Sunday, September 24, 2017

धनु लग्न

धनु लग्न
यह लग्न देव गुरु बृहस्पति का है यह एक अग्नितत्व लग्न है दो स्वभाव लग्न है इस लग्न में तपस्या है खुद को जलाना है ज्ञान की आग में , धनु लग्न में गुरु जहा लग्नेश होता है वहा मन का स्वामी भी होता है यह लोग विशाल मन के होते है इनका मन और तन दोनों बिलकुल साफ़ सुथरे होते है जैसे यह ऊपर से होते है वैसे यह अंदर से होते है, बे वजह किसी का दिल नहीं दुखाते यह लोग ज्ञान से इनको बहुत प्यार होता है और ज्ञानके पीछे यह हमेशा भागते है सबको प्यार और रेस्पेक्ट देते है पर क्रोध और गुस्साइनके अंदर बहुत होता है क्योकि गुरु तत्व होने के कारण यह गलत बात बर्दाश्त नहीं कर पाते है।
 गुरु लग्नेश और सुखेश है इस लगन के लिए गुरु शुभ है अगर गुरु लगन में ही हो तो कुंडली के बहुत सारे दोष दूर कर देता है केंद्र या त्रिकोण में यह बहुत अच्छे शुभ फल प्रदान करता है मान सम्मान उच्च लोगो के साथ सबंध अगरयह शुभ प्रभाव में है तो।
शनि 2 भाव और 3 का स्वामी है शनि 2 का फल ना करके 3 का ज्यादा करेगा स्थांतरण फलित करेगा शनि मारक है और3 भाव अशुभ है अपनी वाणी पर इनका कंट्रोल होना बहुत जरुरी है क्योकि वाणीका स्वामी शनि है अगर शनि कुंडली में खराब हुआ वाणी दोष देगा बोलने पर इनका संयम बहुतजरुरी है शनि अगर कुंडली मेंअच्छी जगह है 11 भाव में उच्च है या 2 भाव मेंहै शुक्र शनि की युति है यह धनदायहोती है
शनि 2 भाव और शुक्र 11 भाव का स्वामी है धनेश और लाभेश के साथ होनेकी वजह से शनि की महादशा में धनिकी प्राप्ति वो भी मेहनत के साथ होसकती है शनि की दशा में अक्सरपरेशानी का सामना भी करना पड़ सकता हैअगर शनि कुंडली में खराब हुआ तो इनकीबेसिक एजुकेशन खराब हो सकती है। शनिकी दशा प्लेसमेंट कैसी है शनि की इस बात पर निर्धारित है।मंगल 12 भाव और 5 का स्वामी है मंगल 12 भाव काफल न करके 5 भाव का फल जायदा करेगा मंगल शुभ है इनके लिए मंगल की दशा में अच्छी एजुकेशनअच्छी संतान विदेश यात्राओ का लाभ मिलता है मंगल लग्नेश गुरु का मित्र भी है त्रिकोण का स्वामी भी है इसकी दशा शुभ है अगर यह सही जगह और शुभ प्रभाव में है।शुक 6 और 11 भाव स्वामी है 6 से 6 होने के कारण11 भाव से भी वो ही फल प्राप्त होते है जो 6 से होते है  शुक्र रोग चोट एक्सीडेंट यह गुरु का लग्न है शुक्र इसकी छवि बिगाड़ने की कोशिश करता है परस्त्री से दूर रहे गलत सम्बन्ध नहीं बनाये औरतो से क्योकि शुक्र रोगेश है इनको hiv की बीमारी जल्दी लगसकती है शरीर में पथरी होनायोन रोग होना शुक्र की दशा शुभ नहीं है।बुध 10 भाव और 7 भाव का स्वामी है केन्द्राधिपतिदोष इसको लग जाता है शुभ गृह केंद्र के स्वामीहोकर अपनी शुभता को कम कर देते है पर अगरइनकी प्लेसमेंट अच्छी हो यह बहुत अच्छा फल भी प्रदान कर सकते है त्रिकोण के
स्वामी के साथ सूर्य और बुध की युतिराजयोग कारक होती है सूर्य 9 भाव कास्वामी बुध कर्मेश होता है केंद्र त्रिकोण केस्वामी है यह राजयोग देती है अगर लग्न नवम और दशम भाव में यह युति हो विशेष फल दायकहोती है।चंद्रमा 8 का स्वामी है चंद्रमा को अष्टमेश होनेका.दोष नहीं लगता चंद्रमा देवता गृह है देव गृहकभी भी आयु का नुक्सान नहीं करते पर चंद्रमा पर अशुभ प्रभाव नहीं होना चहिये शुक्र चंद्रमा की युति बीमारिया या फिर आयु की हानि कर सकती है
सूर्य 9 भाव का स्वामी है सूर्य अगरअच्छी जगह है शुभ प्रभाव में है।अपनी दशा में भाग्य उदय करता है भाग्य को राजसी बना देता है सरकार से फायदा करवाता है सरकारी नौकरी दिलवाता है उच्च लोगो से सम्बन्ध बनवाता है इसकी दशा में भाग्य उदय होता है सूर्य शुभ है इनके लिए।

शनि की महादशा में पीपल की पूजा क्यों ?

