Friday, November 3, 2017

आपकी किस्मत में सरकारी नौकरी है या नहीं, जानने का यह है केवल एकमात्र उपाय

आपकी किस्मत में सरकारी नौकरी है या नहीं, जानने का यह है केवल एकमात्र उपाय *
*जीवन में सुख, शान्ति, धन, संपत्ति, संतान, ऐश्वर्य और राजा के समान समस्त सुख-सुविधाएं प्राप्त करने की अभिलाषा प्रत्येक मनुष्य की होती है, इसके लिए वह कोशिश भी करता है लेकिन कई बार अथक परिश्रम के बावजूद अपेक्षित लाभ नहीं मिलता। वहीं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें उक्त सभी सुख-सुविधाएं बिना विशेष प्रयास के अपने आप ही हासिल हो जाते हैं। किसी मनुष्य के जीवन में राज योग है अथवा नहीं, इस बात की जानकारी उसकी जन्म कुंडली से हो सकती है। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि राज योग का अर्थ राजा बनने से नहीं है, बल्कि इसके द्वारा मान-सम्मान, यश, पद, प्रतिष्ठा, अर्थ लाभ, तरक्की और जीवन के लिए जरूरी सुख-सुविधाएं आसानी से उपलब्ध होने का विश्लेषण किया जाता है।*
*जिस जन्म कुंडली में तीन या चार ग्रह अपने उच्च या मूल त्रिकोण में बली हों तो जातक राजनीति में प्रभावशाली उच्च पद प्राप्त करता है। कुंडली में पांच या छह ग्रहों के उच्च या मूल त्रिकोण में होने से जातक निर्धन परिवार में जन्म लेने के बाद भी राज्य सुख भोगता है। पाप ग्रहों के उच्च या मूल त्रिकोण में होने पर भी जातक शासन से सम्मान हासिल करता है। अगर कुंडली में सभी ग्रह बली तथा अपने उच्च के हों तथा उन पर मित्र ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक की राजनीति में रूचि रहती है। इसी तरह अपने उच्च त्रिकोण अथवा स्व राशि में बैठा हुआ कोई भी ग्रह अगर चंद्रमा को देखता है तो ऐसा जातक राजनीति में सफलता प्राप्त करता है।*
*अगर किसी जातक की कुंडली में मेष या कन्या लग्न में चंद्रमा, ग्यारहवें भाव में शुक्र व गुरु, मंगल, शनि और बुध ग्रह अपनी-अपनी राशि में स्थित हों तो ऐसा जातक राजा के समान सुख-सुविधाएं भोगता है और जीवन में उसे अभावों का सामना भी नहीं करना पड़ता है जन्म कुंडली में मकर लग्न में शनि, मीन राशि में चंद्रमा, मिथुन राशि में मंगल, कन्या राशि में बुध तथा धनु राशि में गुरु स्थित हों तो उच्च राजयोग होने से जातक प्रभावशाली शासनाधिकारी होता है।*
*लग्न में शनि और सातवें भाव में गुरु होने के साथ-साथ अगर गुरु पर शुक्र की दृष्टि भी हो तो ऐसा जातक उत्तम नेतृत्व क्षमता वाला होता है।*
*कुंडली में सभी ग्रह नवें अथवा ग्यारहवें भाव में बैठे हों ऐसी कुंडली चक्र योग वाली होती है। इसके अलावा कुंडली में एक राशि के अंतर से छह राशियों में सभी ग्रह स्थित हों तो कुंडली कलश योग वाली होती है। इस प्रकार कुंडली के जातक राजनीति में उच्च पद प्राप्त करते हैं।*
*कुंडली में वृष राशि में स्थित चन्द्रमा पर गुरु की दृष्टि होने से जातक को राजनीति में विशेष स्थान हासिल होता है। इसी तरह तुला राशि में शुक्र, मेष राशि में मंगल और कर्क राशि में गुरु बैठे हों जातक जीवन में यथोचित मान-सम्मान, यश, पद और अन्य लाभ प्राप्त करता है।

