Friday, January 5, 2018

विशेष योग में पुरुषों का भाग्य चमकता है विवाह के बाद

इस विशेष योग में पुरुषों का भाग्य चमकता है विवाह के बाद -

ज्योतिषीय दृष्टि से व्यक्ति की जन्मकुंडली उसके सम्पूर्ण जीवन चक्र का ही एक प्रतिरूप होती है और कुंडली में बनी ग्रहस्थितियां ही व्यक्ति के जीवन के प्रत्येक पक्ष को नियंत्रित करती हैं और प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में बनी भिन्न भिन्न ग्रहस्थितियां प्रत्येक व्यक्ति को भिन्न भिन्न प्रकार से और भिन्न भिन्न समय पर सफलताएं देती हैं, कुंडली में बने ग्रहयोग व्यक्ति के भाग्य की सफलता और संघर्ष को तो निश्चित करते ही हैं पर ग्रहों की कुछ विशेष स्थितियां व्यक्ति को अन्य व्यक्तियों के द्वारा भाग्योदय प्रदान करती हैं इसी दृष्टिकोण को लेकर यहाँ हम पुरुषों की कुंडली में लेडी लक को लेकर ज्योतिषीय चर्चा कर रहे हैं।

....... ज्योतिष में कुछ ऐसे विशेष ग्रह योग होते हैं जिनमे व्यक्ति का भाग्योदय लेडी लक के द्वारा होता है अर्थात कुछ विशेष ग्रह-स्थितियों में व्यक्ति को विवाह होने के उपरांत विशेष भाग्योदय और सफलता मिलती है तथा जीवन में विवाह और पत्नी के आगमन के बाद व्यक्ति के जीवन सकारात्मक परिवर्तन आने लगते हैं क्योंकि कुछ पुरूषों की कुंडली में कुछ ऐसे विशेष ग्रह योग होते हैं जिनमे लेडी लक ही उनके भाग्योदय का कारण बनता है और जीवन में उनकी पत्नी का आगमन होने के बाद ही भाग्योदय होता है तो आईये देखते हैं ऐसे कुछ विशेष ग्रहयोग। ....................

पुरुषों की कुण्डली में "शुक्र" को पत्नी और वैवाहिक जीवन का कारक ग्रह माना गया है इसके अलावा सप्तम भाव और सप्तमेश विवाह और वैवाहिक जीवन को नियंत्रित करते हैं तो इन्ही ज्योतिषीय घटकों की कुछ विशेष स्थितियां व्यक्ति को लेडी लक से भाग्योदय देता है।.........

1. कुंडली में बारहवे भाव का भाग्योदय से भी सम्बन्ध होता है बारहवे भाव में स्थित ग्रह व्यक्ति का भाग्योदय कराता है अतः जिन पुरुषों की कुंडली में शुक्र बारहवे भाव में स्थित होता है उनका विशेष भाग्योदय उनके विवाह के बाद ही होता है, ऐसे लोगों के विवाह के बाद उनके जीवन में विशेष साफलताएं मिलती हैं और पत्नी जीवन में बहुत सहायक होती है।

2. जिन लोगों की कुंडली में शुक्र दशम भाव में हो या चतुर्थ भाव में होकर दशम भाव पर शुक्र की दृष्टि हो तो ऐसे में भी व्यक्ति के विवाह के बाद भाग्योदय और करियर में विशेष सफलताएं मिलती हैं
और पत्नी का जीवन में आगमन जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाता है।

3. पुरूषों की कुंडली में शुक्र यदि नवम भाव (भाग्य स्थान) में हो या तीसरे भाव में होकर भाग्य स्थान को देख रहा हो तो ऐसे में भी जीवन में पत्नी के आगमन अर्थात विवाह के बाद भाग्य में उन्नति होती है और भाग्योदय होता है।

4. शुक्र का दशमेश और भाग्येश के साथ होना भी लेडी लक से सफलता और भाग्योदय देता है।

5. दशमेश और सप्तमेश का रशिपरिवर्तन अर्थात सप्तमेश दशम भाव में और दशमेश सप्तम भाव में हो तो ऐसे में भी व्यक्ति के विवाह के उपरांत जीवन में विशेष उन्नति होती है।

6. सप्तमेश और नवमेश (भाग्येश) का राशि परिवर्तन भी जीवन में पत्नी के आगमन के बाद विशेष  भाग्योदय देता है।

7. पुरुषों की कुंडली में सप्तमेश का नवम या दशम भाव में स्थित होना या सप्तमेश का नवम या दशम भाव को देखना भी विवाह उपरांत विशेष सफलता और भाग्योदय देता है।

8. कुंडली में यदि सप्तमेश या शुक्र दशम भाव में हों या दशम भाव को देखते हों तो ऐसे में पत्नी भी वर्किंग होती है और जीवन निर्वाह में सहायक होती है।

9. सप्तमेश का भाग्येश और दशमेश के साथ योग होना भी जीवन में पत्नी के आगमन के बाद भाग्योदय देता है।

तो पुरुषों की कुंडली में इन कुछ विशेष ग्रहयोगों के उपस्थित होने पर व्यक्ति के जीवन में लेडी लक सफलता का कारण बनता है और विवाह उपरांत जीवन में पत्नी के आगमन के बाद विशेष भाग्योदय होता है।


शुक्र का लग्न एवं अष्टकवर्ग अनुसार फल

शुक्र का लग्न एवं अष्टकवर्ग अनुसार फल

(१)👉 लग्न मे शुक्र स्थित हो तो जातक संवेदनशील
,प्रेम करने वाला ,दूसरो पर दया करने वाला होता है| ऐसा जातक समस्त जनो के साथ सहानुभूति पूर्वक व्यवहार करता है।

