||#बलवान_भाग्य_और_भाग्योदय_संबंधी_ग्रह_योग|| जिन जातको को सबकुछ या ज्यादातर जिंदगी में आसानी से मिल जाता है या जो वह पाना चाहते है आदि उन जातको को साधारण रूप से भाग्यशाली कहा जाता है।भाग्य का साथ जातक को मिल जाने से ज़िन्दगी एक तरह से कई मामलो में खुशहाल रहती है।कुंडली का नवां भाव भाग्य से सम्बन्ध रखता है।इस भाव की स्थिति से ही यह पता लगाया जाता है जातक कितना भाग्यशाली है और उसका भाग्य किन मामलो में कितना साथ देगा और भाग्य कितना बली है आदि।नवे भाव के स्वामी को भाग्येश कहते है इस भाव का कारक गुरु(बृहस्पति)है।भाग्येश और गुरु की बली और शुभ स्थिति होकर इन दोनों का केंद्र या त्रिकोण भाव में बैठना साथ ही नवें भाव पर अन्य शुभ ग्रहो गुरु शुक्र शुभ बुध पूर्ण बली चंद्र और योगकारक ग्रहो का प्रभाव होने पर जातक भाग्यशाली होता है।भाग्येश का नवें भाव में होना या नवे भाव को देखना भाग्योदय में सहायक होता है।भाग्येश का सम्बन्ध केंद्र या त्रिकोण 1,5 से होना, ज्यादातर 1, 4, 5, 7,10 भावेश से इन्ही भावो में बली सम्बन्ध भाग्य को अच्छा बनाता है।भाग्येश का 1,4, 5, 7, 10 भावेश से सम्बन्ध नैसर्गिक रूप से ग्रह युति या सम्बन्ध में शुभ होना भी आवश्यक है।नवे भाव में शुभ योगो का बनना जैसे बुधादित्य योग,गजकेसरी योग, लक्ष्मी योग, राजयोग, चामर योग, अमला योग, वेशी, वासी, सुनफा, अनफा आदि शुभ योगो का बनना और इन्ही शुभ योगो का ज्यादा से नवे भाव या भावेश के साथ बनना बहुत और भाग्यशाली बनाने वाली स्थिति होती है।इन सब स्थितियों में जातक का भाग्य अच्छा होता है और जातक कई तरह से भाग्यशाली कहलाता है। इसके विपरीत यदि नवे भाव या भावेश या दोनों पर ज्यादा से ज्यादा अशुभ योगो का प्रभाव होना, नवमेश का 6, 8 भावेश से सम्बन्ध होना या इन भावो में होकर कमजोर होना भाग्य को कमजोर करता और भाग्य साथ नही देता।भाग्येश का अस्त होना, अंशो में निर्बल होना, पाप ग्रहो से पीड़ित होने से, शुभ ग्रहो का प्रभाव भाग्येश और नवे भाव पर न होने से भाग्य कमजोर और ख़राब होता है।जितना ज्यादा भाग्य भाव या भाग्येश अशुभ प्रभाव में होना उतना ही भाग्य कमजोर होकर अशुभ प्रभाव देने वाला हो जाता है।भाग्येश यदि निर्बल हो तब भाग्येश का रत्न पहनना चाहिए भाग्येश 6, 8, 12 भाव में हो तब रत्न कुंडली की ठीक तरह से जांच करा कर ही पहनना चाहिए।गुरु ग्रह की गुरु की वस्तुओ से पूजा पाठ करनी चाहिए।जिन अशुभ योगो और ग्रहो के प्रभाव से भाग्य कमजोर हो गया है जिन ग्रहो के अशुभ प्रभाव से भाग्य सम्बंधित अशुभ फल मिल रहे है अशुभ प्रभाव देने वाले ग्रहो की शांति उन ग्रहो के मन्त्र जप, दान, हवन से कराकर ऐसे ग्रहो की शांति करा देनी चाहिए जिससे भाग्य का साथ और शुभ प्रभाव मिल सके।
Tuesday, October 17, 2017
Sunday, October 15, 2017
जन्म कुंडली नहीं है तो करें ये महाउपाय
जन्म कुंडली नहीं है तो करें ये महाउपाय :-
आपका बुरा समय चल रहा हो तो आपको किसी विद्वान ज्योतिषी की सहायता लेनी पड़ेगी ! कुछ लोगों की जन्म कुंडली या जन्म विवरण सही नहीं होता । ऐसी दशा में कैसे पता लगाया जाए कि आप पर किस ग्रह का प्रभाव चल रहा है ! कुछ लक्षण ऐसे होते हैं जिनका सीधा सम्बन्ध किसी ख़ास योग या ग्रह से होता है।
जैसे कि :--
» अगर आपको अचानक धन हानि होने लगे ! आपके पैसे खो जाएँ, बरकत न रहे, दमा या सांस की बीमारी हो जाए, त्वचा सम्बन्धी रोग उत्पन्न हों, कर्ज उतर न पाए, किसी कागजात पर गलत दस्तखत से नुक्सान हो तो आप पर बुध ग्रह का कुप्रभाव चल रहा है !
इसके लिए बुधवार को गाय को हरा चारा व 50 ग्राम चने की दाल व गुड़ , इसी दिन खिलाएं । व अभिमंत्रित किया हुआ पन्ना रत्न चांदी में धारण करें।
जब , बुजुर्ग लोग आपसे बार बार नाराज होते हैं, जोड़ों मैं तकलीफ है, शरीर मैं जकरण या आपका मोटापा बढ़ रहा है, नींद कम है, पढने लिखने में परेशानी है किसी ब्रह्मण से वाद विवाद हो जाए अथवा पीलिया हो जाए तो समझ लेना चाहिए की गुरु का अशुभ प्रभाव आप पर पढ़ रहा है ! अगर सोना गुम हो जाए पीलिया हो जाए या पुत्र पर संकट आ जाए तो निस्संदेह आप पर गुरु का अशुभ प्रभाव चल रहा है !
ऐसी स्थिति में केसर या हल्दी का तिलक वीरवार से शुरू करके 43 दिन तक रोज लगायें, सामान्य अशुभता दूर हो जाएगी किन्तु गंभीर परिस्थितियों में जैसे अगर नौकरी चली जाए या पुत्र पर संकट, सोना चोरी या गम हो जाए तो बृहस्पति के बीज मन्त्रों का जाप करें या करवाएं ! तुरंत मदद मिलेगी ! मंत्र का प्रभाव तुरंत शुरू हो जाता है ! व अभिमंत्रित किया हुआ पुखराज रत्न चांदी या सोने में धारण करें।
» अगर आपको वहम हो जाए, जरा जरा सी बात पर मन घबरा जाए, आत्मविश्वास मैं कमी आ जाए, सभी मित्रों पर से विशवास उठ जाए, ब्लड प्रेशर की बीमारी हो जाए, जुकाम ठीक न हो या बार बार होने लगे, आपकी माता की तबियत खराब रहने लगे ! अकारण ही भय सताने लगे और किसी एक जगह पर आप टिक कर ना बैठ सकें, छोटी छोटी बात पर आपको क्रोध आने लगे तो समझ लें की आपका चन्द्रमा आपके विपरीत चल रहा है ! इसके लिए हर सोमवार का व्रत रखें और दूध या खीर का दान करें ! अभिमंत्रित किया हुआ सफेद मोती व टाइगर या नीलमणि रत्न धारण करें।
» अगर आपकी स्त्रियों से नहीं बनती, किसी स्त्री से धोखा या मान हानि हो जाए, किसी शुभ काम को करते वक्त कुछ न कुछ अशुभ होने लगे, आपका रूप पहले जैसा सुन्दर न रहे ! लोग आपसे कतराने लगें ! वाहन को नुक्सान हो जाए ! नीच स्त्रियों से दोस्ती, ससुराल पक्ष से अलगाव तथा शूगर हो जाए तो आपका शुक्र बुरा प्रभाव दे रहा है !
