Thursday, December 21, 2017

कर्जा मुक्ति के उपाय l


कर्जा मुक्ति के उपाय l

मित्रों हमारे शास्त्रों में कहा गया है की व्यक्ति को यथासंभव कर्जा लेने से बचना चाहिए। कर्ज लेना किसी को भी अच्छा नहीं लगता लेकिन कई बार मज़बूरी वश या अपनी आवश्यकताओं के कारण लोगो को कर्जा लेना ही पड़ता है। कर्ज लेने वाले व्यक्ति को सामने वाले की बहुत सी सही / गलत मनमानी शर्तों को भी मानना पड़ता है।आजकल तो हर छोटा बड़ा आदमी कहीं न कहीं से मकान, गाड़ी,गृह उपोयोगी वस्तुओं,शिक्षा, व्यापार आदि के लिए कर्ज लेता है ।कई बार गलत समय पर कर्ज लेने के कारण या किसी भी अन्य कारण से कर्ज लेने के बाद उसे लौटाना व्यक्ति को भारी हो जाता है वह लाख चाहकर भी कर्ज समय पर नहीं चुका पाता है उस पर कर्ज लगातार बहुत अधिक बड़ता ही जाता है और कई बार तो उसकी पूरी जिंदगी कर्ज चुकाते-चुकाते समाप्त हो जाती है। यहाँ पर हम शास्त्रों और प्राचीन मान्यताओं के अनुसार कर्ज लेने व देने संबंधी कुछ आसान से उपाय बता रहे है इन पर अमल करने पर निश्चित ही आपका कर्ज, बिलकुल समय से सुविधानुसार आपके सिर से उतर जाएगा।

कर्जा मुक्ति मन्त्र

1 - “ॐ ऋण-मुक्तेश्वर महादेवाय नमः”

2 - “ॐ मंगलमूर्तये नमः।”

3 - “ॐ गं ऋणहर्तायै नमः।”

इनमे से किसी भी मन्त्र के नित्य कम से कम एक माला के जप से व्यक्ति को अति शीघ्र कर्जे से मुक्ति मिलती है ।

1. पूर्णिमा व मंगलवार के दिन उधार दें और बुधवार को कर्ज लें।

2. कभी भूलकर भी मंगलवार को कर्ज न लें एवं लिए हुए कर्ज की प्रथम किश्त मंगलवार से देना शुरू करें। इससे कर्ज शीघ्र उतर जाता है।

3.कर्ज मुक्ति के लिए ऋणमोचन मंगल स्तोत्र का पाठ करें |

4. कर्जे से मुक्ति पाने के लिए लाल मसूर की दाल का दान दें।

5. अपने घर के ईशान कोण को सदैव स्वच्छ व साफ रखें।

6. ऋणहर्ता गणेश स्तोत्र का शुक्लपक्ष के बुधवार से नित्य पाठ करें।

7. बुधवार को सवा पाव मूंग उबालकर घी-शक्कर मिलाकर गाय को खिलाने से शीघ्र कर्ज से मुक्ति मिलती है|

8. सरसों का तेल मिट्टी के दीये में भरकर, फिर मिट्टी के दीये का ढक्कन लगाकर किसी नदी या तालाब के किनारे शनिवार के दिन सूर्यास्त के समय जमीन में गाड़ देने से कर्ज मुक्त हो सकते हैं।

9. घर की चौखट पर अभिमंत्रित काले घोड़े की नाल शनिवार के दिन लगाएं।

10. ५ गुलाब के फूल, १ चाँदी का पत्ता, थोडे से चावल, गुड़ लें। किसी सफेद कपड़े में २१ बार गायत्री मन्त्र का जप करते हुए बांध कर जल में प्रवाहित कर दें। ऐसा ७ सोमवार को करें।

11.सर्व-सिद्धि-बीसा-यंत्र धारण करने से सफलता मिलती है।

12.मंगलवार को शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर मसूर की दाल “ॐ ऋण-मुक्तेश्वर महादेवाय नमः”मंत्र बोलते हुए चढ़ाएं।

13.हनुमानजी के चरणों में मंगलवार व शनिवार के दिन तेल-सिंदूर चढ़ाएं और माथे पर सिंदूर का तिलक लगाएं।हनुमान चालीसा या बजरंगबाण का पाठ करें|

14..घर अथवा कार्यालय मे गाय के आगे खड़े होकर वंशी बजाते हुए भगवान श्री कृष्ण का चित्र लगाने से कर्जा नहीं चडता और दिए गए धन की डूबने की सम्भावना भी कम रहती है |

15. यदि व्यक्ति अपने घर के मंदिर में माँ लक्ष्मी की पूजा के साथ 21 हक़ीक पत्थरों की भी पूजा करें फिर उन्हें अपने घर में कहीं पर भी जमीन में गाड़ दे और ईश्वर से कर्जे से मुक्ति दिलाने के लिए प्रार्थना करें तो उसे शीघ्र ही कर्जे से छुटकारा मिल जायेगा ।

16.कर्जे से मुक्ति प्राप्त करने के लिए व्यक्ति लाल वस्त्र पहनें या लाल रूमाल साथ रखें। भोजन में गुड़ का उपयोग करें।

17.बुधवार को स्नान पूजा के बाद व्यक्ति सर्वप्रथम गाय को हरा चारा खिलाये उसके बाद ही खुद कुछ ग्रहण करें तो उसे शीघ्र ही कर्जे से छुटकारा मिल जाता है।

18. कर्जा लेने वाला व्यक्ति यदि अपनी तिजोरी में स्फुटिक श्रीयंत्र के साथ साथ मंगल पिरामिड की स्थापना करें और नित्य धूप दीप दिखाएँ तो उसे शीघ्र ही ऋण से मुक्ति मिलती है ।