कुण्डली से जाने व्यवसाय में सफलता

कुण्डली से जाने व्यवसाय में सफलता
*व्यवसाय में कैसी स्थिति रहेगी इस विषय का आंकलन ज्योतिष द्वारा किया जा सकता है. ग्रहों की किस प्रकार की दृष्टि, युति या स्थान परिवर्तन कैसा हो रहा है, इन सभी तथ्यों के आधार पर कारोबार में सफलता-असफलता एवं लाभ हानि को ज्ञात किया जा सकता है.*
*जन्म कुण्डली के अनुसार व्यक्ति में कार्यनिष्ठा का भाव देखने के लिये दशम घर से शनि का संबन्ध देखा जाता है.जातक की कुण्डली के आधार पर इस बात का पता लगाया जा सकता है कि वह कैरियर के क्षेत्र में कौन सी लाईन पकडेगा. कई व्यक्ति जीवन में दूसरों के अधीन रहकर कार्य करते हैं अर्थात नौकरी से अपनी आजीविका प्राप्त करते हैं तो कुछ व्यक्ति स्वतंत्र रुप से कार्य करना पसन्द करते हैं.*
*कुण्डली में व्यापार करने के लिए योग मौजूद होते हैं. यह योग निम्नलिखित हैं.चन्द्रमा, गुरु तथा शुक्र परस्पर दो या बारह भावों में स्थित हों तो व्यक्ति स्वयं के व्यवसाय से जीविकोपार्जन करता है.*
*यदि चन्द्र कुण्डली में शुभ ग्रह केन्द्र में हो तो जातक बिजनेस से धन कमाता है.कुण्डली में बुध, राहु या शनि से दृष्ट अथवा युति है तो व्यक्ति स्वतंत्र रुप से व्यवसाय करने की चाह रखता है. लेकिन शनि कुण्डली में बली होकर बुध को दृष्ट कर रहा है तो व्यक्ति नौकरी करता है.चन्द्र कुण्डली से गुरु तृतीय भाव में स्थित हो तथा शुक्र लाभ भाव में स्थित हो तो व्यक्ति अपना स्वयं का व्यवसाय कर सकता है.*
*कुण्डली में सप्तम भाव का स्वामी यदि धन भाव में स्थित है और बुध सप्तम भाव में स्थित हो व्यक्ति बिजनेस कर सकता है.कुण्डली में बुध तथा शुक्र द्वितीय भाव अथवा सप्तम भाव में स्थित हों और शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तब जातक व्यापार की ओर झुकाव रख सकता है.बुध को बिजनेस का कारक ग्रह माना जाता है. बुध कुण्डली में यदि सप्तम भाव में द्वितीयेश के साथ है तब जातक बिजनेस करता है.*
*दूसरे भाव का स्वामी शुभ ग्रह की राशि में स्थित हो और बुध या सप्तमेश उसे देख रहें हों तब व्यक्ति व्यापार करता है.यदि गुरु की द्वितीय भाव के स्वामी पर दृष्टि हो तो व्यक्ति व्यापार कर सकता है.उच्च के बुध पर द्वितीयेश की दृष्टि होने पर जातक व्यापार करने में रूचि रखता है.*
*यदि लग्नेश तथा दशमेश की परस्पर एक दूसरे पर दृष्टि हो, युति या दोनों का स्थान परिवर्तन हो रहा हो तब व्यक्ति बिजनेस कर सकता है.दशम भाव पर शुभ ग्रहों की दृष्टि होने से व्यापार करता है. उसे बिजनेस में धन लाभ होता है.*
*दशम भाव में बुध की स्थिति से व्यक्ति व्यापारी बनता है.कुण्डली में आत्मकारक ग्रह के नवाँश में शनि स्थित है तब व्यक्ति व्यापार में समृद्धि पाता है.सप्तम भाव से द्वादश भाव तक या दशम भाव से तृतीय भाव तक पाँच या पाँच से अधिक ग्रह स्थित हैं तब व्यक्ति स्वतंत्र व्यापार करता है.दशम भाव का स्वामी केन्द्र या त्रिकोण भाव में स्थित है तब भी व्यक्ति स्वतंत्र रुप से व्यापार कर सकता है.*
* व्यवसाय में सफलता संबंधी अन्य योग *
*मंगल और चतुर्थ भाव का स्वामी केन्द्र या त्रिकोण भाव में स्थित हो या लाभ भाव में स्थित हो और दशमेश के साथ शुक्र तथा चन्द्रमा की युति हो तब व्यक्ति कृषि तथा पशुपालन से धन प्राप्त करता है.*
*कुण्डली के नवम भाव में बुध, शुक्र तथा शनि स्थित है तब व्यक्ति कृषि कार्य से धन प्राप्त करता है.कुण्डली में सूर्य ग्रह से लेकर शनि ग्रह तक सभी ग्रह परस्पर त्रिकोण भाव में स्थित हैं, तब जातक कृषि से संबंधित कार्यों से अपनी आजीविका कमा सकता है.गुरु अष्टम भाव में स्थित हो और पाप ग्रह केन्द्र में हों और किसी भी शुभ ग्रह का संबंध इनसे नहीं हो तो व्यक्ति माँस - मछली आदि का व्यापार करता है.बुध या शुक्र दशम भाव में दशमेश का नवाँशपति होकर स्थित हो तो व्यक्ति कपडे का व्यवसाय कर सकता है.*
*लग्न तथा सप्तम भाव में सभी ग्रह स्थित हो तब शकट योग बनता है और व्यक्ति ट्राँसपोर्ट से या लकडी के सामान के व्यापार से धनोपार्जन करता है.राहु-केतु को छोड़कर कुण्डली में सातों ग्रह किन्हीं चार भावों में स्थित है तो व्यक्ति भूमि अर्थात कृषि कार्य से लाभ पाता है.कुण्डली में चन्द्रमा या शुक्र की युति लग्नेश से हो जातक लेखक, कवि या पत्रकार बन सकता है.मंगल तथा सूर्य के दशम भाव में स्थित होने के कारण जातक अपनी कार्य कुशलता के आधार पर एक अच्छा कारीगर बनता है और धन पाता है.चन्द्रमा, बुध के नवाँश में स्थित हो और सूर्य से दृष्ट हो तब व्यक्ति अभिनय के क्षेत्र में सफलता हासिल करता है.*
*दशम भाव में चन्द्रमा तथा राहु की युति व्यक्ति को कूटनीतिज्ञ बनाती है.कुण्डली में दशम भाव में मंगल स्थित हो या मंगल का दशम भाव के स्वामी के साथ दृष्टि या युति संबंध हो तब व्यक्ति कुशल प्रशासक बनता है या सेना में अधिकारी का पद प्राप्त कर सकता है।

