Wednesday, August 23, 2017

कमजोर बुध उत्पन्न करता है ये स्वास्थ समस्याएँ -


कमजोर बुध उत्पन्न करता है ये स्वास्थ समस्याएँ -

फलित ज्योतिष में बुध अपनी बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और हमारे जीवन के बहुत विशेष घटकों को नियंत्रित करता है बुध को सबसे कम आयु का ग्रह माना गया है इस लिए इसे राजकुमार का पद दिया गया है, बुध का रंग हरा है वर्ण वैश्य  है बुध मिथुन और कन्या राशि का स्वामी है कन्या राशि बुध की उच्च राशि भी है और मीन राशि में बुध नीचस्थ अर्थात सबसे कमजोर होता है, शनि, शुक्र और राहु  बुध के मित्र ग्रह हैं और गोचरवश बुध किसी भी राशि में लगभग एक माह रहता है।

ज्योतिष में बुध को वैसे तो बुद्धि, कैचिंग पॉवर, तर्कशक्ति, निर्णय क्षमता, याददास्त, सोचने समझने की क्षमता,  वाणी, बोलने की क्षमता, उच्चारण, व्यव्हार कुसलता, सूचना, संचार, यातायात, व्यापार, वाणिज्य, गणनात्मक विषय, लेखन,  कम्युनिकेशन और गहन अध्ययन का कारक माना गया है और ये सभी घटक हमारे जीवन में बहुत अहम भूमिका निभाते हैं विशेषतः बुद्धि क्षमता की तो आज के समय में सर्वाधिक और हर जगह आवश्यकता होती है

पर इन सब के अलावा बुध का हमारे स्वास्थ और शरीर पर भी बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है बुध हमारे शरीर के बहुत विशेष घटकों को नियंत्रित करता है ज्योतिष की चिकित्सीय शाखा में बुध को मष्तिष्क, नर्वस-सिस्टम, गला, नसें, त्वचा, बोलने की क्षमता, याददाश्त आदि का प्रतिनिधित्व बुध ही करता है इसलिए यदि कुंडली में बुध कमजोर या पीड़ित हो तो व्यक्ति को कुछ विशेष स्वास्थ समस्यायों का सामना करना पड़ता है –

यदि कुंडली में बुध नीच राशि (मीन) में हो, छटे या आठवे भाव में स्थित हो, केतु या मंगल से पीड़ित हो, सूर्य के साथ समान अंश पर होने से पूर्णासत हो, षष्टेश अष्टमेश से पीड़ित हो या अन्य किसी भी प्रकार जब बुध बहुत कमजोर या पीड़ित हो ऐसे में व्यक्ति को मष्तिष्क से जुडी समस्यायें और न्यूरो प्रॉब्लम्स रहती हैं, मष्तिष्क से ही शरीर की सभी गतिविधियां नियंत्रित होती हैं इसलिए फिट्स पड़ने वाली समस्या भी कुंडली में बुध पीड़ित होने के कारण ही होती है, बुध पीड़ित होना ही नर्वससिस्टम और नसों से जुडी समस्याएं उत्पन्न करता है, कुंडली में पीड़ित बुध के कारण व्यक्ति को त्वचा संबंधी समस्याएं (स्किन प्रॉब्लम्स) और स्किन एलर्जी की समस्या बहुत होती है इसके अलावा कुंडली में बुध का पीड़ित होना उच्चारण को लेकर भी समस्याएं देता है हकलाहट या शब्दों को स्पष्ट रूप से ना बोल पाने की समस्या भी कमजोर या पीड़ित बुध के कारण ही होती है, गले से जुडी समस्याएं जल्दी जल्दी टॉन्सिल होना भी पीड़ित बुध के ही लक्षण हैं, जिन लोगों की कुंडली में बुध पीड़ित स्थिति में होता है उन्हें याददाश्त से जुडी समस्याएं भी बहुत परेशान करती हैं ऐसे लोगो को बातों को भूलने की समस्या भी रहती है इन सबके अतिरिक्त बुध का पीड़ित होना व्यक्ति को हेजिटेशन की समस्या भी देता है।

वैसे तो प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली के ग्रहयोग भिन्न होने के से सबके लिए व्यक्तिगत उपाय अलग होते हैं पर यहाँ पीड़ित बुध से उत्पन्न स्वास्थ समस्याओं के लिए हम ऐसे उपाय बता रहे हैं जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति कर सकता है –

उपाय -

1. ॐ बुम बुधाय नमः का रोज सामर्थ्यानुसार 1, 2 या 3 माला जाप करें।
2. गणेश जी की उपासना करें।
3. प्रत्येक बुधवार को गाय को हरा चारा खिलाएं।
4. पेड़ पौधों का पालन पौषण करें।
5. किसी योग्य ज्योतिषी से सलाह के बाद पन्ना रत्न भी धारण किया जा सकता है।



।।श्री हनुमते नमः।।

भविष्य जानने के लिए कुंडली मे कारक ग्रहों की क्या भूमिका है जाने


भविष्य जानने के लिए
कुंडली मे कारक ग्रहों की
क्या भूमिका है जाने
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फलादेश करते समय कौन ग्रह कहाँ बैठा है इसकी मदद से भविष्यवाणियों तो की ही जाती है किन्तु सटीक भविष्य कथन करने के लिये भावों के कारक स्वामियों की स्थिती पर भी विचार आवश्यक है । कारक ग्रह विचार फलादेश की सबसे महत्‍वपूर्ण कड़ी है। अगर हमें कारकों के बारे में स्‍पष्‍ट जानकारी हो तो हर सवाल का सही जवाब से दिया जा सकता है। आइए देखते हैं कि भावों के अनुसार कारक ग्रह कौन – कौन से होते हैं।