Sunday, December 17, 2017

||#राजनीति_सफलता_के_ग्रह_योग|

||#राजनीति_सफलता_के_ग्रह_योग||                          

  राजनीती छेत्र एक बहुत बड़ा छेत्र है जो समाजहित और जनता के लिए कार्य करता है।राजनीती में सफलता के लिए सभी 9 ग्रहो का अनुकूल होना जरुरी होता है क्योंकि सभी ग्रह आज की राजनीती में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है।सूर्य खुद राजा है यह सरकार और राजनीती का कारक है।इसके प्रभाव से राजनीती में नाम, राज्य, उच्च पद, प्रतिष्ठा, सम्मान, यश-कीर्ति मिलती है।चंद्रमा मन है राजनीती में कई तरह से कठोर और महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते है जो मन की मजबूती पर निर्भर करते है इसीकारण जातक के चंद्र का मजबूत और अनुकूल होना जरूरी है।मंगल यह सेनापति है, जनता के साहस, जोश से भाषण देना, निडर होकर समाज हित में काम करना यह मंगल के प्रभाव से हो पाता है।बुध इसके बिना राजनीती में सफलता मिलना नमुमकिन है क्योंकि बुध बुद्धि, भाषण देने की कला, बोलने की कला, गहराई से सोचने समझने की समझ का कारक है इसीकारण इसकी अनुकूलता भी जरूरी है।गुरु यह राज्यकृपा और उच्च पद, मंत्री पद का कारक है, सलह देना यही गुरु की देन होती है।राजनीती में जो समाजहित के लिए सलह दी जाती है वो गुरु ग्रह के ही अंतर्गत ही आती है इन कारणों से गुरु की अनुकूलता और बलिष्ठता जरूरी है।शुक्र भी राजनीती में गुरु की तरह की कार्य करता है लेकिन गुरु से सोच-समझ और सलह में कुछ कम।गुरु शुक्र दोनों ग्रह मंत्रीपद के कारक ग्रह है।शनि यह जनता का कारक है जब तक जनता का सहयोग राजनीतिज्ञ को न मिले तब तक राजनीती में सफलता नही मिल सकती।शनि की अनुकूलता से ही जातक जनता है का हितेषी होता है और जनहित में काम भी करता है जिस कारण से जलजतक जनता का प्यारा होता है जो शनि की ही देन है।राहु यह आज की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण ग्रह है।एक तरह यह आज की राजनीति का हीरो है।आज राजनीती में हर तरह का षड्यंत्र, षड्यंत्र संबंधी काम,जरूरत से ज्यादा चालाकी, रूप बदलबदलकर सबका प्यार बनकर अपना फायदा सोचने वाला राहु राजनीती में छप्पड़ फाड़ कर सफलता दिलाता है।यह अपनी पैनी और चतुर बुद्धि से राजनीती में अपने विरोधियो और शत्रुओ मुह बन्द करने में महिर है।यही राहु आज की राजनीती का असली खिलाडी है।केतु की भूमिका सामान्य ही राजनीती में रहती है।।                                                                        राजनीती में जैसे सभी ग्रहो का अनुकूल होना जरूरी है वेसे ही कुंडली के कुछ भाव, भावेशों का भी बली और अनुकुल होना जरूरी है।पहला लग्न लग्नेश बली होना ही चाहिए लग्न लग्नेश पर शुभ प्रभाव होना शुभ रहता है क्योंकि लग्न लग्नेश जातक खुद है और खुद का प्रभाव और छवि जो राजनीती में अपनी पहचान बनाता है यह लग्न लग्नेश की की अनुकूलता से मिलती है।दशम भाव, दशमेश जो राजनीती का घर है जिस कारण से भाव भावेश दोनों का बली और शुभ योगो में होना जरूरी है।दशमेश का दशम के साथ शुभ योगो गजकेसरी योग, लक्ष्मी योग, बुधादित्य योग, सुनफा-अनफा योग, पंचमहापुरुष योगो का योग का होना राजनीती में महान सफलता दिलाता है जातक सफल और उच्च स्तर का राजनीतिज्ञ होता है।दशमेश का त्रिकोणेश और केंद्र त्रिकोण के सम्बन्ध में केंद्र या त्रिकोण में होना चाहिए, दशम भाव, भावेश जितना ज्यादा शुभ बली ग्रह और ग्रहयोगों के प्रभाव में होगा उतना ही अच्छे सफल योग राजनीती में बनते है।नवम भाव जो भाग्य का घर का बली होना, नवमेश का केंद्र त्रिकोण या नवम भाव में ही होना, शुभ ग्रह योगो में होना सफलता देगा जातक का भाग्य राजनीती में उसका साथ देता है।इसके आलावा विशेष रूप से जनता का भाव भावेश चतुर्थ/भावेश, बुद्धि-विवेक, मंत्रियो का भाव पंचम भाव भावेश, षष्ट भाव भावेश जो सबसे बहुत ज्यादा जरूरी है क्योंकि यह भाव प्रतियोगिताओ का होता है और राजनीती में अलग-अलग पार्टियो के बीच चुनाव के समय और समय समय पर प्रतियोगिताएँ जीत के लिए होती रहती है प्रचार-प्रचार आदि के द्वारा जो षष्ट भाव भावेश के शुभ बली होने से संभव हो पाता है।सातवाँ भाव यह राजनीती के दशम भाव से दशम भाव है इस कारण से इस भाव/भावेश का विचार भी दशम भाव/भावेश की तरह किया जाता है।इसके आलावा अनुकूल और योगकारक ग्रहो की दशाओ का जातक के जीवन में सही समय पर आना भी जरूरी होता है जिन ग्रह दशाओ के प्रभाव से जातक सफलता और सफलता के मुकाम पर पहुचता है इस कारण से राजनीती ग्रह योगो सहित सही ग्रह दशाओ का सही समय पर आ जाने से जातक एक सफल और उच्च स्तर का राजनीतिज्ञ बनने में सफल रहता है।