(२)👉 लग्न के शुक्र का जातक हंसमुख,मनमोहक,कलात्मक रूची संपन्न होता है।

(३)👉 लग्न का शुक्र होने पर १६वें या १७ वें साल मे
शारीरिक संबंधो की प्रबल संभावना देता है।
यदि शुक्र के साथ मंगल,शनि,राहु इत्यादी हो तो कम
आयु मे ही यौन संबंध बनने के योग बनते है या फिर
कम आयु से ही यौन कार्यो मे रूची बन जाती है। किसी अवसर पर तो जातक या जातिका का जीवन व्यभिचार मे संलग्न रहता है।
(४)👉 शुक्र लग्नस्थ होकर यदि ६,८,१२के स्वामियो से प्रभावित हो तो जातक के पत्नी या पति से अलग दूसरे व्यक्ति से भी स्नेह संबंध रहते है या फिर दो विवाह का योग
बनता है। ऐसा तब भी होता है जब पापकर्तरी हो।

(५)👉 स्वगृही शुक्र राजयोग देता है। तथा अस्टमेश या
द्वादशेश शुक्र लग्न मे होने पर दुबारा विवाह का योग बनता है।

(६)👉 मेष,सिंह,धनु का शुक्र लग्न मे हो तो विवाह मे विलम्ब होता है परन्तु पत्नी सुंदर और पति से प्रेम करने
वाली और सहयोग प्रदान करने वाली होती है।

(७)👉 वृष का शुक्र जातक को अत्यधिक कामुक ,सुन्दरी
का प्रेमी,दुराचारी, और अनैतिक यौन संबंधो
मे सुख पाने वाला होता है।

(८)👉 लग्न का शुक्र जातक को प्लास्टिक
,पालीथीन,फाइबर,ग्लास,रबर,मोम,नायलान,प्रसाधन,क्रीम पाउडर,पेन्ट ,रंग,टीवी,म्युजिक सिस्टम के व्यापार से लाभ कराता है।

(९)👉 शुक्र के लग्न वाला जातक प्रबंध,प्रसाशन,शासन के पद को को प्राप्त करने के लिये प्रयासरत रहता है।
ऐसा जातक जंहा भी हो अनुशासन चाहता है और अपने ऊपर किसी को पंसद नही करता| ऐसे जातको को
m.b.a_IAS_pps_PCs(j) इत्यादि पदो की प्राप्ति
के लिये प्रयास करना चाहिये।

शुक्र अष्टकवर्ग फल

अष्टकवर्ग विद्या में नियम है कि कोई भी ग्रह चाहे वह स्वराद्गिा या उच्च का ही क्यों न हो, तभी अच्छा फल दे सकता है जब वह अपने अष्टकवर्ग में ५ या अधिक बिंदुओं के साथ हो क्योंकि तब वह ग्रह बली माना जाता है। अतः यदि शुक्र ग्रह शुक्र अष्टकवर्ग में ५ या इससे अधिक बिंदुओं के साथ है तथा सर्वाष्टक वर्ग में भी २८ या अधिक बिंदुओं के साथ है तो शुक्र से संबंधित भावों के शुभ फल प्राप्त होते हैं। यदि सर्वाष्टकवर्ग में २८ से अधिक बिंदु व शुक्र अष्टकवर्ग में ४ से भी कम बिंदु हैं तो फल सम आता है। यदि दोनों ही वर्गों में कम बिंदु हैं तो ग्रह के अद्गाभ फल प्राप्त होते हैं। कारकत्व के अनुसार शुक्र से विवाह, पत्नी, वस्त्र, वाहन, लक्ष्मी आदि का विचार किया जाता है।
भारतीय ज्योतिष में फलकथन हेतु अष्टकवर्ग विद्या की अचूकता व सटीकता का प्रतिशत सबसे अधिक है। अष्टकवर्ग विद्या में लग्न और सात ग्रहों (सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि) को गणना में सम्मिलित किया जाता है। शुक्र ग्रह द्वारा विभिन्न भावों व राशियों को दिये गये शुभ बिंदु तथा शुक्र का ‘शोध्यपिंड’ - ये ‘शुक्र अष्टकवर्ग’ से किये गये फलकथन का आधार होते हैं।

👉 शुक्र के अष्टकवर्ग में जिस जिस राषि में अधिक बिंदु हों, उस उस राषि में शुक्र के आने पर भूमि, धन तथा कलत्र का लाभ उसी राषि की दिषा में मिलता है।

👉 शुक्र के सप्तम से स्त्री का विचार किया जाता है। अतः शुक्र से सप्तम भाव या सप्तम से त्रिकोण भाव, जिसमें भी अधिक बिंदु हों, में गोचर के शुक्र के आने से उसी राषि की दिषा में स्त्री प्राप्ति को कहना चाहिए।

👉 शुक्र के अष्टकवर्ग में शुक्र से सप्तम के बिंदुओं को शुक्र के शोध्यपिंड से गुणाकर २७ का भाग देने पर जो शेष आये, उस तुल्य नक्षत्र या उससे त्रिकोण नक्षत्र में जब शनि आये तो स्त्री को कष्ट समझना चाहिये।

👉 शुक्र के अष्टकवर्ग में शुक्र से सप्तम के बिंदुओं को शुक्र के शोध्यपिंड से गुणाकर १२ का भाग देने पर जो शेष आये, उस तुल्य राषि या उससे त्रिकोण राषि में जब शनि आये तो स्त्री को कष्ट समझना चाहिये।