प्रथम भाव
इस भाव का कारक सूर्य है। यह सबसे प्रमुख भाव है। इसी भाव की राशि, इसमें बैठे ग्रह और इसके अधिपति ग्रह की स्थिति से जातक की स्थिति की प्राथमिक जानकारी मिल जाती है। बाकी भावों की तुलना में जातक की आत्‍मा को जानने का यह सबसे महत्‍वपूर्ण भाव है। जातक की जन्‍मकुण्‍डली अथवा प्रश्‍नकुण्‍डली के किसी सवाल के जवाब में उसके स्‍वास्‍थ्‍य, जीवंतता, सामूहिकता, व्‍यक्तित्‍व, आत्‍मविश्‍वास, आत्‍मसम्‍मान, आत्‍मप्रकाश, आत्‍मा आदि को देखा जाता है। हर सवाल के जवाब में पहले लग्‍न देखना ही होगा। ऐसे में लग्‍न की राशि, इसमें स्थित ग्रह और लग्‍न पर प्रभावों के अनुसार कारकत्‍व का निर्धारण किया जाएगा।

दूसरा भाव
इस भाव का कारक गुरु है। ज्‍योतिष में इसे धन भाव कहा जाता है। इससे बैंक एकाउण्‍ट, पारिवारिक पृष्‍ठभूमि, कई मामलों में आंखें देखी जाती है। यह भाव संसाधन, नैतिक मूल्‍य और गुणों के बारे में बताता है। किसी भी जातक का परिवार कितना बड़ा या छोटा है अथवा स्थाई संपत्ति की क्‍या स्थिति है, इसी भाव से देखेंगे।

तीसरा भाव
इस भाव का कारक मंगल है। इसे सहज भाव भी कहते हैं। कुण्‍डली को ताकत देने वाला भाव यही है। भाग्‍य के इतर अपनी बाजुओं की ताकत से कुछ कर दिखाने वाले लोगों का यह भाव बहुत शक्तिशाली होता है। किसी भी चीज़ की परमीशन मिलना आदि औऱ बौद्धिक विकास, साहसी विचार, दमदार आवाज, प्रभावी भाषण आदि अन्‍य तरीके इस भाव से देखे जाएंगे। छोटी अवधि की यात्राएं और छोटे भाई के लिए भी इसी भाव को देखा जाएगा।

चौथा भाव
इसका कारक चंद्रमा है। यह सुख का घर है। किसी के घर में कितनी शांति है इस भाव से पता चलेगा। इसके अलावा माता के स्‍वास्‍थ्‍य और घर कब बनेगा जैसे सवालों में यह भाव प्रबल संकेत देता है। शांति देने वाला घर, सुरक्षा की भावना, भावनात्‍मक स्थिति, पारिवारिक प्रेम जैसे बिंदुओं के लिए हमें चौथा भाव देखना होगा। यह भाव वाहन सुख औऱ ज़मीन ,मकान प्रॉपर्टी सुख के  बारे में भी जानकारी देता है।

पांचवां भाव
इसका कारक गुरु है। इसे उत्‍पादन भाव भी कह सकते हैं। इंसान क्‍या पैदा करता है, वह इसी भाव से आएगा। इसमें शिष्‍य और पुत्र से लेकर पेटेंट वाली खोजें और कृतियां तक शामिल हो सकती हैं। इसके अलावा आनन्‍दपूर्ण सृजन, सुखी बच्‍चे, सफलता, शेयर मार्किट में निवेश औऱ लाभ ,एक्टिंग,कलाकारी , जीवन का आनन्‍द, सत्‍कर्म जैसे बिंदुओं को जानने के लिए इस भाव को देखा जाता है।

छठा भाव
इस भाव का कारक मंगल है। इसे रोग का घर भी कहते हैं। प्रेम के सातवें घर से बारहवां यानि खर्च का घर है। शत्रु और शत्रुता भी इसी भाव से देखे जाते हैं। कठोर परिश्रम, नौकरी ,
सश्रम आजीविका, स्‍वास्‍थ्‍य, घाव,  सर्जरी, डिप्रेशन, कसरत, नियमित कार्यक्रम के सम्‍बन्‍ध में यह भाव संकेत देता है।

सातवां भाव
इसका कारक शुक्र है। लग्‍न को देखने वाला यह भाव किसी भी तरह के साथी के बारे में बताता है। राह में साथ जा रहे दो लोगों के लिए, प्रेक्टिकल के लिए टेबल शेयर कर रहे दो विद्यार्थियों के लिए, एक ही समस्‍या में घिरे दो साथ-साथ बने हुए लोगों के लिए यह भाव देखा जाएगा। जीवनसाथी, व्‍यावसायिक भागीदार, करीबी दोस्‍त, सुंदरता, लावण्‍य जैसे विषय इसी भाव से जुड़े हुए हैं। सभी विपरीत लिंग वालों के लिए।

आठवां भाव
इसका कारक शनि है। स्‍वाभाविक रूप से गुप्‍त क्रियाओं, अनसुलझे मामलों, आयु, धीमी गति के काम इससे देखे जाएंगे। इसके अलावा दूसरे के संसाधनों का सृजन में इस्‍तेमाल, जिंदगी की जमीनी सच्‍चाइयां, तंत्र-मंत्र के लिए यही भाव है।

नौंवां भाव
इसका कारक भी गुरु है। इसे भाग्‍य भाव भी कहते हैं। पिछले जन्‍म में किए गए सत्‍कर्म प्रारब्‍ध के साथ जुड़कर इस जन्‍म में आते हैं। यह भाव हमें बताता है कि हमारी मेहनत और अपेक्षा से अधिक कब और कितना मिल सकता है। धर्म, अध्‍यात्‍म, समर्पण, आशीर्वाद, बौद्धिक विकास, सच्‍चाई से प्रेम, मार्गदर्शक जैसे गुणों को भी इसमें देखा जाता है।

दसवां भाव
इसके कारक ग्रह अधिक हैं। गुरु, सूर्य, बुध और शनि के पास दसवें घर का कारकत्‍व है। हम जो सोचते हैं वही बनते हैं। यह भाव हमारी सोच को कर्म में बदलने वाला भाव है। हर तरह का कर्म दसवें भाव से प्रेरित होगा। बबस बाध्‍यता इतनी है कि क्रिया हमारी होनी चाहिए। प्रतिक्रिया के बारे में यह भाव नहीं बताता। व्‍यावसायिक सफलताएं, साख, प्रसिद्धि, नेतृत्‍व, लेखन, भाषण, सफल संगठन, प्रशासन, स्किल बांटना जैसे काम यह भाव बताता है।

