Sunday, October 1, 2017

पंचम भाव का परिचय-

पंचम भाव का परिचय-
पंचम भाव एक त्रिकोण भाव है| कुंडली के तीन त्रिकोण स्थान, अर्थात प्रथम, पंचम व नवम स्थान में से पंचम स्थान बहुत ही महत्वपूर्ण है| यह भाव संचित पूर्व-पुण्य, अर्थात पूर्व जन्म के कर्मों के संग्रह को दर्शाता है| इसलिए इसका एक नाम पूर्व पुण्य भाव भी है| व्यक्ति के पूर्वजन्म के कर्म उसके वर्तमान जीवन को प्रभावित करते हैं, इसलिए पंचम भाव सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाव है|

व्यक्ति की संतान संख्या का अनुमान भी पंचम भाव से लगाया जा सकता है| अतः यह पुत्र भाव अथवा संतान का स्थान भी है| पंचम भाव यह भी दर्शाता है कि मनुष्य की आत्मा अध्यात्मिक क्षेत्र में कितनी उन्नत है| केवल यही नही, यह इसके अतिरिक्त यह भी बताता है कि व्यक्ति मंत्र ज्ञान से अपना अध्यात्मिक विकास करने में कितना समर्थ है| अतः इसे मंत्र भाव कहना भी सर्वथा उपयुक्त है| इस भाव के विचारणीय विषयों में ज्ञानार्जन व संतान दोनों ही मानव जीवन की अनिवार्य आवश्यकताएं हैं| शास्त्रों के अनुसार बिना पुत्र के मनुष्य की सद्गति नही होती| वर्तमान युग में यही बात ज्ञान के विषय में भी कही जा सकती है| यदि यह कहा जाए कि बिना ज्ञान के मनुष्य की दुर्गति होती है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी|

 इसलिए एक व्यक्ति अपने जीवन में कितना ज्ञानार्जन कर सकता है यह भी इस भाव से पता चलता है| पंचम स्थान से संतान, बुद्धि, स्मरण शक्ति, विश्लेषण क्षमता, ज्ञानार्जन करने व किसी भी विषय को समझने की क्षमता, इष्टदेव की आराधना, प्रेम विवाह, राजयोग, मंत्र-तंत्र में रूचि व सफलता, माता का धन, सट्टे व लॉटरी से आकस्मिक धन लाभ, प्रियतम या प्रियतमा, उदर, पाचन संस्थान, यकृत, गर्भाशय आदि का विचार किया जाता है|

 लग्न, पंचम व नवम भाव एक-दूसरे के साथ त्रिकोण बनाते हैं| त्रिकोण के रूप में पंचम स्थान एक शुभ भाव है| इस भाव का स्वामी होने पर भावेश के रूप में प्रत्येक ग्रह का शुभ फल बढ़ जाता है| इस भाव का कारक ग्रह गुरु है|
इस भाव से निम्नलिखित विषयों का विचार किया जाता है-
ज्ञान- व्यक्ति कितना बुद्धिमान है एवं उसकी ग्राह्य शक्ति कितनी प्रखर है इसका बोध इस स्थान पर पड़ने वाले प्रभाव से निर्धारित हो सकता है| यदि पंचम भाव, पंचमेश व बुध पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो व्यक्ति अत्यंत ज्ञानी व कुशाग्र बुद्धि का हो सकता है| इसके विपरीत इन घटकों पर पाप प्रभाव व्यक्ति को जड़ मति बनाकर मनोरोग दे सकता है|

संतान- इस भाव से यह ज्ञात हो सकता है कि मनुष्य को संतान की प्राप्ति होगी अथवा नहीं| संतान कब होगी, कितनी होगी, उनका लिंग क्या होगा आदि बातों का पता भी इस भाव का विश्लेषण करने से पता चल सकता है| इस भाव पर शुभ प्रभाव संतान के स्वास्थ्य व प्रगति के लिए शुभ होता है| यदि यह भाव पीड़ित हो तो संतान को कष्ट संभव है|

पितृ भाव- पंचम स्थान नवम भाव से नवम है इसलिए यह पितृ स्थान भी है अर्थात पिता संबंधी विषयों के बारे में जानने के लिए नवम भाव के अतिरिक्त पंचम भाव की सहायता भी लेनी चाहिए|

पितृदोष- इस भाव पर क्रूर व पाप ग्रहों का प्रभाव पितृ दोष का सूचक है जिसका अर्थ है कि व्यक्ति से किसी न किसी प्रकार के पाप कर्म पूर्वजन्म में अवश्य हुए थे जिसके कारण उसे पितृ प्रकोप का भागी बनना पड़ा है|
शास्त्रीय ज्ञान- यह भाव धर्म त्रिकोण के अंतर्गत आता है इसलिए यह व्यक्ति की शास्त्रों के पवित्र ज्ञान को ग्रहण करने की क्षमता को भी बताता है| क्योंकि यह धर्म स्थान अर्थात नवम भाव से नवम भी है|

