्र : चित्रा
नक्षत्र देवता: त्वष्टा
नक्षत्र स्वामी: मंगळ
नक्षत्र आराध्य वृक्ष: बेल
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष: बकुळ
राशी व्याप्ती : २ चरण कन्या राशीमध्ये,
बाकीचे, २ चरण तुळ राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: वाघ
नक्षत्र तत्व : वायु
नक्षत्र स्वभाव: तीक्ष्ण
पौराणिक मंत्र:
त्वष्टारं रथमारूढं चित्रानक्षत्रदेवताम् l
शंखचक्रान्वितकरं किरीटीनमहं भजे ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ त्वष्ट्रे नमःl
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
त्वाष्ट्राॠक्षधिपश्चैव भक्त संरक्षकस्तथा l
सर्वारिष्ट विनाशाय त्वष्ट्राधिप नमोनमःll
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ चित्रायै नमःl
१५) स्वाती
नक्षत्र :स्वाती
नक्षत्र देवता: वायु
नक्षत्र स्वामी : राहु
नक्षत्र आराध्य वृक्ष: अर्जुन
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष : काटे सांवर
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण तुळ राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: म्हैस
नक्षत्र तत्व: अग्नी
नक्षत्र स्वभाव: शुभ
पौराणिक मंत्र:
वायुवरं मृगारुढं स्वाती नक्षत्र देवताम् l
खड्.ग चर्मोज्वल करं धुम्रवर्ण नमाम्यह्म् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ वायवे नमःl
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
स्वर्वेद्यावश्वीनौ देवौव्दिभुजौ शुक्लवर्णकोl
सर्वारिष्ट विनाशाय अश्विभ्यांवै नमो नमः
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ स्वात्यै नमःl
१६) विशाखा
नक्षत्रःविशाखा
नक्षत्र देवता : इंद्राग्नी
नक्षत्र स्वामी : गुरू
नक्षत्र आराध्य वृक्ष: देव बाभुळ ( दा.पं. = नागकेशर )
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष : पारिजातक
राशी व्याप्ती : पहिले 3 चरण तुळ राशीमध्ये,
बाकीचे १ चरण वृश्चिक राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी : वाघ
नक्षत्र तत्व : वायु
नक्षत्र स्वभाव: अशुभ
पौराणिक मंत्र:
इंद्राग्नीशुभदौ स्यातां विशाखा देवतेशुभे l
नमोम्ये करथारुढौ वराभयकरांबुजौ ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ इंद्राग्नीभ्यां नमः
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
स्वर्वेद्यावश्वीनौ देवौ व्दिभुजौ शुक्लवर्णको lसर्वारिष्ट विनाशाय इंद्राग्नीभ्यां नमोनमःll
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ विशाखाभ्यां नमःl
१७) अनुराधा
नक्षत्र :अनुराधा
नक्षत्र देवता : मित्र
नक्षत्र स्वामी : शनि
नक्षत्र आराध्य वृक्ष :नागकेशर
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष : सिता अशोक
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण वृश्चिक राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: हरीण
नक्षत्र तत्व: पृथ्वी
नक्षत्र स्वभाव: शुभ
पौराणिक मंत्र:
मित्रं पद्मासनारूढं अनुराधेश्वरं भजे l
शूलां कुशलसद्भाहुं युग्मंशोणितवर्णकम् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ मित्राय नमः l
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
अनुराधाधिपोमित्रः आयुष्योवर्धकस्तथा l सर्वारिष्ट विनाशाय मित्रायच नमोनमः
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ अनुराधाभ्यो नमःl
१८) जेष्ठा
नक्षत्र: जेष्ठा
नक्षत्र देवता: इंद्र
नक्षत्र स्वामी :बुध
नक्षत्र आराध्य वृक्ष: निर्गुडी/सांबळ (दा.पं. = सांबर )
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष: लोध्र
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण वृश्चिक राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: हरीण
नक्षत्र तत्व: पृथ्वी
नक्षत्र स्वभाव: तीक्ष्ण
पौराणिक मंत्र:
श्वेतहस्तिनमारूढं वज्रांकुशलरत्करम् l
सहस्त्रनेत्रं पीताभं इंद्रं ह्रदि विभावये ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ इंद्राय नमःl
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
इंद्रः सुरपतिः श्रेष्ठो वज्रहस्तो महाबलः l