Saturday, December 16, 2017

शनिदेव हनुमान के बाहुबल और पराक्रम को नहीं जानते थे।

हनुमान जी एक बार संध्या समय अपने आराध्य श्री राम का स्मरण करने लगा तो उसी समय ग्रहों में पाप ग्रह, मंद गति सूर्य पुत्र शनि देव पधारे। वह अत्यंत कृष्ण वर्ण के भीषणाकार थे। वह अपना सिर प्रायः झुकाये रखते हैं। जिस पर अपनी दृष्टि डालते हैं वह अवश्य नष्ट हो जाता है। शनिदेव हनुमान के बाहुबल और पराक्रम को नहीं जानते थे। हनुमान ने उन्हें लंका में दशग्रीव के बंधन से मुक्त किया था। वह हनुमान जी से विनयपूर्वक किंतु कर्कश स्वर में बोले हनुमान जी ! मैं आपको सावधान करने आया हूं। त्रेता की बात दूसरी थी, अब कलियुग प्रारंभ हो गया है। भगवान वासुदेव ने जिस क्षण अपनी अवतार लीला का समापन किया उसी क्षण से पृथ्वी पर कलि का प्रभुत्व हो गया। यह कलियुग है। इस युग में आपका शरीर दुर्बल और मेरा बहुत बलिष्ठ हो गया है।अब आप पर मेरी साढेसाती की दशा प्रभावी हो गई है। मैं आपके शरीर पर आ रहा हूं। शनिदेव को इस बात का तनिक भी ज्ञान नहीं था कि रघुनाथ के चरणाश्रि्रतों पर काल का प्रभाव नहीं होता। करुणा निधान जिनके हृदय में एक क्षण को भी आ जाते हैं, काल की कला वहां सर्वथा निष्प्रभावी हो जाती है। प्रारब्ध के विधान वहां प्रभुत्वहीन हो जाते हैं। सर्व समर्थ पर ब्रह्म के सेवकों का नियंत्रण-संचालन-पोषण प्रभु ही करते हैं। उनके सेवकों की ओर दृष्टि उठाने का साहस कोई सुर-असुर करे तो स्वयं अनिष्ट भाजन होता है। शनिदेव के अग्रज यमराज भी प्रभु के भक्त की ओर देखने का साहस नहीं कर पाते। हनुमान जी ने शनिदेव को समझाने का प्रयत्न किया, आप कहीं अन्यत्र जाएं। ग्रहों का प्रभाव पृथ्वी के मरणशील प्राणियों पर ही पड़ता है। मुझे अपने आराध्य का स्मरण करने दें। मेरे शरीर में श्री रघुनाथजी के अतिरिक्त दूसरे किसी को स्थान नहीं मिल सकता। लेकिन शनिदेव को इससे संतोष नहीं मिला। वह बोले, मैं सृष्टिकर्ता के विधान से विवश हूं। आप पृथ्वी पर रहते हैं। अतः आप मेरे प्रभुत्व क्षेत्र से बाहर नहीं हैं। पूरे साढे बाईस वर्ष व्यतीत होने पर साढ़े सात वर्ष के अंतर से ढाई वर्ष के लिए मेरा प्रभाव प्राणी पर पड़ता है। किंतु यह गौण प्रभाव है। आप पर मेरी साढ़े साती आज इसी समय से प्रभावी हो रही हो। मैं आपके शरीर पर आ रहा हूं। इसे आप टाल नहीं सकते।फिर हनुमान जी कहते हैं, जब आपको आना ही है तो आइए, अच्छा होता कि आप मुझ वृद्ध को छोड़ ही देते'! फिर शनिदेव कहते हैं, कलियुग में पृथ्वी पर देवता या उपदेवता किसी को नहीं रहना चाहिए। सबको अपना आवास सूक्ष्म लोकों में रखना चाहिए जो पृथ्वी पर रहेगा। वह कलियुग के प्रभाव में रहेगा और उसे मेरी पीड़ा भोगनी पड़ेगी और ग्रहों में मुझे अपने अग्रज यम का कार्य मिला है। मैं मुख्य मारक ग्रह हूं। और मृत्यु के सबसे निकट वृद्ध होते हैं। अतः मैं वृद्धों को कैसे छोड़ सकता हूं।' हनुमान जी पूछते हैं, आप मेरे शरीर पर कहां बैठने आ रहे हैं। शनिदेव गर्व से कहते हैं प्राणी के सिर पर। मैं ढाई वर्ष प्राणी के सिर पर रहकर उसकी बुद्धि विचलित बनाए रखता हूं। मध्य के ढाई वर्ष उसके उदर में स्थित रहकर उसके शरीर को अस्वस्थ बनाता हूं व अंतिम ढाई वर्ष पैरों में रहकर उसे भटकाता हूं।' फिर शनिदेव हनुमान जी के मस्तक पर आ बैठे तो हनुमान जी के सिर पर खाज हुई। इसे मिटाने के लिए हनुमान जी ने बड़ा पर्वत उठाकर सिर पर रख लिया।शनिदेव चिल्लाते हैं, यह क्या कर रहे हैं आप।' फिर हनुमान जी कहते हैं, जैसे आप सृष्टिकर्ता के विधान से विवश हैं वैसे मैं भी अपने स्वभाव से विवश हूं। मेरे मस्तक पर खाज मिटाने की यही उपचार पद्धति है। और आप अपना कार्य करें और मैं अपना कार्य।'ऐसा कहते ही हुनमान जी ने दूसरा पर्वत उठाकर सिर पर रख लिया। इस पर शनिदेव कहते हैं, आप इन्हें उतारिए, मैं संधि करने को तैयार हूं।' उनके इतना कहते ही हनुमान जी ने तीसरा पर्वत उठाकर सिर पर रख लिया तो शनि देव चिल्ला कर कहते हैं, मैं अब आपके समीप नहीं आऊंगा। फिर भी हनुमान जी नहीं माने और चौथा पर्वत उठाकर सिर पर रख लिया। शनिदेव फिर चिल्लाते हैं, पवनकुमार ! त्राहि माम ताहि माम ! रामदूत ! आंजनेयाय नमः ! मैं उसको भी पीड़ित नहीं करूंगा जो आपका स्मरण करेगा। मुझे उतर जाने का अवसर दें। हनुमान जी कहते हैं, बहुत शीघ्रता की। अभी तो पांचवां पर्वत (शिखर) बाकी है। और इतने में ही शनि मेरे पैरों में गिर गए, और कहा' मैं सदैव आपको दिये वचनों को स्मरण रखूंगा।' आघात के उपचार के लिए शनिदेव तेल मांगने लगे। हनुमान जी तेल कहां देने वाले थे। तभी शनि देव ने अपनी पीढा दूर करने को तेल लगाया !और तभी से तेल चड़ने लगा !वही शनिदेव आज भी तेलदान से तुष्ट होते हैं। और खुशियाँ प्रदान करते है !!  बोलिये राम भगत हनुमान की जय।।

जोड़ो के दर्द की समस्या और ज्योतिष

जोड़ो के दर्द की समस्या और ज्योतिष -
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वैसे तो हमारे स्वास्थ से जुडी कोई भी समस्या जीवन की गति को धीमा कर ही देती है पर जोड़ो के दर्द या जॉइंट्स पेन की समस्या हमारे जीवन में एक बोझ की तरह होती है जिससे जीवन ठहर सा जाता है घुटनो के दर्द की समस्या बहुत से लोगो के जीवन में एक बड़ी बाधा बनी रहती है तो बहुत से लोग कमर दर्द के कारण कितनी ही समस्याओं का सामना करते हैं तो आये देखते हैं कौनसे ग्रहयोग व्यक्ति को जोड़ो के दर्द की समस्या देते हैं -
"ज्योतिष की चिकित्सीय शाखा हमारे स्वास्थ और शारीरिक गतिविधियों को समझने तथा उनके निदान में अपनी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है ज्योतिष में "शनि" को हड्डियों के जोड़ या जॉइंट्स का कारक माना गया है हमारे शरीर में हड्डियों का नियंत्रक ग्रह तो सूर्य है पर हड्डियों के जोड़ों की स्थिति को "शनि" नियंत्रित करता है अतः हमारे शरीर में हड्डियों के जोड़ या जॉइंट्स की मजबूत या कमजोर स्थिति हमारी कुंडली में स्थित 'शनि" के बल पर निर्भर करती है कुंडली में शनि पीड़ित स्थिति में होने पर व्यक्ति अक्सर जॉइंट्स पेन या जोड़ो के दर्द से परेशान रहता है और कुंडली में शनि पीड़ित होने पर ही घुटनो के दर्द, कमर दर्द, गर्दन के दर्द, रीढ़ की हड्डी की समस्या, कोहनी और कंधो के जॉइंट्स में दर्द के जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं।  इसके अतिरिक्त कुंडली का "दसवा भाव" घुटनो का प्रतिनिधित्व करता है छटा भाव कमर का प्रतिनिधित्व करता है तीसरा भाव कन्धों का प्रतिनिधित्व करता है और सूर्य को हड्डियों और केल्सियम का कारक माना गया है अतः इन सबकी भी यहाँ सहायक भूमिका है  परंतु जोड़ो के दर्द की समस्या में मुख्य भूमिका  "शनि" की ही होती है क्योंकि शनि को हड्डियों के जोड़ो का नैसर्गिक कारक माना गया है और शनि हमारे शरीर में उपस्थित हड्डियों के सभी जॉइंट्स का प्रतिनिधित्व करता है अतः कुंडली में शनि पीड़ित होने पर ही व्यक्ति को दीर्घकालीन या निरन्तर जॉइंट्स पेन की समस्या बनी रहती है"