द्वितीय भाव में चंद्र का फल


द्वितीय भाव में चंद्र का फल
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यदि द्वितीय भाव मे चंद्र अपनी उच्च राशि मे स्थित हो तो जातक मणि, मोती आदि बहुमूल्य रत्नों के कोष से युक्त होता है।

यदि द्वितीय भाव मे चंद्र अपने उच्च नवमांश मे स्थित हो तो ऐसे जातक के पास सोना-चांदी से युक्त कोष होता है।

यदि द्वितीय भाव मे चंद्र षडवर्ग शुद्ध हो तो जातक विविध प्रकार के धन कोष से युक्त होता है।

यदि द्वितीय भाव मे चंद्र अपनी नीच राशी मे स्थित हो जातक अवांछित कार्यो में अपना धन खर्च करके धन कोष (बचत या संचित राशि) नष्ट कर देता है।

यदि नीच नवमांश में स्थित चंद्र द्वितीय भाव मे हो तो जातक की खर्च करने की क्षमता नही होती वह संचित धन से रहित होता है।

यही चंद्र यदि पाप ग्रहों के वर्ग में गया हो तो जातक को आजीवन धन सम्बंधित भय बना रहता है।

यदि द्वितीय भाव मे चंद्र अपने मित्र ग्रह की राशि मे स्थित हो तो ऐसे जातक के बेटे धनी होते है।

यदि द्वितीय भाव मे चंद्र अपने मित्र ग्रह के नवमांश मे स्थित हो तो जातक खेती बाड़ी से धन कमाने वाला होता है।

यदि द्वितीय भाव मे चंद्र वर्गोत्तम नवमांश में स्थित हो तो जातक मित्रो के धन से सुख भोगता है।

यदि द्वितीय भाव मे चंद्र शत्रु राशि मे स्थित हो तो जातक चोरी करके धन कमाता है।

यदि शत्रुग्रह के नवमांश में स्थित हो तो जातक विविध कुकर्म करके धन कमाता है।

यही चंद्र अपनी मूल त्रिकोण राशि मे स्थित हो तो जातक की पत्नी धन कमाने वाली होती है वह पत्नी के धन को भोगता है।

*जन्मपूर्व योनि विचार

*जन्मपूर्व योनि विचार*
1- जिस व्यक्ति की कुंडली में चार या इससे अधिक ग्रह उच्च राशि के अथवा स्वराशि के हों तो उस व्यक्ति ने उत्तम योनि भोगकर यहां जन्म लिया है, ऐसा ज्योतिषियों का मानना है।
2- लग्न में उच्च राशि का चंद्रमा हो तो ऐसा व्यक्ति पूर्वजन्म में योग्य वणिक था, ऐसा मानना चाहिए।
3- लग्नस्थ गुरु इस बात का सूचक है कि जन्म लेने वाला पूर्वजन्म में वेदपाठी ब्राह्मण था। यदि जन्मकुंडली में कहीं भी उच्च का गुरु होकर लग्न को देख रहा हो तो बालक पूर्वजन्म में धर्मात्मा, सद्गुणी एवं विवेकशील साधु अथवा तपस्वी था, ऐसा मानना चाहिए।
4- यदि जन्म कुंडली में सूर्य छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो अथवा तुला राशि का हो तो व्यक्ति पूर्वजन्म में भ्रष्ट जीवन व्यतीत करना वाला था, ऐसा मानना चाहिए।
5- लग्न या सप्तम भाव में यदि शुक्र हो तो जातक पूर्वजन्म में राजा अथवा सेठ था व जीवन के सभी सुख भोगने वाला था, ऐसा समझना चाहिए।
6- लग्न, एकादश, सप्तम या चौथे भाव में शनि इस बात का सूचक है कि व्यक्ति पूर्वजन्म में शुद्र परिवार से संबंधित था एवं पापपूर्ण कार्यों में लिप्त था।
7- यदि लग्न या सप्तम भाव में राहु हो तो व्यक्ति की पूर्व मृत्यु स्वभाविक रूप से नहीं हुई, ऐसा ज्योतिषियों का मत है।
8- चार या इससे अधिक ग्रह जन्म कुंडली में नीच राशि के हों तो ऐसे व्यक्ति ने पूर्वजन्म में निश्चय ही आत्महत्या की होगी, ऐसा मानना चाहिए।
9- कुंडली में स्थित लग्नस्थ बुध स्पष्ट करता है कि व्यक्ति पूर्वजन्म में वणिक पुत्र था एवं विविध क्लेशों से ग्रस्त रहता था।
10- सप्तम भाव, छठे भाव या दशम भाव में मंगल की उपस्थिति यह स्पष्ट करती है कि यह व्यक्ति पूर्वजन्म में क्रोधी स्वभाव का था तथा कई लोग इससे पीडि़त रहते थे।
11- गुरु शुभ ग्रहों से दृष्ट हो या पंचम या नवम भाव में हो तो जातक पूर्वजन्म में संन्यासी था, ऐसा मानना चाहिए।
12- कुंडली के ग्यारहवे भाव में सूर्य, पांचवे में गुरु तथा बारहवें में शुक्र इस बात का सूचक है कि यह व्यक्ति पूर्वजन्म में धर्मात्मा प्रवृत्ति का तथा लोगों की मदद करने वाला था, ऐसा ज्योतिषियों का मानना है।