आप महालक्ष्मी की पूजा करें, चीनी, चावल तथा चांदी शुक्रवार को किसी ब्राह्मण की पत्नी को भेंट करें, बड़ी बहन को वस्त्र दें, 21 ग्राम का चांदी का बिना जोड़ का कड़ा शुक्रवार को धारण करें ! अगर किसी के विवाह में देरी या बाधाएं आ रही हों तो जिस दिन रिश्ता देखने जाना हो उस दिन 57 आटे की गोलियां किसी नदी मैं प्रवाहित करके जाएँ ! इन में से किसी भी उपाय को करने से आपका शुक्र शुभ प्रभाव देने लगेगा ! किसी सुहागन को सुहाग का सामन देने से भी शुक्र का शुभ प्रभाव होने लगता है ! ध्यान रहे, शुक्रवार को राहुकाल में कोई भी उपाय न करें ! पुखराज व पन्ना दोनों रत्न धारण करें।
» अगर आपके मकान मैं दरार आ जाए ! घर में प्रकाश की मात्रा कम हो जाए ! जोड़ों में दर्द रहने लगे विशेषकर घुटनों और पैरों में या किसी एक टांग पर चोट, रंग काला हो जाए, जेल जाने का डर सताने लगे, सपनों मैं मुर्दे या शमशान घाट दिखाई दे, गठिया की शिकायत हो जाए, परिवार का कोई वरिष्ठ सदस्य गंभीर रूप से बीमार या मृत्यु को प्राप्त हो जाए तो आप पर शनि का कुप्रभाव है जिसके निवारण के लिए शनिवार को सरसों का तेल लोहे के कटोरे में डाल कर अपना मुँह उसमे देख कर , उसी तेल में गुलगुले बना कर कुत्तो को खीलायें व बचा तेल आटे में मिलाकर भैंस को खीलायें। ऐसा हर शनिवार करें ! बीमारी की अवस्था में किसी गरीब, बीमार व्यक्ति को दवाई दिलवाएं ! नीलम रत्न धारण करें। व धर में काले घोड़े की नाल लगाएं।
» अगर आपके बाल झड जाएँ और आपकी हड्डियों के जोड़ों मैं कड़क कड़क की आवाज आने लगे, पिता से झगडा हो जाए, मुकदमा या कोर्ट केस मैं फंस जाएँ, आपकी आत्मा दुखी हो जाए, आलसी प्रवृत्ति हो जाये तो आपको समझ लेना चाहिए की सूर्य व केतु का अशुभ प्रभाव आप पर हो रहा है !
ऐसी दशा मैं सबसे अच्छा उपाय है की हर सुबह सूर्य को मीठा डालकर अर्ध्य दें ! पिता से सम्बन्ध सुधरने की कोशिश करें ! पिता को उपहार दें। व गोमेद व लहसुनिया रत्न धारण करें।
» आपको खून की कमी हो जाए, बार बार दुर्घटना होने लगे या चोट लगने लगे, सर मैं चोट, आग से जलना, नौकरी मैं शत्रु पैदा हो जाएँ या ये पता न चल सके की कौन आपका नुक्सान करने की चेष्टा कर रहा है, व्यर्थ का लड़ाई झगडा हो, पुलिस केस, जीवन साथी के प्रति अलगाव नफरत या शक पैदा हो जाए, आपरेशन की नौबत आ जाए, कर्ज ऐसा लगने लगे की आसानी से ख़त्म नहीं होगा तो आप पर मंगल ग्रह क्रुद्ध हैं ! ऐसे में आप , हनुमान जी की यथासंभव उपासना शुरू कर दें ! हनुमान जी से तिलक लेकर माथे पर प्रतिदिन लगायें, अति गंभीर परिस्थितियों मैं रक्त दान करें तो जो रक्त आपका आपरेशन, चोट या दुर्घटना आदि के कारण निकलना है, नहीं होगा ! व मूंगा त्रिकोण व कला मोती रत्न धारण करें। ओर घर में एक मुखी रूद्राक्ष सिंदूर में मिला कर रखें ।
आपका बुरा समय चल रहा हो तो आपको किसी विद्वान ज्योतिषी की सहायता लेनी पड़ेगी ! कुछ लोगों की जन्म कुंडली या जन्म विवरण सही नहीं होता । ऐसी दशा में कैसे पता लगाया जाए कि आप पर किस ग्रह का प्रभाव चल रहा है ! कुछ लक्षण ऐसे होते हैं जिनका सीधा सम्बन्ध किसी ख़ास योग या ग्रह से होता है।
जैसे कि :--
» अगर आपको अचानक धन हानि होने लगे ! आपके पैसे खो जाएँ, बरकत न रहे, दमा या सांस की बीमारी हो जाए, त्वचा सम्बन्धी रोग उत्पन्न हों, कर्ज उतर न पाए, किसी कागजात पर गलत दस्तखत से नुक्सान हो तो आप पर बुध ग्रह का कुप्रभाव चल रहा है !
इसके लिए बुधवार को गाय को हरा चारा व 50 ग्राम चने की दाल व गुड़ , इसी दिन खिलाएं । व अभिमंत्रित किया हुआ पन्ना रत्न चांदी में धारण करें।
जब , बुजुर्ग लोग आपसे बार बार नाराज होते हैं, जोड़ों मैं तकलीफ है, शरीर मैं जकरण या आपका मोटापा बढ़ रहा है, नींद कम है, पढने लिखने में परेशानी है किसी ब्रह्मण से वाद विवाद हो जाए अथवा पीलिया हो जाए तो समझ लेना चाहिए की गुरु का अशुभ प्रभाव आप पर पढ़ रहा है ! अगर सोना गुम हो जाए पीलिया हो जाए या पुत्र पर संकट आ जाए तो निस्संदेह आप पर गुरु का अशुभ प्रभाव चल रहा है !
ऐसी स्थिति में केसर या हल्दी का तिलक वीरवार से शुरू करके 43 दिन तक रोज लगायें, सामान्य अशुभता दूर हो जाएगी किन्तु गंभीर परिस्थितियों में जैसे अगर नौकरी चली जाए या पुत्र पर संकट, सोना चोरी या गम हो जाए तो बृहस्पति के बीज मन्त्रों का जाप करें या करवाएं ! तुरंत मदद मिलेगी ! मंत्र का प्रभाव तुरंत शुरू हो जाता है ! व अभिमंत्रित किया हुआ पुखराज रत्न चांदी या सोने में धारण करें।
» अगर आपको वहम हो जाए, जरा जरा सी बात पर मन घबरा जाए, आत्मविश्वास मैं कमी आ जाए, सभी मित्रों पर से विशवास उठ जाए, ब्लड प्रेशर की बीमारी हो जाए, जुकाम ठीक न हो या बार बार होने लगे, आपकी माता की तबियत खराब रहने लगे ! अकारण ही भय सताने लगे और किसी एक जगह पर आप टिक कर ना बैठ सकें, छोटी छोटी बात पर आपको क्रोध आने लगे तो समझ लें की आपका चन्द्रमा आपके विपरीत चल रहा है ! इसके लिए हर सोमवार का व्रत रखें और दूध या खीर का दान करें ! अभिमंत्रित किया हुआ सफेद मोती व टाइगर या नीलमणि रत्न धारण करें।
» अगर आपकी स्त्रियों से नहीं बनती, किसी स्त्री से धोखा या मान हानि हो जाए, किसी शुभ काम को करते वक्त कुछ न कुछ अशुभ होने लगे, आपका रूप पहले जैसा सुन्दर न रहे ! लोग आपसे कतराने लगें ! वाहन को नुक्सान हो जाए ! नीच स्त्रियों से दोस्ती, ससुराल पक्ष से अलगाव तथा शूगर हो जाए तो आपका शुक्र बुरा प्रभाव दे रहा है !
आप महालक्ष्मी की पूजा करें, चीनी, चावल तथा चांदी शुक्रवार को किसी ब्राह्मण की पत्नी को भेंट करें, बड़ी बहन को वस्त्र दें, 21 ग्राम का चांदी का बिना जोड़ का कड़ा शुक्रवार को धारण करें ! अगर किसी के विवाह में देरी या बाधाएं आ रही हों तो जिस दिन रिश्ता देखने जाना हो उस दिन 57 आटे की गोलियां किसी नदी मैं प्रवाहित करके जाएँ ! इन में से किसी भी उपाय को करने से आपका शुक्र शुभ प्रभाव देने लगेगा ! किसी सुहागन को सुहाग का सामन देने से भी शुक्र का शुभ प्रभाव होने लगता है ! ध्यान रहे, शुक्रवार को राहुकाल में कोई भी उपाय न करें ! पुखराज व पन्ना दोनों रत्न धारण करें।
» अगर आपके मकान मैं दरार आ जाए ! घर में प्रकाश की मात्रा कम हो जाए ! जोड़ों में दर्द रहने लगे विशेषकर घुटनों और पैरों में या किसी एक टांग पर चोट, रंग काला हो जाए, जेल जाने का डर सताने लगे, सपनों मैं मुर्दे या शमशान घाट दिखाई दे, गठिया की शिकायत हो जाए, परिवार का कोई वरिष्ठ सदस्य गंभीर रूप से बीमार या मृत्यु को प्राप्त हो जाए तो आप पर शनि का कुप्रभाव है जिसके निवारण के लिए शनिवार को सरसों का तेल लोहे के कटोरे में डाल कर अपना मुँह उसमे देख कर , उसी तेल में गुलगुले बना कर कुत्तो को खीलायें व बचा तेल आटे में मिलाकर भैंस को खीलायें। ऐसा हर शनिवार करें ! बीमारी की अवस्था में किसी गरीब, बीमार व्यक्ति को दवाई दिलवाएं ! नीलम रत्न धारण करें। व धर में काले घोड़े की नाल लगाएं।
» अगर आपके बाल झड जाएँ और आपकी हड्डियों के जोड़ों मैं कड़क कड़क की आवाज आने लगे, पिता से झगडा हो जाए, मुकदमा या कोर्ट केस मैं फंस जाएँ, आपकी आत्मा दुखी हो जाए, आलसी प्रवृत्ति हो जाये तो आपको समझ लेना चाहिए की सूर्य व केतु का अशुभ प्रभाव आप पर हो रहा है !