*शनि की महादशा में पीपल की पूजा क्यों ?*
जब किसी इंसान पर शनिदेव की महादशा चल रही होती है तो उसे पीपल की पूजा का उपाय जरूर बताया जाता है। कई बार मन में यह सवाल उठता है कि ब्रम्हांड के सबसे शक्तिशाली और क्रूर ग्रह शनि का क्रोध मात्र पीपल वृक्ष की पूजा करने से कैसे शान्त हो जाता है।?
आज हम आपको बताने जा रहे हैं शनि और पीपल से सम्बंधित वह पौराणिक कथा जिसके बारे में आपने शायद ही पहले कभी सुना हो।
पुराणों की माने तो एक बार त्रेता युग मे अकाल पड़ गया था । उसी युग मे एक कौशिक मुनि अपने बच्चो के साथ रहते थे । बच्चो का पेट न भरने के कारण मुनि अपने बच्चो को लेकर दूसरे राज्य मे रोज़ी रोटी के लिए जा रहे थे ।
रास्ते मे बच्चो का पेट न भरने के कारण मुनि ने एक बच्चे को रास्ते मे ही छोड़ दिया था । बच्चा रोते रोते रात को एक पीपल के पेड़ के नीचे सो गया था तथा पीपल के पेड़ के नीचे रहने लगा था। तथा पीपल के पेड़ के फल खा कर बड़ा होने लगा था। तथा कठिन तपस्या करने लगा था ।
एक दिन ऋषि नारद वहाँ से जा रहे थे । नारद जी को उस बच्चे पर दया आ गयी तथा नारद जी ने उस बच्चे को पूरी शिक्षा दी थी तथा विष्णु भगवान की पूजा का विधान बता दिया था।
अब बालक भगवान विष्णु की तपस्या करने लगा था । एक दिन भगवान विष्णु ने आकर बालक को दर्शन दिये तथा विष्णु भगवान ने कहा कि हे बालक मैं आपकी तपस्या से प्रसन्न हूँ । आप कोई वरदान मांग लो।
बालक ने विष्णु भगवान से सिर्फ भक्ति और योग मांग लिया था । अब बालक उस वरदान को पाकर पीपल के पेड़ के नीचे ही बहुत बड़ा तपस्वी और योगी हो गया था।
एक दिन बालक ने नारद जी से पूछा कि हे प्रभु हमारे परिवार की यह हालत क्यो हुई है । मेरे पिता ने मुझे भूख के कारण छोड़ दिया था और आजकल वो कहा है।
नारद जी ने कहा बेटा आपका यह हाल शानिमहाराज ने किया है । देखो आकाश मे यह शनैश्चर दिखाई दे रहा है । बालक ने शनैश्चर को उग्र दृष्टि से देखा और क्रोध से उस शनैश्चर को नीचे गिरा दिया । उसके कारण शनैश्चर का पैर टूट गया । और शनि असहाय हो गया था।
शनि का यह हाल देखकर नारद जी बहुत प्रसन्न हुए । नारद जी ने सभी देवताओ को शनि का यह हाल दिखाया था । शनि का यह हाल देखकर ब्रह्मा जी भी वहाँ आ गए थे । और बालक से कहा कि मैं ब्रह्मा हूँ आपने बहुत कठिन तप किया है।
आपके परिवार की यह दुर्दशा शनि ने ही की है । आपने शनि को जीत लिया है । आपने पीपल के फल खाकर जीवंन जीया है । इसलिए आज से आपका नाम पिपलाद ऋषि के नाम जाना जाएगा।और आज से जो आपको याद करेगा उसके सात जन्म के पाप नष्ट हो जाएँगे।
तथा पीपल की पूजा करने से आज के बाद शनि कभी कष्ट नहीं देगा । ब्रह्मा जी ने पिपलाद बालक को कहा कि अब आप इस शनि को आकाश मे स्थापित कर दो । बालक ने शनि को ब्रह्माण्ड मे स्थापित कर दिया ।