1. यदि शनि कुंडली में छटे या आठवे भाव में हो तो ऐसे में व्यक्ति को घुटनो, कमर आदि के जोड़ो के  दर्द की समस्याएं होती हैं।

2. शनि यदि नीच राशि (मेष) में हो तो भी व्यक्ति जोड़ो के दर्द से समस्याग्रस्त रहता है।

3. शनि का केतु और मंगल के योग से पीड़ित होना भी जॉइंट्स पेन की समस्या देता है।

4. शनि यदि सूर्य से पूर्णअस्त हो तो भी जोड़ो के दर्द की समस्या रहती है।

5. शनि का अष्टमेश या षष्टेश के साथ होना भी जोड़ो में दर्द की समस्या देता है।

6. यदि कुंडली के दशम भाव में कोई पाप योग बन रहा हो या दशम भाव में कोई पाप ग्रह नीच राशि में हो तो भी घुटनो के दर्द की समस्या रहती है।

7. छटे भाव में पाप योग बनना कमर दर्द की समस्या देता है।

8. यदि कुंडली में शनि पीड़ित स्थिति में हो तो शनि की दशा में भी जॉइंट्स पेन की समस्या बनी रहती है।
वैसे तो प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में ग्रहस्थिति भिन्न होने के कारण व्यक्तिगत रूप से प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपाय भी भिन्न होते हैं परंतु यहाँ हम जॉइंट्स पेन के लिए कुछ सामान्य ज्योतिषीय उपाय बता रहें हैं जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति कर सकता है -

शांत्यर्थ उपाय
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1. ॐ शं शनैश्चराय नमः का नियमित जाप करें।

2. शनिवार को मन्दिर में पीपल पर सरसो के तेल का दिया जलाएं।

3. शनिवार को संध्याकाल में सरसो के तेल का परांठा कुत्ते को खिलाएं।

4. किसी योग्य ज्योतिषी से परामर्श के बाद शनि का कोई रत्न भी धारण कर सकते हैं पर किसी योग्य ज्योतिषी की सलाह के बिना शनि का कोई भी रत्न ना पहने।

5. आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें।

6. शुक्ल पक्ष के प्रथम शनिवार से आरंभ कर कम से कम तीन शनि सर से पैर तक काल धागा नापकर उसे जटा वाले नारियल पर लपेट सर से 11 बार मनोकामना बोलकर उतार बहते जल में प्रवाहित करें।