ऐसी दशा मैं सबसे अच्छा उपाय है की हर सुबह सूर्य को मीठा डालकर अर्ध्य दें ! पिता से सम्बन्ध सुधरने की कोशिश करें ! पिता को उपहार दें। व गोमेद व लहसुनिया रत्न धारण करें।
» आपको खून की कमी हो जाए, बार बार दुर्घटना होने लगे या चोट लगने लगे, सर मैं चोट, आग से जलना, नौकरी मैं शत्रु पैदा हो जाएँ या ये पता न चल सके की कौन आपका नुक्सान करने की चेष्टा कर रहा है, व्यर्थ का लड़ाई झगडा हो, पुलिस केस, जीवन साथी के प्रति अलगाव नफरत या शक पैदा हो जाए, आपरेशन की नौबत आ जाए, कर्ज ऐसा लगने लगे की आसानी से ख़त्म नहीं होगा तो आप पर मंगल ग्रह क्रुद्ध हैं ! ऐसे में आप , हनुमान जी की यथासंभव उपासना शुरू कर दें ! हनुमान जी से तिलक लेकर माथे पर प्रतिदिन लगायें, अति गंभीर परिस्थितियों मैं रक्त दान करें तो जो रक्त आपका आपरेशन, चोट या दुर्घटना आदि के कारण निकलना है, नहीं होगा ! व मूंगा त्रिकोण व कला मोती रत्न धारण करें। ओर घर में एक मुखी रूद्राक्ष सिंदूर में मिला कर रखें ।
क्रोधित स्वभाव के विशेष ग्रहयोग
क्रोधित स्वभाव के विशेष ग्रहयोग – *
*ज्योतिषीय दृष्टिकोण में हमारी कुंडली के “लग्न भाव” को हमारे स्वभाव का कारक माना गया है कुंडली का “द्वितीय भाव” भी हमारी वाणी और व्यव्हार को नियंत्रित करता है और “पंचम भाव” बुद्धि का स्थान होने से हमारे व्यव्हार को प्रभावित करता है॥*
*कुंडली के इन तीन भावों का तो महत्व है ही परंतु क्रोध और क्रोधित स्वभाव के लिए विशेषकर “मंगल” को क्रोध का कारक माना गया है॥*
*बुध हमारी बुद्धि, चन्द्रमाँ मन का, बृहस्पति विवेक का कारक है अतः मंगल के अलावा इन सभी ग्रहों की स्थिति क्रोध और क्रोध के स्तर को निश्चित करती है॥*
*एक और ग्रह है जो व्यक्ति के क्रोध को विध्वंसात्मक रूप देने का कार्य करता है वह है “राहु“, राहु को एक विध्वंसकारी और नकारात्मक ऊर्जा का कारक माना गया है जो अपनी युति से मंगल को विकृत करके व्यक्ति के क्रोध को विध्वंसकारी बना देता है॥*
*1)यदि मंगल कुंडली के लग्न या पंचम भाव में हो तो व्यक्ति में क्रोध की अधिकता होती है।*
*2)कुंडली में मंगल और बुध का योग हो तो व्यक्ति बहुत क्रोधित स्वभाव का होता है।*
*3)सूर्य और मंगल का योग व्यक्ति को क्रोधित स्वभाव का बनाता है।कुंडली के द्वितीय और पँचम भाव में यदि कोई पाप योग बना हो या कोई ग्रह नीच राशि में बैठा हो तो भी व्यक्ति अधिक क्रोध करने वाला होता है।)*
*4)बृहस्पति और मंगल का योग भी व्यक्ति को तीव्र क्रोध देता है।लग्नेश और पंचमेश के साथ मंगल का योग भी क्रोध को बढ़ाता है।*
*5)यदि कुंडली में गुरुचांडाल योग (गुरु + राहु) हो तो व्यक्ति क्रोध और अभद्र व्यव्हार करने वाला होता है।*
*6)राहु और चन्द्रमाँ का योग भी व्यक्ति को क्रोधित और चिड़चिड़े स्वभाव का बनाता है।*
*7)मंगल और राहु का योग व्यक्ति को अनियंत्रित और विध्वंसकारी क्रोध देता है।*
*8)द्वितीय भाव में राहु होना या बुध और राहु के योग में भी राहु वाणी को प्रभावित करके क्रोध को बढ़ाता है।*
*ज्योतिषीय दृष्टिकोण में हमारी कुंडली के “लग्न भाव” को हमारे स्वभाव का कारक माना गया है कुंडली का “द्वितीय भाव” भी हमारी वाणी और व्यव्हार को नियंत्रित करता है और “पंचम भाव” बुद्धि का स्थान होने से हमारे व्यव्हार को प्रभावित करता है॥*
*कुंडली के इन तीन भावों का तो महत्व है ही परंतु क्रोध और क्रोधित स्वभाव के लिए विशेषकर “मंगल” को क्रोध का कारक माना गया है॥*
*बुध हमारी बुद्धि, चन्द्रमाँ मन का, बृहस्पति विवेक का कारक है अतः मंगल के अलावा इन सभी ग्रहों की स्थिति क्रोध और क्रोध के स्तर को निश्चित करती है॥*
*एक और ग्रह है जो व्यक्ति के क्रोध को विध्वंसात्मक रूप देने का कार्य करता है वह है “राहु“, राहु को एक विध्वंसकारी और नकारात्मक ऊर्जा का कारक माना गया है जो अपनी युति से मंगल को विकृत करके व्यक्ति के क्रोध को विध्वंसकारी बना देता है॥*
*1)यदि मंगल कुंडली के लग्न या पंचम भाव में हो तो व्यक्ति में क्रोध की अधिकता होती है।*
*2)कुंडली में मंगल और बुध का योग हो तो व्यक्ति बहुत क्रोधित स्वभाव का होता है।*
*3)सूर्य और मंगल का योग व्यक्ति को क्रोधित स्वभाव का बनाता है।कुंडली के द्वितीय और पँचम भाव में यदि कोई पाप योग बना हो या कोई ग्रह नीच राशि में बैठा हो तो भी व्यक्ति अधिक क्रोध करने वाला होता है।)*
*4)बृहस्पति और मंगल का योग भी व्यक्ति को तीव्र क्रोध देता है।लग्नेश और पंचमेश के साथ मंगल का योग भी क्रोध को बढ़ाता है।*
*5)यदि कुंडली में गुरुचांडाल योग (गुरु + राहु) हो तो व्यक्ति क्रोध और अभद्र व्यव्हार करने वाला होता है।*
*6)राहु और चन्द्रमाँ का योग भी व्यक्ति को क्रोधित और चिड़चिड़े स्वभाव का बनाता है।*
*7)मंगल और राहु का योग व्यक्ति को अनियंत्रित और विध्वंसकारी क्रोध देता है।*
*8)द्वितीय भाव में राहु होना या बुध और राहु के योग में भी राहु वाणी को प्रभावित करके क्रोध को बढ़ाता है।*
भाव 6 से आजीविका का विचार
भाव 6 से आजीविका का विचार
छठा भाव त्रिक भावों में से एक भाव है. 6,8 व 12 वें भाव को त्रिक भावों के नाम से जाना जाता है. तथा त्रिक भावों को शुभ भाव नहीं कहा जाता है. इन भावों का संबन्ध जिन भी ग्रहों व भावेशों से बनता है उनकी शुभता में कमी आती है.
छठे भाव को रोग भाव ऋण व सेवा भाव के नाम से भी जाना जाता है व्यक्ति के शत्रु भी इसी भाव से देखे जाते है. यह भाव उपचय भावों में भी शामिल किया गया है.
इसके अलावा छठा भाव अर्थ भाव ( दूसरा, छठा व दशम भाव) भी है. इस भाव पर गुरु की दृ्ष्टि व्यक्ति को जीवन में अर्थ की कमी नहीं होने देती. इस प्रकार इस भाव की भूमिका को आजीविका के क्षेत्र में कम नहीं समझना चाहिए.
एक अन्य मत के अनुसार इस भाव से एसे सभी कार्य जो अधिक मेहनत से पूरे होते है, कर्मचारी, सेवक आदि का विचार इस भाव से करना चाहिए. इस भाव में शुभ ग्रहों का एक साथ स्थित होना, व्यक्ति को सेवा कार्यो में सदभाव व स्नेह का भाव देता है.