रातयज्ञाधिपो देवस्तर मैनित्यं नमो नमः|l
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ जेष्ठायै नमःl
१९) मूळ
नक्षत्र:मूळ
नक्षत्र देवता: निॠति (राक्षस)
नक्षत्र स्वामी: केतु
नक्षत्र आराध्य वृक्ष : राळ
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष: देव बाबुळ
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण धनु राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: कुत्रा
नक्षत्र तत्व : जल
नक्षत्र स्वभाव: तीक्ष्ण
पौराणिक मंत्र: खड्.गखेटधरं कृष्णं यातुधानं नृवाहनम् l
अर्ध्वकेशं विरुपाक्षं भजे मुलाधिदेवताम् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ निॠतये नमः l
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
निॠति खड्.गहस्तंच सर्व लोकैक पावन l
नरवाहन मत्युग्रं वंदेहं कालिकाप्रियं ll
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ मुलाय नमःl
२०) पूर्वाषाढा
नक्षत्र: पूर्वाषाढा
नक्षत्र देवता: जल/ उदक
नक्षत्र स्वामी: शुक्र
नक्षत्र आराध्य वृक्ष: वेत
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष: अशोक सीता
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण धनु राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी:वानर
नक्षत्र तत्व: जल
नक्षत्र स्वभाव: उग्र
पौराणिक मंत्र:
आषाढदेवता नित्यमापः सन्तु शुभावहाःl
समुद्र गास्तरा गिणोल्हादिन्यःसर्वदेहिनाम्ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ अद्भयो नमःl
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
स्त्रीरूपाः पाशाकलशहस्ता मकरवाहनाःl
श्वेतमौक्तिक भूषाढ्या अद्भस्ताभ्यो नमो नमःll
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ पूर्वाषाढाभ्यां नमःl
२१) उत्तराषाढा
नक्षत्र: उत्तराषाढा
नक्षत्र देवता: विश्वदेव
नक्षत्र स्वामी: रवि
नक्षत्र आराध्य वृक्ष :फणस
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष: कांचन
राशी व्याप्ती : पहिले चरण धनु राशीमध्ये,
बाकीचे ३ चरण मकर राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: मुंगुस
नक्षत्र तत्व: पृथ्वी
नक्षत्र स्वभाव: स्थिर
पौराणिक मंत्र:
विश्वांदेवान् अहं वंदेषाढनक्षत्रदेवताम् l
श्रीपुष्टिकीर्तीधीदात्री सर्वपापानुमुक्तये ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः l
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
देवता बहुरूपत्वात् विश्वेदेवास्तथैवच l
सर्वारिष्ट विनाशाय तेभ्यो नित्यं नमो नमःll
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ उत्तराषाढाभ्यां नमःl
२२) श्रवण
नक्षत्र: श्रवण
नक्षत्र देवता: विष्णु
नक्षत्र स्वामी: चंद्र
नक्षत्र आराध्य वृक्ष: रुई ( अर्क ) मंदार
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष: आंबा
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण मकर राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: वानर
नक्षत्र तत्व: पृथ्वी
नक्षत्र स्वभाव: चर
पौराणिक मंत्र:
शांताकारं चतुर्हस्तं श्रोणा नक्षत्रवल्लभम् l
विष्णु कमलपत्राक्षं ध्यायेद् गरुड वाहन् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ विष्णवे नमः l
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
विष्णुं विष्णुं महाविष्णुं महेश्वरं l
सर्वारिष्ट विनाशाय नमामि पुरुषोत्तम ll
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ श्रवणाय नमःl
२३) धनिष्ठा
नक्षत्र: धनिष्ठा
नक्षत्र देवता :वसु
नक्षत्र स्वामी: मंगळ
नक्षत्र आराध्य वृक्ष: शमी
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष: नीम
राशी व्याप्ती: पहिले २ चरण मकर राशीमध्ये,
बाकीचे २ चरण कुंभ राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: सिंह
नक्षत्र तत्व: पृथ्वी
नक्षत्र स्वभाव: थोडेसे शुभ
पौराणिकमंत्र
श्राविष्ठादेवतां वंदे वसुन्वरधराश्रिताम् l
शंखचक्रांकितरांकिरीटांकित मस्तकाम् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ वसुभ्यो नमःl
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