*मृत्यु उपरांत गति विचार*
मृत्यु के बाद आत्मा की क्या गति होगी या वह पुन: किस रूप में जन्म लेगी, इसके बारे में भी जन्म कुंडली देखकर जाना जा सकता है। आगे इसी से संबंधित कुछ प्रमाणिक योग बताए जा रहे हैं-
1- कुंडली में कहीं पर भी यदि कर्क राशि में गुरु स्थित हो तो जातक मृत्यु के बाद उत्तम कुल में जन्म लेता है।
2- लग्न में उच्च राशि का चंद्रमा हो तथा कोई पापग्रह उसे न देखते हों तो ऐसे व्यक्ति को मृत्यु के बाद सद्गति प्राप्त होती है।
3- अष्टमस्थ राहु जातक को पुण्यात्मा बना देता है तथा मरने के बाद वह राजकुल में जन्म लेता है, ऐसा विद्वानों का कथन है।
4- अष्टम भाव पर मंगल की दृष्टि हो तथा लग्नस्थ मंगल पर नीच शनि की दृष्टि हो तो जातक रौरव नरक भोगता है।
5- अष्टमस्थ शुक्र पर गुरु की दृष्टि हो तो जातक मृत्यु के बाद वैश्य कुल में जन्म लेता है।
6- अष्टम भाव पर मंगल और शनि, इन दोनों ग्रहों की पूर्ण दृष्टि हो तो जातक की अकाल मृत्यु होती है।
7- अष्टम भाव पर शुभ अथवा अशुभ किसी भी प्रकार के ग्रह की दृष्टि न हो और न अष्टम भाव में कोई ग्रह स्थित हो तो जातक ब्रह्मलोक प्राप्त करता है।
8- लग्न में गुरु-चंद्र, चतुर्थ भाव में तुला का शनि एवं सप्तम भाव में मकर राशि का मंगल हो तो जातक जीवन में कीर्ति अर्जित करता हुआ मृत्यु उपरांत ब्रह्मलीन होता है अर्थात उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
9- लग्न में उच्च का गुरु चंद्र को पूर्ण दृष्टि से देख रहा हो एवं अष्टम स्थान ग्रहों से रिक्त हो तो जातक जीवन में सैकड़ों धार्मिक कार्य करता है तथा प्रबल पुण्यात्मा एवं मृत्यु के बाद सद्गति प्राप्त करता है।
10- अष्टम भाव को शनि देख रहा हो तथा अष्टम भाव में मकर या कुंभ राशि हो तो जातक योगिराज पद प्राप्त करता है तथा मृत्यु के बाद विष्णु लोक प्राप्त करता है।
11- यदि जन्म कुंडली में चार ग्रह उच्च के हों तो जातक निश्चय ही श्रेष्ठ मृत्यु का वरण करता है।
12- ग्यारहवे भाव में सूर्य-बुध हों, नवम भाव में शनि तथा अष्टम भाव में राहु हो तो जातक मृत्यु के पश्चात मोक्ष प्राप्त करता है।

*विशेष योग*
1- बारहवां भाव शनि, राहु या केतु से युक्त हो फिर अष्टमेश (कुंडली के आठवें भाव का स्वामी) से युक्त हो अथवा षष्ठेश (छठे भाव का स्वामी) से दृष्ट हो तो मरने के बाद अनेक नरक भोगने पड़ेंगे, ऐसा समझना चाहिए।
2- गुरु लग्न में हो, शुक्र सप्तम भाव में हो, कन्या राशि का चंद्रमा हो एवं धनु लग्न में मेष का नवांश हो तो जातक मृत्यु के बाद परमपद प्राप्त करता है।
3- अष्टम भाव को गुरु, शुक्र और चंद्र, ये तीनों ग्रह देखते हों तो जातक मृत्यु के बाद श्रीकृष्ण के चरणों में स्थान प्राप्त करता है, ऐसा ज्योतिषियों का मत है।
*उक्त पोस्ट से संबंधित जानकारी  पुस्तक से कॉपी पेस्ट पोस्ट हैl*

कुण्डली में कमजोर हो शुक्र तो होती हैं ये समस्याएं ये उपाय होते हैं सहायक -

कुण्डली में कमजोर हो शुक्र तो होती हैं ये समस्याएं ये उपाय होते हैं सहायक -

ज्योतिष में वैसे तो नव-ग्रहों में से प्रत्येक ग्रह का अपना अलग महत्व होता है प्रत्येक ग्रह हमारे जीवन के भिन्न भिन्न घटकों को नियंत्रित करता है परंतु नौ ग्रहों में से शुक्र ग्रह का हमारे जीवन में बड़ा ही विशेष महत्व है क्योंकि शुक्र हमारे जीवन के बहुत विशेष घटकों को नियंत्रित करता है, शुक्र को ज्योतिष में सौम्य और शुभ ग्रह माना गया है ज्योतिष में वर्णित में बारह राशियों में से वृष और तुला राशि पर शुक्र का आधिपत्य है मीन राशि में शुक्र उच्चस्थ तथा कन्या में नीचस्थ होता है शनि, बुध और राहु शुक्र के मित्र ग्रह हैं।