ऋण भाव
इसके विपरीत यह ऋण का भाव भी है. आजीविका के कार्यो को पूर्ण करने के लिये तथा इसका विस्तार करने के लिये ऋण लेने की स्थिति आती ही रहती है. किसी व्यक्ति के लिये ऋण लेना सरल होगा या नहीं, इसका विचार करने के लिये इस भाव में अगर शुभ ग्रह स्थित हों तो ऋण लेने में बाधाएं आती है. अन्यथा यह सरलता से प्राप्त हो जाता है.
इस भाव के स्वामी का अशुभ प्रभाव में होने पर व्यक्ति के रोग ग्रस्त होने की संभावनाएं बढ जाती है इस भाव पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव व्यक्ति को बिमारियां शीघ्र होने की संभावनाएं बनाता है.
भाव 6 में अशुभ ग्रह
जब कुण्डली के छठे भाव में अशुभ ग्रह स्थित हों तो व्यक्ति की आजीविका में बाधाएं देते है. इस योग के फलों को देखते समय इन अशुभ ग्रहों पर शुभ ग्रहों का प्रभाव नहीं होना चाहिए. इस भाव में चन्द्र या शुक्र की स्थिति होने पर व्यक्ति अस्पताल या होटल से संबन्धित क्षेत्रों में आजीविका प्राप्त कर सफल हो रहा होता है
यह भाव अस्पताल का भाव है. सूर्य या राहू अशुभ ग्रह होकर व्यक्ति को चिकित्सक बनने की योग्यताएं देते है. चिकित्सा भाव से जुडे के लिये व्यक्ति की कुंडली में चन्द्र का नीच राशि में होना इस योग में वृ्द्धि करता है. छठे भाव से मंगल का संबन्ध व्यक्ति को सेना या पुलिस के क्षेत्र में काम करने के अवसर देता है. इस भाव से जब शनि का संबन्ध बनता है. तो व्यक्ति को न्याय के क्षेत्र में सफलता मिलने की संभावनाएं रहती है.
भाव 6 की राशियां
जब छठे भाव में हिंसक राशियां अर्थात (1,2,8,11 वीं राशि ) हों, तथा इस भाव में एक से अधिक पाप ग्रह एक-दूसरे से निकटतम अंशों पर स्थित हों तो व्यक्ति को नौकरी से निकाले जाने का योग बनता है. इस प्रकार बनने वाले अन्य योग केतु व शनि निकटतम अंशों के साथ छठे भाव में स्थित हों तो भी उपरोक्त योग बनता है. एक अन्य मत के अनुसार इस भाव में मंगल, शनि, राहू व केतु आजीविका क्षेत्र में परेशानियां देते है. इस भाव में चन्द्र व्यक्ति के मन को कठोर बनाता है. अर्थात इस भाव में चन्द्र होने पर व्यक्ति शीघ्र विचलित नहीं होता है. फिर भी चन्द्र की शुभता देखने के लिये उसका पक्ष बल भी अवश्य देख लेना चाहिए.
भाव 6 में पीडित मंगल
जब कुण्डली में मंगल पीडित होकर स्थित हों तथा लग्न भाव में अपनी राशि से दृष्टि संबन्ध बना रहे हों, तो व्यक्ति पुलिस विभाग में या अन्य किसी विभाग में अनितिपूर्ण तरीके से धन कमाने का प्रयास करता है. अष्टम का मंगल तीसरे भाव में अपनी राशि को देखे उसे बली कर रहा हों तब भी व्यक्ति के पुलिस विभाग में गलत तरीके से धन प्राप्त करने के योग बनते है.
इस भाव में मंगल व चन्द्र का सम्बन्ध व्यक्ति के सर्जन बनने की योग्यता देता है
वकालत में सफलता के योग
जब कुण्डली में छठा भाव, तीसरा भाव व नवम भाव बली हो तथा इन भावों से मंगल व शनि का संबन्ध होने पर व्यक्ति अपने पराक्रम के बल पर कानून के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है. इस भाव में शनि बली अवस्था में हों तो व्यक्ति को व्यापार के स्थान पर नौकरी करना अधिक पसन्द होता है शनि नौकरी या सेवा के कारक ग्रह है. वे जब कुण्डली में सुस्थिर होकर स्थित हों तो व्यक्ति अपने सभी काम स्वयं करना पसन्द करता है.
छठा भाव त्रिक भावों में से एक भाव है. 6,8 व 12 वें भाव को त्रिक भावों के नाम से जाना जाता है. तथा त्रिक भावों को शुभ भाव नहीं कहा जाता है. इन भावों का संबन्ध जिन भी ग्रहों व भावेशों से बनता है उनकी शुभता में कमी आती है.
छठे भाव को रोग भाव ऋण व सेवा भाव के नाम से भी जाना जाता है व्यक्ति के शत्रु भी इसी भाव से देखे जाते है. यह भाव उपचय भावों में भी शामिल किया गया है.
इसके अलावा छठा भाव अर्थ भाव ( दूसरा, छठा व दशम भाव) भी है. इस भाव पर गुरु की दृ्ष्टि व्यक्ति को जीवन में अर्थ की कमी नहीं होने देती. इस प्रकार इस भाव की भूमिका को आजीविका के क्षेत्र में कम नहीं समझना चाहिए.
एक अन्य मत के अनुसार इस भाव से एसे सभी कार्य जो अधिक मेहनत से पूरे होते है, कर्मचारी, सेवक आदि का विचार इस भाव से करना चाहिए. इस भाव में शुभ ग्रहों का एक साथ स्थित होना, व्यक्ति को सेवा कार्यो में सदभाव व स्नेह का भाव देता है.
ऋण भाव
इसके विपरीत यह ऋण का भाव भी है. आजीविका के कार्यो को पूर्ण करने के लिये तथा इसका विस्तार करने के लिये ऋण लेने की स्थिति आती ही रहती है. किसी व्यक्ति के लिये ऋण लेना सरल होगा या नहीं, इसका विचार करने के लिये इस भाव में अगर शुभ ग्रह स्थित हों तो ऋण लेने में बाधाएं आती है. अन्यथा यह सरलता से प्राप्त हो जाता है.
इस भाव के स्वामी का अशुभ प्रभाव में होने पर व्यक्ति के रोग ग्रस्त होने की संभावनाएं बढ जाती है इस भाव पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव व्यक्ति को बिमारियां शीघ्र होने की संभावनाएं बनाता है.
भाव 6 में अशुभ ग्रह
जब कुण्डली के छठे भाव में अशुभ ग्रह स्थित हों तो व्यक्ति की आजीविका में बाधाएं देते है. इस योग के फलों को देखते समय इन अशुभ ग्रहों पर शुभ ग्रहों का प्रभाव नहीं होना चाहिए. इस भाव में चन्द्र या शुक्र की स्थिति होने पर व्यक्ति अस्पताल या होटल से संबन्धित क्षेत्रों में आजीविका प्राप्त कर सफल हो रहा होता है
यह भाव अस्पताल का भाव है. सूर्य या राहू अशुभ ग्रह होकर व्यक्ति को चिकित्सक बनने की योग्यताएं देते है. चिकित्सा भाव से जुडे के लिये व्यक्ति की कुंडली में चन्द्र का नीच राशि में होना इस योग में वृ्द्धि करता है. छठे भाव से मंगल का संबन्ध व्यक्ति को सेना या पुलिस के क्षेत्र में काम करने के अवसर देता है. इस भाव से जब शनि का संबन्ध बनता है. तो व्यक्ति को न्याय के क्षेत्र में सफलता मिलने की संभावनाएं रहती है.
भाव 6 की राशियां
जब छठे भाव में हिंसक राशियां अर्थात (1,2,8,11 वीं राशि ) हों, तथा इस भाव में एक से अधिक पाप ग्रह एक-दूसरे से निकटतम अंशों पर स्थित हों तो व्यक्ति को नौकरी से निकाले जाने का योग बनता है. इस प्रकार बनने वाले अन्य योग केतु व शनि निकटतम अंशों के साथ छठे भाव में स्थित हों तो भी उपरोक्त योग बनता है. एक अन्य मत के अनुसार इस भाव में मंगल, शनि, राहू व केतु आजीविका क्षेत्र में परेशानियां देते है. इस भाव में चन्द्र व्यक्ति के मन को कठोर बनाता है. अर्थात इस भाव में चन्द्र होने पर व्यक्ति शीघ्र विचलित नहीं होता है. फिर भी चन्द्र की शुभता देखने के लिये उसका पक्ष बल भी अवश्य देख लेना चाहिए.