ग्‍यारहवां भाव
इसका कारक भी गुरु है। यह ज्‍यादातर उपलब्धि से जुड़ा भाव है। आय, प्रसिद्ध, मान सम्‍मान और शुभकामनाएं तक यह भाव एकत्रित करता है। हम कुछ करेंगे तो उस कर्म का कितना फल मिलेगा या नहीं मिलेगा, यह भाव अधिक स्‍पष्‍ट करता है। यह कर्म का संग्रह भाव है। उपलब्धि किसी भी क्षेत्र में हो सकती है। धैर्य, विकास और सफलता भी इसी भाव से देखे जाते हैं।
बारहवां भाव
इसका कारक शनि है। यह खर्च का घर है। हर तरह का खर्च, शारीरिक, मानसिक, धन और जो भी खर्च हो सकते हैं सभी इसी से आएंगे। विद्या का खर्च भी इसी भाव से होता है। इस कारण बारहवें भाव में बैठा गुरु बेहतर होता है ग्‍यारहवें भाव की तुलना में क्‍योंकि सरस्‍वती की उल्‍टी चाल होती है, जितना संग्रह करेंगे उतनी कम होगी और जितना खर्च करेंगे उतनी बढ़ेगी। इसके अलावा बाहरी सम्‍बन्‍धों, विदेश यात्रा, जेल यात्रा, विदेश में प्रॉपर्टी होना  ध्‍यान और मोक्ष इस भाव से देखे जाएंगे।
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||अस्त ग्रहो को ठीक करने के लिए क्या करना चाहिए??||

       जब कोई ग्रह अस्त हो जाता है तो वह अपनी शुभता, और अनुकूल फल देने के बल खो देता है।जब कोई ग्रह हो जाता है तब वह ग्रह अपने नैसर्गिक गुण खो देता है ऐसा ग्रह न अपने कारक तत्वों फल का फल दे पाता है और न उस भाव का शुभ फल जिस भाव का यह अस्त ग्रह स्वामी होता है।सूर्य के आलावा सब ग्रहो अस्त होते है क्योंकि सूर्य के प्रभाव से ही ग्रह अस्त होते है इसी कारण सूर्य एक निश्चित अंश की दुरी पर होने पर ग्रह अस्त माना जाता है।जब चंद्रमा सूर्य से 12अंशो के अंदर होता है तो अस्त हो जाता है इसी तरह मंगल सूर्य से 7अंश, बुध 13अंश, बृहस्पति 11अंश पर, शुक्र 9अंशो पर, शनि 15अंशो पर अस्त होता है।इतने अंशो पर भी ग्रह अस्त हो जाता लेकिन पूरी तरह से नही जब कोई ग्रह सूर्य से 5 से 3अंशो की दुरी पर होता है तब वह् ग्रह पूर्ण अस्त हो जाता है वह बिलकुल ही बलहीन और शुभता विहीन होता है।जब कई या कम से कम 2 से 3 या 2 ग्रह योगकारक होकर पूर्ण अस्त हो जाते है तब जातक के लिए यह स्थिति बहुत नकारात्मक हो जाती है ऐसी कुंडली का बल बहुत कम हो जाता है।6, 8, 12 भाव के स्वामियो का अस्त होना शुभ फल दायक होता है क्योंकि 6,8 12भावेश अधिकांश  अशुभ फल दायक होते है जब यह अस्त हो जाते है तब इनके अशुभ फल देने की ताकत भी नष्ट हो जाती है ऐसी स्थिति में यह न शुभ फल दे पाते है और न अशुभ।एक तरह से जातक के लिए 6, 8, 9 भावेश का अस्त होना शुभ होता है।लेकिन जब 6, 8, 12 का स्वामी त्रिकोणेश भी हो तो और उसकी मूलत्रिकोण राशि त्रिकोण में आती हो तब उस ग्रह का अस्त होना शुभ नही होता।                                                                         जब कोई ग्रह केंद्र या त्रिकोण का स्वामी अस्त हो गया हो तब उस ग्रह का सबसे ठीक उपाय उस ग्रह का रत्न पहनना होता है साथ ही ऐसे ग्रह का मन्त्र जप, पूजा पाठ करना भी ज्यादा से ज्यादा शुभ रहता है।ऐसे अस्त ग्रह की वस्तुओ का दान करना भी सामान्य ठीक रहता है।जब ग्रह अस्त होकर बहुत ज्यादा अशुभ फल कर रहा हो तब ऐसे ग्रह से सम्बंधित वस्तुओ का दान और जप करना अशुभ फल में कमी होकर शुभ फल की वृद्धि होती है।अस्त ग्रहो के लिए ग्रहो से सम्बंधित जड़ भी आती है अस्त ग्रह से सम्बन्धीय जड़ को शुद्ध और अभिमंत्रित करके उसको उस अस्त ग्रह से सम्बंधित रंग के सूती कपड़े और डोरे की सहायता से गले या हाथ की बाजु में पहनना ग्रह की अनुकूलता में वृद्धि करता है।अस्त ग्रहो के लिए हवन या कोई विशेष पूजा करना या कराना भी अस्त ग्रह के अनुकूलता फल में वृद्धि करता ह