तथा पिपलाद ऋषि ने शनि से यह वायदा लिया कि जो पीपल के वृक्ष की पूजा करेगा उसको आप कभी कष्ट नहीं दोगे । शनैश्चर ने ब्रह्मा जी के सामने यह वायदा ऋषि पिपलाद को दिया था।
उस दिन से यह परंपरा है जो ऋषि पिपलाद को याद करके शनिवार को पीपल के पेड़ की पूजा करता है उसको शनि की साढ़े साती , शनि की ढैया और शनि महादशा कष्ट कारी नहीं होती है ।
शनि की पूजा और व्रत एक वर्ष तक लगातार करनी चाहिए । शनि कों तिल और सरसो का तेल बहुत पसंद है इसलिए तेल का दान भी शनिवार को करना चाहिए । पूजा करने से तो दुष्ट मनुष्य भी प्रसन्न हो जाता है।
तो फिर शनि क्यो नहीं प्रसन्न होगा ? इसलिए शनि की पूजा का विधान तो भगवान ब्रह्मा ने दिया है ।

जानिए शनि की साढ़ेसाती कब देती है शुभ परिणाम

जानिए शनि की साढ़ेसाती कब देती है शुभ परिणाम


शनि की साढ़ेसाती ज्योतिष का सर्वाधिक चर्चित विषय है जिसे लेकर सभी व्यक्तियों के मन में जिज्ञासा भी रहती है और भय भी साढ़ेसाती की गणना के बारे में जैसा के सब जानते ही हैं जब गोचरवश शनि हमारी "जन्म राशि" से बारहवीं राशि में आता है तो साढ़ेसाती आरम्भ हो जाती है साढ़ेसाती के दौरान शनि ढाई साल हमारी राशि से बारहवीं राशि में ढाई साल हमारी राशि में और ढाई साल हमारी राशि से अगली राशि में गोचर करता है इस तरह साडेसात साल पूरे होते हैं....... साढ़ेसाती के परिणाम को समान्यतः देखें तो जब किसी व्यक्ति के जीवन में साढ़ेसाती का प्रेवेश होता है तो संघर्ष बढ़ने लगता है कार्यों में बाधायें आने लगती हैं व्यक्ति को बहुत कठिन परिश्रम करना पड़ता है जीवन में उतार-चढाव बहुत बढ़ जाते हैं और साढ़ेसाती के दौरान उत्पन्न होने वाली ऐसी परिस्थितयां व्यावहारिक रूप से वास्तव में उत्पन्न भी होती ही हैं जैसा के हम अधिकांशतः लोगों के साथ देखते भी हैं...................पर अब यहाँ विशेष बात यह है के साढ़ेसाती हमेशा और प्रत्येक परिस्थिति में बुरा ही फल करे या साढ़ेसाती के अंतर्गत तीनो ढैय्या एक समान ही फल करें ऐसा आवश्यक नहीं हैं वास्तव में शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव हमारी कुंडली की जन्मकालीन ग्रहस्थिति पर बहुत अधिक निर्भर करता है और प्रत्येक व्यक्ति की जन्मकालीन ग्रहस्थिति भिन्न भिन्न होने से साढ़ेसाती का प्रभाव सभी के लिए कुछ न कुछ प्रकार से भिन्न होता है जैसा के हम अधिकांशतः देखते हैं के साढ़ेसाती के दौरान व्यक्ति के जीवन में संघर्ष और बाधाएं बढ़ती है पर कुछ विशेष स्थितियों में साढ़ेसाती के दौरान बहुत शुभ फल भी प्राप्त होते हैं और शनि की साढ़ेसाती व्यक्ति को बहुत उच्च सफलता भी प्रदान करती है। .............................