अध्ययन में अभिरुचि- यह भाव मूलतः ज्ञान का स्थान है, अतः किसी भी प्रकार के ज्ञान को अर्जित करने इस स्थान से संबंधित है परंतु यह कहना ज्यादा उचित होगा कि मनुष्य की रूचि जिस प्रकार के शास्त्र अध्ययन में होगी यह भाव उसमें सहायता करेगा|

मातृ अरिष्ट- यह भाव चतुर्थ भाव से द्वितीय स्थान(मारक भाव) स्थान है, इसलिए यह माता को अरिष्ट प्रदान करता है| इस भाव के स्वामी की दशा-अंतर्दशा में माता को स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती हैं|

मंत्र सिद्धि- यह भाव मनुष्य की तंत्र मंत्र में रूचि को भी दर्शाता है| व्यक्ति को मंत्रों की सिद्धि होगी भी या नहीं और वह उसके लिए कितनी फलदायी रहेगी आदि बातों का पता भी इसी भाव से चलता है|

तीर्थ यात्राएं- यह भाव नवम स्थान से नवम है इसलिए इसका नवम भाव(धर्म स्थान) से घनिष्ठ संबंध है| नवम भाव हमारी तीर्थ यात्राओं से भी संबंधित है इसी कारण पंचम भाव से भी तीर्थ यात्राओं का विचार किया जाता है| व्यक्ति कब और किस प्रयोजन से तीर्थ यात्रा करेगा आदि बातों का पता नवम भाव के अतिरिक्त इस भाव से भी चलता है|

इष्टदेव- पंचम भाव का संबंध हमारे इष्टदेव से भी होता है| मनुष्य को किस देवी अथवा देवता की पूजा करनी चाहिए और वह उसके लिए कितनी फलदायी रहेगी आदि बातों की जानकारी भी इस भाव  से पता चलती है|

प्रेम विवाह- पचम स्थान प्रियतम अथवा प्रियतमा का है| जब इस भाव का संबंध सप्तम भाव व सप्तमेश से हो जाता है तो व्यक्ति परंपरागत विवाह न करके प्रेम विवाह करने के लिए प्रेरित होता है|

मनोरंजन व सट्टा-लॉटरी- पंचम भाव मनोरंजन का भी है| मनोरंजन के विभिन्न साधन जैसे सिनेमा, क्लब, जुआघर, सट्टे-लॉटरी आदि का विचार इसी भाव से करते हैं यदि बुध और शुक्र चतुर्थेश व पंचमेश होकर एक-दूसरे से संबंध बनाए तो व्यक्ति की रूचि एक्टिंग, सिनेमा, क्लब, सट्टे व लॉटरी आदि में होती है|

जाने प्रेम विवाह के कुछ खास योग

जाने प्रेम विवाह के कुछ खास योग
प्रेम विवाह , सुनते ही मनको अति प्रसन्नता होती है, युवा वर्ग इसे बहुत ही प्रेक्टिकल लेते है, जो इस ज़माने में हर युवा वर्ग का सपना और आकर्षण है , किन्तु इसका का मतलब परंपरागत लोगो के लिए उल्टा है वे इसे कुछ झंजत समझते है , सब अपनी अपनी सोच है कोई अपनी जगह गलत नहीं , अपनी पसंद से विवाह करना करना ये व्यक्तिगत सोच पर हे और कुंडली में कुछ बनते योगो पर निर्धारितहोता है -
आओ जाने कुछ कुंडली में बन्ने वाले योगो के बारे में जो प्रेम विवाह के लिए व्यक्ति को आकर्षित करते है! जो इस प्रकार है -,
* किसी भी जातक की कुंडली में पंचम भाव से प्रणय संबंधों का पता चलता है जबकि सप्तम भाव विवाह से संबंधित है। शुक्र सप्तम भाव का कारक ग्रह है अतः जब पंचमेश-सप्तमेश एवं शुक्र का शुभ संयोग होता है तो पति-पत्नी दोनों में घनिष्ठ स्नेह संबंध होता है। ऐसी ग्रह स्थिति में प्रेम विवाह भी संभव है।
* शुक्र सप्तमेश से संबंधित होकर पंचम भाव में बैठा हो तो भी प्रेम विवाह संभव होता है।
* पंचमेश व सप्तमेश की युति या राशि परिवर्तन हो तो भी प्रेम विवाह संभव होता है।
* मंगल, शुक्र का परस्पर दृष्टि प्रेम विवाह का परिचायक है।
* पंचम या सप्तम भाव में सूर्य एवं हर्षल की युति होने पर भी प्रेम विवाह हो सकता है।
इस प्रकार के योग यदि जन्म कुंडली में होते हैं, तब प्रेम विवाह के योग बनते हैं। यह जरूरी नहीं है कि प्रेम विवाह मतलब जाति से बाहर विवाह होना।