भाव 6 में पीडित मंगल
जब कुण्डली में मंगल पीडित होकर स्थित हों तथा लग्न भाव में अपनी राशि से दृष्टि संबन्ध बना रहे हों, तो व्यक्ति पुलिस विभाग में या अन्य किसी विभाग में अनितिपूर्ण तरीके से धन कमाने का प्रयास करता है. अष्टम का मंगल तीसरे भाव में अपनी राशि को देखे उसे बली कर रहा हों तब भी व्यक्ति के पुलिस विभाग में गलत तरीके से धन प्राप्त करने के योग बनते है.
इस भाव में मंगल व चन्द्र का सम्बन्ध व्यक्ति के सर्जन बनने की योग्यता देता है
वकालत में सफलता के योग
जब कुण्डली में छठा भाव, तीसरा भाव व नवम भाव बली हो तथा इन भावों से मंगल व शनि का संबन्ध होने पर व्यक्ति अपने पराक्रम के बल पर कानून के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है. इस भाव में शनि बली अवस्था में हों तो व्यक्ति को व्यापार के स्थान पर नौकरी करना अधिक पसन्द होता है शनि नौकरी या सेवा के कारक ग्रह है. वे जब कुण्डली में सुस्थिर होकर स्थित हों तो व्यक्ति अपने सभी काम स्वयं करना पसन्द करता है.
शनि शत्रु नहीं मित्र
शनि शत्रु नहीं मित्र -
ज्योतिष-शास्त्र में शनि से अधिक चर्चित शायद ही कोई दूसरा विषय हो जिसे जानने या पढ़ने के लिए लोग उत्सुक रहते हों। वैसे तो नव-ग्रह में प्रत्येक का अपना अलग महत्व है प्रत्येक ग्रह हमारे जीवन के किसी ना किसी पक्ष को प्रभावित करता ही है परन्तु शनि का यहाँ एक विशेष महत्व है क्योंकि शनि को नव ग्रह में दण्डाधिकारी का पद मिला है परन्तु शनि ग्रह को लेकर समाज और लोगों के मन में बहुत सी भ्रान्तियाँ फैली हुई हैं और इसका कारन पूर्ण ज्ञान या जानकारी का न होना भी है तो आईये ज्योतिष में शनि के महत्व को जाने।
ज्योतिष में शनि का महत्व -
खगोलीय दृष्टि से शनि हमारे सोलर सिस्टम में सूर्य से सबसे दूर स्थित ग्रह है। ज्योतिष में वर्णित बारह राशियों में शनि को "मकर" और "कुम्भ" राशि का स्वामी मना गया है शनि की उच्च राशि "तुला" तथा नीच राशि "मेष" मानी गयी है शनि को एक क्रोधित ग्रह के रूप में दर्शाया गया है। शनि का वर्ण काला है। शनि की गति नवग्रहों में सबसे धीमी है इसी लिए शनि एक राशि में ढाई वर्ष तक रहता है और बारह राशियों के चक्र को तीस साल में पूरा करता है।
ज्योतिष में शनि को - कर्म, आजीविका, जनता, सेवक, नौकरी, अनुशाशन, दूरदृष्टि, प्राचीन-वस्तु, लोहा, स्टील, कोयला, पेट्रोल, पेट्रोलयम प्रोडक्ट, मशीन, औजार, तपश्या और अध्यात्म का करक मन गया है। स्वास्थ की दृष्टि से शनि हमारे पाचन-तंत्र, हड्डियों के जोड़, बाल, नाखून,और दांतों को नियंत्रित करता है।
प्राचीन ग्रंथों में शनि को दुःख का कारक या दुःख देने वाला ग्रह माना गया है परन्तु कलयुग मशीनों का ही बोलबाला है और शनि मशीनों का कारक ग्रह है इसलिए वर्तमान समय में शनि को एक तकनीकी ग्रह के रूप में देखा जाना चहिये। तकनिकी क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों के जीवन में शनि का बड़ा महत्व होता है। यदि किसी की कुंडली में शनि मजबूत हो तो ऐसा व्यक्ति तकनिकी क्षेत्र में सफलता पाता है।
शनि की साढ़ेसाती- साढ़ेसाती ज्योतिष का सर्वाधिक चर्चित विषय है और शायद ही लोगों के मन में किसी अन्य ग्रह स्थिति को लेकर इतना भय रहता हो जितना के साढ़ेसाती को लेकर रहता है पर वास्तविकता पूरी तरह ऐसी नहीं होती
जब गोचरवश शनि हमारी जन्म राशि से बारहवीं राशि में आता है तो साढ़ेसाती आरम्भ हो जाती है साढ़ेसाती के दौरान शनि ढाई साल हमारी राशि से बारहवीं राशि में ढाई साल हमारी राशि में और ढाई साल हमारी राशि से अगली राशि में गोचर करता है इस तरह साडेसात साल पूरे होते हैं। जब किसी व्यक्ति के जीवन में साढ़ेसाती का प्रेवेश होता है तो संघर्ष बढ़ने लगता है कार्यों में बाधायें आने लगती हैं व्यक्ति को बहुत कठिन परिश्रम करना पड़ता है जीवन में उतार-चढाव बहुत बढ़ जाते हैं परन्तु साढ़ेसाती के दौरान होने वाले इस संघर्ष का एक दूसरा पक्ष भी है हमारे अनेको पूर्व जन्मों में किये गए या जाने अनजाने में हुए पाप या अशुभ कर्म भी जन्मों से एकत्रित होकर हमारे वर्तमान के साथ जुड़े रहते हैं और साढ़ेसाती के दौरान शनि हमसे संघर्ष और परिश्रम कराकर उन इक्कट्ठे हुए पाप कर्मों को भष्म करके हमारे जीवन को पवित्र कर देते हैं और संघर्ष का सामना कराकर व्यक्ति के "अहंकार" रुपी शत्रु को भी नष्ट कर देते हैं इससे पता चलता है के साढ़ेसाती का हमारे जीवन में आना आवश्यक भी है ये साढ़ेसाती का एक गहन पहलु था। अब यदि ज्योतिष के तकनिकी दृष्टिकोण से देखे तो साढ़ेसाती आने पर व्यक्ति के जीवन में संघर्ष तो आता है परन्तु साढ़ेसाती का फल कभी भी सब के लिए एक जैसा नहीं होता साढ़ेसाती का फल आपके लिए कैसा होगा यह पूरी तरह आपकी कुंडली की ग्रह स्थिति पर निर्भर करता है कुछ लोगों को संघर्ष का सामना करना पड़ता है तो कुछ लोग साढ़ेसाती के दौरान बहुत उन्नति भी करते हैं। साढ़ेसाती के समय यदि शनि हमारी कुंडली में अपने मित्र ग्रहों पर गोचर करे तो ऐसे में साढ़ेसाती बहुत अच्छा फल करती है।
साढ़ेसाती के उपाय - यदि शनि की साढ़ेसाती या महादशा के दौरान बाधायें आ रही हो तो ये उपाय करें अवश्य लाभ होगा –
1. ॐ शम शनैश्चराय नमः का जप करें।
2. साबुत उड़द का दान करें।
3. शनिवार को पीपल के पेड़ पर सरसों के तेल का दिया जलायें।
4. हनुमान चालीसा का पाठ करें।
वर्तमान समय में शनि वृश्चिक राशि में गोचर कर रहा है और इस समय धनु, वृश्चिक और तुला राशि पर साढ़ेसाती चल रही है तथा मेष और सिंह राशि पर शनि की ढैया चल रही है।
26 अक्टूबर 2017 को शनि का धनु राशि में प्रवेश होगा शनि के धनु राशि में प्रवेश से साढ़ेसाती और ढैय्या के वर्तमान समीकरण और प्रभाव में बड़ा परिवर्तन होगा जिसकी पूरी जानकारी हम जल्द ही आपको देंगे।
।। श्री हनुमते नमः।।
ज्योतिष-शास्त्र में शनि से अधिक चर्चित शायद ही कोई दूसरा विषय हो जिसे जानने या पढ़ने के लिए लोग उत्सुक रहते हों। वैसे तो नव-ग्रह में प्रत्येक का अपना अलग महत्व है प्रत्येक ग्रह हमारे जीवन के किसी ना किसी पक्ष को प्रभावित करता ही है परन्तु शनि का यहाँ एक विशेष महत्व है क्योंकि शनि को नव ग्रह में दण्डाधिकारी का पद मिला है परन्तु शनि ग्रह को लेकर समाज और लोगों के मन में बहुत सी भ्रान्तियाँ फैली हुई हैं और इसका कारन पूर्ण ज्ञान या जानकारी का न होना भी है तो आईये ज्योतिष में शनि के महत्व को जाने।
ज्योतिष में शनि का महत्व -