👉 शुक्र के अष्टकवर्ग में जिन राषियों में अधिक बिंदु हैं उस राषि की कन्या से विवाह करने से वंष वृद्धि होगी या उस राषि की दषा में जन्मी कन्या से विवाह करना संतानप्रद होता है।’’

👉 जन्म कुंडली में शुक्र जिस राषि में बैठा है, उस राषि का स्वामी यदि ५ या अधिक बिंदुओं के साथ हो तो जातक को सभी प्रकार से संपन्नता, सुविधा और सुख मिलता है।
👉 यदि कुंडली में सप्तमेष नीच का हो तथा शुक्र २ या ३ बिंदुओं के साथ ६-८-१२ भाव में हो तो जातक चरित्रहीन होता है।

👉 जन्म कुंडली के जिस भाव में सबसे ज्यादा शुभ बिंदु हों, उस भाव पर शुक्र का जब गोचर हो तो वह समय संगीत सीखने, यौन सुख, गहने खरीदने या शादी करने के लिये शुभ होता है।


👉 शुक्र के शोध्य पिंड को सूर्य के सातवें घर के बिंदुओं की संख्या से गुणा कर १२ का भाग देने पर जो शेष आये, उस तुल्य राषि में सूर्य का गोचर विवाह का माह बताता है।

Thursday, January 4, 2018

बुध शनि की युति

* बुध शनि की युति *

*बुध शनि की युति अगर पहले भाव में हो तो या तो चेहरे पर कोई काला निशान जैसे गोल मस्सा होगा,लहसन का निसान होगा,या बहिन बुआ बेटी को अपना शरीर छुपाकर चलने की आदत होगी,अक्सर मर्यादा वाले घरों के अन्दर यह बात अधिक देखने के लिये मिलती है,बुध शनि की युति वाले परिवारों में घर में बहिन बुआ बेटी काम काज में भी बहुत हाथ बटातीं होंगी लेकिन सभी काम काज शरीर से सम्बन्धित होते है जैसे कि परिवार के लोगों की सेवा करना उनके खाने पीने और ठहरने आदि के बारे में घर की बहुयें काम नही करतीं होंगी,घर की बहिन बुआ बेटी के जिम्मे वह सभी काम होंगे जो शरीर पालन की क्रिया में शामिल किये जाते है।*

*अक्सर बुध शनि की युति पहले भाव में मार्गी शनि के साथ होने पर और भाव का प्रभाव शनि या बुध के माफ़िक होने से व्यक्ति की प्रतिमा जनमानस के ह्रदय में बस जाती है,जिनकी प्रतिमायें चौराहों या सार्वजनिक स्थानों में लगी होती है वे पहले भाव की श्रेणी में नही आते है उनके चौथे भाव का रूप सामने आता है। बुध शनि के पहले भाव में होने से व्यक्ति के बाल घुंघराले होते है और बहुत ही मुलायम और काले होते है,अक्सर इस प्रकार के लोगों के बाल काफ़ी लम्बे भी होते है,लेकिन शनि की उपस्थिति से अक्सर इस प्रकार के लोगों के बालों में जुयें भी खूब पडती है। व्यक्ति को भावानुसार चुगली करने की आदत होती है,व्यक्ति के अन्दर जुबान में न समझने वाली स्थिति को भी जाना जाता है,अक्सर इस प्रकार के लोग अपनी अपनी आदतों के अनुसार जुबान के पक्के नही माने जा सकते है,उनके लिखने पढने के अन्दर देरी होती है,वे केवल शरीर के इशारों से अच्छी तरह से बात करना जानते होते है,अक्सर बुध शनि की आदतों के अनुसार परिवार में बडे भाई के जो लडकी होती है उसकी या तो ग्रहों के अनुसार प्रसंसा होती है अथवा उसकी गाथायें समाज में खूब बखानी जाती है।*

*अक्सर इस प्रकार के जातक किसी भी दशा में अपने शरीर के हाव भाव प्रदर्शित करने में जैसे कैट-वाक करना आदि खूब कर सकते है,लेकिन इस काम में शुक्र और गुरु का भी योगदान होना चाहिये। शुक्र के साथ होने पर सजने सजाने के कामों में भी खूब मन लगाते है,एक्टिंग के कामो के अन्दर उनका नाम अक्सर सुना जाता है,दक्षिण भारतीय नृत्यांगनाओं की बुध शनि शुक्र की युति को समझा जा सकता है,उनके हाव भाव ही अधिक देखे जाते है। रात को गाये जाने वाले गीत भी शनि के पराक्रम को देखे जाने के कारण इस प्रकार के जातकों को खूब आते है,गुप्त सूचनायें देना और गुप्त जानकारी रखना आदि काम भी इस प्रकार के लोगों को खूब भाते है।*

*सूर्य के साथ होने पर बुध का असर कम हो जाता है और इस प्रकार के जातक समाज या दिन की रोशनी में घर से निकलना पसंद नही करते है,बातों के अन्दर पिता और पुत्र से कभी विचार नही मिलते है,घर के सदस्यों के साथ सुबह या शाम को ही मुलाकात हो पाती है,हमेशा साथ नही रहता है। जातक की प्राथमिक अवस्था में वह अक्सर पिता से दूर ही रहता है। शनि बुध के साथ चन्द्रमा के आने से जातक अपने विचारों और कामों को अपने अनुसार नही कर पाता है उसे दूसरों से पूंछ कर ही काम करना पडता है,स्वतंत्र विचार वह कभी प्रदान कर ही नही सकता है,उससे अगर किसी विचार के मामले में जानने की इच्छा होती है तो वह बता देता है कि फ़लां जगह पर फ़लां पन्ने पर यह बात लिखीहै,वह खुद उस बात को अपने द्वारा छानबीन कर नही बता पाता है।*

