Monday, September 18, 2017

मंगल बनाता है रियल हीरो

मंगल बनाता है रियल हीरो ......
जन्म कुंडली में अगर मंगल अपनी स्व राशी का होकर या अपनी उच्च राशी मकर का होकर कुंडली के 1,3,6,10,11 में हो तो जातक एक वीर योद्धा होता है तथा शत्रुहन्ता भी होता है ,ऐसा व्यक्ति परम प्रतिभाशाली होने के साथ साथ अत्यंत साहसी ,वीर ,धीर व सेनानायक होता है ऐसे मनुष्य अपनी मेहनत के बल पर अपना भाग्य चमकाते हैं और जीवन में बहुत कुछ करते हैं तथा समाज में बहुत नाम करते हैं ,ऐसे योग वाले जातक पुलिस ,सेना ,खेल ,कुश्ती ,क्रिकेट ,राजनीती आदि क्षेत्रों में अधिक सफल देखें जातें हैं ,जो वास्त्विक हीरो होते हैं ..

पाल्मिस्ट्री में अचानक धन लाभ

पाल्मिस्ट्री में बताया गया है कि व्यक्ति की हथेली में मौजूद कुछ रेखाओं को देखकर उनकी आर्थिक स्थिति को जाना जा सकता है। कुछ रेखाएं ऐसी होती हैं जिन्हें देखकर यह साफ कहा जा सकता है कि व्यक्ति धनवान होगा। तो देखिए आपकी हथेली में ऐसी रेखाएं मौजूद हैं या नहीं।
1. हथेली भारी हो और उंगलियों का आधार भी बराबर है साथ ही भाग्य रेखा एक से अधिक हो तो यह संकेत है कि आपका भाग्य कई ओर से लाभ दिलाएगा। ऐसे व्यक्ति को अचानक धन लाभ मिलता है और करोड़पति बन जाता है।
2. भाग्य रेखा हथेली में मोटी से पतली होती जाए। जीवन रेखा गोल और शनि पर्वत ऊंचा हो तो व्यक्ति व्यवसाय में खूब धन कमाता है और करोड़पति बनता है।
3. हथेली भारी है और जीवन रेखा के साथ साथ मंगल रेखा चल रही हो तो यह ब्रह्मा का संकेत है कि आप करोड़पति बनेंगे। ऐसे व्यक्ति को पैतृक संपत्ति से बड़ा लाभ मिलता है।
4. हथेली में भाग्य रेखा जीवन रेखा से दूर हो और चन्द्र पर्व से एक पतली रेखा निकलकर भाग्य रेखा से मिले तो व्यक्ति विदेश में जाकर धनवान बनता है।

5. भाग्य रेखा मणिबंध से निकलकर सीधे शनि पर्वत पर जाए और सूर्य रेखा एक से अधिक हो साथ ही सूर्य और शनि की उंगली सीधी हो तो यह संकेत है कि आप काफी धनवान बनेंगे।
6. चन्द्रमा से एक रेखा निकलकर भाग्य रेखा से मिले और भाग्य रेखा पतली हो और सीधे शनि पर्वत पर खत्म हो रही है तो यह आपके करोड़पति बनने का योग है।
7. विवाह रेखा गुरु पर्वत पर जाए। हाथ में मोटी रेखाओं का जाल नहीं हो और मस्तिष्क रेखा कटी फटी नहीं हो तो व्यक्ति महिलाओं और सुसराल के सहयोग से धनवान बनता है।
8. हथेली में उंगलियां सीधी हो और जीवन रेखा गोल हो साथ ही शुक्र पर्वत पर तिल का निशान हो तो आप करोड़पति होते हैं।
9. भाग्य रेखा, बुध रेखा और मस्तिष्क से त्रिकोण का निशान बने तो आप अमीर आदमी बनेंगे।

मंत्र-महिमा किस मंत्र से क्या लाभ होता है..