7. सप्त धान्य एवं काली वस्तुओ का दान करने से भी काफी फर्क पड़ता है।

Thursday, December 14, 2017

शुभ मुहूर्त देखना

शुभ मुहूर्त देखना
शुभ मुहूर्त :- 
भूमि/ प्लाट क्रय  विक्रय मुहूर्त :-  भूमि एवं प्लाट खरीदने या बेचने हेतु वैशाख , ज्येष्ठ, अषाढ़ , मार्गशीर्ष, माघ, व् फाल्गुन मास की द्वितीय, पंचमी, षष्ठी, दशमी, एकादशी  व् पूर्णिमा तिथि में बुधवार, गुरूवार, शुक्रवार, शनिवार, रविवार, सोमवार, अदि वारों में मृगशिरा, अश्लेशा, मघा, विशाखा, अनुराधा, पूर्वाषाढ़, पूर्वाभाद्रपद, मूल,  रेवती, उत्तराषाढ़,  उत्तराभाद्रपद, हस्त, चित्रा, स्वाति, शतभिषा, नक्षत्र उत्तम रहते हैं |
सिद्ध योग देखना
अगर शुक्रवार को नंदा तिथि पड़ती हो  , बुधवार को भद्रा तिथि पड़ती हो , शनिवार को रिक्त तिथि पड़ती हो  ,
मंगलवार को जया तिथि  पड़ती हो  तथा  गुरूवार को पूर्णा तिथि पड़ती हो तो उस दिन सिद्ध मुहूर्त होता है | नंदा तिथि, भद्रा तिथि, रिक्ता तिथि, जया तिथि  तथा पूर्णा तिथि के बारे में जानने के लिए कृपया पंचांग एवं कलेंडर के वेबपेज पर देखें |
मृत्यु योग देखना
अगर रविवार व् मंगलवार को नंदा तिथि पड़ती हो  , सोमवार व् शुक्रवार को भद्रा तिथि पड़ती हो , गुरूवार को रिक्ता तिथि पड़ती हो , शनिवार को पूर्णा तिथि पड़ती हो, तथा बुधवार, को जया तिथि पड़ती हो तो मृत्यु योग बनता है | नंदा तिथि, भद्रा तिथि, रिक्ता तिथि, जया तिथि  तथा पूर्णा तिथि के बारे में जानने के लिए कृपया पंचांग एवं कलेंडर के वेबपेज पर देखें |
वस्तु या चीज खरीदने बेचने का मुहूर्त
तीनों पूर्वा, विशाखा, भरनी, कृतिका, अश्लेषा, नक्षत्र तथा शुभ दिन शुक्र, गुरु, सोमवार, बुधवार, आदि इन वारों में वस्तु या चीज को बेचना चाहिये | तथा चित्रा, रेवती, स्वाति, शतभिषा, अश्विनी, धनिष्ठा, श्रवण  नक्षत्रों में  एवं और गुरूवार, शुकवार, सोमवार, बुधवार, इन वारों में वस्तु या चीज खरीदना चाहिये  यह शुभ रहता है |
औषधि या इलाज कराने या दवाई शुरू करने का मुहूर्त
रेवती, अश्विनी, पुनर्वशु, पुष्य, चित्रा, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, अनुराधा, मूल, मृगशिरा, इन नक्षत्रों में दवाई या इलाज शुरू करने से जल्दी रोग दूर हो जाता है एवं शुभ रहता है |
कुआ पूजने का मुहूर्त
कुआ पूजन वर्ष के चैत्र, पौष, मास तथा पुरसोत्तम मास को छोड़कर सभी महीनों की २, ३, ५, ६, ७, ८, १०, ११, १२, १३, एवं पूर्णिमा तिथियों को  तथा सोमवार, बुधवार, गुरूवार, शुभ वार रहते हैं | मूल, श्रवण, मृगशिरा, पुनर्वशु, पुष्य, हस्त, अनुराधा, आदि नक्षत्र शुभ रहते हैं|तथा मेष, कर्क, सिंह,तुला, व् मकर, लग्न शुभ रहते हैं |
गृह आरम्भ करने या नींव धरने का मुहूर्त
गृह आरम्भ करने या नींव धरने  के लिए शुभ तिथि , वार, नक्षत्र, लग्न आदि निम्न प्रकार से हैं :
शुभ महीने : श्रावण , वैशाख, कार्तिक, मार्गशीर्ष, फाल्गुन मास नींव धरने के लिए उत्तम रहते हैं |
शुभ तिथियाँ : उपरोक्त सभी महीनों की शुभ तिथि , २, ३, ५, ६, ७, १०, ११, १२, १२, एवं पूर्णिमा  तिथि नीवं धरने के लिए शुभ रहती हैं | शुभ वार : सोमवार, बुधवार, गुरूवार, शुक्रवार, व् शनिवार, आदि उत्तम रहते हैं |
शुभ नक्षत्र : मृगशिरा, रेवती, शतभिषा, चित्रा, पुष्य, अनुराधा, रोहिणी, तीनो उत्तरा, हस्त, स्वाति व् धनिष्ठा नक्षत्र उत्तम रहते हैं | शुभ लग्न : वृष, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ, आदि की स्थिर लग्न | उपरोक्त सभी घटकों में नींव धरना या गृह आरम्भ करना शुभ रहता है |
गृह प्रवेश मुहूर्त
गृह प्रवेश उत्तरायण काल में शुभ रहता है | गृह प्रवेश वैशाख , ज्येष्ठ, मार्गशीर्ष, माघ,एवं फाल्गुन  मास , इन सभी महीनों की २, ३, ५, ६, ७, १०, ११, १३, एवं पूर्णिमा  तिथि  व् सोमवार, बुधवार, गुरूवार, शुक्रवार, व् शनिवार, शुभ रहते हैं |
शुभ नक्षत्र  : रोहिणी, मृगशिरा, तीनो, उत्तरा, चित्रा, अनुराधा, व् रेवती,  तथा जन्म लग्न से ३, ६, १०, ११ वें पड़ने वाली स्थिर लग्न शुभ रहती हैं |
चुनाव लड़ने के लिए नामांकन भरना व् शपथ लेने के लिए मुहूर्त
पंच , सरपंच, पार्षद, प्रधान, विधान सभा, लोक सभा, राष्ट्रपति, अध्यक्ष  आदि के लिए चुनाव लड़ने के लिए नामांकन भरने के लिए  तथा  जीतने पर शपथ ग्रहण करने  आदि के लिए शुभ मुहूर्त जरूरी होता है | इसके लिए शुभ मुहूर्त के लिए :
शुभ तिथियाँ :  २, ३, ५, ९, १०, १२, तथा पूर्णिमा तिथि अच्छी रहती हैं | 
शुभ वार :  सोमवार, बुधवार, गुरूवार, शुक्रवार, शुभ रहते हैं |
शुभ नक्षत्र :  अश्विनी, रोहिणी, पुनर्वशु, पुष्य, तीनों उत्तरा , हस्त, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, रेवती, उपरोक्त नक्षत्र  मुहूर्त के लिए शुभ रहते हैं |
शुभ लग्न : मेष, कर्क, तुला, मकर, लग्न शुभ रहती हैं |

वास्तुदेव की तीन विशेषताएं होती हैं

वास्तुदेव की तीन विशेषताएं होती हैं  : –
चर वास्तु  : इसमें वास्तु पुरुष की  नजर या रुख  भाद्रपद ( अगस्त, सितम्बर ), आश्विन तथा
कार्तिक ( अक्टूबर , नवम्बर ) महीनों के अवधि में दक्षिण की ओर  होता है |  तथा  मार्गशीर्ष (नवम्बर-
दिसंबर ), पौष ( दिसंबर – जनवरी ), और माघ (जनवरी-फरवरी ) महीनों में पश्चिम की ओर होता है |
फाल्गुन (फरवरी – मार्च ), चैत्र (मार्च – अप्रैल ), और  वैशाख (अप्रैल – मई ) महीनों में उत्तर की ओर
होता है | ज्येष्ठ (मई – जून ), आषाढ़ (जून – जुलाई ), तथा  श्रावण (जुलाई – अगस्त ) महीनों की अवधि
में पूर्व की ओर होता है |
निर्माण कार्य का आरम्भ  या शिलान्यास  और मुख्य द्वार की स्थापना  ऐसे स्थान पर होनी चाहिए जो
वास्तुपुरुष की दृष्टी  या नजर की ओर हो , ताकि मनुष्य उस मकान में शान्ति और सुख से रह सके |
स्थिर वास्तु :  वास्तु पुरुष का सिर सदैव उत्तर-पूर्व की ओर  तथा पैर दक्षिण – पश्चिम की ओर , दाहिना
हाथ उत्तर-पश्चिम की ओर  एवं बांया  हाथ दक्षिण – पूर्व की ओर रहता है  इस बात को ध्यान में रखते हुए
मकान का डिजाइन एवं प्लान  बनाना चाहिए |
नित्य वास्तु : प्रत्येक दिन वास्तु पुरुष की नजर  सुबह प्रथम  तीन घंटे  पूर्व की ओर , इसके पश्चात
तीन घंटे दक्षिण  की ओर  तथा उसके बाद तीन घंटे पश्चिम की ओर तथा अंतिम तीन घंटे उत्तर की ओर
दृष्टी अथवा नजर रहती है | भवन का निर्माण कार्य इसी प्रकार समयानुसार करना  चाहिए | वास्तु
पुरुष की तीन अवसरों पर पूजा अर्चना करनी चाहिये  निर्माण कार्य में  शिलान्यास  करते समय ,
दूसरी बार  मुख्य द्ववार लगाते  समय , तीसरी बार  गृह प्रवेश के समय पूजा करनी चाहिये | गृह प्रवेश
उस समय होना चाहिये जब वास्तुपुरुष की नजर उस ओर हो  ये शुभ रहता है |