कुंडली के कुछ विशेष योग से बनती है दो विवाह की स्थिति

कुंडली के कुछ विशेष योग से बनती है दो विवाह की स्थिति

विवाह जीवन के सभी 16 संस्कारों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है. ऐसा माना जाता है कि जोडिय़ां ऊपर यानि भगवान के यहां से ही निर्धारित होती है. लगभग हर इंसान का विवाह अवश्य ही होता है लेकिन कुछ लोगों के एक से अधिक विवाह भी होते हैं. एक से अधिक विवाह होना अशुभ माना जाता है. ज्योतिष के अनुसार कुंडली में कुछ विशेष योग बनते हैं जिनसे मालुम हो जाता है यदि किसी व्यक्ति के एक से अधिक विवाह होने के योग हैं.
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली में सप्तम भाव या सातवां स्थान विवाह के कारक भाव है. इसी स्थान से विवाह संबंधी जानकारी प्राप्त की जा सकती है. इस स्थान पर ग्रह होना या किसी ग्रह की दृष्टि होना वैवाहिक जीवन को प्रभावित करता है.
इसी सप्तम भाव का जो भी स्वामी ग्रह हो वह इस स्थान पर हो तथा इसके साथ कोई पाप ग्रह स्थित हो. इसके अलावा अष्टम भाव यानि आठवें घर का स्वामी ग्रह अष्टम भाव में ही हो और इसके घर में भी कोई पाप ग्रह स्थित हो.
ऐसी स्थिति यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में बन रही है तो उस इंसान के एक से अधिक स्त्रियों से संबंध रहने की संभावनाएं. अधिकांश परिस्थितियों में इस प्रकार होने पर व्यक्ति के दो विवाह हो सकते हैं. कुंडली के अन्य ग्रहों की स्थिति से इस प्रकार के बुरे योग समाप्त भी हो सकते हैं. व्यक्ति का पहला विवाह संबंध किसी भी कारण से टूट सकता है और वह निश्चित ही दूसरा विवाह करेगा.
उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति की मेष लग्न की कुंडली है और उसकी कुंडली में सप्तम भाव यानि तुला राशि में इस राशि का स्वामी ग्रह शुक्र इसी स्थान पर हो और इसके साथ कोई पाप ग्रह (मंगल, शनि, राहु या केतु) स्थित हो. इसी कुंडली में अष्टम भाव वृश्चिक राशि है, इस राशि का स्वामी ग्रह मंगल है. मंगल यदि अष्टम भाव में है और इसके साथ भी कोई पाप ग्रह है तो निश्चित ही ऐसे इंसान के जीवन में एक से अधिक स्त्रियां आएंगी. ऐसे लोगों की दो शादियां होने की संभावनाएं होती हैं. ध्यान रहे कुंडली में सभी ग्रहों की स्थिति का अध्ययन भी आवश्यक है. अन्य ग्रहों की स्थिति से इस प्रकार के योग बदल भी सकते हैं.