खगोलीय दृष्टि से शनि हमारे सोलर सिस्टम में सूर्य से सबसे दूर स्थित ग्रह है। ज्योतिष में वर्णित बारह राशियों में शनि को "मकर" और "कुम्भ" राशि का स्वामी मना गया है शनि की उच्च राशि "तुला" तथा नीच राशि "मेष" मानी गयी है शनि को एक क्रोधित ग्रह के रूप में दर्शाया गया है। शनि का वर्ण काला है। शनि की गति नवग्रहों में सबसे धीमी है इसी लिए शनि एक राशि में ढाई वर्ष तक रहता है और बारह राशियों के चक्र को तीस साल में पूरा करता है।
ज्योतिष में शनि को - कर्म, आजीविका, जनता, सेवक, नौकरी, अनुशाशन, दूरदृष्टि, प्राचीन-वस्तु, लोहा, स्टील, कोयला, पेट्रोल, पेट्रोलयम प्रोडक्ट, मशीन, औजार, तपश्या और अध्यात्म का करक मन गया है। स्वास्थ की दृष्टि से शनि हमारे पाचन-तंत्र, हड्डियों के जोड़, बाल, नाखून,और दांतों को नियंत्रित करता है।
प्राचीन ग्रंथों में शनि को दुःख का कारक या दुःख देने वाला ग्रह माना गया है परन्तु कलयुग मशीनों का ही बोलबाला है और शनि मशीनों का कारक ग्रह है इसलिए वर्तमान समय में शनि को एक तकनीकी ग्रह के रूप में देखा जाना चहिये। तकनिकी क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों के जीवन में शनि का बड़ा महत्व होता है। यदि किसी की कुंडली में शनि मजबूत हो तो ऐसा व्यक्ति तकनिकी क्षेत्र में सफलता पाता है।
शनि की साढ़ेसाती- साढ़ेसाती ज्योतिष का सर्वाधिक चर्चित विषय है और शायद ही लोगों के मन में किसी अन्य ग्रह स्थिति को लेकर इतना भय रहता हो जितना के साढ़ेसाती को लेकर रहता है पर वास्तविकता पूरी तरह ऐसी नहीं होती
जब गोचरवश शनि हमारी जन्म राशि से बारहवीं राशि में आता है तो साढ़ेसाती आरम्भ हो जाती है साढ़ेसाती के दौरान शनि ढाई साल हमारी राशि से बारहवीं राशि में ढाई साल हमारी राशि में और ढाई साल हमारी राशि से अगली राशि में गोचर करता है इस तरह साडेसात साल पूरे होते हैं। जब किसी व्यक्ति के जीवन में साढ़ेसाती का प्रेवेश होता है तो संघर्ष बढ़ने लगता है कार्यों में बाधायें आने लगती हैं व्यक्ति को बहुत कठिन परिश्रम करना पड़ता है जीवन में उतार-चढाव बहुत बढ़ जाते हैं परन्तु साढ़ेसाती के दौरान होने वाले इस संघर्ष का एक दूसरा पक्ष भी है हमारे अनेको पूर्व जन्मों में किये गए या जाने अनजाने में हुए पाप या अशुभ कर्म भी जन्मों से एकत्रित होकर हमारे वर्तमान के साथ जुड़े रहते हैं और साढ़ेसाती के दौरान शनि हमसे संघर्ष और परिश्रम कराकर उन इक्कट्ठे हुए पाप कर्मों को भष्म करके हमारे जीवन को पवित्र कर देते हैं और संघर्ष का सामना कराकर व्यक्ति के "अहंकार" रुपी शत्रु को भी नष्ट कर देते हैं इससे पता चलता है के साढ़ेसाती का हमारे जीवन में आना आवश्यक भी है ये साढ़ेसाती का एक गहन पहलु था। अब यदि ज्योतिष के तकनिकी दृष्टिकोण से देखे तो साढ़ेसाती आने पर व्यक्ति के जीवन में संघर्ष तो आता है परन्तु साढ़ेसाती का फल कभी भी सब के लिए एक जैसा नहीं होता साढ़ेसाती का फल आपके लिए कैसा होगा यह पूरी तरह आपकी कुंडली की ग्रह स्थिति पर निर्भर करता है कुछ लोगों को संघर्ष का सामना करना पड़ता है तो कुछ लोग साढ़ेसाती के दौरान बहुत उन्नति भी करते हैं। साढ़ेसाती के समय यदि शनि हमारी कुंडली में अपने मित्र ग्रहों पर गोचर करे तो ऐसे में साढ़ेसाती बहुत अच्छा फल करती है।
साढ़ेसाती के उपाय - यदि शनि की साढ़ेसाती या महादशा के दौरान बाधायें आ रही हो तो ये उपाय करें अवश्य लाभ होगा –
1. ॐ शम शनैश्चराय नमः का जप करें।
2. साबुत उड़द का दान करें।
3. शनिवार को पीपल के पेड़ पर सरसों के तेल का दिया जलायें।
4. हनुमान चालीसा का पाठ करें।
वर्तमान समय में शनि वृश्चिक राशि में गोचर कर रहा है और इस समय धनु, वृश्चिक और तुला राशि पर साढ़ेसाती चल रही है तथा मेष और सिंह राशि पर शनि की ढैया चल रही है।
26 अक्टूबर 2017 को शनि का धनु राशि में प्रवेश होगा शनि के धनु राशि में प्रवेश से साढ़ेसाती और ढैय्या के वर्तमान समीकरण और प्रभाव में बड़ा परिवर्तन होगा जिसकी पूरी जानकारी हम जल्द ही आपको देंगे।
।। श्री हनुमते नमः।।
विवाह के लिये सप्तम भाव, सप्तमेश और शुक्र का विचार किया जाता है.
विवाह के लिये सप्तम भाव, सप्तमेश और शुक्र का विचार किया जाता है. ये तीनों शुभ स्थिति में हों तो विवाह शीघ्र होता है तथा वैवाहिक जीवन भी सुखमय रहने की संभावनाएं बनती है.
इसके विपरीत जब सप्तम भाव, सप्तमेश और शुक्र तीनों किसी भी प्रकार के पाप प्रभाव में हों तो विवाह में विलम्ब की संभावना बनती है. विवाह के समय का निर्धारण करने में कुण्डली में बन रहे योग विशेष भूमिका निभाते है.
किसी व्यक्ति को जीवन में कितना सुख मिलेगा यह सब कुण्डली के योगों पर निर्भर करता है. शुभ ग्रह, शुभ भावों के स्वामी होकर जब शुभ भावों में स्थित हों, तथा अशुभ ग्रह निर्बल होकर अशुभ भावों के स्वामी होकर, अशुभ भावों में स्थित हों तो व्यक्ति को अनुकुल फल देते हैं.
आईये देखे कि कुण्डली के योग विवाह समय को किस प्रकार प्रभावित करते है.
जब जन्म कुण्डली में अष्टमेश पंचम में हों व्यक्ति का विवाह विलम्ब से होने की संभावना बनती है. अष्टम भाव व इस भाव के स्वामी का संबन्ध जिन भावों से बनता है. उन भावों के फलों की प्राप्ति में बाधाएं आने की संभावना रहती है.
इसके अलावा जब जन्म कुण्डली में सूर्य व चन्द्र शनि से पूर्ण दृष्टि संबन्ध रखते हों तब भी व्यक्ति का विवाह देर से होने के योग बनते है. इस योग में सूर्य व चन्द्र दोनों में से कोई सप्तम भाव का स्वामी हो या फिर सप्तम भाव में स्थित हों तभी इस प्रकार की संभावना बनती है.
शुक्र केन्द्र में स्थित हों और शनि शुक्र से सप्तम भाव में स्थित हों तो व्यक्ति का विवाह वयस्क आयु में प्रवेश के बाद ही होने की संभावना बनती है.
शनि सप्तमेश होकर एकादश भाव में स्थित हों और एकादशेश दशम भाव में हों तो व्यक्ति का विवाह 21 से 23 वर्ष में होने की उम्मीद रहती है.
अगर शुक्र चन्द्र से सप्तम भाव में स्थ्ति हो और शनि शुक्र से सप्तम भाव में स्थित हों तो भी व्यक्ति का विवाह शीघ्र हो सकता है.
इसके अतिरिक्त सप्तमेश और शुभ ग्रह द्वितीय भाव में हों तो व्यक्ति का विवाह 21 वर्ष में हो सकती है.
जब जन्म कुण्डली में शुभ ग्रह प्रथम, द्वितीय या सप्तम भाव में हों तब व्यक्ति का विवाह 21 वर्ष के आसपास होने के योग बनते है.
चन्द्र जब कुण्डली में शुक्र से सप्तम भाव में हो व बुध चन्द्र से सप्तम भाव में और अष्टमेश पंचम में हो तो व्यक्ति का विवाह 22 वें वर्ष में होने की संभावना बनती है.