अष्टौदेवाच वसवो यज्ञ संरक्षकास्तथा l
सर्वारिष्ट विनाशाय तेभ्यो नित्यं नमो नमःll
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ धनिष्ठायै नमःl
२४) शततारका
नक्षत्र: शततारका
नक्षत्र देवता: वरुण
नक्षत्र स्वामी: राहु
नक्षत्र आराध्य वृक्ष :कदंब
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष:आपटा
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण कुंभ राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: घोडा
नक्षत्र तत्व: जल
नक्षत्र स्वभाव: चर
पौराणिक मंत्र:
वरुणं सततं वंदे सुधाकलश धारीणम् l
पाशहस्तं शतभिशग् देवतां देववंदीतम ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ वरुणाय नमः
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
पाशहस्तंच वरुणं यादसां पतिमीश्वरं l
अपांपति महं वंदे देवं मकरवाहनं ll
नक्षत्र नाम मंत्र :- ॐ शतभिषजे नमः
२५) पुर्वाभाद्रपदा
नक्षत्र: पुर्वाभाद्रपदा
नक्षत्र देवता: अजैक चरण
नक्षत्र स्वामी: गुरू
नक्षत्र आराध्य वृक्ष: आंबा
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष: हिरडा
राशी व्याप्ती : पहिले ३ चरण कुंभ राशीमध्ये,
बाकीचे १ चरण मीन राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी :सिंह
नक्षत्र तत्व: अग्नी
नक्षत्र स्वभाव: उग्र
पौराणिक मंत्र:
शिरसा महजं वंदे ध्येकपादं तमोपहम् l
मुदे प्रोष्ठपदेवानं सर्वदेवनमस्कृतम् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र :-
ॐ अजैकपदे नमःl
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
अजायैकपदे नित्यं लोकस्यानंददायकः l
सर्वारिष्ट विनाशाय तस्मै नित्यं नमो नमःll
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ पुर्वाप्रोष्ठपद्भ्यां नमःl
२६) उत्तराभाद्रपदा
नक्षत्र : उत्तराभाद्रपदा
नक्षत्र देवता : अहिर्बुंधन्य
नक्षत्र स्वामी: शनि
नक्षत्र आराध्य वृक्ष: कडुलिंब (नीम)
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष :आवळा
राशी व्याप्ती : ४ ही चरण मीन राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: गायक
नक्षत्र तत्व : जल
नक्षत्र स्वभाव : ध्रुव
पौराणिक मंत्र:
अहिर्मे बुध्नियो भूयात मुदे प्रोष्ठ पदेश्वरःl
शंखचक्रांकीतकरः किरीटोज्वलमौलिमान् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ अहिर्बुंधन्याय नमःl
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
अहिर्बुंधन्यः सदाश्रेष्ठः सर्वरक्षणकस्तथा l
सर्वारिष्ट विनाशाय तस्मै नित्यं नमो नमःll
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ उत्तरप्रोष्ठपदभ्यां नमःl
२७) रेवती
नक्षत्र : रेवती
नक्षत्र देवता :पूषा
नक्षत्र स्वामी :बुध
नक्षत्र आराध्य वृक्ष
मोह ( मधुक )
नक्षत्र पर्यायी वृक्ष: जेष्ठमध/ चिंच
राशी व्याप्ती : ४ ही चरण मीन राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी : हत्ती
नक्षत्र तत्व: जल
नक्षत्र स्वभाव: मृदु
पौराणिक मंत्र:
पूषणं सततं वंदे रेवतीशं समृध्दये l
वराभयोज्वलकरं रत्नसिंहासने स्थितम् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ पूष्णे नमःl
नक्षत्र पीडाहर मंत्र:-
अधिपोरेवतीॠक्षः पशुरक्षणकस्तथाl
सर्वारिष्टसर्वार्थ विनाशाय तस्मै नित्यं नमो नमःll
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ रेवत्यै नमः

L" एल अक्षर

"L" एल अक्षर

जिस लड़की या लड़के के नाम की शुरुआत अंग्रेजी के 'L' अक्षर से होता है तो उस व्यक्ति के लिए प्यार, रोमांस ही सब कुछ होता है| रंग-रूप में भी ये काफी सुंदर होते हैं| हर चीज दिल से सोचने वाले होते हैं एल अक्षर वाले| इन्हें गुस्सा भी बहुत जल्दी आता है, लेकिन इनके गुस्से पर भोलेनाथ की कृपा रहती है इसलिए इनका गुस्सा जल्द ही काफूर हो जाता है। इस अक्षर वाले लोगों की एक खासियत होती है वो है इस अक्षर का व्यक्ति कभी किसी बड़ी चीज की तमन्ना नहीं रखता हैं। इन्हें छोटी-छोटी ही चीजों में खुशी मिलती है। ये बहुत कल्पनाशील होते हैं। इसलिए ये लोग अक्सर साहित्य के क्षेत्र में अपना करियर बनाते हैं।