*शनि का प्रभाव सप्तम स्थान पर होने और बुध का भी सम्प्तम स्थान को देखे जाने के कारण अधिकतर जीवन साथी की आवाज अधिक तेज होती है,उसका कारण भी या तो बुध शनि की लगन में स्थिति वाला जातक अपने विचारों को सही रूप से प्रकट नही कर पाता है अथवा वह अपने अनुसार अंधेरे में रहने के कारण समझ नही पाता है और जीवन साथी को बार बार एक ही बात कहने के अनुसार चिल्लाने या चीखने की आदत पड जाती है,इस प्रकार के जातकों को अक्सर कम सुनाई देने वाले जीवन साथी ही मिलते है,या तो वे जन्म से कम सुनते है अथवा शादी या विवाह के बाद जातक की शनि बुध की युति उन्हे कम सुनने का मरीज बना देते हैं।*

*बुध शनि के जातकों को हरा और काला रंग बहुत पसंद होता है अक्सर इस प्रकार के जातकों को गहरा हरा रंग और गहरे हरे रंग के पत्ते वाले पेड अधिक पसंद होते है,अगर राशि का पूर्ण सहयोग हो तो जातक के निवास के आसपास बुध-शनि का पेड बरगद जरूर होता है अथवा चन्द्रमा की युति के कारण दूध के पेड भी पाये जाते है,बुध शनि का प्रभाव छोटे रूप से बडे रूप में होने का मिलता है,जैसे एक बरगद का पेड बहुत छोटे से बीज के अन्दर छुपा होता है,और जब वह फ़ैल जाता है तो उसकी जडें काफ़ी लम्बी चलती है और हर डाली से एक जड निकल कर अपना अपना भोजन ग्रहण करने लगती है,अक्सर बुध शनि वाले जातकों के कन्या संतान या तो बहुत अधिक होती है अथवाहोती नही है,बुध शनि वाले जातकों की लडकियां खोती बहुत है,यह प्राभाव पहली साल में फ़िर तेरहवी साल और फ़िर पच्चीसवीं साल तक मिलता है।बुध का अन्धेरे में गुम हो जाना भी इसी बात का द्योतक है।*

*बुध शनि वाले जातक संतान के मामले में शुरु में बहुत कमजोर संतानों को पैदा करने वाले होते है,लेकिन वे संताने अपनी उम्र में जाकर बहुत बडा नाम या क्षेत्र विकसित करती है।*

राहु का सकारात्मक-- नकारात्मक प्रभाव

क्या करता है नकारात्मक राहू ---

 राहू के बारे मै कुछ नकारात्मक बाते जाने । ये हम सब जानते है की गुरु राहु चांडाल दोष, सूर्य राहु पितृ दोष, ग्रहण दोष, चन्द्र राहु ग्रहण दोष, शनि राहु शापित दोष, मंगल राहु अंगारक दोष बनाते है। मतलब 100 लीटर दूध मै एक बून्द निम्बू की दूध फाड़ देती है । इसी तरह राहु का साथ शुभ ग्रह को खराब कर देता है । इस ग्रह का हर किसी की जिंदगी पर अलग अलग प्रभाव पढ़ता है । जिंदगी मे इसका अधिक प्रभाव पूर्ण नास्तिक से लेकर पागलपन तक बना देता है । ये निर्भर करता है की राहू आपकी जिंदगी मै कितने अंश का है, और प्रभावी ग्रह, स्थान कितना कमजोर है । जब कुंडली मे शनि नीच राशि, कमजोर या दुष्प्रभाव मै हो तब राहू और खराब असर देने लगता है।

ज्योतिष के अनुसार राहु शोध, कटु भाषण, विदेश, चीज़ों की कमी और उनकी चाहत, तर्क, झूठ, चालाकी, शक्ति, गरिमा, जुआ, झगड़ा, आत्महत्या, गुलामी, गलत तर्क आदि का प्रतीक है। वहीं केतू अंतिम मुक्ति, कारावास, मोक्ष, आत्महत्या, दोषी व्यक्ति, हत्या, व्यभिचार, जानवर, उपभोग, दर्दनाक बुखार, महान तपस्या, मन की अस्थिरता तथा विदेशी लोगों से संबंध का प्रतीक माना जाता है। राहु और केतू किसी व्यक्ति को किस तरह प्रभावित करेंगे ये उस व्यक्ति की कुंडली पर निर्भर करता है। कुंडली में जिस स्थान पर पर ये ग्रह बैठे होंगे और जिन भी ग्रहों की दृष्टि इन दोनों पर पड़ रही होगी उसी के अनुसार व्यक्ति के भाग्य पर प्रभाव पड़ेगा। अगर राहु और केतू आपकी कुंडली में सही जगह पर बैठे हों तो ये संबंधित स्थान के प्रभावों को बढ़ा देते हैं लेकिन यदि इनकी स्थिति विपरीत हुई तो व्यक्ति को संबंधित क्षेत्र में सचेत रहना आवश्यक है।

अगर आपकी कुंडली में राहु दोष है तो आपको मानसिक तनाव, आर्थिक नुकसान, स्वयं को ले कर ग़लतफहमी, आपसी तालमेल में कमी, बात बात पर आपा खोना, वाणी का कठोर होना और अपशब्द बोलना साथ ही अगर आपकी कुंडली में राहु की स्थिति अशुभ हौ तो आपके हाथ के नाखून अपने आप टूटने लगते हैं।