Tuesday, August 22, 2017

कन्फ्यूज बनाता है चन्द्रमाँ-बुध का योग


कन्फ्यूज बनाता है चन्द्रमाँ-बुध का योग -

ज्योतिष में बुध को बुद्धि, सोचने समझने की क्षमता, निर्णय शक्ति, तर्क शक्ति, मष्तिष्क, बुद्धिपरक कार्य और पढ़ने की क्षमता आदि का कारक माना गया है अर्थात हमारे मष्तिष्क और बौद्धिक गातिविधियों को बुध ही नियंत्रित करता है कुंडली में बुध की सबल या निर्बल स्थिति ही हमारी बौद्धिक क्षमता और निर्णय शक्ति का स्तर निश्चित करती है........... चन्द्रमाँ को ज्योतिष में मूवमेंट या चलायमानता का कारक माना गया है क्योंकि नौ ग्रहों में चन्द्रमाँ की गति सबसे तेज है जो एक राशि में केवल दो से सवा दो दिन तक हो रहता है इसलिए चन्द्रमाँ को परिवर्तन, मूवमेंट और चलायमानता का कारक माना गया है इसी लिए कुंडली में बुध और चन्द्रमाँ का योग होने पर व्यक्ति को कुछ विशेष समस्याओं का सामना करना पड़ता है।...........
यदि कुंडली में चन्द्रमाँ और बुध का योग हो अर्थात चन्द्रमाँ और बुध एक साथ हों तो ऐसे में व्यक्ति की बुद्धि अस्थिर होती है और व्यक्ति के निर्णय कभी स्थिर नहीं रहते, चन्द्रमाँ बुध का योग होने पर व्यक्ति के मस्तिष्क में योजनाएं तो बहुत बनती है परंतु उसके निर्णय हमेसा बदलते रहते हैं किसी भी एक कार्य का निश्चय करने के कुछ साम्य बाद ही मन में उस कार्य को ना करके दूसरे कार्य को करने का विचार आने लगता है, कुंडली में चन्द्रमाँ बुध का योग होने पर व्यक्ति की बुद्धि चलायमान होती है जिसका व्यक्ति की निर्णय शक्ति या डिसीजन पावर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, चन्द्रमाँ बुध का योग होने पर व्यक्ति को किसी भी बात का निर्णय करने में बड़ा संशय होता है और व्यक्ति हमेसा कन्फ्यूजन की स्थिति में रहता है ऐसे में व्यक्ति को किन्ही दो चीजों या बातों में से एक का चयन करने में बड़ी समस्या आती है और किसी एक बात का चयन करने के बाद अधिकांशतः व्यक्ति को लगता है के उसका यह निर्णय गलत था कहने का तात्पर्य यही है के चन्द्रमाँ बुध के योग से व्यक्ति के मस्तिष्क में संशय या भ्रम की स्थिति बनी रहती है, चन्द्रमाँ बुध के योग से व्यक्ति ओवर थिंकिंग अर्थात बहुत अधिक सोचने की आदत भी होती है चन्द्रमाँ बुध के योग में यदि चन्द्रमाँ की डिग्री बुध से अधिक हो तो इस योग की प्रबलता बढ़ जाती है यदि कुंडली में चन्द्रमाँ बुध का योग हो ऐसे व्यक्ति को किसी भी बड़े या महत्वपूर्ण निर्णय से पहले किसी अन्य योग्य व्यक्ति से सलाह अवश्य लेनी चाहिए।
यदि कुंडली में चन्द्रमाँ बुध का योग होने पर अधिक कन्फ्यूजन रहती हो निर्णय लेने में समस्याएं आती हों या बुद्धि हमेशा अस्थिर रहती हो तो निम्नलिखित उपाय करें -

1. ॐ बुम बुधाय नमः का नियमित जाप करें।
2. प्रत्येक बुधवार को गाय को हरा चारा खिलाएं।
3. सोमवार को मन्दिर में या गरीब व्यक्ति को दूध दान करें।
4. गणेश जी की उपासना करें।
5. किसी योग्य ज्योतिषी की सलाह के बाद पन्ना रत्न भी धारण कर सकते हैं।  

।। श्री हनुमते नमः।

Monday, August 21, 2017

*गले मे खराश, दर्द, सूजन के उपचार


🍃 *आरोग्यं :-*
*गले मे खराश, दर्द, सूजन के उपचार -*

1) गुनगुने पानी में नमक मिला कर दिन में दो-तीन बार गरारे करें। गरारे करने के तुरन्त बाद कुछ ठंडा न लें। गुनगुना पानी पिएं जिससे गले को आराम मिलेगा।

2) कच्चा सुहागा आधा ग्राम मुंह में रखें और उसका रस चुसते रहें। दो तीन घण्टों मे ही गला बिलकुल साफ हो जाएगा।

3) सोते समय एक ग्राम मुलहठी की छोटी सी गांठ मुख में रखकर कुछ देर चबाते रहे। फिर मुंह में रखकर सो जाए। सुबह तक गला साफ हो जायेगा। मुलहठी चूर्ण को पान के पत्ते में रखकर लिया जाय तो और भी अच्छा रहेगा। इससे सुबह गला खुलने के साथ-साथ गले का दर्द और सूजन भी दूर होती है।

4) रात को सोते समय सात काली मिर्च और उतने ही बताशे चबाकर सो जायें। बताशे न मिलें तो काली मिर्च व मिश्री मुंह में रखकर धीरे-धीरे चूसते रहने से बैठा गला खुल जाता है।

5) जिन व्यक्तियों के गले में निरंतर खराश रहती है या जुकाम में एलर्जी के कारण गले में तकलीफ बनी रहती है, वह सुबह-शाम दोनों वक्त चार-पांच मुनक्का के दानों को खूब चबाकर खा लें, लेकिन ऊपर से पानी ना पिएं। दस दिनों तक लगातार ऐसा करने से लाभ होगा।


जन्म कुंडली के द्वादश भाव परिचय


जन्म कुंडली के द्वादश भाव परिचय

कुंडली का पहला भाव

वैदिक ज्योतिष में कुंडली के पहले भाव को लग्न कहा जाता है तथा वैदिक ज्योतिष के अनुसार इसे कुंडली के बारह घरों में सबसे महत्त्वपूर्ण घर माना जाता है। किसी भी व्यक्ति विशेष के जन्म के समय उसके जन्म स्थान पर आकाश में उदित राशि को उस व्यक्ति का लग्न माना जाता है तथा इस राशि अर्थात लग्न को उस व्यक्ति की कुंडली बनाते समय पहले घर में स्थान दिया जाता है तथा इसके बाद आने वाली राशियों को कुंडली में क्रमश: दूसरे, तीसरे — बारहवें घर में स्थान दिया जाता है।