*"मंत्र-महिमा किस मंत्र से क्या लाभ होता है.."*
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मन की मनन करने की शक्ति अर्थात एकाग्रता
प्रदान करके, जप द्वारा सभी भयों का विनाश
करके, पूर्ण रूप से रक्षा करनेवाले शब्दों को -
मंत्र कहा जाता है। ऐसे कुछ मंत्र  और  उनकी
शक्ति निम्न प्रकार है ::~

1. हरि ॐ
ह्रीं शब्द बोलने से यकृत पर गहरा प्रभाव पड़ता है
और हरि के साथ यदि *ॐ* मिला कर उच्चारण किया
जाए तो हमारी पाँचों ज्ञानेन्द्रियों पर अच्छी असर
पड़ती है। सात बार हरि ॐ का गुंजन करने से
मूलाधार केन्द्र पर स्पंदन होते हैं और कई रोगों
को कीटाणु भाग जाते हैं।

2. हे राम!
रमन्ते योगीनः यस्मिन् स रामः। जिसमें योगी लोग
रमण करते हैं वह है राम। रोम रोम में जो चैतन्य
आत्मा है वह है राम। ॐ राम... ॐ राम.. का हर
रोज एक घण्टे तक जप करने से रोग प्रतिकारक
शक्ति बढ़ती है, मन पवित्र होता है,निराशा,हताशा
और मानसिक दुर्बलता दूर होने से शारीरिक स्वा -
स्थ्य प्राप्त होता है।

3. सूर्यमंत्रः ॐ सूर्याय नमः।
इस मँत्र के जप से स्वास्थ्य, दीर्घायु, वीर्य एवं ओज
की प्राप्ति होती है। यह मंत्र शरीर एवं चक्षु के सारे
रोग दूर करता है। इस मंत्र के जप करने से जापक
के शत्रु उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते।

4. सारस्वत्य मंत्रः ॐ सारस्वत्यै नमः।
इस मंत्र के जप से ज्ञान और तीव्र बुद्धि प्राप्त होती है।

5. लक्ष्मी मंत्रः ॐ श्री महालक्ष्म्यै नमः।
इस मंत्र के जप से धन की प्राप्ति होती है और निर्धनता
का निवारण होता है।

6. गणेष मंत्रः ॐ श्री गणेषाय नमः। ॐ गं गणपतये नमः।
इन मंत्रों के जप से कोई भी कार्य पूर्ण करने में आने वाले
विघ्नों का नाश होता है।

7. हनुमान मंत्रः ॐ श्री हनुमते नमः।
इस मंत्र के जप से विजय और बल की प्राप्ति होती है।

8. सुब्रह्मण्यमंत्रः ॐ श्री शरणभवाय नमः।
इस मंत्र के जप से कार्यों में सफलता मिलती है।
यह मंत्र प्रेतात्मा के दुष्प्रभाव को दूर करता है।

9. सगुण मंत्रः ॐ श्री रामाय नमः। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमः शिवाय।
ये सगुण मंत्र हैं, जो कि पहले सगुण साक्षातकार कराते हैं
और अंत में निर्गुण साक्षात्कार।

10. मोक्षमंत्रः ॐ, सोsहम्, शिवोsहम्, अहं ब्रह्मास्मि।
ये मोक्ष मंत्र हैं, जो आत्म-साक्षात्कार में मदद करते हैं।

त्रिषडाय भाव -३-६-११

🌘 त्रिषडाय भाव -३-६-११🌒

 🌘जन्म कुंडली का तृतीय भाव, छटा भाव तथा एकादश भाव त्रिषडाय भाव होते हैं ।
शनि जैसे पापग्रह  त्रिषडाय भाव में अच्छे माने जाते हैं।

🌘तृतीय भाव से हम छोटे भाई – बहन , शौक , संचार , लेखन कार्य , छोटी यात्रायें , पराक्रम आदि देखते हैं ।

 🌘इससे दायां कंधा, बाजु , नौकर देखे जाते हैं ।

✡️तृतीय भाव का कारक ग्रह मंगल है ।

🌘षष्टम भाव रोग ,शत्रु तथा ऋण का भाव है । इस भाव से हम कोर्ट – कचहरी , लडाई –झगडा , लोन ,हिंसा , चोर , संघर्ष, प्रतियोगिता , नौकर – चाकर , ईर्ष्या , कमर से नीचे बस्ति, मामा ,मौसी आदि देखते हैं ।