इसके साथ ही वाहन दुर्घटना, पेट में कोई समस्या, सिर में दर्द होना, भोजन में बाल दिखना, अपयश की प्राप्ति, संबंध ख़राब होना, दिमागी संतुलन ठीक नहीं रहता है, शत्रुओं की ओर से परेशान आदि आपकी कुंडली में राहु के खराब होने के संकेत है।

कई बार राहू आपको भय भी देता है, एक अज्ञात सा भय, अक्सर इसका असर अमावस्या पर दिखाई देता है, राहु ग्रह पेट की समस्या ज्यादा देता है, आप हर इलाज करवा लीजिये,पुरे संसार मै घूम लीजिये, हर रिपोर्ट ठीक आयगी,पर पेट का दर्द ठीक नही होगा जब तक राहू का इलाज नही करवाया जाए ।
राहु के मुख्य लक्षण (प्रभाव)---पेट के रोग, दिमागी रोग, पागलपन, खाजखुजली ,भूत -चुडैल का शरीर में प्रवेश, बिना बात के ही झूमना, नशे की आदत लगना, गलत स्त्रियों या पुरुषों के साथ सम्बन्ध बनाकर विभिन्न प्रकार के रोग लगा लेना, शराब और शबाब के चक्कर में अपने को बरबाद कर लेना,लगातार टीवी और मनोरंजन के साधनों में अपना मन लगाकर बैठना, होरर शो देखने की आदत होना, भूत प्रेत और रूहानी ताकतों के लिये जादू या शमशानी काम करना, नेट पर बैठ कर बेकार की स्त्रियों और पुरुषों के साथ चैटिंग करना और दिमाग खराब करते रहना, कृत्रिम साधनो से अपने शरीर के सूर्य यानी वीर्य को झाडते रहना, शरीर के अन्दर अति कामुकता के चलते लगातार यौन सम्बन्धों को बनाते रहना और बाद में वीर्य के समाप्त होने पर या स्त्रियों में रज के खत्म होने पर टीबी तपेदिक फ़ेफ़डों की बीमारियां लगाकर जीवन को खत्म करने के उपाय करना, शरीर की नशें काटकर उनसे खून निकाल कर अपने खून रूपी मंगल को समाप्त कर जीवन को समाप्त करना, ड्र्ग लेने की आदत डाल लेना, नींद नही आना, शरीर में चींटियों के रेंगने का अहसास होना,गाली देने की आदत पड जाना,सडक पर गाडी आदि चलाते वक्त अपना पौरुष दिखाना या कलाबाजी दिखाने के चक्कर में शरीर को तोड लेना, बाजी नामक रोग लगा लेना, जैसे गाडीबाजी, आदि, इन रोगों के अन्य रोग भी राहु के है, जैसे कि किसी दूसरे के मामले में अपने को दाखिल करने के बाद दो लोगों को आपस में लडाकर दूर बैठ कर तमाशा देखना, लोगों को क्लिप बनाकर लूटने की क्रिया करना और इन कामों के द्वारा जनता का जीवन बिना किसी हथियार के बरबाद करना भी है। अगर उपरोक्त प्रकार के भाव मिलते है, तो समझना चाहिये कि किसी न किसी प्रकार से राहु का प्रकोप शरीर पर है, या तो गोचर से राहु अपनी शक्ति देकर मनुष्य जीवन को जानवर की गति प्रदान कर रहा है, अथवा राहु की दशा चल रही है, और पुराने पूर्वजों की गल्तियों के कारण जातक को इस प्रकार से उनके पाप भुगतने के लिये राहु प्रयोग कर रहा है।

राहु का सकारात्मक प्रभाव -
कभी आपने सूना की किसी को अचानक लाटरी निकल गयी, या मकान खोदने पर गढ़ा हुआ धन निकला, या राजनीति मे अचानक ऊँचे पद पर पहुंच गया,या सट्टा बाजार मै करोड़ो कमाए। ये सब राहू जी के ही कार्य है ।
अब फिर से समझे की ये तय हो गया की राहु राक्षस है, फिर अमृत को चख कर वो बलशाली हो गया। किन्तु उसकी आदत नकारात्मक ही होती है। लेकिन एक नकारात्मक व्यक्ति भी किसी न किसी पर मेहरबान तो होता ही है, एक गुंडा, बदमाश भी किसी को चाहता तो होगा । वैसे ही राहु सबका बुरा करता है , लेकिन जब अपने उच्च घर मिथुन पुरातन काल अनुसार कहना है वृषभ मै भी जब विराजमान होते है, कन्या राशि मे होते है, तब बहुत ही सकारात्मक प्रभाव देते है, फर्श से अर्श तक, याने जमीन से आसमान तक पहुचाने का कार्य भी इनका ही है ।

जब शनि शुभ हो,और राहु भी शुभ हो तो समय बदलते देर नही लगती । जो इंसान के पास चाय पीने को रूपये नही रहते वो राहु के समय परिवर्तन के साथ करोड़ो की सम्पत्ति का मालिक बन जाता है ।

मतलब एक ग्रह गोबर को सोना भी बना सकता है, और सोने को गोबर भी बना देता है ।
सही मायनो मै राहू को समझ पाना बहुत ही कठिन होता है, क्योकि उसमे नकारात्मक और सकारात्मक दोनों के गुण है, एक तरफ राक्षस प्रवर्ति , दूसरी और अमृत का अंश चखकर देव गुण ।