किसी भी कुंडली में लग्न स्थान अथवा पहले भाव का महत्त्व सबसे अधिक होता है तथा जातक के जीवन के लगभग सभी महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में इस भाव का प्रभाव पाया जाता है। जातक के स्वभाव तथा चरित्र के बारे में जानने के लिए पहला भाव विशेष महत्त्व रखता है तथा इस भाव से जातक की आयु, स्वास्थ्य, सामाजिक प्रतिष्ठा तथा अन्य कई महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों के बारे में पता चलता है। कुंडली का पहला भाव शरीर के अंगों में सिर, मस्तिष्क तथा इसके आस-पास के हिस्सों को दर्शाता है तथा इस भाव पर अशुभ ग्रह का प्रभाव शरीर के इन अंगों से संबंधित रोगों, चोटों अथवा परेशानियों का कारण बन सकता है।

दूसरा भाव
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कुंडली के दूसरे भाव को वैदिक ज्योतिष में धन स्थान कहा जाता है तथा किसी भी व्यक्ति की कुंडली में इस भाव का अपना एक विशेष महत्त्व होता है। इसलिए किसी कुंडली को देखते समय इस भाव का अध्ययन बड़े ध्यान से करना चाहिए। कुंडली का दूसरा भाव कुंडली धारक के द्वारा अपने जीवन काल में संचित किए जाने वाले धन के बारे में बताता है तथा इसके अतिरिक्त यह भाव जातक के द्वारा संचित किए जाने वाले सोना, चांदी, हीरे-जवाहरात तथा इसी प्रकार के अन्य बहुमूल्य पदार्थों के बारे में भी बताता है। किन्तु कुंडली का दूसरा भाव केवल धन तथा अन्य बहुमूल्य पदार्थों तक ही सीमित नहीं है तथा इस भाव से जातक के जीवन के और भी बहुत से क्षेत्रों के बारे में जानकारी मिलती है। दूसरा भाव जातक की वाणी तथा उसके बातचीत करने के कौशल के बारे में भी बताता है। शरीर के अंगों में यह भाव चेहरे तथा चेहरे पर उपस्थित अंगों को दर्शाता है तथा कुंडली के इस भाव पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव होने की स्थिति में जातक को शरीर के इन अंगों से संबंधित चोटों अथवा बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है। कुंडली का दूसरा भाव जातक की सुनने, बोलने तथा देखने की क्षमता को भी दर्शाता है तथा इन सभी के ठीक प्रकार से काम करने के लिए कुंडली के इस घर का मज़बूत होना आवश्यक है।

तीसरा भाव
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कुंडली के तीसरे भाव को वैदिक ज्योतिष में बंधु भाव कहा जाता है, कुंडली का तीसरा भाव कुंडलीधारक के पराकर्म को भी दर्शाता है तथा इसिलिए कुंडली के इस भाव को पराक्रम भाव भी कहा जाताहै।

कुंडली के इस भाव से जातक के अपने भाई-बंधुओं, दोस्तों, सहकर्मियों तथा पड़ोसियों के साथ संबधों का पता चलता है। किसी व्यक्ति के जीवन काल में उसके भाईयों तथा दोस्तों से होने वाले लाभ तथा हानि के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए कुंडली के इस भाव का ध्यानपूर्वक अध्ययन करना आवश्यक है। जिन व्यक्तियों की कुंडली में तीसरा भाव बलवान होता है तथा किसी अच्छे ग्रहके प्रभाव में होता है, ऐसे व्यक्ति अपने जीवन काल में अपने भाईयों, दोस्तों तथा समर्थकों के सहयोग से सफलतायें प्राप्त करते हैं। जबकि दूसरी ओर जिन व्यक्तियों की जन्म कुंडली में तीसरे भाव पर अशुभ बुरे ग्रहों का प्रभाव होता है, ऐसे व्यक्ति अपने जीवन काल में अपने भाईयों तथा दोस्तों के कारण बार-बार हानि उठाते हैं तथा इनके दोस्त या भाई इनके साथ बहुत जरुरत के समयपर विश्वासघात भी कर सकते हैं।

शरीर के अंगों में यह भाव कंधों तथा बाजुओं को दर्शाता है तथा विशेष रूप से दायें कंधे तथा दायें बाजू को। इसके अतिरिक्त यह भाव मस्तिष्क से संबंधित कुछ हिस्सों तथा सांस लेने की प्रणाली को भी दर्शाता है तथा इस भाव पर किसी बुरे ग्रह का प्रभाव कुंडली धारक को मस्तिष्क संबंधित रोगों अथवा श्व्सन संबंधित रोगों से पीड़ित कर सकता है।

चौथा भाव
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कुंडली के चौथे भाव को वैदिक ज्योतिष में मातृ भाव तथा सुख स्थान भी कहा जाता है, यह भाव जातक के जीवन में माता की ओर से मिलने वाले योगदान तथा जातक के द्वारा किए जाने वाले सुखों के भोग को दर्शाता है। चौथा भाव कुंडली का एक महत्त्वपूर्ण भाव है तथा किसी भी क्रूर ग्रह का चौथे घर अथवा चन्द्रमा पर अशुभ प्रभाव कुंडली में मातृ दोष बना देता है। किसी व्यक्ति के जीवन में उसकी माता की ओर से मिले योगदान तथा प्रभाव को देखने के लिए तथा माता के साथ संबंध और माता का सुख देखने के लिए कुंडली के इस घर का ध्यानपूर्वक अध्ययन करना आवश्यक है।

कुंडली ककुंडली का चौथा भाव व्यक्ति के ज़ीवन में मिलने वाले सुख, खुशियों, सुविधाओं, तथा उसके घर के अंदर के वातावरण अर्थात घर के अन्य सदस्यों के साथ उसके संबंधों को भी दर्शाता है। किसी व्यक्ति के जीवन में वाहन-सुख, नौकरों-चाकरों का सुख, उसके अपने मकान बनने या खरीदने को भी कुंडली के इस भाव से देखा जाता है। कुंडली में चौथे भाव के बलवान होने से तथा किसी अच्छे ग्रह के प्रभाव में होने से कुंडली धारक को अपने जीवन काल में अनेक प्रकार की सुख-सुविधाओं तथा ऐश्वर्यों का भोग करने को मिलता है तथा उसे बढिया वाहनों का सुख तथा नए मकान प्राप्त होने का सुख़ भी मिलता है। दूसरी ओर कुंडली के चौथे भाव के बलहीन होने की स्थिति में जातक के जीवनकाल में सुख-सुविधाओं का आम तौर पर अभाव ही रहता है। कुंडली का चौथा भाव शरीर के अंगों में छाती, फेफड़ों, हृदय तथा इसके आस-पास के अंगों को दर्शाता है तथा इस भाव पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव कुंडली धारक को छाती, फेफड़ों तथा हृदय से संबंधित रोगों से पीड़ित कर सकता है तथा इसके अतिरिक्त जाताक की मानसिक शांति पर बुरा प्रभाव डाल सकता है।