किसी भी व्यक्ति पर चल रही साढ़ेसाती के दौरान यदि गोचर का शनि (तत्कालिक शनि) व्यक्ति की कुंडली में स्थित जन्मकालीन शनि पर गोचर करे अर्थात व्यक्ति की जन्म कुंडली में शनि जिस राशि में स्थित है उस राशि में साढ़ेसाती के दौरान का शनि आये तो ऐसे में शनि की साढ़ेसाती बहुत शुभ परिणाम देती है इसके अलावा साढ़ेसाती के दौरान यदि तत्कालिक शनि व्यक्ति की कुंडली में स्थित अपने मित्र ग्रहों (बुध, शुक्र) पर गोचर करता है तो भी साढ़ेसाती के दौरान अच्छे परिणाम मिलते हैं इसके अतिरिक्त जन्मकुंडली में बृहस्पति जिस राशि में स्थित है उस राशि में यदि साढ़ेसाती के दौरान शनि आता है तो भी साढ़ेसाती का वह समय व्यक्ति को बहुत शुभ परिणाम देता है तो निष्कर्षतः यदि किसी व्यक्ति पर साढ़ेसाती चल रही है और साढ़ेसाती के दौरान तत्कालिक शनि उस राशि में चल रहा हो जिस राशि में व्यक्ति की कुंडली में शनि, शुक्र, बुध या बृहस्पति स्थित है तो ऐसे में साढ़ेसाती होते हुए भी व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन और सफलता प्राप्त होती है............

साढ़ेसाती के दौरान जब तत्कालिक शनि व्यक्ति के जन्मकालिक शनि पर गोचर करता है या व्यक्ति की कुंडली में स्थित शनि से सातवीं राशि में जब तत्कालिक शनि आता है तो ऐसे में साढ़ेसाती होते हुए भी व्यक्ति को अपने करियर या आजीविका में उन्नति और अच्छी सफलता मिलती है....... इसी प्रकार जब कुंडली में स्थित जन्मकालिक बृहस्पति वाली राशि में तत्कालिक शनि आता है तो ऐसे में भी साढ़ेसाती होते हुए भी व्यक्ति की आजीविका में उन्नति होती है.............साढ़ेसाती के दौरान यदि तत्कालिक शनि व्यक्ति कुंडली में स्थित जन्मकालिक शुक्र पर गोचर करे तो ऐसे में साढ़ेसाती बहुत शुभ फल करती है और व्यक्ति के जीवन में भौतिक संसाधन और समृद्धि बढ़ती है…….