कुंडली का फलकथन करने से पूर्व विचार करने योग्य बातें

कुंडली का फलकथन करने से पूर्व विचार करने योग्य बातें :-
1. किसी भी ग्रह की महादशा में उसी ग्रह की अन्तर्दशा अनुकूल फल नहीं देती।
2. योगकारक ग्रह की महादशा में पापी या मारक ग्रह की अन्तर्दशा आने पर प्रारंभ में शुभ फल तथा उत्तरार्द्ध में अशुभ फल देने लगता है।
3. अकारक ग्रह की महादशा में कारक ग्रह की अन्तर्दशा आने पर प्रारंभ में अशुभ तथा उत्तरार्द्ध में शुभ फल की प्राप्ति होती है।
4. भाग्य स्थान का स्वामी यदि भाग्य भाव में बैठा हो और उस पर गुरु की दृष्टि हो तो ऐसा व्यक्ति प्रबल भाग्यशाली माना जाता है।
5. लग्न का स्वामी सूर्य के साथ बैठकर विशेष अनुकूल रहता है।
6. सूर्य के समीप निम्न अंशों तक जाने पर ग्रह अस्त हो जाते हैं, (चन्द्र-१२ अंश, मंगल-१७ अंश, बुध-१३ अंश, गुरु-११ अंश, शुक्र-९ अंश, शनि-१५ अंश) फलस्वरूप ऐसे ग्रहों का फल शून्य होता है। अस्त ग्रह जिन भावों के अधिपति होते हैं उन भावों का फल शून्य ही समझना चाहिए।
7. सूर्य उच्च का होकर यदि ग्यारहवें भाव में बैठा हो तो ऐसे व्यक्ति अत्यंत प्रभावशाली तथा पूर्ण प्रसिद्धि प्राप्त व्यक्तित्व होता है।
8. सूर्य और चन्द्र को छोड़कर यदि कोई ग्रह अपनी राशि में बैठा हो तो वह अपनी दूसरी राशि के प्रभाव को बहुत अधिक बढ़ा देता है।
9. किसी भी भाव में जो ग्रह बैठा है, इसकी अपेक्षा जो ग्रह उस भाव को देख रहा होता है, उसका प्रभाव ज़्यादा रहता है।
10. जिन भावों में शुभ ग्रह बैठे हों या जिन भावों पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो वे भाव शुभ फल देने में सहायक होते हैं।
11. एक ग्रह दो भावों का अधिपति होता है। ऐसी स्थिति में वह ग्रह अपनी दशा में लग्न से गिनने पर जो राशि पहले आएगी उसका फल वह पहले प्रदान करेगा।
12. दो केन्द्रों का स्वामी ग्रह यदि त्रिकोण के स्वामी के साथ बैठे हैं तो उसे केंद्रत्व दोष नहीं लगता और वह शुभ फल देने में सहायक हो जाता है। सामान्य नियमों के अनुसार यदि कोई ग्रह दो केंद्र भावों का स्वामी होता है तो वह अशुभ फल देने लग जाता है चाहे वह जन्म-कुंडली में करक ग्रह ही क्यों न हो।
13. अपने भाव से केन्द्र व त्रिकोण में पड़ा हुआ ग्रह शुभ होता है।
14. केंद्र के स्वामी तथा त्रिकोण के स्वामी के संबंध हो तो वे एक दूसरे की दशा में शुभ फल देते हैं। यदि संबंध न हो तो एक की महादशा में जब दूसरे की अंतर्दशा आती है तो अशुभ फल ही प्राप्त होता है।
15. वक्री होने पर ग्रह अधिक बलवान हो जाता है तथा वह ग्रह जन्म-कुंडली में जिस भाव का स्वामी है, उस भाव को विशेष फल प्रदान करता है।
16. यदि भावाधिपति उच्च, मूल त्रिकोणी, स्वक्षेत्री अथवा मित्रक्षेत्री हो तो शुभ फल करता है।
17. यदि केन्द्र का स्वामी त्रिकोण में बैठा हो या त्रिकोण केंद्र में हो तो वह ग्रह अत्यन्त ही श्रेष्ठ फल देने में समर्थ होता है। जन्म-कुंडली में पहला, पाँचवा तथा नवाँ भाव त्रिकोण स्थान कहलाते हैं। परन्तु कोई ग्रह त्रिकोण में बैठकर केंद्र के स्वामी के साथ संबंध स्थापित करता है तो वह न्यून योगकारक ही माना जाता है।
18. त्रिक स्थान (कुंडली के ३, ६, ११वे भाव को त्रिक स्थान कहते हैं) में यदि शुभ ग्रह बैठे हो तो त्रिक स्थान को शुभ फल देते हैं परन्तु स्वयं दूषित हो जाते हैं और अपनी शुभता खो देते हैं।
19. यदि त्रिक स्थान में पाप ग्रह बैठे हों तो त्रिक भावों को पापयुक्त बना देते हैं पर वे ग्रह स्वयं शुभ रहते हैं और अपनी दशा में शुभ फल देते हैं।
20. चाहे अशुभ या पाप ग्रह ही हो, पर यदि वह त्रिकोण भाव में या त्रिकोण भाव का स्वामी होता है तो उसमे शुभता आ जाती है।
21. एक ही त्रिकोण का स्वामी यदि दूसरे त्रिकोण भाव में बैठा हो तो उसकी शुभता समाप्त हो जाती है और वह विपरीत फल देते है। जैसे पंचम भाव का स्वामी नवम भाव में हो तो संतान से संबंधित परेशानी रहती है या संतान योग्य नहीं होती।
22. यदि एक ही ग्रह जन्म-कुंडली में दो केंद्रस्थानों का स्वामी हो तो शुभफलदायक नहीं रहता। जन्म-कुंडली में पहला, चौथा, सातवाँ तथा दसवां भाव केन्द्र स्थान कहलाते हैं।