पाँचवा भाव
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कुंडली के पाँचवे भाव को वैदिक ज्योतिष में संतान भाव कहा जाता है तथा अपने नाम के अनुसार ही कुंडली का यह भाव संतान प्राप्ति के बारे में बताता है। हालांकि कुंडली के कुछ और तथ्य भी इस विषय में अपना महत्त्व रखते है। यहां पर यह बात घ्यान देने योग्य है कि कुंडली का पाँचवा घर केवल संतान की उत्पत्ति के बारे में बताता है तथा संतान के पैदा हो जाने के बाद व्यक्ति के अपनी संतान से रिश्ते अथवा संतान से प्राप्त होने वाला सुख को कुंडली के केवल इसी घर को देखकर नहीं बताया जा सकता तथा उसके लिए कुंडली के कुछ अन्य तथ्यों पर भी विचार करना पड़ता है। कुंडली का पाँचवा भाव बलवान होने से तथा किसी शुभ ग्रह के प्रभाव में होने से जातक स्वस्थ संतान पैदा करने में पूर्ण रुप से सक्षम होता है तथा ऐसे व्यक्ति की संतान आम तौर पर स्वस्थ होने के साथ-साथ मानसिक, शारीरिक तथा बौद्भिक स्तर पर भी सामान्य से अधिक होती है तथा समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाने में सक्षम होती है। दूसरी ओर कुंडली का पाँचवा भाव बलहीन होने की स्थिति में जातक को संतान की उत्पत्ति में समस्याएं आती हैं।

कुंडली का पाँचवा भाव व्यक्ति के मानसिक तथा बौद्धिक स्तर को दर्शाता है तथा उसकी कल्पना शक्ति, ज्ञान, शिक्षा, तथा ऐसे ज्ञान तथा शिक्षा से प्राप्त होने वाले व्यवसाय, धन तथा समृद्धि के बारे में भी बताता है।

कुंडली का पाँचवा भाव जातक के प्रेम-संबंधों के बारे में बारे में भी बताता है।

शरीर के अंगों में कुंडली का यह भाव जिगर, पित्ताशय, अग्न्याशय, तिल्ली, रीढ की हड्डी तथा अन्य कुछ अंगों को दर्शाता है। कुंडली के पाँचवे भाव पर किन्हीं विशेष क्रूर ग्रहों का प्रभाव जातक को प्रजनन संबंधित समस्याएं तथा मधुमेह, अल्सर तथा पित्ताशय में पत्थरी जैसी बीमारियों से पीड़ित कर सकता है।

छठा भाव
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कुंडली के छठे भाव को वैदिक ज्योतिष में अरि अथवा शत्रु भाव कहा जाता है तथा कुंडली के इस भाव के अध्ययन से यह पता चल सकता है कि जातक अपने जीवन काल में किस प्रकार के शत्रुओं तथा प्रतिद्वंदियों का सामना करेगा तथा जातक के शत्रु अथवा प्रतिद्वंदी किस हद तक उसे परेशान कर पाएंगे। कुंडली के छठे भाव के बलवान होने से तथा किसी विशेष शुभ ग्रह के प्रभाव में होने से कुंडली धारक अपने जीवन में अधिकतर समय अपने शत्रुओं तथा प्रतिद्वंदियों पर आसानी से विजय प्राप्त कर लेता है तथा उसके शत्रु अथवा प्रतिद्वंदी उसे कोई विशेष नुकसान पहुंचाने में आम तौर पर सक्षम नहीं होते।

कुंडली का छठा भाव जातक के जीवन काल में आने वाले झगड़ों, विवादों, मुकद्दमों तथा इनसे होने वाली लाभ-हानि के बारे में भी बताता है। इसके अतिरिक्त कुंडली के इस भाव से जातक के जीवन में आने वाली बीमारियों तथा इन बीमारियों पर होने वाले खर्च का भी पता चलता है। कुंडली का छठा भाव शरीर के अंगों में पेट के निचले हिस्से को, आँतों को तथा उनकी कार्यप्रणाली को, गुर्दों तथा आस-पास के कुछ और अंगों को दर्शाता है। कुंडली के इस भाव पर किन्ही विशेष क्रूर ग्रहों का प्रभाव कुंडली धारक को कब्ज, दस्त, कमज़ोर पाचन-शक्ति के कारणहोने वाली बीमारियों, पेट में गैस-जलन जैसी समस्याओं, गुर्दों की बीमारीयों तथा ऐसी ही कुछ अन्य बीमारियों से पीड़ित कर सकता है।

 सातवाँ भाव
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कुंडली के सातवें भाव को वैदिक ज्योतिष में युवती भाव कहा जाता है तथा कुंडली के इस भाव से मुख्य तौर पर जातक के विवाह और वैवाहिक जीवन के बारे में पता चलता है। इस प्रकार जातक के विवाह तथा वैवाहिक जीवन से जुड़े अधिकतर प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए कुंडली के इस भाव का ध्यानपूर्वक अध्ययन करना अति आवश्यक है। विवाह के अतिरिक्त बहुत लंबी अवधि तक चलने वाले प्रेम संबंधों के बारे में तथा व्यवसाय में किसी के साथ सांझेदारी के बारे में भी कुंडली के इस भाव से पता चलता है। कुंडली के सातवें भाव से कुंडली धारक के विदेश में स्थायी रुप से स्थापित होने के बारे में भी पता चलता है, विशेष तौर पर जब यह विवाह के आधार पर विदेश में स्थापित होनेसे जुड़ा हुआ हो।