✡️षष्टम भाव के कारक ग्रह शनि और मंगल हैं ।

इसी प्रकार एकादश भाव लाभ भाव होता है । इसी भाव से जातक को प्राप्ती होती है चाहे वह लाभ की प्राप्ती हो या ज्येष्ठ भ्राता , मनोकामना पूर्ति , मान- सम्मान की प्राप्ती , बायां कंधा, बायां कान, मित्रता , अपने बच्चों के जीवन साथी , सुख – समृधि आदि इसी भाव से विचार किये जाते हैं ।

🌘एकादश भाव में स्थित सभी ग्रह जातक को लाभ देते हैं । यहां तक के इस भाव में वक्री ग्रह भी शुभ फल देते हैं ।  किंतु शुक्र को यहां शुभ नहीं माना गया ।
✡️गुरु इस भाव के लिये कारक ग्रह है ।

🌘त्रिषडाय भाव का प्रथम त्रिषडाय भाव तृतीय भाव है । यह प्रथम काम भाव भी है । काम अर्थात इच्छा पूर्ति की चेष्टा तथा इसका कारक मंगल जैसा कि बताया जा चुका है । तृतीय भाव का सम्बंध जातक में प्राप्ती की चेष्टा उत्पन्न करताहै । मंगल जातक में साहस देता है कि वह इस पथ पर आगे बढे ।

🌘शायद इसी कारण से तृतीय भाव का कारक ग्रह मंगल जैसा तीव्र तथा पापी ग्रह है तथा इसीलिय यह कहा जाता है कि तृतीय भाव में पापी ग्रह स्थित हो तो जातक में ऊर्जा और साहस का संचार करते हैं।

🌘षष्टम भाव अर्थ त्रिकोण का दूसरा त्रिकोण है । जहां प्रतिस्पर्धा भी है , लडाई –झगडा भी है, शत्रु भी है । कहने का अर्थ यह है कि षष्टम भाव तथा षष्ठेश भी धन से सम्बंध रखता है परंतु लडाई ‌झगडे से प्राप्त धन, लोन या ऋण से प्राप्त धन ।

🌘शायद इसी कारण इसके कारक ग्रह मंगल अर्थात लडाई –झगडा व शनि अर्थात कोर्ट –कचहरी है। यदि षष्टम भाव / षष्ठेश का सम्बंध दशम भाव / दशमेश से हो जाये तो जातक दूसरों के
लडाई-झगडे से फायदा उठाता है क्योकि छटा भाव दशम भाव से नवम है तथा दशम भाव छटे भाव से पंचम भाव है।

🌘इसी प्रकार यदि तृतीय भाव / भावेश का सम्बन्ध छटे भाव से हो जाता है तो जातक की ऊर्जा , हिम्मत , पराक्रम , जातक की संघर्ष शक्ति , प्रतियोगिता क्षमता से साथ जुड जाती है । तो जातक अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है।
विपरीत परिस्थितियों में हिम्मत से काम लेता है। उसमें लक्ष्य तक पहुंचने की लगन होती है । जिसके लिये वह सदैव प्रयासरत रहता है ।

🌘एकादश भाव काम त्रिकोण का अंतिम त्रिकोण भाव है । अत: इस भाव में इच्छायें हैं मनोकामनायें हैं। इस त्रिकोण के साथ जिस भी त्रिकोण अर्थात धर्म ,अर्थ , काम या मोक्ष का सम्बंध बनता है उससे सम्बंधित लाभ , हानि, इच्छापूर्ति होती है । इसलिये इस अंतिम काम त्रिकोण मे सभी ग्रह प्राप्ति तक पहुचाते हैं ।

🌘त्रिषडाय भावों को शुभ नहीं माना जाता इसका कारण है ! शायद इसमें दो काम त्रिकोण भाव हैं तथा एक अर्थ त्रिकोण भाव है । इन तीनों का सम्बंध जातक को लाभ प्राप्ति के लिये प्रेरित करता है ! फिर चाहे वो जैसे भी प्राप्त हो । व्यक्ति में प्रतिस्पर्धा होती है ,दूसरों को पीछे छोड कर आगे पडने की प्रवृति होती है ।