ज्योतिष में शुक्र को धन, सुख संपत्ति, घर, जायदात, भौतिक संसाधन, ऐश्वर्य, विलासिता, वैभव, आर्थिक उन्नति और भोग का कारक माना गया है, शुक्र ही हमारे जीवन के सभी भौतिक संसाधनों और समृद्धि को नियंत्रित करता है इसलिए आज के समय शुक्र सर्वाधिक महत्व रखने वाला ग्रह माना जाता है जिन लोगों की कुंडली में शुक्र बली स्थिति में होता है उन्हें जीवन में अच्छी आर्थिक स्थिति, संपत्ति ऐश्वर्य और वैभव की प्राप्ति होती है और यदि कुंडली में शुक्र कमजोर और पीड़ित स्थिति में हो तो ऐसे में जीवन में आर्थिक विकास नहीं हो पाता जीवन में सुख संसाधनों और धन से जुडी समस्यायें उत्पन्न होती हैं और व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से संघर्षपूर्ण जीवन व्यतीत करता है, जन्मकुंडली में बने अन्य शुभ योगों के होने से व्यक्ति की आर्थिक स्थिति अच्छी तो हो सकती हैं पर जीवन में ऐश्वर्य और वैभव केवल बली शुक्र से ही प्राप्त होता है ,यदि कुंडली में शुक्र पीड़ित हो तो ऐसे में व्यक्ति समान्य आर्थिक स्थिति को ही प्राप्त कर पाता है जीवन में वैभव नहीं आ पाता, और यदि कुंडली में शुक्र अति पीड़ित स्थिति में हो तो ऐसे में कुंडली में बने राजयोग भी निष्फल हो जाते हैं इसलिए कुंडली में राजयोग भी तभी अपना पूरा परिणाम देता है………………

यदि कुण्डली में शुक्र नीच राशि (कन्या) में हो, अष्टम भाव में हो, केतु या मंगल के साथ होने से पीड़ित हो, सूर्य के साथ समान अंशों पर होने से अस्त हो, 0 या 30 डिग्री पर होने से कमजोर हो या अन्य किसी प्रकार पीड़ित हो तो ऐसे में व्यक्ति आर्थिक स्थिति में स्थिरता नहीं आ पाती धन को लेकर अव्यवस्था बनी रहती है और व्यक्ति का आर्थिक पक्ष उसकी महत्वकांशा के अनुरूप नहीं हो पाता, कुंडली में शुक्र पीड़ित होने पर व्यक्ति को संपत्ति की प्राप्ति के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है तथा पीड़ित शुक्र के कारण जीवन में वैभव नहीं आ पाता। .......... पुरुषों के लिए शुक्र ही उनके वैवाहिक जीवन का कारक ग्रह होता है अतः पुरुषों की कुंडली में शुक्र पीड़ित होने पर विवाह में विलम्ब होना तथा वैवाहिक जीवन में संघर्ष की स्थिति बनी रहती है तथा पीड़ित शुक्र पत्नी से वैचारिक मतभेद और पत्नी के स्वास्थ में समस्याओं का भी कारण बनता है   …….

कुण्डली में शुक्र का पीड़ित या कमजोर होना स्वास्थ की दृष्टि से भी समस्याएं उत्पन्न करता है। ...... कुंडली में यदि शुक्र नीच राशि (कन्या) में हो छटे, आठवे भाव में हो पूर्णअस्त हो अष्टमेश या षष्टेश से पीड़ित हो तो ऐसे में व्यक्ति को किडनी संबंधी समस्याएं, यूरिन रिलेटिड प्रॉब्लम, डायबटीज, थाइरोइड, हार्मोन्स से सम्बंधित समस्याएं आदि स्वास्थ समस्याएं उत्पन्न होती हैं पुरुषों की कुण्डली में शुक्र अति पीड़ित होने पर स्पर्म काउंट की समस्या तथा स्त्री की कुंडली में शुक्र अति पीड़ित होना  मासिक धर्म (मेंस्ट्रुएशन) से सम्बंधित समायें भी उत्पन्न करता है। ......
कुंडली में शुक्र पीड़ित होने पर यदि उपरोक्त समस्याएं उत्पन्न हो रही हों तो

निम्नलिखित उपाय लाभदायक होंगे। .........

1. ॐ शुम शुक्राय नमः का नियमित जाप करें।

2. प्रत्येक शुक्रवार को चावल की खीर गाय को खिलाएं।

3. श्री सूक्त का प्रतिदिन पाठ करें।

4. किसी योग्य ज्योतिषी से परामर्श लेकर यदि आपके लिए शुभ हो तो "ओपल" रत्न धारण कर सकते हैं।

नक्षत्र एवं संबंधित दान----

नक्षत्र एवं संबंधित दान----

अश्विनी नक्षत्र में कांस्य पात्र में घी भरकर दान करने से रोग मुक्ति होती है। 

भरणी नक्षत्र में ब्राह्मण को तिल एवं धेनु का दान करने से सद्गतिप्राप्त होती है व कष्ट कम होता है। 

कृतिका नक्षत्र में घी और खीर से युक्त भोजन ब्राह्मण व साधु संतो को दान करने से उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। 

रोहिणी नक्षत्र में घी मिश्रित अन्न को ब्राह्मण व साधुजन को दान करना चाहिए।

मृगशिरा नक्षत्र में ब्राह्मणों को दूध दान करने से किसी प्रकार का ऋण नहीं रहता व व्याधि से दूर रहते हैं। 