23. शनि और राहु विछेदात्मक ग्रह हैं अतः ये दोनों ग्रह जिस भाव में भी होंगे संबंधित फल में विच्छेद करेंगे जैसे अगर ये ग्रह सप्तम भाव में हों तो पत्नी से विछेद रहता है। यदि पुत्र भाव में हों तो पुत्र-सुख में न्यूनता रहती है।
24. राहू या केतू जिस भाव में बैठते हैं उस भाव की राशि के स्वामी समान बन जाते हैं तथा जिस ग्रह के साथ बैठते हैं, उस ग्रह के गुण ग्रहण कर लेते हैं।
25. केतु जिस ग्रह के साथ बैठ जाता है उस ग्रह के प्रभाव को बहुत अधिक बड़ा देता है।
26. लग्न का स्वामी जिस भाव में भी बैठा होता है उस भाव को वह विशेष फल देता है तथा उस भाव की वृद्धि करता है।
27. लग्न से तीसरे स्थान पर पापी ग्रह शुभ प्रभाव करता है लेकिन शुभ ग्रह हो तो मध्यम फलमिलता है।
28. तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव में पापी ग्रहों का रहना शुभ माना जाता जाता है।
29. तीसरे भाव का स्वामी तीसरे में, छठे भाव का स्वामी छठे में या ग्यारहवें भाव का स्वामी ग्यारहवें भाव में बैठा हो तो ऐसे ग्रह पापी नहीं रहते अपितु शुभ फल देने लग जाते हैं।
30. चौथे भाव में यदि अकेला शनि हो तो उस व्यक्ति की वृद्धावस्था अत्यंत दुःखमय व्यतीत होती है।
31. यदि मंगल चौथे, सातवें , दसवें भाव में से किसी भी एक भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति का गृहस्थ जीवन दुःखमय होता है। पिता से कुछ भी सहायता नहीं मिल पाती और जीवन में भाग्यहीन बना रहता है।
32. यदि चौथे भाव का स्वामी पाँचवे भाव में हो और पाँचवें भाव का स्वामी चौथे भाव में हो तो विशेष फलदायक होता है। इसी प्रकार नवम भाव का स्वामी दशम भाव में बैठा हो तथा दशम भाव का स्वामी नवम भाव में बैठा हो तो विशेष अनुकूलता देने में समर्थ होता है।
33. अकेला गुरु यदि पंचम भाव में हो तो संतान से न्यून सुख प्राप्त होता है या प्रथम पुत्र से मतभेद रहते हैं।
34. जिस भाव की जो राशि होती है उस राशि के स्वामी ग्रह को उस भाव का अधिपति या भावेश कहा जाता है। छठे, आठवें और बारहवें भाव के स्वामी जिन भावों में रहते हैं, उनको बिगाड़ते हैं, किन्तु अपवाद रूप में यदि यह स्वगृही ग्रह हों तो अनिष्ट फल नहीं करते, क्योंकि स्वगृही ग्रह का फल शुभ होता है।
35. छठे भाव का स्वामी जिस भाव में भी बैठेगा, उस भाव में परेशानियाँ रहेगी। उदहारण के लिए छठे भाव का स्वामी यदि आय भाव में हो तो वह व्यक्ति जितना परिश्रम करेगा उतनी आय उसको प्राप्त नहीं सकेगी।
36.यदि सप्तम भाव में अकेला शुक्र हो तो उस व्यक्ति का गृहस्थ जीवन सुखमय नहीं रहता और पति-पत्नी में परस्पर अनबन बनी रहती है।
37. अष्टम भाव का स्वामी जहाँ भी बैठेगा उस भाव को कमजोर करेगा।
38. शनि यदि अष्टम भाव में हो तो उस व्यक्ति की आयु लम्बी होती है।
39. अष्टम भाव में प्रत्येक ग्रह कमजोर होता है परन्तु सूर्य या चन्द्रमा अष्टम भाव में हो तो कमजोर नहीं रहते।
40. आठवें और बारहवें भाव में सभी ग्रह अनिष्टप्रद होते हैं, लेकिन बारहवें घर में शुक्र इसका अपवाद है क्योंकि शुक्र भोग का ग्रह है बारहवां भाव भोग का स्थान है।
यदि शुक्र बारहवें भाव में हो तो ऐसा व्यक्ति अतुलनीय धनवान एवं प्रसिद्ध व्यक्ति होता है।
41. द्वादश भाव का स्वामी जिस भाव में भी बैठता है, उस भाव को हानि पहुँचाता है।
42. दशम भाव में सूर्य और मंगल स्वतः ही बलवान माने गए हैं, इसी प्रकार चतुर्थ भाव में चन्द्र और शुक्र, लग्न में बुध तथा गुरु और सप्तम भाव में शनि स्वतः ही बलवान हो जाते हैं तथा विशेष फल देने में सहायक होते हैं।
43.ग्यारहवें भाव में सभी ग्रह अच्छा फल करते हैं।
44. अपने स्वामी ग्रह से दृष्ट, युत या शुभ ग्रह से दृष्ट भाव बलवान होता है।
45. किस भाव का स्वामी कहाँ स्थित है तथा उस भाव के स्वामी का क्या फल है, यह भी देख लेना चाहिए।
यदि कोई ग्रह जिस राशि में है उसी नवमांश में भी हो तो वह वर्गोत्तम ग्रह कहलाता है और ऐसा ग्रह पूर्णतया बलवान माना जाता है तथा श्रेष्ठ फल देने में सहायक होता है।