🌘उसके लिये वो नैतिक अनैतिक कैसे भी कदम उठा सकता है। उसमें ऊर्जा होती है परंतु उसमें कर्म नहीं होता । जातक को बिना मेहनत के , चोरी से , दूसरों से लडाई – झगडे से, लोन से तथा ऋण आदि से लाभ की प्राप्ति होती है ।

🌘त्रिषडाय भाव में यदि दशम भाव भी जोड दिया जाये तो यह उपचय भाव बन जाता है । दशम भाव जातक का कर्म स्थान होता है । इससे हम नौकरी / व्यवसाय, उच्च पद, अधिकार आदि देखते हैं । त्रिषडाय भाव में दशम भाव जुडने से अब यह उतना अशुभ नहीं रह जाता । इसमें जातक का पुरूषार्थ जुड गया । यदि किसी जातक की जन्म कुंड्ली में उपचय भावों अर्थात तृतीय भाव,षष्टम भाव , दशम भाव तथा एकादश भाव का सम्बंध आ जाता है तो ऐसा जातक “ फर्श से अर्श तक ” पहुंच जाता है । वह ना खुद आराम से बैठता है और ना ही किसी को बैठने देता है ।

🌘जातक जब अपने संघर्ष में , प्रतिस्पर्धा मे अपने कर्मों को साहसपूर्ण व ऊर्जापूर्ण रूप से जोडता है तो उसको श्रेष्ठ की प्राप्ति होती है ।

ग्रहों की होरा में कुछ निश्चित कार्य किए जाए तो सफलता निश्चित ही प्राप्त

विभिन्न ग्रहों की होरा में कुछ निश्चित कार्य किए
जाए तो सफलता निश्चित ही प्राप्त
होती हैं |
सूर्य की होरा -
सरकारी नौकरी ज्वाइन करना,चार्ज
लेना और देना,अधिकारी से मिलना,टेंडर भरना व मानिक
रत्न धारण करना|
चंद्र की होरा -यह
होरा सभी कार्यो हेतु शुभ
मानी जाती हैं |
मंगल की होरा -पुलिस व न्यायालयों से सम्बंधित
कार्य व नौकरी ज्वाइन करना, जुआ सट्टा लगाना,क़र्ज़
देना, सभा समितियो में भाग लेना,मूंगा एवं लहसुनिया रत्न धारण
करना|
बुध की होरा -नया व्यापार शुरू करना,लेखन व
प्रकाशन कार्य करना,प्रार्थना पत्र देना,विद्या शुरू करना,कोष
संग्रह करना,पन्ना रत्न धारण करना |
गुरु की होरा -बड़े अधिकारियो से मिलना,शिक्षा विभाग में
जाना व शिक्षक से मिलना,विवाह सम्बन्धी कार्य
करना,पुखराज रत्न धारण करना |
शुक्र की होरा -नए वस्त्र पहनना,आभूषण
खरीदना व धारण करना,फिल्मो से सम्बंधित कार्य
करना ,मॉडलिंग करना,यात्रा करना,हीरा व ओपल रत्न
पहनना|
शनि की होरा -मकान
की नींव खोदना व खुदवाना,कारखाना शुरू
करना,वाहन व भूमि खरीदना,नीलम व
गोमेद रत्न धारण करना|
इस प्रकार विभिन्न ग्रह की होरा में विभिन्न कार्य
सफलता हेतु किए जा सकते हे

चन्द्रमाँ का अन्य ग्रहों से योग

चन्द्रमाँ का अन्य ग्रहों से योग



ज्योतिष में चन्द्रमाँ को मन का कारक माना गया है चन्द्रमाँ ही हमारी मानसिक और भावनात्मक स्थिति को नियंत्रित करता है व्यक्ति की भावनात्मक और मानसिक शक्ति कैसी होगी यह उसकी जन्मकुंडली में स्थित चन्द्रमाँ पर निर्भर करता है कुंडली में मजबूत चन्द्रमाँ जहाँ व्यक्ति के मन को एकाग्र, शांत और आंतरिक शक्ति से युक्त बनाता है वहीँ कुंडली में चन्द्रमाँ कमजोर होने पर व्यक्ति की मानसिक और भावनात्मक स्थिति अस्थिर और अशांतिपूर्ण होती है…तो चन्द्रमाँ स्वतंत्र रूप से तो जन्मकुंडली में में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है ही पर यदि कुंडली में चन्द्रमाँ का अन्य ग्रहों से योग हो तो ऐसे में इसके भिन्न भिन्न परिणाम होते हैं. . .