यदि एक सर्प के काटने से हमारी मौत हो सकती है, तो दूसरी और सर्प का जहर हमारी जिंदगी भी बचा सकता है ।
हर ज्योतिष राहु के नाम पर अक्सर नकारात्मक भ्रामक विचार रखते है, लेकिन हर भाव मे जब यह ग्रह सकारात्मक प्रभाव देता है, तो इंसान को बलशाली से लेकर प्रभावशाली व्यक्ति तक बना देता है। क्या आप जानते हो की कलाकारों की एक्टिंग मै भी राहु और शुक्र की विशेष कृपा जरूरी होती है।

कई लोग शनि या राहु को गाली देकर बात करते हैं, यह अनुचित है। ये कुछ भी नहीं करते, आपके किए हुए कर्मों का तद्नुसार ही फल देते हैं। क्या आश्चर्य की बात है कि स्वतंत्र भारत के अधिकांश प्रधानमंत्री राहु के कारण ही इतना ऊंचा राजयोग पा सके हैं। राहु के कारण ही इंदिरा गांधी सफल रहीं और उन्हीं के कारण राजीव गांधी का राज्यारोहण हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी को भी राहु ने बहुत कुछ दिया। उनकी दशांश कुण्डली में तुला में राहु बैठे हैं जिसकी दशा में उन्हें राजयोग मिला।
आप सूर्य भगवान की पूजा करें और राहु की उपेक्षा करें तो यह चल नहीं सकता क्योंकि नवग्रह मण्डल में राहु को महत्वपूर्ण स्थान दिया हुआ है। सभी ग्रहों से समान कृपा प्राप्त होने पर ही हम अपने विंशोत्तरी दशा के अनुसार जीवन वर्ष प्राप्त कर सकते हैं और जीवन को सफलता से भोग सकते हैं।

राहु बहुत बड़े-बड़े योग बनाते हैं और बड़े-बड़े योग भंग कर देते हैं। पाराशर राहु की प्रशंसा में कहते हैं कि यदि केन्द्राधिपति से युत होकर वे केन्द्र में स्थित हो जाएं तो महान राजयोगकारक होते हैं और अपनी दशा में शुभ फल देते हैं।

करियर में सफलता या संघर्ष

करियर में सफलता या संघर्ष -

आजीविका या करियर हमारे जीवन के सबसे महत्वपूर्ण पक्षों में से एक है  पर करियर को लेकर प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में परिस्थितियां भिन्न भिन्न होती हैं जहाँ कुछ लोग सरलता और थोड़े ही प्रयासों से करियर में अच्छी स्थिति को प्राप्त कर लेते हैं वहीँ कुछ लोगो को कठिन परिश्रम के बाद भी करियर में सफलता नहीं मिलती और बहुत बार ऐसा भी देखने को मिलता है के व्यक्ति अच्छी शिक्षा और प्रतिभा होने पर भी करियर की और से परेशान रहता है  वास्तव में हमारी जन्मकुंडली में बनने वाली ग्रह स्थितियां ही हमारे करियर की सफलता या संघर्ष को निश्चित करती हैं तो आइये देखते हैं के ज्योतिषीय दृष्टि से हमारी कुंडली में कौनसे ग्रह और ग्रहस्थितियां करियर को नियंत्रित करती हैं।

"हमारी जन्मकुंडली में "दशम भाव" हमारी आजीविका या करियर की स्थिति का कारक भाव होता है इसके अलावा "शनि" को आजीविका का नैसर्गिक कारक माना गया है अतः कुंडली में दशम भाव, दशमेश और शनि की स्थिति पर ही  हमारे करियर की सफलता या संघर्ष निर्भर करते हैं अर्थात कुंडली में दशम भाव और शनि अच्छी स्थिति में होंगे तो करियर में अच्छी सफलता होगी और दशम भाव व शनि के कमजोर होने पर करियर में संघर्ष की स्थिति रहेगी"  

करियर में अच्छी सफलता के योग -

1. यदि कुंडली में दशमेश (दसवे भाव का स्वामी ग्रह) दशम भाव में ही स्थित हो या दशमेश की दशम भाव पर दृष्टि हो तो व्यक्ति को करियर में अच्छी सफलता मिलती है।

2. यदि दशमेश स्व या उच्च राशि में होकर शुभ स्थान में हो तो व्यक्ति का करियर अच्छा होता है।

3. दशमेश यदि बली होकर केंद्र (1,4,7,10 भाव) या त्रिकोण (1,5,9 भाव) में हो तो करियर में सफलता मिलती है।

4. दशमेश का यदि शुभ भावों के स्वामियों के साथ राशि परिवर्तन हो रहा हो तो ये भी करियर में अच्छी सफलता दिलाता है, जैसे दशमेश लग्न में हो और लग्नेश दशम भाव में हो तो व्यक्ति को अच्छी सफलता मिलती है।

5. यदि शनि स्व या उच्च राशि (मकर, कुम्भ, तुला) में होकर शुभ स्थान में हो तो भी करियर में अच्छी सफलता मिलती है।

6. बलवान बृहस्पति की दशम भाव और शनि पर दृष्टि पड़ना भी करियर के लिए अच्छा होता है।

करियर में संघर्ष के योग -

1. कुण्डली में यदि दशमेश (दसवे भाव का स्वामी ग्रह) पाप भाव ( 6,8,12 भाव) में हो तो व्यक्ति को करियर पक्ष में संघर्ष का सामना करना पड़ता है और सफलता देर से मिलती है।

2. यदि दशमेश नीच राशि में हो तो व्यक्ति का करियर संघर्षमय रहता और परिश्रम का पूरा फल नहीं मिल पाता।

3. यदि दशम भाव कोई पाप योग (जैसे ग्रहण योग, गुरुचांडाल योग,आदि) बना हुआ हो या दशम भाव में कोई पाप ग्रह नीच राशि में बैठा हो तो भी व्यक्ति को करियर में बहुत बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