धन प्राप्ति योग

धन प्राप्ति योग
आकस्मिक धन प्राप्ति से तात्पर्य है कि इनाम, भेंट, वसीयत, रेस-लॉटरी, भू-गर्भ धन, स्कॉलरशिप आदि से प्राप्त धन है। कुंडली में पंचम स्थान से इनाम, लॉटरी, स्कॉलरशिप आदि का निर्देश मिलता है, जबकि अष्टम भाव गुप्त भू-गर्भ, वसीयत, अनसोचा या अकल्पित धन दर्शाता है। धन संपत्ति प्रारब्ध में होती है, तब ही मनुष्य उसे प्राप्त कर सकता है। भाग्यशाली लोगों को ही बिना परिश्रम के अचानक धन प्राप्त होता है, इसलिए कुंडली में नवम भाग्य भाव त्रिकोण का भी विशेष महत्व है।
इस प्रकार अचानक आकस्मिक धन-संपत्ति प्राप्ति के लिए कुंडली में द्वितीय धनभाव, एकादश लाभभाव, पंचम प्रारब्ध एवं लक्ष्मी भाव, अष्टम गुप्तधन भाव तथा नवम भाग्य भाव एवं इनके अघिपति तथा इन भावों में स्थित ग्रहों के बलाबल के आधार पर संभव है। निम्न योगों में से अघिकतम योग वाली कुंडली आकस्मिक धन प्राप्त कराने में समर्थ पाई जाती है।
1. धनेश अष्टम भाव में तथा अष्टमेश धन भाव में अकस्मात धन दिलाता है।
2. लग्नेश धनभाव में तथा धनेश लग्न भाव में भी अचानक धन देता है।
3. द्वितीय भाव का अघिपति लाभ स्थान में और लग्नेश द्वितीय भाव में होता है, तो अकस्मात धन लाभ कराता है।
4. लाभ भाव में चंद्रम+मंगल युति व बुध पंचम भाव में स्थित होने पर अकस्मात धन लाभ होता है।
5. अष्टम भाव में शुक्र तथा चंद्र + मंगल कुंडली के किसी भी भाव में एक साथ होते हैं, तो जातक अकस्मात धन प्राप्त करता है।
6. भाग्यकारक गुरू यदि नवमेश होकर अष्टम भाव में है, तो जातक अकस्मात धनी बनता है।
7. द्वितीय एवं पंचम स्थान या इनके स्वामी युति, दृष्टि या परिवर्तन योग से यदि शुभ संबंध बनाते हैं, तो लॉटरी खुलती है।
8. कुंडली में धनभाव, पंचम भाव, एकादश भाव, नवम भाग्य भाव का किसी भी प्रकार से संबंध होता है, तो अकस्मात धन प्राप्त कराता है।
9. पंचम, नवम या एकादश भाव में राहु-केतु होते हैं, तो लॉटरी खुलती है, क्योंकि राहु अकल्पित और अचानक फल देता है।
10. षष्टम-अष्टम, अष्टम-नवम, एकादश-द्वादश स्थान के परिवर्तन योग आकस्मिक धन प्राप्त कराते हैं। दशा-अंतरदशा में अचानक धन प्राप्त कराते हैं।
11. अष्टम भाव स्थित धनेश जातक को जमीन में दबा हुआ, गुप्त धन प्राप्त कराता है या वसीयत द्वारा धन प्राप्त कराता है।
12. लग्नेश-धनेश के संबंध से पैतृक संपत्ति मिलती है।
13. लग्नेश-चतुर्थेश के संबंध से माता से संपत्ति प्राप्त होती है।
14. लग्नेश शुभग्रह होकर यदि धनभाव में स्थित हो, तो जातक खजाना प्राप्त कर सकता है।
15. अष्टम स्थान स्थित लाभेश अचानक धन दिलाता है।
16. कर्क या धनु राशि का गुरू नवम भाव गत होता है और मकर का मंगल यदि कुंडली में चंद्रमा के साथ दशम भाव में होता है, तो अकस्मात धन दिलाते हैं।
17. चंद्र-मंगल, पंचम भाव में हो और शुक्र की पंचम भाव पर दृष्टि होती है, तो जातक अचानक धन पाता है।
18. गुरू-चंद्र की युति कर्क राशि में द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, नवम या एकादश भाव में से किसी भी भाव में होती है, तो जातक अकस्मात धन पाता है। चंद्र से तृतीय, पंचम, दशम एवं एकादश भाव में शुभ ग्रह धन योग की रचना करते हैं।
19. धन-संपत्ति पूर्वार्जित सतकर्मो का स्थान पंचम भाव है तथा विगत जन्म के संचित कर्मो के अनुसार ही स्त्री-पुरूष, पुत्र, परिवार, धन-संपत्ति के रूप में आकर मिल जाते हैं और प्रारब्ध का निर्माण होता है।

अकस्मात धन प्राप्ति के योग


आज दूसरे भाव धन से संबंधित योगों को व्याख्या

अकस्मात धन प्राप्ति के योग👉 यदि धन भाव का स्वामी शनि 4-8 या 12 वें भाव मे हो तथा बुध सप्तम भाव मे स्वग्रही होकर बैठा हो तो अकस्मात धन प्राप्ति का योग बनता है।

अकस्मात दिवालिया योग👉 यदि धन भाव मे कर्क राशि का चंद्र हो तथा अष्टम भाव मे शनि स्वग्रही होकर स्थित हो तो परस्पर दशा अंतर्दशा में जातक का दिवालिया योग बनता है।

क्रमिक धन नाश योग👉 यदि बुध धन भाव का स्वामी होकर गुरु के साथ अष्टम भाव मे हो तो जातक पिता से अर्जित धन को नष्ट कर डालता है।

धन संग्रहक योग👉 यदि धन भाव का स्वामी मंगल हो और वह एकादश भाव मे बैठकर दूसरे भाव को देख रहा हो तो जातक धन का संग्रह करने वाला होता है। तथा अपनी बौद्धिक क्षमता से धन संचय करता है।

धन असंग्रहक योग👉 धन भाव का स्वामी गुरु स्वराशि होकर धन भाव मे हो और शुक्र द्वादश भाव मे हो तो जातक धन संग्रह नही कर पाता।

धन वृद्धि योग👉 द्वितीय भाव का स्वामी गुरु उच्च होकर नवम भाव मे हो तो धन वृद्धियोग बनता है। इस योग वाला व्यक्ति स्वयं धन संग्रह करता है और पैतृक संपत्ति का भी उपभोग करता है।