चन्द्रमाँ + सूर्य - यदि कुंडली में चन्द्रमाँ सूर्य एक साथ हों तो ये अमावश्या योग भी कहलाता है ऐसे में व्यक्ति को मानसिक अस्थिरता और की समस्या होती है व्यक्ति में एकाग्रता की कमी रहती है, ऐसा व्यक्ति जल्दी ही किसी भी बात को लेकर परेशान हो जाता है और मानसिक व्याकुलता की समस्या बहुत रहती है।

चन्द्रमाँ + मंगल - कुंडली में चन्द्रमाँ मंगल का योग होने पर व्यक्ति कुछ अहंवादी स्वभाव का होता है किसी के आधीन रहकर कार्य करना उसे पसंद नहीं होता अपनी मर्जी का मालिक होता है, ऐसा व्यक्ति जिस काम को करने का ठान ले उसे करने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा देता है अर्थात मेहनती और प्रयत्नशील होता है।

चन्द्रमाँ + बुध - कुंडली में चन्द्रमाँ बुध एक साथ होने पर ऐसा व्यक्ति अस्थिर मति होता है अर्थात ऐसे व्यक्ति की बुद्धि किसी बात पर स्थिर नहीं रहती, ऐसा व्यक्ति बहुत कन्फ्यूज माइंडेड होता है और ऐसे व्यक्ति को किसी भी निर्णय को लेने में बहुत समस्या और संशय होता है।

चन्द्रमाँ + बृहस्पति - कुंडली में चन्द्रमाँ बृहस्पति एक साथ होना बहुत शुभ है ये गजकेसरी योग भी कहलाता है, ये योग यदि शुभ स्थिति में बना हो तो व्यक्ति को जीवन में अच्छी धन समृद्धि प्राप्त होती है, व्यक्ति सत्वक और शांत मन का व्यक्ति होता है और धर्म पर श्रद्धा रखने वाला होता है।

चन्द्रमाँ + शुक्र - कुंडली में चन्द्रमाँ शुक्र का योग होने पर व्यक्ति बहुत महत्वकांशी स्वभाव का होता है ऐसा व्यक्ति ऐश्वर्य और विलासितापूर्ण जीवन जीने का इच्छुक होता है इस योग में व्यक्ति को रचनात्मक और कलात्मक कार्यों में बहुत रुचि होती है और ये योग व्यक्ति को जीवन में अच्छी समृद्धि देने में भी सहायक होता है।

चन्द्रमाँ + शनि - कुंडली में चन्द्रमाँ शनि का योग होने पर व्यक्ति मानसिक स्थिरता और जल्दी तनाव होने की समस्या बहुत होती है, एकाग्रता कमजोर होती है, ऐसे में व्यक्ति को घबराहट या डर लगने जैसी समस्याएं भी रहती हैं।

चन्द्रमाँ + राहु - कुंडली में चन्द्रमाँ राहु एक साथ होना एक नकारात्मक योग है इसे ग्रहण योग भी कहते हैं इस योग में व्यक्ति एंग्जायटी और डिप्रेशन की समस्या का शिकार होता है इमोशनल सेंसिविटी बहुत होती है बात बात पर नकारात्मक सोचने की आदत होती है और ऐसे में व्यक्ति के मन में हमेशा शांति की कमी बनी रहती है।

चन्द्रमाँ + केतु - कुंडली में चन्द्रमाँ केतु एक साथ होने पर भी व्यक्ति को बहुतसी मानसिक समस्याएं होती हैं, मानसिक स्थिरता नहीं बन पाती घबराहट और ओवर थिंकिंग की समस्या रहती है और व्यक्ति मानसिक शांति की कमी का अनुभव करता है।