इसके अतिरिक्त जब शुक्र द्वितीय में और मंगल अष्टमेश के साथ हों तो व्यक्ति बाईस से सताईस वर्ष की आयु में विवाह करता है.
चन्द्र शुक्र से सप्तम में और लग्नेश शुक्र एकादश भाव में स्थित हों तो व्यक्ति का विवाह 27 वें वर्ष में होने की संभावनाएं बनती है.
अगर कुण्डली में सप्तमेश नवम में हो, शुक्र तीसरे में हो तो व्यक्ति का विवाह 27 से 30 के मध्य की आयु में होने के योग बनते है.
अष्टमेश स्व-राशि में स्थित हों और लग्नेश शुक्र के साथ हो तो व्यक्ति का विवाह विलम्ब से होने की संभावना बढ़ जाती है.
सप्तमेश त्रिकोण भावों में क्रूर ग्रहों के साथ हों और शुक्र भी पाप ग्रहों से पीड़ित होकर द्वितीय भाव में स्थित हों तो 30 वर्ष के बाद विवाह की संभावना रहती है.
लग्नेश या सप्तमेश स्वराशि में स्थित होकर पंचम या छठे भाव से दूर स्थित हो तो व्यक्ति की शादी देर से हो सकती है.
अगर सप्तम भाव का स्वामी सूर्य हों तो व्यक्ति का विवाह 24 से 26 वर्ष के मध्य होने की संभावना बनती है.
चन्द्र सप्तमेश होने पर व्यक्ति का विवाह 21 से 22 वें वर्ष के मध्य होने का योग बनाता है.
मंगल सप्तमेश हो तो 24 से 27 के मध्य की आयु में विवाह संभव है.
बुध सप्तमेश होने पर 28 से 30 की आयु में विवाह का योग बनता है.
जिस व्यक्ति की कुण्डली में गुरु सप्तमेश हो उस व्यक्ति का विवाह 22 से 24 वर्ष की आयु में होने की संभावना बनती है.
शुक्र के सप्तमेश होने पर 21 से 23 वर्ष की आयु में विवाह हो सकता है.
शनि सप्तमेश होने पर 30 वर्ष के पश्चात विवाह होने की उम्मीद रहती है.
इन योगों में ग्रहों की स्थिति के अनुसार विवाह समय में परिवर्तन हो सकता है. अगर सप्तमेश उच्च हो, बलवान हो, शुभ ग्रहों के प्रभाव में हो तथा अशुभ ग्रहों के पाप प्रभाव से मुक्त हो तो विवाह की आयु में परिवर्तन होना संभव है.
इसके विपरीत जब सप्तम भाव, सप्तमेश और शुक्र तीनों किसी भी प्रकार के पाप प्रभाव में हों तो विवाह में विलम्ब की संभावना बनती है. विवाह के समय का निर्धारण करने में कुण्डली में बन रहे योग विशेष भूमिका निभाते है.
किसी व्यक्ति को जीवन में कितना सुख मिलेगा यह सब कुण्डली के योगों पर निर्भर करता है. शुभ ग्रह, शुभ भावों के स्वामी होकर जब शुभ भावों में स्थित हों, तथा अशुभ ग्रह निर्बल होकर अशुभ भावों के स्वामी होकर, अशुभ भावों में स्थित हों तो व्यक्ति को अनुकुल फल देते हैं.
आईये देखे कि कुण्डली के योग विवाह समय को किस प्रकार प्रभावित करते है.
जब जन्म कुण्डली में अष्टमेश पंचम में हों व्यक्ति का विवाह विलम्ब से होने की संभावना बनती है. अष्टम भाव व इस भाव के स्वामी का संबन्ध जिन भावों से बनता है. उन भावों के फलों की प्राप्ति में बाधाएं आने की संभावना रहती है.
इसके अलावा जब जन्म कुण्डली में सूर्य व चन्द्र शनि से पूर्ण दृष्टि संबन्ध रखते हों तब भी व्यक्ति का विवाह देर से होने के योग बनते है. इस योग में सूर्य व चन्द्र दोनों में से कोई सप्तम भाव का स्वामी हो या फिर सप्तम भाव में स्थित हों तभी इस प्रकार की संभावना बनती है.
शुक्र केन्द्र में स्थित हों और शनि शुक्र से सप्तम भाव में स्थित हों तो व्यक्ति का विवाह वयस्क आयु में प्रवेश के बाद ही होने की संभावना बनती है.
शनि सप्तमेश होकर एकादश भाव में स्थित हों और एकादशेश दशम भाव में हों तो व्यक्ति का विवाह 21 से 23 वर्ष में होने की उम्मीद रहती है.
अगर शुक्र चन्द्र से सप्तम भाव में स्थ्ति हो और शनि शुक्र से सप्तम भाव में स्थित हों तो भी व्यक्ति का विवाह शीघ्र हो सकता है.
इसके अतिरिक्त सप्तमेश और शुभ ग्रह द्वितीय भाव में हों तो व्यक्ति का विवाह 21 वर्ष में हो सकती है.
जब जन्म कुण्डली में शुभ ग्रह प्रथम, द्वितीय या सप्तम भाव में हों तब व्यक्ति का विवाह 21 वर्ष के आसपास होने के योग बनते है.
चन्द्र जब कुण्डली में शुक्र से सप्तम भाव में हो व बुध चन्द्र से सप्तम भाव में और अष्टमेश पंचम में हो तो व्यक्ति का विवाह 22 वें वर्ष में होने की संभावना बनती है.
इसके अतिरिक्त जब शुक्र द्वितीय में और मंगल अष्टमेश के साथ हों तो व्यक्ति बाईस से सताईस वर्ष की आयु में विवाह करता है.
चन्द्र शुक्र से सप्तम में और लग्नेश शुक्र एकादश भाव में स्थित हों तो व्यक्ति का विवाह 27 वें वर्ष में होने की संभावनाएं बनती है.
अगर कुण्डली में सप्तमेश नवम में हो, शुक्र तीसरे में हो तो व्यक्ति का विवाह 27 से 30 के मध्य की आयु में होने के योग बनते है.
अष्टमेश स्व-राशि में स्थित हों और लग्नेश शुक्र के साथ हो तो व्यक्ति का विवाह विलम्ब से होने की संभावना बढ़ जाती है.
सप्तमेश त्रिकोण भावों में क्रूर ग्रहों के साथ हों और शुक्र भी पाप ग्रहों से पीड़ित होकर द्वितीय भाव में स्थित हों तो 30 वर्ष के बाद विवाह की संभावना रहती है.
लग्नेश या सप्तमेश स्वराशि में स्थित होकर पंचम या छठे भाव से दूर स्थित हो तो व्यक्ति की शादी देर से हो सकती है.
अगर सप्तम भाव का स्वामी सूर्य हों तो व्यक्ति का विवाह 24 से 26 वर्ष के मध्य होने की संभावना बनती है.
चन्द्र सप्तमेश होने पर व्यक्ति का विवाह 21 से 22 वें वर्ष के मध्य होने का योग बनाता है.
मंगल सप्तमेश हो तो 24 से 27 के मध्य की आयु में विवाह संभव है.
बुध सप्तमेश होने पर 28 से 30 की आयु में विवाह का योग बनता है.
जिस व्यक्ति की कुण्डली में गुरु सप्तमेश हो उस व्यक्ति का विवाह 22 से 24 वर्ष की आयु में होने की संभावना बनती है.
शुक्र के सप्तमेश होने पर 21 से 23 वर्ष की आयु में विवाह हो सकता है.
शनि सप्तमेश होने पर 30 वर्ष के पश्चात विवाह होने की उम्मीद रहती है.
इन योगों में ग्रहों की स्थिति के अनुसार विवाह समय में परिवर्तन हो सकता है. अगर सप्तमेश उच्च हो, बलवान हो, शुभ ग्रहों के प्रभाव में हो तथा अशुभ ग्रहों के पाप प्रभाव से मुक्त हो तो विवाह की आयु में परिवर्तन होना संभव है.
सप्तम भाव
सप्तम भाव में मंगल- बुध
अगर किसी व्यक्ति की जन्म कुण्डली में विवाह भाव में मंगल व बुध दोनों एक साथ स्थित हों तो व्यक्ति के जीवनसाथी के स्वास्थ्य में कमी के योग बनते है. इस योग के व्यक्ति के जीवनसाथी को बेवजह इधर-उधर भटकना पड़ सकता है. इनके साथी को वाद-विवाद कि स्थिति से बचने का प्रयास करना चाहिए तथा अच्छे कार्य करना चाहिए.
सप्तम भाव में मंगल-गुरु
सप्तम भाव में जब मंगल व गुरु कि युति हो रही हों तो व्यक्ति के जीवनसाथी के साहस में वृद्धि की संभावनाएं बनती है. इस योग के फलस्वरुप व्यक्ति का जीवनसाथी पराक्रमी होता है. उसे अपने मित्रों व बंधुओं का सुख प्राप्त होता है. घूमने का शौकीन होता है. इस योग के व्यक्ति को अपने जीवनसाथी से कुछ कम सहयोग मिल सकता है.