आद्र्रा नक्षत्र में तिल मिश्रित खिचड़ी का दान करने से सभी प्रकार के संकटों से मुक्त हो जाते है। 

पुनर्वसु नक्षत्र में घी के बने मालपुए ब्राह्मण को दान करने से रोग का निदान होता है। 

पुष्य नक्षत्र में इच्छा अनुसार स्वर्ण दान करने से सभी कष्ट दूर हो जाते है। 

अश्लेषा नक्षत्र में इच्छा अनुसार चांदी दान करने से रोग से शांति व निर्भय हो जाता है।

- मघा नक्षत्र में तिल से भरे घड़ों का दान करने से रोग से निदान व धन की प्राप्ति भी होती है। 

पूर्वाफाल्गुनी में ब्राह्मण को घोड़ी का दान करने से सद्गति मिलती है।

उत्तराफाल्गुनी में स्वर्ण कमल ब्राह्मण को दान देने से बाधाएं दूर हो जाती हैं व रोग से शांति मिलती है। 

हस्त नक्षत्र में रोग से निदान पाने के लिए ब्राह्मण को चांदी दान करना व जल सेवा लाभदायक होती है। 

चित्रा नक्षत्र में ताम्रपत्र, घी का दान शुभ होता है। 

स्वाति नक्षत्र में जो पदार्थ स्वयं का प्रिय हो, उनका दान करने से शांति मिलती हैऔर अंत में सद्गति मिलती है।

विशाखा नक्षत्र में वस्त्रादि के साथ अपना कुछ धन ब्राह्मण को देने से सारे कष्ट दूर होते हैं साथही आपके पितृगण भी प्रसन्न होते है। 

अनुराधा नक्षत्र में यथाशक्ति कम्बल ओढ़ने तथा पहनने वाले वस्त्र ब्राह्मण को दान किये जायें तो आयु में वृद्धि होती है। 

ज्येष्ठा नक्षत्र में मूली दान देने से अभीष्ट गति प्राप्त होती है।

मूल नक्षत्र में कंद, मूल, फल, आदि देने से पितृ संतुष्ट हो जाते हैं, स्वास्थ्य मेंलाभ व उत्तम गति मिलती है।

पूर्वाषाढ़ा में कुलीन और वेदवेत्ता ब्राह्मण को दधिपात्र देने से कष्ट दूर हो जाते हंै।

उत्तराषाढ़ा में घी और मधु का दान ब्राह्मण को देने से रोग में शांति होती है।

श्रवण नक्षत्र में पुस्तक दान करना लाभदायक। 

धनिष्ठा में दो गायों का दान करने से रोग में शांति व जन्मां तक सुख की प्राप्ति भी होतीहै।

शतभिषा नक्षत्र में अगरु व चन्दन दान करने से शरीर के कष्ट दूर हो जाते हैं। 

पूर्वाभाद्रपद में साबुत उड़द के दान से सभी कष्ट से आराम व सुख प्राप्तहोता है। 

उत्तराभाद्रपद में सुन्दर वस्त्रों के दान से पितृ संतुष्ट होते हैं और उसे सद्गति प्राप्त होती है। 