आठवां भाव
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कुंडली के आठवें भाव को वैदिक ज्योतिष में रंध्र भाव कहा जाता है तथा अपने नाम के अनुसार ही कुंडली का यह भाव मुख्य तौर पर जातक की आयु के बारे में बताता है। किसी कुंडली में आठवें भाव तथा लग्न भाव अर्थात पहले घर के बलवान होने पर या इन दोनों घरों केएक या एक से अधिक शुभ ग्रहों के प्रभाव में होने पर जातक की आयु सामान्य या फिर सामान्य से भी अधिक होती है जबकि कुंडली में आठवें भाव के बलहीन होने से अथवा इस भाव पर एक या एक से अधिक अशुभ ग्रहों का प्रभाव होने से जातक की आयु पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। कुंडली का आठवां भाव वसीयत में मिलने वाली जायदाद के बारे में, अचानक प्राप्त हो जाने वाले धन के बारे में, किसी की मृत्यु के कारण प्राप्त होने वाले धन के बारे में तथा किसी भी प्रकार से आसानी से प्राप्त हो जाने वाले धन के बारे में भी बताता है। कुंडली के आठवां भाव पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव जातक को बवासीर तथा गुदा से संबंधित अन्य बीमारियों से पीड़ित कर सकता है।

नवां भाव
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कुंडली के नौवें भाव को वैदिक ज्योतिष में भाग्य स्थान के नाम से जाना जाता है तथा कुंडली का यह भाव मुख्य तौर पर जातक के पूर्वजन्मों में संचित अच्छे या बुरे कर्मों से इस जन्म में मिलने वाले फलों के बारे में बताता है। कुंडली का नौवां भाव जातक के पूर्वजो के साथ भी संबंधित होता है तथा इस भाव से जातक को अपने पूर्वजो से प्राप्त हुए अच्छे या बुरे कर्मफलों के बारे में भी पता चलता है।

कुंडली का नौवां भाव जातक की धार्मिक प्रवृत्तियों के बारे में भी बताता है तथा उसकी धार्मिक कार्यों को करने की रुचि एवम तीर्थ स्थानों की यात्राओं के बारे मे भी कुंडली के नौवें भाव से पता चलता है। नौवें भाव पर शुभ ग्रहों का प्रभाव जातक को बहुत धार्मिक बना देता है। कुंडली का नौवां भाव विदेशों में भ्रमण तथा स्थायी रुप से स्थापित होने के बारे में भी बताता है।

दसवां भाव
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कुंडली के दसवें भाव को वैदिक ज्योतिष में कर्म भाव कहा जाता है, तथा कुंडली का यह भाव मुख्य रूप से जातक के व्यवसाय के साथ जुड़े उतार-चढ़ाव तथा सफलता-असफलता को दर्शाता है। कुंडली में दसवें भाव के बलवान होने से तथा इस भाव पर एक या एक से अधिक शुभग्रहों का प्रभाव होने से जातक को अपने व्यवसायिक जीवन में बड़ी सफलताएं मिलतीं हैं तथा उसका व्यवसायिक जीवन आम तौर पर बहुत सफल रहता है। जातक के अपनी संतान के साथ संबंध तथा संतान से मिलने वाला सुख अथवा दुख देखने के लिए भी कुंडली के इस भाव पर विचार करना आवश्यक है।

ग्यारवाँ भाव
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कुंडली के ग्यारहवें भाव को वैदिक ज्योतिष में लाभ भाव कहा जाता है तथा कुंडली का यह भाव मुख्य तौर पर जातक के जीवन में होने वाले वित्तिय तथा अन्य लाभों के बारे में बताता है। ग्यारहवें भाव के द्वारा बताए जाने वाले लाभ जातक द्वारा उसकी अपनी मेहनत से कमाए पैसे के बारे में ही बताएं, यह आवश्यक नहीं। कुंडली के इस भाव द्वारा बताए जाने वाले लाभ बिना मेहनत किए मिलने वाले लाभ जैसे कि लाटरी में इनाम जीत जाना, सट्टेबाज़ी अथवा शेयर बाजार में एकदम से पैसा बना लेना तथा अन्य प्रकार के लाभ जो बिना अधिक प्रयास किए ही प्राप्त हो जाते हैं, भी हो सकते हैं।

कुंडली के ग्यारहवें भाव के बलवान होने पर तथा इस भाव पर एक या एक से अधिक शुभ ग्रहों का प्रभाव होने पर जातक अपने जीवन में आने वाले लाभ प्राप्ति के अवसरों को शीघ्र ही पहचान जाता है तथा इन अवसरों का भरपूर लाभ उठाने में सक्षम होता है जबकि कुंडली के ग्यारहवें भाव के बलहीन होने पर जातक अपने जीवन में आने वाले लाभ प्राप्ति के अधिकतर अवसरों को सही प्रकारसे समझ नही पाता तथा इस कारण इन अवसरों से कोई विशेष लाभ नहीं उठा पाता।

बारहवां भाव
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कुंडली के बारहवें भाव को वैदिक ज्योतिष में व्यय भाव कहा जाता है तथा कुंडली का यह भाव मुख्यरुप से जातक के द्वारा अपने जीवन काल में खर्च किए जाने वाले धन के बारे में बताता है तथा साथ ही साथ कुंडली का यह घर यह संकेत भी देता है कि जातक के द्वारा खर्च किए जाने वाला धन आम तौर पर किस प्रकार के कार्यों में लगेगा। कुंडली के बारहवें भाव के बलवान होने की स्थिति में आम तौर पर जातक की कमाई और व्यय में उचित तालमेल होता है तथा जातक अपनी कमाई के अनुसार ही धन को खर्च करने वाला होता है, जिसके कारण उसे अपने जीवन में धन को नियंत्रित करने में अधिक कठिनाई नहीं हनहीं होती जबकि कुंडली के बारहवें भाव के बलहीन होने की स्थिति में जातक का खर्च आम तौर पर उसकी कमाई से अधिक होता है तथा इस कारण उसे अपने जीवन में बहुत बार धन की तंगी का सामना करना पड़ता है।