Tuesday, December 5, 2017

*कुंडली में मृत्यु योग

*कुंडली में मृत्यु योग :-*
हमारे प्राचीन ऋषि-महर्षियों ने ज्योतिष की गड़ना के आधार पर जीवन और मृत्यु के बारे में कुछ योग बताएं है जसके आधार पर मृत्यु कैसे होगी किस प्रकार से होगी आइये देखते है इस लेख के माध्यम से कुछ त्रुटी हो तो इस पर अपना प्रकाश अवश्य डाले धन्यवाद् ..
लग्नेश के नवांश से मृत्यु का ज्ञान:-जन्म कुंडली में लग्न चक्र और नवांश को देखकर यह बताया जा सकता है की मृत्यु कैसे होगी ..
लग्नेश का नवांश मेष हो तो पितदोष, पीलिया, ज्वर, जठराग्नि आदि से संबंधित बीमारी से मृत्यु होती है।
लग्नेश का नवांश वृष हो तो एपेंडिसाइटिस, शूल या दमा आदि से मृत्यु होती है।
लग्नेश मिथुन नवांश में हो तो मेनिन्जाइटिस, सिर शूल, दमा आदि से मृत्यु होती है।
लग्नेश कर्क नवांश में हो तो वात रोग से मृत्यु हो सकती है।
लग्नेश सिंह नवांश में हो तो व्रण, हथियार या अम्ल से अथवा अफीम, मय आदि के सेवन से मृत्यु होती है।
कन्या नवांश में लग्नेश के होने से बवासीर, मस्से आदि रोग से मृत्यु होती है।
तुला नवांश में लग्नेश के होने से घुटने तथा जोड़ांे के दर्द अथवा किसी जानवर के आक्रमण चतुष्पद (पशु) के कारण मृत्यु होती है।
लग्नेश वृश्चिक नवांश में हो तो संग्रहणी, यक्ष्मा आदि से मृत्यु होती है।
लग्नेश धनु नवांश में हो तो विष ज्वर, गठिया आदि के कारण मृत्यु हो सकती है।
लग्नेश मकर नवांश में हो तो अजीर्ण, अथवा, पेट की किसी अन्य व्याधि से मृत्यु हो सकती है।
लग्नेश कुंभ नवांश में हो तो श्वास संबंधी रोग, क्षय, भीषण ताप, लू आदि से मृत्यु हो सकती है।
लग्नेश मीन नवांश में हो धातु रोग, बवासीर, भगंदर, प्रमेह, गर्भाशय के कैंसर आदि से मृत्यु होती है।हत्या एवं आत्महत्या के योग प्रश्न:-
जन्म के समय के आकाशीय ग्रह योग मानव के जन्म-मृत्यु का निर्धारण करते हैं। शरीर के संवेदनशील तंत्र के ऊपर चंद्र का अधिकार होता है। चंद्र अगर शनि, मंगल, राहु-केतु, नेप्च्यून आदि ग्रहों के प्रभाव में हो तो मन व्यग्रता का अनुभव करता है। दूषित ग्रहों के प्रभाव से मन में कृतघ्नता के भाव अंकुरित होते हैं, पाप की प्रवृŸिा पैदा होती है और मनुष्य अपराध, आत्महत्या, हिंसक कर्म आदि की ओर उन्मुख हो जाता है। चंद्र की कलाओं में अस्थिरता के कारण आत्महत्या की घटनाएं अक्सर एकादशी, अमावस्या तथा पूर्णिमा के आस-पास होती हंै। मनुष्य के शरीर में शारीरिक और मानसिक बल कार्य करते हैं। मनोबल की कमी के कारण मनुष्य का विवेक काम करना बंद कर देता है और अवसाद में हार कर वह आत्महत्या जैसा पाप कर बैठता है।
आत्महत्या करने वालों में 60 प्रतिशत से अधिक लोग अवसाद या किसी न किसी मानसिक रोग से ग्रस्त होते हैं।
आत्महत्या के कारण मृत्यु योग जन्म कुंडली में निम्न स्थितियां हों तो जातक आत्महत्या की तरफ उन्मुख होता है।
लग्न व सप्तम स्थान में नीच ग्रह हो। अष्टमेश पाप ग्रह शनि राहु से पीड़ित हो। अष्टम स्थान के दोनों तरफ अर्थात् सप्तम व   हो, उच्च या नीच राशिस्थ हो अथवा मंगल व केतु की युति में हो। सप्तमेश और सूर्य नीच भाव का हो तथा राहु शनि से दृष्टि संबंध रखता हो।
लग्नेश व अष्टमेश का संबंध व्ययेश से हो। मंगल व षष्ठेश की युति हो, तृतीयेश, शनि और मंगल अष्टम में हों।
अष्टमेश यदि जल तत्वीय हो तो जातक पानी में डूबकर और यदि अग्नि तत्वीय हो तो जल कर आत्महत्या करता है।
कर्क राशि का मंगल अष्टम भाव में हो तो जातक पानी में डूबकर आत्महत्या करता है।
हत्या या आत्महत्या के कारण होने वाली मृत्यु के अन्य योग:
यदि मकर या कुंभ राशिस्थ चंद्र दो पापग्रहों के मध्य हो तो जातक की मृत्यु फांसी, आत्महत्या या अग्नि से होती है। चतुर्थ भाव में सूर्य एवं मंगल तथा दशम भाव में शनि हो तो जातक की मृत्यु फांसी से होती है। यदि अष्टम भाव में एक या अधिक अशुभ ग्रह हों तो जातक की मृत्यु हत्या, आत्महत्या, बीमारी या दुर्घटना के कारण होती है।
यदि अष्टम भाव में बुध और शनि स्थित हों तो जातक की मृत्यु फांसी से होती है। यदि मंगल और सूर्य राशि परिवर्तन योग में हों और अष्टमेश से केंद्र में स्थित हों तो जातक को सरकार द्वारा मृत्यु दण्ड अर्थात् फांसी मिलती है। शनि लग्न में हो और उस पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तथा सूर्य, राहु और क्षीण चंद्र युत हों तो जातक की गोली या छुरे से हत्या होती है।
यदि नवांश लग्न से सप्तमेश, राहु या केतु से युत हो तथा भाव 6, 8 या 12 में स्थित हो तो जातक की मृत्यु फांसी लगाकर आत्महत्या कर लेने से होती है।
यदि चंद्र से पंचम या नवम राशि पर किसी अशुभ ग्रह की दृष्टि या उससे युति हो और अष्टम भाव अर्थात 22वें द्रेष्काण में सर्प, निगड़, पाश या आयुध द्रेष्काण का उदय हो रहा हो तो जातक फांसी लगाकर आत्महत्या करने से मृत्यु को प्राप्त होता है। चैथे और दसवें या त्रिकोण भाव में अशुभ  ग्रह स्थित हो या अष्टमेश लग्न में मंगल से युत हो तो जातक फांसी लगाकर आत्महत्या करता है।