4. पाप भाव के स्वामियों का भी दशम भाव में होना करियर में समस्याएं बढ़ाता है।

5. आजीविका कारक शनि यदि नीच राशि (मेष) में हो तो ऐसे में व्यक्ति को
करियर में स्थिरता नहीं मिल पाती और संघर्ष की स्थिति बनी रहती है।

6. कुंडली यदि शनि, केतु या मंगल के साथ हो तो व्यक्ति को करियर में बहुत बाधा और उतार चढ़ाव  का सामना करना पड़ता है।

7. शनि का आठवे भाव में होना या सूर्य से अस्त होना भी करियर में बाधाएं और अस्थिरता देता है।

8. शनि यदि किसी भी राशि में 0 या अंतिम अंशों  28 29 30 ... पर हो तो भी करियर में संघर्ष बढ़ता है।

विशेष - करियर की स्थिति के सटीक आंकलन के लिए दसवे भाव और शनि दोनों के बल को देखना जरूरी होता है यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में दशम भाव, दसमेश या शनि कमजोर स्थिति में हों पर उन पर बृहस्पति की दृष्टि पड़ रही हो तो ऐसे में संघर्ष के बाद व्यक्ति को सफलता मिल जाती है दूसरे दृष्टिकोण से बृहस्पति का कमजोर दशम भाव, दशमेश या शनि पर दृष्टि डालना यह दिखाता है के पूजा-पाठ दान पूण्य से करियर की समस्याओं का समाधान हो जायेगा।

ज्योतिष में कुंडली के दशम भाव और शनि को प्रभावित करने वाले ग्रहों के आधार पर ही व्यक्ति के करियर का क्षेत्र निश्चित किया जाता है जो स्वयं में एक बहुत महत्वपूर्ण विषय है जिस पर हम भविष्य में अवश्य चर्चा करेंगे।
प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में ग्रहस्थिति भिन्न होने के कारण कुंडली के विशेष आंकलन के बाद ही व्यक्ति के लिए सटीक उपाय बताये जाते है पर यहाँ हम करियर की बाधाओं के निवारण के लिए कुछ समान्य उपाय बता रहे हैं जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति कर सकता है -

उपाय -

1. अपने दशमेश ग्रह के मन्त्र का जाप करें।

2. ॐ शम शनैश्चराय नमः का रोज जाप करें (एक माला रोज)

3. शनिवार को पीपल पर सरसो के तेल का दिया जलाएं।

4. कुत्तो को रोज भोजन दें।

5. हनुमान चालीसा और संकटमोचन का रोज पाठ करें।

बुध अष्टकवर्ग


बुध अष्टकवर्ग
🔸🔸🔹🔹
(१) बुध अपने अष्टकवर्ग मे ८ शुभ बिंदु पाये तो जातक बुध की दशा मे राज सम्मान पद व प्रतिष्ठा दिलाता है जातक उच्चस्थ लोगो का कृपापात्र होने से धन व यश पाता है।

(२) ७ बिंदु पाने वाला बुध जातक को धन-मान व सुख प्रदान करता है।

(३) ६ बिंदु युक्त बुध सभी कार्य में सफलता का सम्मान दिलाता है।

(४) पांच बिंदु पाने वाला बुध जातक को लोकप्रिय यशस्वी व सभी का स्नेही बनाता है।

(५) चार बिंदु युक्त बुध कभी अवनति असफलता व अपयश तो कभी उन्नति सफलता व सुयश भी देता है।

(६) तीन बिंदु वाला बुध धन संपदा की हानि का भय चिंता दिया करता है जातक कभी धन भाव के कारण कष्ट पाता है।

(७) दो बिंदु पाने वाला बुध अपनी दशा भुक्ति अनिष्ट गोचर में उद्विग्नता क्षोभ ,मति भ्रम तो कभी गलतफहमी के कारण परिवार में कलह क्लेश दिया करता है।

(८) एक बिंदु वाला बुध सभी प्रकार की हानि व क्षति देता है जातक धन_मान व यश की हानि पता है।

(९) ०बिंदु पाने वाला बुध अपनी दशा भुक्ति मे जातक को मृत्यु भय व शत्रु भय दिया करता है।

विशेष 👉  मुख्यतः बुध के अष्टकवर्ग से उन्नति ,उपलब्धि ,विद्या ,लेख ,उपन्यास व कथा साहित्य ,बुद्धिमत्ता का विचार बुध के अष्टकवर्ग से किया जाता है।

बुध और प्रतिभा
🔸🔸🔹🔸🔸
(१) वेदों का ज्ञाता  ;- पांच बिंदु युक्त बुध केंद्र त्रिकोण में यदि गुरु अथवा शनि की दृष्टि यूति पाए तो जातक वेदों का अर्थ जाने वाला बहुत विद्वान व्यक्ति होता है।

(२) तर्क निपूर्ण ;- ५ बिंदु पाने वाला बुध यदि गुरु और मंगल की दृष्टि युति पाए तो जातक तर्क निपूर्ण तर्कशास्त्री होता है।

(३) साहित्यकार ;- मंगल की राशि और शुक्र के नवांश में बैठा बुध मात्र चार बिंदु पाकर भी अगर गुरु की दृष्टि पाए तो जातक साहित्यकार होता है।

(४) ज्योतिषी ;- बुध के अष्टक वर्ग में यदि केतु युक्त राशि को 3 या अधिक बिंदु मिले तथा केतु पंचम भाव में पंचमेश से संबंध करें तो जातक काफी अच्छा ज्योतिषी होता है।