कुंडली का बारहवां भाव जातक की विदेश यात्राओं के बारे में भी बताता है तथा किसी दण्ड के फलस्वरूप मिलने वाला देश निकाला भी कुंडली के इसी भाव से देखा जाता है। किसी व्यक्ति का अपने परिवार के सदस्यों से दूर रहना भी कुंडली के इस भाव से पता चल जाता है। जातक के जीवन के किसी विशेष समय में उसके लंबी अवधि के लिए अस्पताल जाने अथवा कारावास में बंद होने जैसे विषयों के बारे में जानने के लिए भी कुंडली के इस भाव को देखा जाता है।

बारहवां भाव व्यक्ति के जीवन में मिलने वाले शय्या के सुख के बारे में भी बताता है तथा यह भाव जातक की निद्रा के बारे में भी बताता है। कुंडली के इस भाव पर किन्ही विशेष बुरे ग्रहों का प्रभाव जातक को निद्रा से संबंधित रोग या परेशानियों से पीड़ित कर सकता हैl

आय प्राप्ति योग


आय प्राप्ति योग
आज के भगदौड़ वाले समय में व्यवसाय या नौकरी में प्रमोशन की चाह सभी के मन में देखी जा सकती है. अक्सर देखने में आता है कि कुछ व्यक्तियों को अत्यधिक परिश्रम के बावजूद भी आशानुरूप सफलता नहीं मिल पाती है और कुछ लोगों को कम मेहनत से ही अच्छी सफलता मिल जाती है. इस का एक कारण ज्योतिष में भी खोजा जा सकता है ज्योतिष अनुसार यह ग्रहों और उनके गोचर का प्रभाव और व्यक्ति के प्राब्धय के प्रभाव होता है .सफलता किसे प्राप्त होगी और कब कोई उन्नति के शिखर पर पहुंचता है इन सब बातों का विचार ज्योतिष द्वारा समझने का प्रयास किया जा सकता है.
कुण्डली विवेचना
जन्म कुण्डली द्वारा व्यक्ति की प्रगत्ति और उन्नती को समझा जा सकता है. कुण्डली में एकादश भाव को आय की प्राप्ति का भाव अर्थात लाभ भाव कहा जाता है इसलिए इस भाव पर उच्च के ग्रहों का गोचर अच्छी सफलता दिलाता है. थोडा़ और सूक्ष्म अध्ययन के लिये नवांश कुण्डली को देखा जाता है. व्यवसाय मे उन्नति के काल को निकालने के लिये दशमांश कुण्डली की विवेचना भी उतनी ही आवश्यक हो जाती है जितनी की डी-1 और डी-9 इन वर्ग कुण्डलियों में दशम भाव दशमेश का सर्वाधिक महत्व होता है. वर्ग कुण्डलियों से जो ग्रह दशम/एकादश भाव या भावेश विशेष संबध बनाते है. उन ग्रहों की दशा, अन्तरदशा में जातक को उन्नति मिलने की संभावना रहती है. इसी प्रकार बली ग्रहों की तथा शुभ ग्रहों की दशा मे भी पदोन्नती मिल सकती है.
दशा विवेचन
कुण्डली में लग्नेश, दशमेश व उच्च के ग्रहों की दशाएं व्यक्ति को जीवन में ऊँचाईयाँ प्रदान करने में सहायक होती हैं. जब इन का संबध व्यवसाय भाव या लाभ भाव के साथ होता है तो व्यक्ति को व्यवसाय या नौकरी में उन्नती व वृद्धि प्राप्त होती है. इन दशाओं का संबध यदि सप्तम या सप्तमेश से हो जाये तो शुभ फलों की प्राप्ति में अधिकता आ जाती है.
कुण्डली के दशम भाव का स्वामी नवांश कुण्डली में जिस राशि में जाये उसके स्वामी के अनुसार व्यक्ति का व्यवसाय व उस पर बली ग्रह की दशा/ गोचर उन्नति के मार्ग प्रशस्त करता है, इन ग्रहों की दशा में व्यक्ति को अधिक से अधिक लाभ प्राप्त करने के अवसर प्राप्त होते हैं. यदि इस समय व्यक्ति परिश्रम के द्वारा कार्यों को करने का प्रयास करे तो उसे निश्च्य ही सफलता मिलती है. कुण्डली में उन्नति के योग हो, पद लग्न पर शुभ प्रभाव हो, दशवे घर व ग्यारहवें घर से जुड़ी दशाएं हो व गुरु शनि का गोचर हो तो व्यक्ति को मिलने वाली उन्नति को कोई नहीं रोक सकता है.
इसके अतिरिक्त कुछ ग्रह योग व्यक्ति के जीवन संवार देते हैं. ज्योतिषशास्त्र में बताये गये कुछ उत्तम योग हैं महालक्ष्मी योग, नृप योग आदि. ज्योतिष विधा ग्रह और उनके योगों के आधार पर फल का ज्ञान देता है. महान योगों में महालक्ष्मी योग धन और एश्वर्य प्रदान करने वाला योग है. यह योग कुण्डली में तब बनता है जब धन भाव यानी द्वितीय स्थान का स्वामी बृहस्पति एकादश भाव में बैठकर द्वितीय भाव पर दृष्टि डालता है. यह धनकारक योग माना जाता है। इसी प्रकार एक महान योग है सरस्वती योग यह तब बनता है जब शुक्र बृहस्पति और बुध ग्रह एक दूसरे के साथ हों अथवा केन्द्र में बैठकर एक दूसरे से सम्बन्ध बना रहे हों, युति अथवा दृष्टि किसी प्रकार से सम्बन्ध बनने पर यह योग बनता है यह योग जिस व्यक्ति की कुण्डली में बनता है उस पर विद्या की देवी मां सरस्वती की कृपा रहती है सरस्वती योग वाले व्यक्ति कला, संगीत, लेखन, एवं विद्या से सम्बन्धित किसी भी क्षेत्र में काफी नाम और धन कमाते हैं. इस प्रकार कुण्डली के विस्तार पूर्वक विवेचन द्वारा यह समझा जा सकत अहै कि जीवन में प्रगती व उन्नती के लिए भाग्य का साथ व कर्म की उपयोगिता बहुत आवश्यक होती है.