तो किसी भी व्यक्ति पर चल रही शनि की साढ़ेसाती के पूरे साढ़ेसात साल बुरा या एक जैसा ही परिणाम देंगे ऐसा आवश्यक नहीं है साढ़ेसाती का परिणाम जन्मकालीन ग्रहस्थिति के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के लिए कुछ न कुछ प्रकार भिन्न होता है और साढ़ेसाती के दौरान तत्कालिक शनि हमारी जन्मकुंडली में स्थित किसी जन्मकालीन ग्रह पर तो गोचर नहींकर रहा है यह देखना बहुत आवश्यक होता है जो उस समय में व्यक्ति के लिए साढ़ेसाती के परिणाम को निश्चित करता है और जैसा हम यहाँ बता ही चुके हैं साढ़ेसाती के अंतर्गत पड़ने वाली तीनो ढैय्या में से जिस भी ढैय्या में शनि हमारी कुंडली में स्थित जन्मकालिक शनि शुक्र बुध और बृहस्पति पर गोचर करता है तो ऐसे में साढ़ेसाती का वो भाग व्यक्ति को बहुत शुभ परिणाम देता है

।।श्री हनुमते नमः।। 

Saturday, September 23, 2017

प्रथम भाव से व्यक्ति के शरीर, रूप, रंग, आकृति, स्वभाव, ज्ञान, बल, सुख, यश, गौरव, आयु तथा मानसिक स्तर का विचार

प्रथम भाव को लग्न, आत्मा, शरीर, होरा, उदय, आदि, के नाम से भी जाना जाता है| इस भाव से व्यक्ति के शरीर, रूप, रंग, आकृति, स्वभाव, ज्ञान, बल, सुख, यश, गौरव, आयु तथा मानसिक स्तर का विचार किया जाता है| लग्न को भावों में विशिष्ट श्रेणी प्रदान की गई है| लग्न एक केंद्र भी है, तो त्रिकोण भी| लग्न भाव का स्वामी(लग्नेश), चाहे वह नैसर्गिक पापी ग्रह हो या शुभ ग्रह, हमेशा शुभ ही माना जाता है| अतः लग्न व लग्नेश को फलित ज्योतिष में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है| इस भाव का कारक ग्रह सूर्य है, क्योंकि सूर्य ही जातक का जनक व उसकी आत्मा का अधिष्ठाता है|
प्रथम भाव से निम्नलिखित विषयों का विचार किया जाता है-
शरीर- शरीर का मोटा या दुबला होना जलीय एवं शुष्क ग्रहों और राशियों पर निर्भर करता है| अर्थात जब जलीय ग्रहों का संबंध अन्य ग्रहों की अपेक्षा प्रथम भाव पर अधिक पड़ता है तब जातक का शरीर मोटा होता है| परंतु अगर शुष्क ग्रहों और राशियों का संबंध लग्न पर अधिक पड़ता है तब जातक का शरीर दुबला होता है|
कद- लग्न पर जब शनि, राहु, बुध, गुरु आदि दीर्घ ग्रह एवं राशियों का प्रभाव पड़ता है तब जातक का शरीर लंबा होता है| परंतु जब मंगल, शुक्र आदि छोटे कद वाले ग्रह एवं राशियों का प्रभाव प्रथम भाव पर पड़ता है, तब व्यक्ति का कद छोटा होता है|
बालारिष्ट- प्रथम भाव व्यक्ति की शैशव अवस्था(बाल अवस्था) का प्रतीक है| अतः यदि लग्न के साथ-साथ लग्नेश व चन्द्र पर पाप व क्रूर ग्रहों का प्रभाव हो तो मनुष्य को बाल्य अवस्था में शारीरिक कष्ट होने की संभावना होती है| अगर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो बालारिष्ट से बचाव होता है|
स्वभाव- मनुष्य के स्वभाव का विचार लग्न, लग्नेश, चतुर्थ भाव, चतुर्थेश तथा चन्द्र से किया जाता है| किसी भी मनुष्य के स्वभाव का आकंलन करने में लग्न का बहुत महत्व होता है| इसका कारण यह है कि चतुर्थ भाव व्यक्ति के मन तथा हृदय से संबंधित है, ह्रदय तथा मन का प्रभाव मनुष्य के स्वभाव पर पूर्ण रूप से पड़ता है| चंद्रमा मन का प्रतीक है, मन से स्वभाव जुड़ा हुआ होता है| लग्न मनुष्य का सर्वस्व है, यह उसके सिर तथा विचार शक्ति को दर्शाता है| इसलिए जब चतुर्थ भाव, चतुर्थेश, चन्द्र, लग्न व लग्नेश पर शुभ ग्रहों का प्रभाव होता है तो व्यक्ति अच्छे स्वभाव वाला, सात्विक, दयालु तथा मिलनसार होता है| इसके विपरीत जब इन घटकों पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव होता है तब व्यक्ति क्रूर तथा दुष्ट स्वभाव का होता है|