दुर्घटना के कारण मृत्यु योग:-
जिस जातक के जन्म लग्न से चतुर्थ और दषम भाव में से किसी एक में सूर्य और दूसरे में मंगल हो उसकी मृत्यु पत्थर से चोट लगने के कारण होती है।
यदि शनि, चंद्र और मंगल क्रमशः चतुर्थ, सप्तम और दशम भाव में हांे तो जातक की मृत्यु कुएं में गिरने से होती है।
सूर्य और चंद्र दोनों कन्या राशि में हों और पाप ग्रह से दृष्ट हों तो जातक की उसके घर में बंधुओं के सामने मृत्यु होती है।
यदि कोई द्विस्वभाव राशि लग्न में हो और उस में सूर्य तथा चंद्र हों तो जातक की मृत्यु जल में डूबने से होती है।
यदि चंद्र मेष या वृश्चिक राशि में दो पाप ग्रहों के मध्य स्थित हो तो जातक की मृत्यु शस्त्र या अग्नि दुर्घटना से होती है।
जिस जातक के जन्म लग्न से पंचम और नवम भावों में पाप ग्रह हों और उन दोनों पर किसी भी शुभ ग्रह की दृष्टि नहीं हो, उसकी मृत्यु बंधन से होती है।
जिस जातक के जन्मकाल में किसी पाप ग्रह से युत चंद्र कन्या राशि में स्थित हो, उसकी मृत्यु उसके घर की किसी स्त्री के कारण होती है।
जिस जातक के जन्म लग्न से चतुर्थ भाव में सूर्य या मंगल और दशम में शनि हो, उसकी मृत्यु चाकू से होती है।
यदि दशम भाव में क्षीण चंद्र, नवम में मंगल, लग्न में शनि और पंचम में सूर्य हो तो जातक की मृत्यु अग्नि, धुआं, बंधन या काष्ठादि के प्रहार के कारण होती है।
जिस जातक के जन्म लग्न से चतुर्थ भाव में मंगल, सप्तम में सूर्य और दशम में शनि स्थित हांे उसकी मृत्यु शस्त्र या अग्नि दुर्घटना से होती है।
जिस जातक के जन्म लग्न से दशम भाव में सूर्य और चतुर्थ में मंगल स्थित हो उसकी मृत्यु सवारी से गिरने से या वाहन दुर्घटना में होती है।
यदि लग्न से सप्तम भाव में मंगल और लग्न में शनि, सूर्य एवं चंद्र हों उसकी मृत्यु मशीन आदि से होती है।
यदि मंगल, शनि और चंद्र क्रम से तुला, मेष और मकर या कुंभ में स्थित हों तो जातक की मृत्यु विष्ठा में गिरने से होती है।
मंगल और सूर्य सप्तम भाव में, शनि अष्टम में और क्षीण चंद्र में स्थित हो उसकी मृत्यु पक्षी के कारण होती है।
यदि लग्न में सूर्य, पंचम में मंगल, अष्टम में शनि और नवम में क्षीण चंद्र हो तो जातक की मृत्यु पर्वत के शिखर या दीवार से गिरने अथवा वज्रपात से होती है।
सूर्य, शनि, चंद्र और मंगल लग्न से अष्टमस्थ या त्रिकोणस्थ हों तो वज्र या शूल के कारण अथवा दीवार से टकराकर या मोटर दुर्घटना से जातक की मृत्यु होती है।
चंद्र लग्न में, गुरु द्वादश भाव में हो, कोई पाप ग्रह चतुर्थ में और सूर्य अष्टम में निर्बल हो तो जातक की मृत्यु किसी दुर्घटना से होती है।
यदि दशम भाव का स्वामी नवांशपति शनि से युत होकर भाव 6, 8 या 12 में स्थित हो तो जातक की मृत्यु विष भक्षण से होती है।
यदि चंद्र या गुरु जल राशि (कर्क, वृश्चिक या मीन) में अष्टम भाव में स्थित हो और साथ में राहु हो तथा उसे पाप ग्रह देखता हो तो सर्पदंश से मृत्यु होती है।
यदि लग्न में शनि, सप्तम में राहु और क्षीण चंद्र तथा कन्या में शुक्र हो तो जातक की शस्त्राघात से मृत्यु होती है।
यदि अष्टम भाव तथा अष्टमेश से सूर्य, मंगल और केतु की युति हो अथवा दोनों पर उक्त तीनों ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक की मृत्यु अग्नि दुर्घटना से होती है।
यदि शनि और चंद्र भाव 4, 6, 8 या 12 में हांे तथा अष्टमेश अष्टम भाव में दो पाप ग्रहों से घिरा हो तो जातक की मृत्यु नदी या समुद्र में डूबने से होती है।
लग्नेश, अष्टमेश और सप्तमेश यदि एक साथ बैठे हों तो जातक की मृत्यु स्त्री के साथ होती है।
यदि कर्क या सिंह राशिस्थ चंद सप्तम या अष्टम भाव में हो और राहु से युत हो तो मृत्यु पशु के आक्रमण के कारण होती है।
दशम भाव में सूर्य और चतुर्थ में मंगल स्थित हो तो वाहन के टकराने से मृत्यु होती है। अष्टमेश एवं द्वादशेश में भाव परिवर्तन हो तथा इन पर मंगल की दृष्टि हो तो जातक की अकाल मृत्यु होती है। षष्ठ, अष्टम अथवा द्वादश भाव में चंद्र, शनि एवं राहु हों तो जातक की मृत्यु अस्वाभाविक तरीके से होती है।
लग्नेश एवं अष्टमेश बलहीन हों तथा मंगल षष्ठेश के साथ हो तो जातक की मृत्यु कष्टदायक होती है।
चंद्र, मंगल एवं शनि अष्टमस्थ हों तो मृत्यु शस्त्र से होती है। षष्ठ भाव में लग्नेश एवं अष्टमेश हों तथा षष्ठेश मंगल से दृष्ट हो तो जातक की मृत्यु शत्रु द्वारा या शस्त्राघात से होती है।
लग्नेश और अष्टमेश अष्टम भाव में हों तथा पाप ग्रहों से युत दृष्ट हों तो जातक की मृत्यु प्रायः दुर्घटना के कारण होती है।
चतुर्थेश, षष्ठेश एवं अष्टमेश में संबंध हो तो जातक की मृत्यु वाहन दुर्घटना में होती है। अष्टमस्थ केतु 25 वें वर्ष में भयंकर कष्ट अर्थात् मृत्युतुल्य कष्ट देता है।
यदि अष्टम भाव मेचंद्र, मंगल, और शनि हों तो जातक की मृत्यु हथियार से होती है।
यदि द्वादश भाव में मंगल और अष्टम भाव में शनि हो तो भी जातक की मृत्यु हथियार द्वारा होती है।