कोष वृद्धि योग👉 द्वितीय भाव का स्वामी सूर्य हो और लग्न में उच्च का गुरु हो तो कोष वृद्धि योग होता है। इस योग वाला व्यक्ति धनाढ्य होता हैं

लक्ष्मी योग👉 लग्नेश बलवान हो और नवम भाव का स्वामी स्वग्रही हो तो लक्ष्मी योग बनता है। ऐसे व्यक्ति के पेड़ अकूत संपत्ति होती है।

धन योग👉 लग्न से पांचवी राशि शुक्र की हो तथा शुक्र एवं शनि पांचवे अथवा ग्यारहवे भाव मे हो तो धन योग बनता है। ऐसे व्यक्ति जीवन मे पर्याप्त धन कमाते है।

श्री योग👉 लग्न से पांचवी राशि मिथुन या कन्या की हो तथा एकादश भाव मे मंगल व चंद्र हो तो श्री योग बनता है। इस योग वाला व्यक्ति विशेष धनवान होता है।

वित्त योग👉 लग्न से पांचवी राशि सिंह में सूर्य स्वग्रही होकर बैठा हो तथा चंद्र और गुरु ग्यारहवे भाव मे हो तो वित्त योग बनता है। ऐसे व्यक्ति सम्पन्न होते है।

अखंड धन योग👉 लग्न से पांचवी राशि धनु या मीन हो तथा एकादश भाव मे चंद्र व मंगल हो तो अखंड धन योग बनता है। ऐसे जातक निसंदेह अपार वैभव सम्पन्न होते है।

कमला योग👉 लग्न से पांचवी राशि मकर या कुम्भ हो तथा बुध व मंगल एकादश भाव मे हो तो कमला योग बनता है। ऐसे व्यक्ति को धन की कमी नही रहती है।

नक्षत्र से रोग विचार तथा उपाय

नक्षत्र से रोग विचार तथा उपाय

हमारे ज्योतिष शास्त्र में नक्षत्र के अनुसार रोगों का वर्णन किया गया है। व्यक्ति के कुंडली में नक्षत्र अनुसार रोगों का विवरण निम्नानुसार है। आपके कुंडली में नक्षत्र के अनुसार परिणाम आप देख सकते है।

अश्विनी नक्षत्र👉 जातक को वायुपीड़ा, ज्वर, मतिभ्रम आदि से कष्ट.
उपाय : दान पुण्य, दिन दुखियों की सेवा से लाभ होता है।

भरणी नक्षत्र👉 जातक को शीत के कारण कम्पन, ज्वर, देह पीड़ा से कष्ट, देह में दुर्बलता, आलस्य व कार्य क्षमता का अभाव।
उपाय : गरीबोंकी सेवा करे लाभ होगा।

कृतिका नक्षत्र👉 जातक आँखों सम्बंधित बीमारी, चक्कर आना, जलन, निद्रा भंग, गठिया घुटने का दर्द, ह्रदय रोग, घुस्सा आदि।
उपाय : मन्त्र जप, हवन से लाभ।

रोहिणी नक्षत्र👉 ज्वर, सिर या बगल में दर्द, चित्य में अधीरता।
उपाय : चिर चिटे की जड़ भुजा में बांधने से मन को शांति मिलती है।

मृगशिरा नक्षत्र👉 जातक को जुकाम, खांसी, नजला, से कष्ट।
उपाय : पूर्णिमा का व्रत करे लाभ होगा।

आद्रा नक्षत्र👉 जातक को अनिद्रा, सिर में चक्कर आना, अधासीरी का दर्द, पैर, पीठ में पीड़ा।
उपाय : भगवान शिव की आराधना करे, सोमवार का व्रत करे, पीपल की जड़ दाहिनी भुजा में बांधे लाभ होगा।

पुनर्वसु नक्षत्र👉 जातक सिर या कमर में दर्द से कष्ट।
उपाय: रविवार को पुष्य नक्षत्र में आक का पौधा की जड़ अपनी भुजा मर बांधने से लाभ होगा।

पुष्प नक्षत्र👉 जातक निरोगी व स्वस्थ होता है। कभी तीव्र ज्वर से दर्द परेशानी होती है, कुशा की जड़ भुजा में बांधने से तथा पुष्प नक्षत्र में दान पुण्य करने से लाभ होता है।

अश्लेश नक्षत्र👉 जातक का दुर्बल देह प्राय: रोग ग्रस्त बना रहता है, देह में सभी अंग में पीड़ा, विष प्रभाव या प्रदुषण के कारण कष्ट।
उपाय : नागपंचमी का पूजन करे, पटोल की जड़ बांधने से लाभ होता है।

मघा नक्षत्र👉 जातक को अर्धसीरी या अर्धांग पीड़ा, भुत पिचाश से बाधा।
उपाय : कुष्ठ रोगी की सेवा करे, गरीबोंको मिष्ठान खिलाये।

पूर्व फाल्गुनी👉 जातक को बुखार,खांसी, नजला, जुकाम, पसली चलना, वायु विकार से कष्ट।
उपाय : पटोल या आक की जड़ बाजु में बांधे, नवरात्रों में देवी माँ की उपासना करे।