जन्मकालीन स्थिति- लग्न तथा लग्नेश पर जैसे ग्रहों का प्रभाव होता है मनुष्य को उसी प्रकार की पारिवारिक स्थिति, कुल, सुख-दुःख आदि की प्राप्ति होती है| यदि लग्न, लग्नेश, चन्द्र, सूर्य तथा इनके अधिपतियों पर गुरु और शुक्र जैसे ब्राह्मण ग्रहों का प्रभाव हो तो मनुष्य का जन्म ब्राह्मण कुल में होता है| यदि इन घटकों पर सूर्य तथा मंगल जैसे क्षत्रिय ग्रहों का प्रभाव हो तो मनुष्य का जन्म क्षत्रिय कुल में होता है| यदि अधिकांश पर बुध तथा चन्द्र जैसे वैश्य ग्रहों का प्रभाव हो तो मनुष्य का जन्म वैश्य कुल में होता है| यदि अधिकांश पर शनि का प्रभाव हो तो शुद्र कुल में जन्म होता है| यदि अधिकांश घटकों पर राहु-केतु का प्रभाव हो तो मनुष्य का जन्म गैर हिन्दू जातियों में होने की संभावना होती है|
आयु- प्रथम भाव का मनुष्य की आयु से भी घनिष्ठ संबंध है| जब लग्न, लग्नेश के साथ-साथ चन्द्र, सूर्य, शनि, तृतीय तथा अष्टम भाव व इनके स्वामी बली हों तो मनुष्य की आयु में वृद्धि होती है और उसका स्वास्थ्य अच्छा रहता है| इसके विपरीत यदि इन पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो अथवा यह घटक कमजोर हों तो व्यक्ति की अल्पायु होती है|
आजीविका- इसका विचार दशम भाव के अतिरिक्त लग्न से भी किया जाता है| कारण यह है कि लग्न मनुष्य का सर्वस्व है, वह धन है और धन कमाने वाला भी है| इसलिए सुदर्शन पद्दति के अनुसार लग्न, लग्नेश, चन्द्र, सूर्य और इनके अधिपति ग्रहों पर जिन-जिन ग्रहों का प्रभाव पड़ रहा हो तो मनुष्य की आजीविका उसी ग्रह से संबंधित होती है|
लग्नाधियोग- यदि प्रथम भाव के अतिरिक्त द्वितीय तथा द्वादश भाव पर भी शुभ ग्रहों का युति अथवा दृष्टि द्वारा प्रभाव हो तो लग्नाधियोग का निर्माण होता है| क्योंकि इस अवस्था में शुभ ग्रहों का प्रभाव लग्न और उससे द्वितीय तथा द्वादश भाव पर भी पड़ता है| अतः लग्न बली हो जाता है और व्यक्ति को जीवन में धन-ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है|
मान-सम्मान- यदि लग्न, लग्नेश, चन्द्र, सूर्य, दशम भाव तथा इनके अधिपति बली अवस्था में हों तो मनुष्य को जीवन में बहुत मान-सम्मान की प्राप्ति होती है| क्योंकि प्रथम भाव मनुष्य के मान-सम्मान, गौरव, यश तथा कीर्ति का प्रतीक है|
राज्य से अधिकार प्राप्ति- यदि लग्न लग्नेश, चन्द्र, सूर्य, दशम भाव तथा इनके अधिपतियों पर शुभ ग्ग्रहों का प्रभाव हो तो मनुष्य अत्यंत बलवान, सत्ताधारी, उच्च अधिकारी, तथा राज्य कृपा प्राप्त व्यक्ति होता है| क्योंकि लग्न, लग्नेश का बली होना मनुष्य को सम्मान, सता, शक्ति तथा राज्य कृपा प्रदान करता है

कुंडली में बनने वाले सुनफा योग, अनफा योग, दुर्धरा योग

कुंडली में बनने वाले सुनफा योग, अनफा योग, दुर्धरा योग *