यदि षष्ठ भाव में मंगल हो तो भी जातक की मृत्यु हथियार से होती है। यदि राहु चतुर्थेश के साथ षष्ठ भाव में हो तो मृत्यु डकैती या चोरी के समय उग्र आवेग के कारण होती है।
यदि चंद्र मेष या वृश्चिक राशि में पापकर्तरी योग में हो तो जातक जलने से या हथियार के प्रहार से मृत्यु को प्राप्त होता है।
यदि अष्टम भाव में चंद्र, दशम में मंगल, चतुर्थ में शनि और लग्न में सूर्य हो तो मृत्यु कुंद वस्तु से होती है।
यदि सप्तम भाव में मंगल और लग्न में चंद्र तथा शनि हों तो मृत्यु संताप के ।वचार गोष्ठी कारण होती है।
यदि लग्नेश और अष्टमेश कमजोर हों और मंगल षष्ठेश से युत हो तो मृत्यु युद्ध में होती है।
यदि नवांश लग्न से सप्तमेश, शनि से युत हो या भाव 6, 8 या 12 में हो तो मृत्यु जहर खाने से होती है।
यदि चंद्र और शनि अष्टम भाव में हांे और मंगल चतुर्थ में हो या सूर्य सप्तम में अथवा चंद और बुध षष्ठ भाव में हांे तो जातक की मृत्यु जहर खाने से होती है।
यदि शुक्र मेष राशि में, सूर्य लग्न में और चंद्र सप्तम भाव में अशुभ ग्रह से युत हो तो स्त्री के कारण मृत्यु होती है।
यदि लग्न स्थित मीन राशि में सूर्य, चंद्र और अशुभ ग्रह हों तथा, अष्टम भाव में भी अशुभ ग्रह हों तो दुष्ट स्त्री के कारण मृत्यु होती है।
विभिन्न दुर्घटना योग:
लग्नेश और अष्टमेश दोनों अष्टम में हांे। अष्टमेश पर लाभेश की दृष्टि हो (क्योंकि लाभेश षष्ठ से षष्ठम भाव का स्वामी होता है)।
द्वितीयेश, चतुर्थेश और षष्ठेश का परस्पर संबंध हो। मंगल, शनि और राहु भाव 2, 4 अथवा 6 में हों। तृतीयेश क्रूर हो तो परिवार के किसी सदस्य से तथा चतुर्थेश क्रूर हो तो जनता से आघात होता है। अष्टमेश पर मंगल का प्रभाव हो, तो जातक गोली का शिकार होता है। अगर शनि की दृष्टि अष्टमेश पर हो और लग्नेश भी वहीं हो तो गाड़ी, जीप, मोटर या ट्राॅली से दुर्घटना हो सकती है।
बीमारी के कारण मृत्यु योग:-
जिस जातक के जन्मकाल में शनि कर्क में एवं चंद्र मकर में बैठा हो अर्थात् देानों ही ग्रहों में राशि परिवर्तन हो, उसकी मृत्यु जलोदर रोग से या जल में डूबने से होती है।
यदि कन्या राशि में चंद्र दो पाप ग्रहों के मध्य स्थित हो तो जातक की मृत्यु रक्त विकार या क्षय रोग से होती है।
यदि शनि द्वितीय भाव में और मंगल दशम में हों तो मृत्यु शरीर में कीड़े पड़ने से होती है।
जिस जातक के जन्मकाल में क्षीण चंद्र बलवान मंगल से दृष्ट हो और शनि लग्न से अष्टम भाव में स्थित हो तो उसकी मृत्यु गुप्त रोग या शरीर में कीड़े पड़ने से या शस्त्र से या अग्नि से होती है।
अष्टम भाव में पाप ग्रह स्थित हो तो मृत्यु अत्यंत कष्टकारी होती है। इसी भाव में शुभ ग्रह स्थित हो और उस पर बली शनि की दृष्टि हो तो गुप्त रोग या नेत्ररोग की पीड़ा से मृत्यु होती है। क्षीण चंद्र अष्टमस्थ हो और उस पर बली शनि की दृष्टि हो तो इस स्थिति में भी उक्त रोगों से मृत्यु होती है।
यदि अष्टम भाव में शनि एवं राहु हांे तो मृत्यु पुराने रोग के कारण होती है। यदि अष्टम भाव में चंद्र हो और साथ में मंगल, शनि या राहु हो तो जातक की मृत्यु मिरगी से होती है।
यदि अष्टम भाव में मंगल हो और उस पर बली शनि की दृष्टि हो तो मृत्यु सर्जरी या गुप्त रोग अथवा आंख की बीमारी के कारण होती है।
यदि बुध और शुक्र अष्टम भाव में हांे तो जातक की मृत्यु नींद में होती है।
यदि मंगल लग्नेश हो (यदि मंगल नवांशेश हो) और लग्न में सूर्य और राहु तथा सिंह राशि में बुध और क्षीण चंद्र स्थित हों तो जातक की मृत्यु पेट के आपरेशन के कारण होती है।
जब लग्नेश या सप्तमेश, द्वितीयेश और चतुर्थेश से युत हो तो अपच के कारण मृत्यु होती है। यदि बुध सिंह राशि में अशुभ ग्रह से दृष्ट हो तो जातक की मृत्यु बुखार से होती है। यदि अष्टमस्थ शुक्र अशुभ ग्रह से दृष्ट हो तो मृत्यु गठिया या मधुमेह के कारण होती है।
यदि बृहस्पति अष्टम भाव में जलीय राशि में हो तो मृत्यु फेफड़े की बीमारी के कारण होती है।
यदि राहु अष्टम भाव में अशुभ ग्रह से दृष्ट हो तो मृत्यु चेचक, घाव, सांप के काटने, गिरने या पिŸा दोष से मृत्यु होती है।
यदि मंगल षष्ठ भाव में सूर्य से दृष्ट हो तो मृत्यु हैजे से होती है। यदि मंगल और शनि अष्टम भाव में स्थित हों तो धमनी में खराबी के कारण मृत्यु होती है। नवम भाव में बुध और शुक्र हों तो हृदय रोग से मृत्यु होती है। यदि चंद्र कन्या राशि में अशुभ ग्रहों के घेरे में हो तो मृत्यु रक्त की कमी के कारण होती है।

मृत्यु कैसे होगी......
अष्टमेश जिस नक्षत्र का होगा उस का स्वामी = जीव
जीव जिस नक्षत्र में होगा उस का स्वामी= शरीर
1.जीव यदि शरीर से दुर्बल तो मृत्यु समय अल्पकाल तक बीमारी और
अगर दोनों के बलवत्ता में अत्यधिक फर्क है तो बीमारी काल अत्यधिक अलप होगा ।
2. जीव यदि शरीर से अधिक बलवान तो मृत्यु पूर्व दीर्घ बीमारी....
3 .जीव और शरीर एक से बलवान (मरण दुख कम) या दुर्बल (शारीरिक कष्ट अधिक) हो तो बिन बीमारी = अकस्मक मृत्यु ....
अष्टम , अष्टमेश से शरीर का कौन सा हिस्सा रोग ग्रस्त  या जख्मी होगा बताता है ।