रेवती में कांस्य के पात्र दान करना लाभदायक होता है।

राशि, नक्षत्र और रोगोपचार


राशि, नक्षत्र और रोगोपचार
आपकी राशि, नक्षत्र और रोगोपचार

          भारतीय ज्योतिश में राशि एवं नक्षत्र का अपना विषेश महत्त्व है। किसी  राशि एवं नक्षत्र के आधार पर रोगों का वर्णन प्राचीन आचार्यो ने किया है। बारह  राशियों अर्थात् सत्ताईष नक्षत्रों को अंगों में स्थापित करने पर मानव  शरीर की आकृति बनती है। नवग्रहों में चन्द्र सर्वाधिक गतिशिल ग्रह है, इसलिये इसका मानव षरीर पर भी सर्वाधिक प्रभाव मान सकते हैं। हमारे षरीर का लगभग 70 प्रतिषत भाग जल है। ज्योतिश में जल का स्वामी चन्द्र को ही माना है, इसलिये भारतीय ज्योतिश में चन्द्र को महत्वपूर्ण स्थान देकर उसका जन्म समय जिस राशि या नक्षत्र में गोचर होता है, वही हमारी जन्म राशि या जन्म नक्षत्र माना जाता है। इस राषि या नक्षत्र के आधार पर जातक को कौन रोग हो सकता है एवं इस रोग से बचाव का सुलभ उपाय क्या होगा, इसकी जानकारी इस अध्याय में दी जा रही है। नक्षत्र के आराध्य अथवा उसके प्रतिनिधि वृक्ष की जडी धारण करके भी रोग का प्रकोप कम किया जा सकता है:-
      1 अष्विनी:- वराह ने अष्विनी नक्ष्त्र का घुटने पर अधिकार माना है।  इसके पीडित होने पर बुखार भी   रहता है। यदि आपको घुटने से सम्बन्धित पीडा हो, बुखार आ रहा हो तो आप अपामार्ग की जड धारण करें। इससे आपको रोग की पीडा कम होगी।
      2   भरणी:- भरणी नक्षत्र का अधिकार सिर पर माना गया है। इसके पीडित होने पर पेचिष रोग होता        है। इस प्रकार की पीडा पर अगस्त्य की जड धारण करें।
3 कृतिका:- कृतिका नक्षत्र का अधिकार कमर पर है। इसके पीडित होने पर कब्ज एवं अपच की समस्या होती है। आपका जन्म नक्षत्र यदि कृतिका हो तथा कमर दर्द, कब्ज, अपच की षिकायत हो तो कपास की जड धारण करें।
4 रोहिणी:- रोहिणी नक्षत्र का अधिकार टांगों पर होता है। इसके पीडित होने पर सिरदर्द, प्रलाप, बवासीर जैसे रोग होते है। इस प्रकार की पीडा होने पर अपामार्ग या आंवले की जड धारण करें।
5 मृगशिरा:- मृगशिरा नक्षत्र का अधिकार आँखों पर है। इसके पीडित होने पर रक्त विकार, अपच,एलर्जी जैसे रोग होते है। ऐसी स्थिति में खैर की जड धारण करें।
6 आद्र्रा:- आद्र्रा नक्षत्र का अधिकार बालों पर है। इसके पीडित होने पर मंदाग्नि, वायु विकार तथा आकस्मिक रोग होते हैं। इससे प्रभावित जातकों को ष्यामा तुलसी या पीपल की जड धारण करनी चाहिये।
7 पुनर्वसु:- पुनर्वसु नक्षत्र का अधिकार अंगुलियों पर है। इसके पीडित होने पर हैंजा, सिरदर्द, यकृत रोग होते है। इन जातकों को आक की जड धारण करनी चाहिये। ष्वेतार्क जडी मिले तो सर्वोत्तम हैं।
8 पुश्य:- पुश्य नक्षत्र का अधिकार मुख पर है। स्वादहीनता, उन्माद, ज्वर इसके कारण होते है। इनसे पीडित जातकों को कुषा अथवा बिछुआ की जड धारण करनी चाहिये।
9 आष्लेशा:- आष्लेशा नक्षत्र का अधिकार नाखून पर है। इसके कारण रक्ताल्पता एवं चर्म रोग होते है। इनसे पीडित जातको को पटोल की जड धारण करनी चाहिये।
10 मघा:- मघा नक्षत्र का अधिकार वाणी पर है। वाणी सम्बन्धित दोश, दमा आदि होने पर जातक भृगराज या वट वृक्ष की जड धारण करें।
11 पूर्वाफाल्गुनी:- पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र का अधिकार गुप्तांग पर है। गुप्त रोग, आँतों में सूजन, कब्ज, षरीर दर्द होने पर कटेली की जड धारण करें।
12 उत्तराफाल्गुनी:- उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का अधिकार गुदा, लिंग, गर्भाषय पर होता है। इसलिये इनसे सम्बन्धित रोग मधुमेह होने पर पटोल जड धारण करें।
13 हस्त:- हस्त नक्षत्र का अधिकार हाथ पर होता है। हाथ में पीडा होने या षरीर में जलदोश अर्थात् जल की कमी, अतिसार होने पर चमेली या जावित्री मूल धारण करें।
14 चित्रा:- चित्रा नक्षत्र का अधिकार माथे पर होता है। सिर सम्बन्धित पीडा, गुर्दे में विकार, दुर्घटना होने पर अनंतमूल या बेल धारण करें।
15 स्वाति:- स्वाति नक्षत्र का अधिकार दाँतों पर है, इसलिये दंत रोग, नेत्र पीडा तथा दीर्घकालीन रोग होने पर अर्जुन  मूल धारण करें।
16 विषाखा:- विषाखा नक्षत्र का अधिकार भुजा पर है। भुजा में विकार, कर्ण पीडा, एपेण्डिसाइटिस होने पर गुंजा मूल धारण करें।
17 अनुराधा:- अनुराधा नक्षत्र का अधिकार हृदय पर है। हृदय पीडा, नाक के रोग, षरीर दर्द होने पर नागकेषर की जड धारण करें।
18 ज्येश्ठा:- ज्येश्ठा नक्षत्र का अधिकार जीभ व दाँतों पर होता है। इसलिये इनसे सम्बन्धित पीडा होने पर अपामार्ग की जड धारण करें।