(५) नृत्य नाट्य संगीत ;- चार बिंदु पाने वाला बुध यदि पाप ग्रह की युति पाकर अपनी नीच राशि अर्थात मीन के नवांश में हो तो जातक के नृत्य नाटक व संगीत में विशेष दक्षता पाता है।

(६) भविष्यवक्ता;- पांच बिंदु युक्त बुध यदि शनि तथा गुरु से चतुर्थ  या ६,८भाव में बैठ कर दूसरे भाव को देखे तो जातक स्टिक भविष्य करने वाला भविष्यवक्ता होता है| गुरु और शनि की युति पंचम भाव में हो तो तथा बुध अष्टम भाव में हो तब भी यह योग बनेगा।

(७) उच्च शिक्षित ;-बुध नियंत्रक ग्रह केंद्र या त्रिकोण भाव में बैठे व बुधके अष्टक वर्ग में यदि 4 से अधिक बिंदु पाए तो जातक उच्च शिक्षा प्राप्त कर विद्वान व  धनी-मानी व्यक्ति बनता है।

(८) शिक्षा में बाधा;-  तीन या कम बिंदु प्राप्त बुध यदि 6 8 12 में शुक्र से युति करें तो जातक शिक्षा में बाधा पता है ऐसा जातक अल्पशिक्षित या अशिक्षित होता है।

(९)गूंगा या सभामूक ;- बुध से २सरा भाव यदि 0 बिंदु पाए तो जातक मूक या अपने भाव की अभिव्यक्ति में अकुशल होता है।

(१) बुध के अष्टक वर्ग मे यदि सूर्य द्वारा बुध या बुध से दूसरेभाव को शुभ बिंदु मिलें तो जातक देश भक्ति की बातो करता है।

(२) शुभ चंद्रमा से बुध को मिला शुभ बिंदु वाणी को साफ व आकर्षक बनाता है किंतु पाप पीडित चंद्रमा से बिंदु वाणी को खराब व गंदी बनाता है।

(३) बुध से प्राप्त शुभ बिंदु वाणी को सुंदर व रूचिकर बनाते है।

(४) मंगल से प्राप्त शुभ बिंदु वाणी को भडकाऊ या क्रूर बाते कहने वाला बनाते है।

(५) बुध को यदि गुरू से शुभ बिंदु मिले तो जातक के विचार साफ ,धर्मपरक  व विद्वता पूर्ण होते है|।

(६) बुध को शुक्र द्वारा प्राप्त शुभ बिंदु जातक की वाणी को सार गर्भित रोचक व शिष्ट बनातो है|।

(७) बुध को शनि से प्राप्त शुभ बिंदु जातक को कपटपूर्ण व झूठी बात कहने वाला बनाते है।

Tuesday, January 2, 2018

चारमुखी रूद्राक्ष



चारमुखी रूद्राक्ष

चारमुखी रूद्राक्ष साक्षात ब्रहमा का स्वरूप माना गया है। यह मनुष्य की हत्या के पाप को दूर करने में सक्षम माना जाता है। चारमुखी रूद्राक्ष को शरीर में धारण करके निम्नलिखित प्रकार की समस्याओं से छुटकारा पाया जा सकता है-

1- चारमुखी रूद्राक्ष आत्मघाती प्रयासों को विफल करने में सक्षम होता है।

2- सिर दर्द, पागलपन, तनाव क्रोध आदि सभी प्रकार की समस्याओं को दूर करने में चारमुखी रूद्राक्ष कारगर सिद्ध होता है।

3- नकारात्मक सोंच, मायूसी, आलस्य, कायरता आदि अनेक प्रकार की व्याधियों को समाप्त कर जीवन सुखमय बनाता है।

4- चारमुखी रूद्राक्ष को शरीर में धारण करने से आत्म-विश्वास एंव संकल्प शक्ति बलवती होती है।

5- बुध ग्रह से जनित दोषों को दूर करने में चारमुखी रूद्राक्ष को धारण करने से लाभकारी परिणाम मिलते है।

6- व्यापार व व्यवसाय में प्रगति के लिए चारमुखी रूद्राक्ष को पूजन कक्ष में रखकर नित्य पूजन करने से लाभ मिलता है।

7- पत्रकार, लेखक, सम्पादक, प्रकाशन, कवि, आदि के पेशे से जुड़ लोगों के लिए चारमुखी रूद्राक्ष पहनना फायदेमन्द होता है।

8- जिन बच्चों का पढ़ने में मन नहीं लगता, उन्हे चारमुखी रूद्राक्ष को लाल धागे में शुद्ध करके गले में धारण करना चाहिए।

धारण विधि- किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी और चतुर्दशी दोनों दिन शिवलिंग से स्पर्श कराते हुए चारमुखी रूद्राक्ष को शिवलिंग के समीप रखकर "नमः शिवाय" मन्त्र से शिवलिंग तथा रूद्राक्ष दोनों को एक साथ स्नान करायें। तथा चन्दन, धूप, दीप से पजन करके, कुश से रूद्राक्ष को जल से अभिसिंचित करते हुये निम्न मन्त्र का 11 बार का उच्चारण करते हुए दोनों दिन

ॐ अपेहि मनसस्पतेयक्राम परश्चर।
परोनिर्ऋत्या आ चक्ष्व बहुधा जीवितो मनः।।

जलाभिषेचन करने के बाद पूर्णिमा के दिन निम्न मन्त्र- ॐ हौं जूं सः माम् पालय पालय'' से 10' बार आहूतियां दें। हवन के पश्चात ' नमः शिवाय जपते हुए रूद्राक्ष को हवन कुण्ड की 7 बार परिक्रमा लगाकर धारण करना चाहिए।