*वैदिक ज्योतिष के महत्वपूर्ण योग सुनफा योग, अनफा योग तथा दुर्धरा योग को वैदिक ज्योतिष के अनुसार शुभ योग माना जाता है तथा किसी कुंडली में इन तीनों योगों में से किसी एक योग का बनना मुख्य रूप से कुंडली में चन्द्रमा की स्थिति के आधार पर ही तय किया जाता है।*
*सुनफा योग : वैदिक ज्योतिष में सुनफा योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार यदि किसी कुंडली में चन्द्रमा से अगले घर में कोई ग्रह स्थित हो तो कुंडली में सुनफा योग बनता है जो जातक को धन, संपत्ति तथा प्रसिद्धि प्रदान कर सकता है। कुछ ज्योतिषी यह मानते हैं कि इस योग की गणना के लिए सूर्य का विचार नहीं किया जाता जिसका अर्थ यह है कि किसी कुंडली में केवल सूर्य के ही चन्द्रमा से अगले घर में स्थित होने पर कुंडली में सुनफा योग नहीं बनता तथा ऐसी स्थिति में सूर्य के साथ कोई और ग्रह भी उपस्थित होना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि किसी कुंडली के चौथे घर में चन्द्रमा स्थित हैं तथा कुंडली के पांचवे घर में सूर्य के अतिरिक्त कोई अन्य ग्रह स्थित है तो कुंडली में सुनफा योग बनता है। अपनी प्रचलित परिभाषा के अनुसार सुनफा योग बहुत सी कुंडलियों में बन जाता है किन्तु इनमें से बहुत से जातकों को इस योग के शुभ फल प्राप्त नहीं होते जिसके चलते इस योग के किसी कुंडली में बनने के लिए कुछ अन्य तथ्यों पर भी विचार करना आवश्यक है।*
*किसी कुंडली में सुनफा योग बनाने के लिए चन्द्रमा को उस कुंडली में शुभ होना चाहिए तथा चन्द्रमा से अगले घर में स्थित ग्रह अथवा ग्रहों को भी कुंडली में शुभ होना चाहिए तथा इनमें से किसी भी ग्रह के कुंडली में अशुभ होने की स्थिति में कुंडली में सुनफा योग नही बनेगा अथवा ऐसा सुनफा योग क्षीण होगा। इसके अतिरिक्त किसी कुंडली में सुनफा योग बनाने के लिए चन्द्रमा का किसी भी अशुभ ग्रह के प्रभाव से रहित होना भी आवश्यक है जिसका अर्थ यह है कि कुंडली में चन्द्रमा के साथ कोई अशुभ ग्रह स्थित न हो तथा कुंडली में कोई अशुभ ग्रह अपनी दृष्टि से भी चन्द्रमा पर अशुभ प्रभाव न डाल रहा हो क्योंकि किसी कुंडली में शुभ चन्द्रमा पर एक अथवा एक से अधिक अशुभ ग्रहों का प्रभाव कुंडली में बनने वाले सुनफा योग के शुभ फलों को कम अथवा बहुत कम कर सकता है। सुनफा योग के शुभ फल निश्चित करने से पहले कुंडली में चन्द्रमा का बल तथा स्थिति आदि भी देख लेनें चाहिएं। उदाहरण के लिए किसी कुंडली में चन्द्रमा के कर्क राशि में चौथे घर में स्थित होने से बनने वाला सुनफा योग कुंडली में चन्द्रमा के वृश्चिक राशि में बारहवें घर में स्थित होने से बनने वाले सुनफा योग की तुलना में कहीं अधिक प्रबल तथा शुभ फलदायी होगा।*
*अनफा योग : वैदिक ज्योतिष में अनफा योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार यदि किसी कुंडली में चन्द्रमा से पिछले घर में कोई ग्रह स्थित हो तो कुंडली में अनफा योग बनता है जो जातक को स्वास्थ्य, प्रसिद्धि तथा आध्यात्मिक विकास प्रदान कर सकता है। कुछ ज्योतिषी यह मानते हैं कि इस योग की गणना के लिए सूर्य का विचार नहीं किया जाता जिसका अर्थ यह है कि किसी कुंडली में केवल सूर्य के ही चन्द्रमा से पिछले घर में स्थित