19 मूल:- मूल नक्षत्र का अधिकार पैर पर है। इसलिये पैरों में पीडा, टी.बी. होने पर मदार की जड धारण करें।
20 पूर्वाशाढा:- पूर्वाशाढा नक्षत्र का अधिकार जांघ, कूल्हों पर होता है। जाँघ एवं कूल्हों में पीडा,  कार्टिलेज की समस्या, पथरी रोग होने पर कपास की जड धारण करें।
21 उतराशाढा:-उतराशाढा नक्षत्र का अधिकार भी जाँघ एवं कूल्हो पर माना है। हड्डी में दर्द, फे्रक्चर हो वमन आदि होने पर कपास या कटहल की जड धारण करें।
22 श्रवण:- श्रवण नक्षत्र का अधिकार कान पर होता है। इसलिये कर्ण रोग, स्वादहीनता होने पर अपामार्ग की जड धारण करें।
23 धनिश्ठा:- धनिश्ठा नक्षत्र का अधिकार कमर तथा रीढ की हड्डी पर होता है। कमर दर्द, गठिया आदि होने पर भृंगराज की जड धारण करें।
24 षतभिशा:- षतभिशा नक्षत्र का अधिकार ठोडी पर होता है। पित्ताधिक्य, गठिया रोग होने पर कलंब की जड धारण करें।
25 पूर्वाभाद्रपद:- पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र का अधिकार छाती, फेफडों पर होता हैं। ष्वास सम्बन्धी रोग होने पर आम की जड धारण करें।
26  उतराभाद्रपद:- उतराभाद्रपद नक्षत्र का अधिकार अस्थि पिंजर पर होता है। हांफने की समस्या होने पर पीपल की जड धारण करें।
27  रेवती:- रेवती नक्षत्र का अधिकार बगल पर होता है। बगल में फोडे-फुंसी या अन्य विकार होने पर महुवे की जड धारण करें।
          जब किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य पीडा हो तो आपको अपने जन्म नक्षत्र के प्रतिनिधि वृक्ष की जडी धारण करनी चाहिये। यदि आपको अपना जन्म नक्षत्र पता नहीं है तो आपको किस प्रकार की स्वास्थ्य पीडा है तथा वह षरीर के किस अंग से सम्बन्धित है अथवा वह रोग किसके अन्तर्गत आ रहा है, उससे सम्बन्धित वृक्ष की जडी ऊपर बताये अनुसार धारण करें तो आपको अवष्य अनुकूल फल की प्राप्ति होगी।
      आपकी राषि के अनुसार जडी धारण करके भी रोग के प्रकोप को कम कर सकते हैं। आप अपनी राषि अपने नाम के प्रथम अक्षर से जान सकते हैं। इस आधार पर:-
 मेश राषि वालों को पित्त विकार, खाज-खुजली, दुर्घटना, मूत्रकृच्छ की समस्या होती है। मेश राषि का स्वामी ग्रह मंगल है। इन्हें अनंतमूल की जड धारण करनी चाहिये।
व्ृाष्चिक  राषि वालों को भी उपरोक्त रोगों की ही समस्या होती हैं। इन्हें भी अनंतमूल की जड धारण करनी चाहिये
 व्ृाशभ एवं तुला राषि वालों को गुप्त रोग, धातु रोग, षोथ आदि होते हैं। यदि आपकी राषि वृशभ अथवा तुला हो तो आपको सरपोंखा की जड धारण करनी चाहिये।
 मिथुन एवं कन्या राषि वालों को चर्म विकार, इंसुलिन की कमी, भ्रांति, स्मुति ह्नास, निमोनिया, त्रिदोश ज्वर होता है। इन्हें विधारा की जड धारण करनी चाहिये।
 कर्क राषि वालों को सर्दी-जुकाम, जलोदर, निद्रा, टी.बी. आदि होते हैं। इन्हें खिरनी की जड धारण करनी चाहिये।
 सिंह राषि वालों को उदर रोग, हृदय रोग, ज्वर, पित्त सम्बन्धित विकार होते हैं। इन्हें अर्क मूल धारण करनी चाहिये। बेल की जड भी धारण कर सकते हैं।
 धनु एवं मीन राषि वालों को अस्थमा, एपेण्डिसाइटिस, यकृत रोग, स्थूलता आदि रोग होते हैं। इन्हें केले की जड धारण करनी चाहिये।
 मकर एवं कुंभ राषि वालों को वायु विकार, आंत्र वक्रता, पक्षाघात, दुर्बलता आदि रोग होते हैं। इन्हें बिछुआ की जड धारण करनी चाहिये।
  चन्द्र का कारकत्व जल हैं। इसलिये चन्द्र निर्बल होने पर जल चिकित्सा लाभप्रद सिद्ध होती हैं। हमारे षरीर में लगभग 70 प्रतिषत जल होता है। इसलिये षरीर की अधिकांष क्रियाओं में जल की सहभागिता होती है। जल चिकित्सा से जो वास्तविक रोग है, उसका उपचार तो होता ही है इसके साथ अन्य अंगों की षुद्धि भी होती है। इस कारण षरीर में भविश्य में रोग होने की सम्भावना भी कम होती है। जल एक अच्छा विलायक है। इसमें विभिन्न तत्त्व एवं पदार्थ आसानी से घुल जाते हैं जिससे रोग का उपचार आसानी से हो जाता है। जल चिकित्सा में वाश्प् स्नान, वमन,एनीमा, गीली पट्टी, तैरना, उशाःपान एवं अनेक प्रकार की चिकित्सायें हैं। दैनिक क्रियाओं में भी हम जल का उपयोग करते रहते हैं। लेकिन जब चन्द्र कमजोर एवं पीडित होकर उसकी दषा आये तभी जल के अनुपात में षारीरिक असंतुलन बनता है। हमारे षरीर में स्थित गुर्दे जल तत्त्वों का षुद्धिकरण करते हैं। जल की अधिकता होने पर पसीने के रूप में जल बाहर निकलता है जिससे षरीर का तापमान कम हो जाता है। इसलिये जल सेवन अधिक करने पर जोर दिया जाता है ताकि षरीर स्वस्थ रहे अर्थात् चन्द्र की कमजोरी स्वास्थ्य में बाधक न बने। इस प्रकार हमारे लिये चन्द्र महत्त्वपूर्ण ग्रह बन जाता है।