सप्तम भाव में मंगल-शुक्र
कुण्डली में सप्तम भाव में मंगल व शुक्र की युति व्यक्ति के जीवनसाथी को रोमांटिक बनाती है. इस योग के फलस्वरुप व्यक्ति का जीवनसाथी विशेष स्नेह करने वाला होता है. ऎसे व्यक्ति को अपने जीवनसाथी के कारण कई बार अपयश का भी सामना करना पड़ सकता है. कुण्डली में यह योग होने पर व्यक्ति को अपने जीवन साथी से संबन्धों में ईमानदार रहना चाहिए.
सप्तम भाव में मंगल-शनि
अगर कुण्डली के सप्तम भाव में मंगल व शनि दोनों एक साथ स्थित हों तो संतान सुख में कमी हो सकती है. इस योग में किसी कारण से जीवनसाथी से कुछ समय के लिए दूर रहना पड़ता है. जीवनसाथी के स्वास्थ्य में कमी भी आती है. वैवाहिक जीवन में इन्हें अपयश से बचने का प्रयास करना चाहिए.
सप्तम भाव में बुध-गुरु
यह योग व्यक्ति के जीवनसाथी के सौन्दर्य में वृद्धि करता है. विवाह भाव में बुध व गुरु कि युति होने से मित्रों की संख्या अधिक होती है. उन्हें अपने छोटे भाई-बहनों का सहयोग प्राप्त होता है. इस योग के प्रभाव से व्यक्ति के जीवनसाथी के धन में वृद्धि होती है.
यह योग व्यक्ति के जीवनसाथी के स्वभाव में मृ्दुता का भाव रहने की संभावनाएं बनाता है. अपने मधुर स्वभाव के कारण उसके सभी से अच्छे संबन्ध होते है. ऎसे व्यक्ति को अपने पिता के सहयोग से लाभ प्राप्त होने की भी संभावनाएं बनती है.
सप्तम भाव में बुध-शुक्र
जब कुण्डली में विवाह भाव में बुध व शुक्र दोनों शुभ ग्रह एक साथ स्थित हों तो व्यक्ति के जीवनसाथी के सहयोग से धन व वैभव में वृद्धि की संभावना बनती हैं. योग के शुभ प्रभाव से व्यक्ति के पारिवारिक स्तर में भी वृद्धि होती है. उन्हें सरकारी क्षेत्रों से भी लाभ प्राप्त होने की संभावना बनती है. इस योग के व्यक्ति का जीवन साथी स्वभाव, गुण व योग्यता से उत्तम होता है.
सप्तम भाव में बुध-शनि
इस योग वाले व्यक्ति की शादी में विलम्ब की संभावना रहती है. इनके जीवनसाथी को परोपकारी बनना चाहिए तथा सच बोलने का प्रयास करना चाहिए.
सप्तम भाव में गुरु-शुक्र
यह योग व्यक्ति के जीवनसाथी को सुन्दर, सुशील व जीवनसाथी से स्नेह करने वाला बनाता है. इसके फलस्वरुप व्यक्ति के धन, वैभव में वृद्धि होती है. उत्तम वाहनों का सुख प्राप्त होने का योग बनता है. इस योग के कारण व्यक्ति के यश में भी बढ़ोतरी होती है.
सप्तम भाव में गुरु-शनि
यह योग जीवनसाथी को जिद्दी बना सकता है. इस योग के व्यक्ति को अपने पिता के धन को अनावश्य व्यय नहीं करना चाहिए. इन्हें आर्थिक नुकसान का भी सामना करना पड़ सकता है.
सप्तम भाव में शुक्र-शनि
विवाह भाव में शुक्र व शनि की युति से व्यक्ति के जीवनसाथी को धन, वैभव तथा अनेक प्रकार के सुख प्राप्त होने कि संभावना बनती है.
अगर किसी व्यक्ति की जन्म कुण्डली में विवाह भाव में मंगल व बुध दोनों एक साथ स्थित हों तो व्यक्ति के जीवनसाथी के स्वास्थ्य में कमी के योग बनते है. इस योग के व्यक्ति के जीवनसाथी को बेवजह इधर-उधर भटकना पड़ सकता है. इनके साथी को वाद-विवाद कि स्थिति से बचने का प्रयास करना चाहिए तथा अच्छे कार्य करना चाहिए.
सप्तम भाव में मंगल-गुरु
सप्तम भाव में जब मंगल व गुरु कि युति हो रही हों तो व्यक्ति के जीवनसाथी के साहस में वृद्धि की संभावनाएं बनती है. इस योग के फलस्वरुप व्यक्ति का जीवनसाथी पराक्रमी होता है. उसे अपने मित्रों व बंधुओं का सुख प्राप्त होता है. घूमने का शौकीन होता है. इस योग के व्यक्ति को अपने जीवनसाथी से कुछ कम सहयोग मिल सकता है.
सप्तम भाव में मंगल-शुक्र
कुण्डली में सप्तम भाव में मंगल व शुक्र की युति व्यक्ति के जीवनसाथी को रोमांटिक बनाती है. इस योग के फलस्वरुप व्यक्ति का जीवनसाथी विशेष स्नेह करने वाला होता है. ऎसे व्यक्ति को अपने जीवनसाथी के कारण कई बार अपयश का भी सामना करना पड़ सकता है. कुण्डली में यह योग होने पर व्यक्ति को अपने जीवन साथी से संबन्धों में ईमानदार रहना चाहिए.
सप्तम भाव में मंगल-शनि
अगर कुण्डली के सप्तम भाव में मंगल व शनि दोनों एक साथ स्थित हों तो संतान सुख में कमी हो सकती है. इस योग में किसी कारण से जीवनसाथी से कुछ समय के लिए दूर रहना पड़ता है. जीवनसाथी के स्वास्थ्य में कमी भी आती है. वैवाहिक जीवन में इन्हें अपयश से बचने का प्रयास करना चाहिए.
सप्तम भाव में बुध-गुरु
यह योग व्यक्ति के जीवनसाथी के सौन्दर्य में वृद्धि करता है. विवाह भाव में बुध व गुरु कि युति होने से मित्रों की संख्या अधिक होती है. उन्हें अपने छोटे भाई-बहनों का सहयोग प्राप्त होता है. इस योग के प्रभाव से व्यक्ति के जीवनसाथी के धन में वृद्धि होती है.
यह योग व्यक्ति के जीवनसाथी के स्वभाव में मृ्दुता का भाव रहने की संभावनाएं बनाता है. अपने मधुर स्वभाव के कारण उसके सभी से अच्छे संबन्ध होते है. ऎसे व्यक्ति को अपने पिता के सहयोग से लाभ प्राप्त होने की भी संभावनाएं बनती है.
सप्तम भाव में बुध-शुक्र
जब कुण्डली में विवाह भाव में बुध व शुक्र दोनों शुभ ग्रह एक साथ स्थित हों तो व्यक्ति के जीवनसाथी के सहयोग से धन व वैभव में वृद्धि की संभावना बनती हैं. योग के शुभ प्रभाव से व्यक्ति के पारिवारिक स्तर में भी वृद्धि होती है. उन्हें सरकारी क्षेत्रों से भी लाभ प्राप्त होने की संभावना बनती है. इस योग के व्यक्ति का जीवन साथी स्वभाव, गुण व योग्यता से उत्तम होता है.
सप्तम भाव में बुध-शनि
इस योग वाले व्यक्ति की शादी में विलम्ब की संभावना रहती है. इनके जीवनसाथी को परोपकारी बनना चाहिए तथा सच बोलने का प्रयास करना चाहिए.
सप्तम भाव में गुरु-शुक्र
यह योग व्यक्ति के जीवनसाथी को सुन्दर, सुशील व जीवनसाथी से स्नेह करने वाला बनाता है. इसके फलस्वरुप व्यक्ति के धन, वैभव में वृद्धि होती है. उत्तम वाहनों का सुख प्राप्त होने का योग बनता है. इस योग के कारण व्यक्ति के यश में भी बढ़ोतरी होती है.
सप्तम भाव में गुरु-शनि
यह योग जीवनसाथी को जिद्दी बना सकता है. इस योग के व्यक्ति को अपने पिता के धन को अनावश्य व्यय नहीं करना चाहिए. इन्हें आर्थिक नुकसान का भी सामना करना पड़ सकता है.
सप्तम भाव में शुक्र-शनि
विवाह भाव में शुक्र व शनि की युति से व्यक्ति के जीवनसाथी को धन, वैभव तथा अनेक प्रकार के सुख प्राप्त होने कि संभावना बनती है.
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