उत्तर फाल्गुनी👉 जातक को ज्वर ताप, सिर व बगल में दर्द, कभी बदन में पीड़ा या जकडन।
उपाय : पटोल या आक की जड़ बाजु में बांधे, ब्राह्मण को भोजन कराये।

हस्त नक्षत्र👉 जातको पेट दर्द, पेट में अफारा, पसीने से दुर्गन्ध, बदन में वात पीड़ा आक या जावित्री की जड़ भुजा में बांधने से लाभ होगा।

चित्रा नक्षत्र👉 जातक जटिल या विषम रोगों से कष्ट पता है। रोग का कारण बहुधा समज पाना कठिन होता है। फोड़े फुंसी सुजन या चोट से कष्ट होता है।
उपाय : असंगध की जड़ भुजा में बांधने से लाभ होता है, तिल चावल जौ से हवन करे।

स्वाति नक्षत्र👉 वाट पीड़ा से कष्ट, पेट में गैस, गठिया, जकडन से कष्ट।
उपाय : गौ तथा ब्राह्मणों की सेवा करे, जावित्री की जड़ भुजा में बांधे।

विशाखा नक्षत्र👉 जातक को सर्वांग पीड़ा से दुःख, कभी फोड़े होने से पीड़ा।
उपाय : गूंजा की जड़ भुजा भुजा पर बांधना, सुगन्धित वास्तु से हवन करना लाभ दायक होता है।

अनुराधा नक्षत्र👉 जातक को ज्वर ताप, सिर दर्द, बदन दर्द, जलन, रोगों से कष्ट,
उपाय : चमेली, मोतिया, गुलाब की जड़ भुजा में बांधना से लाभ।

जेष्ठा नक्षत्र👉 जातक को पित्त बड़ने से कष्ट,देह में कम्पन, चित्त में व्याकुलता, एकाग्रता में कमी, कम में मन नहीं लगना।
उपाय : चिरचिटे की जड़ भुजा में बांधने से लाभ। ब्राह्मण को दूध से बनी मिठाई खिलाये।

मूल नक्षत्र👉 जातक को सन्निपात ज्वर, हाथ पैरों का ठंडा पड़ना, रक्तचाप मंद, पेट गले में दर्द अक्सर रोगग्रस्त रहना।
उपाय : 32 कुओं (नालों) के पानी से स्नान तथा दान पुण्य से लाभ होगा।

पूर्वाषाढ़ नक्षत्र👉 जातक को देह में कम्पन, सिर दर्द तथा सर्वांग में पीड़ा। सफ़ेद चन्दन का लेप, आवास कक्ष में सुगन्धित पुष्प से सजाये। कपास की जड़ भुजा में बांधने से लाभ।

उत्तराषाढ़ा नक्षत्र👉 जातक संधि वात, गठिया, वात शूल या कटी पीड़ा से कष्ट, कभी असहय वेदना।
उपाय : कपास की जड़ भुजा में बांधे, ब्राह्मणों को भोज कराये लाभ होगा।

श्रवन नक्षत्र👉 जातक अतिसार, दस्त, देह पीड़ा ज्वर से कष्ट, दाद, खाज खुजली जैसे चर्म रोग कुष्ठ, पित्त, मवाद बनना, संधि वात, क्षय रोग से पीड़ा।
उपाय : अपामार्ग की जड़ भुजा में बांधने से रोग का शमन होता है।

धनिष्ठा नक्षत्र👉 जातक मूत्र रोग, खुनी दस्त, पैर में चोट, सुखी खांसी, बलगम, अंग भंग, सुजन, फोड़े या लंगड़े पण से कष्ट।
उपाय : भगवान मारुती की आराधना करे ,गुड चने का दान करे।

शतभिषा नक्षत्र👉 जातक जलमय, सन्निपात, ज्वर, वातपीड़ा, बुखार से कष्ट। अनिंद्रा, छाती पर सुजन, ह्रदय की अनियमित धड़कन, पिंडली में दर्द से कष्ट।
उपाय :यज्ञ, हवन, दान, पुण्य तथा ब्राह्मणों को मिठाई खिलानेसे लाभ होगा।

पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र👉 जातक को उल्टी या वमन, देह पीड़ा, बैचेनी, ह्रदय रोग, टकने की सुजन, आंतो का रोग से कष्ट होता है।
उपाय : भृंगराज की जड़ भुजा में भुजा पर बांधे, तिल का दान करने से लाभ होता है।

उत्तराभाद्रपद नक्षत्र👉 जातक अतिसार, वातपीड़ा, पीलिया, गठिया, संधिवात, उदरवायु, पाव सुन्न पड़ना से कष्ट हो सकता है।
उपाय : पीपल की जड़ भुजा पर बांधने से तथा ब्राह्मणों को मिठाई खिलाये लाभ होगा।

रेवती नक्षत्र👉 जातक को ज्वर, वाट पीड़ा, मति भ्रम, उदार विकार, मादक द्रव्य सेवन से उत्पन्न रोग किडनी के रोग, बहरापन, या कण के रोग पाव की अस्थि, मासपेशी खिचाव से कष्ट।
उपाय : पीपल की जड़ भुजा में बांधे लाभ होगा।