कमजोर चन्द्रमाँ के नकारात्मक परिणाम से बचने और चन्द्रमाँ को सकारात्मक और बली करने के लिए हम कुछ उपाय बता रहे हैं जो आपके लिए सहायक होंगे -

उपाय -

1. ॐ सोम सोमाय नमः का जाप करें (एक माला रोज)

2. चाँदी की एक ठोस गोली का लॉकेट गले में धारण करें।

3. सफ़ेद चन्दन का तिलक मस्तक पर लगाएं।

4. प्रातः काल जल्दी उठकर सूर्य दर्शन अवश्य करें।

5. किसी योग्य ज्योतिषी से परामर्श के बाद मोती भी धारण कर सकते हैं।

6. प्रतिदिन शिवलिंग का दूध और जल से अभिषेक करें।

।। श्री हनुमते नमः

लग्नानुसार_योगकारक_ग्रह

#लग्नानुसार_योगकारक_ग्रह||
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मेष लग्न से लेकर मीन लग्न तक कुल 12लग्न होते है।हर एक लग्न के लिए कोई न कोई ग्रह बहुत शुभ होकर योगकारक होता है तो कोई ग्रह बहुत ज्यादा योगकारक होकर बहुत शुभ हो जाता है।

योगकारक ग्रह सफलता, उन्नति, कई तरह के सुख,धन आदि जैसे राजयोगकारक फल देता है जो ग्रह जितना ज्यादा योगकारक होता वह उस कुंडली के लिए उतना ही ज्यादा शुभ होता है।कुंडली के लग्न का स्वामी सबसे ज्यादा शुभ और योगकारक होता है।।                                                           #मेष लग्न के लिए मंगल, सूर्य और गुरु योगकारक होते है।।                                                                     #वृष लग्न के लिए शुक्र, बुध सामान्य और शनि प्रबल योगकारक होता है।।                                                                                                          #मिथुन लग्न के लिए बुध, शनि सामान्य और शुक्र प्रबल योगकारक होता है।।                                                                                                             #कर्क लग्न के लिए चंद्र लग्नेश होने से और गुरु नवमेश होने से योगकारक है, मंगल प्रबल योगकारक और बहुत उच्च स्तर का राजयोगकरक होता है।।                                                                                                      #सिंह लग्न के लिए सूर्य, गुरु,मंगल उच्च स्तर का योगकारक ग्रह होता है।।                                                                          
#कन्या लग्न के लिए बुध, शनि और शुक्र योगकारक है।।                                     #तुला लग्न के लिए शुक्र,बुध सामान्य और शनि प्रबल योगकारक है।।                                                                                    
#वृश्चिक लग्न मे मंगल, गुरु, चंद्र और सूर्य योगकारक होते है।।                                                                              #धनु लग्न के लिए गुरु, मंगल और सूर्य योगकारक है।।                                        #मकर लग्न के लिए शनि, बुध सामान्य और शुक्र प्रबल योगकारक होता है।।                                                        #कुम्भ लग्न के लिए मकर लग्न की तरह शनि, बुध सामान्य और शुक्र प्रबल योगकारक है।                                                                                                #मीन लग्न के लिए गुरु लग्नेश होकर, चंद्र और मंगल त्रिकोण के स्वामी होकर योगकारक होते है।।                                                                                   इस तरह जो ग्रह जिस लग्न के लिए योगकारक होता है वह श्रेष्ठ फल देता है।योगकारक ग्रह कमजोर, पीड़ित, अस्त, अशुभ भाव के स्वामी ग्रहो के साथ होने से तब वह अपने शुभ फल नही दे पाता, ऐसे कमजोर और पीड़ित

योगकारक ग्रह को बलवान और शुभ करने के लिए पहला उपाय इस योगकारक ग्रह का रत्न धारण करना शुभ होता है, ऐसे ग्रह की धातु पहनना, मन्त्र जप, पूजा पाठ करना और जो योगकारक ग्रहो को पीड़ित कर रहे है उनकी शनि उन ग्रहो के मन्त्र जप, दान, पूजा पाठ से कर देनी चाहिए।।