होने पर कुंडली में अनफा योग नहीं बनता तथा ऐसी स्थिति में सूर्य के साथ कोई और ग्रह भी उपस्थित होना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि किसी कुंडली के चौथे घर में चन्द्रमा स्थित हैं तथा कुंडली के तीसरे घर में सूर्य के अतिरिक्त कोई अन्य ग्रह स्थित है तो कुंडली में अनफा योग बनता है। अपनी प्रचलित परिभाषा के अनुसार अनफा योग बहुत सी कुंडलियों में बन जाता है किन्तु इनमें से बहुत से जातकों को इस योग के शुभ फल प्राप्त नहीं होते जिसके चलते इस योग के किसी कुंडली में बनने के लिए कुछ अन्य तथ्यों पर भी विचार करना आवश्यक है।*
*सुनफा योग की भांति ही अनफा योग के किसी कुंडली में निर्माण के लिए भी कुंडली में चन्द्रमा तथा चन्द्रमा से पिछले घर में स्थित ग्रहों का शुभ होना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त कुंडली में चन्द्रमा पर किसी भी अशुभ ग्रह का स्थिति अथवा दृष्टि के माध्यम से अशुभ प्रभाव नहीं होना चाहिए क्योंकि चन्द्रमा पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव कुंडली में बनने वाले अनफा योग के शुभ फलों को कम अथवा बहुत कम कर सकता है। कुंडली में बनने वाले अनफा योग के बारे में फलादेश करने से पहले कुंडली में चन्द्रमा की स्थिति तथा बल भी देख लेना चाहिए क्योंकि सुनफा योग की भांति ही अनफा योग के शुभ फलों में भी चन्द्रमा के बल तथा स्थिति के आधार पर बहुत अंतर आ सकता है।*
*दुर्धरा योग : वैदिक ज्योतिष में दुर्धरा योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार यदि किसी कुंडली में चन्द्रमा से पिछले घर में तथा चन्द्रमा से अगले घर में कोई ग्रह स्थित हो तो कुंडली में दुर्धरा योग बनता है जो जातक  को शारीरिक सुंदरता, स्वास्थ्य, संपत्ति तथा समृद्धि प्रदान कर सकता है। कुछ ज्योतिषी यह मानते हैं कि इस योग की गणना के लिए सूर्य का विचार नहीं किया जाता जिसका अर्थ यह है कि किसी कुंडली में केवल सूर्य के ही चन्द्रमा से पिछले अथवा अगले घर में स्थित होने पर कुंडली में दुर्धरा योग नहीं बनता तथा ऐसी स्थिति में सूर्य के साथ कोई और ग्रह भी उपस्थित होना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि किसी कुंडली के चौथे घर में चन्द्रमा स्थित हैं तथा कुंडली के तीसरे घर में सूर्य के अतिरिक्त कोई अन्य ग्रह स्थित है तथा कुंडली के पांचवे ग्रह में भी सूर्य के अतिरिक्त कोई अन्य ग्रह स्थित है तो कुंडली में दुर्धरा योग बनता है। अपनी प्रचलित परिभाषा के अनुसार दुर्धरा योग बहुत सी कुंडलियों में बन जाता है किन्तु इनमें से बहुत से जातकों को इस योग के शुभ फल प्राप्त नहीं होते जिसके चलते इस योग के किसी कुंडली में बनने के लिए कुछ अन्य तथ्यों पर भी विचार करना आवश्यक है।*
*सुनफा योग की भांति ही दुर्धरा योग के किसी कुंडली में निर्माण के लिए भी कुंडली में चन्द्रमा तथा चन्द्रमा से अगले तथा पिछले घर में स्थित ग्रहों का शुभ होना आवश्यक है क्योंकि चन्द्रमा के कुंडली में अशुभ होने से दुर्धरा योग बनेगा ही नहीं जबकि इस योग के निर्माण में शामिल अन्य ग्रहों के अशुभ होने से इस योग के फल कम अथवा बहुत कम हो जाएंगे। इसके अतिरिक्त कुंडली में चन्द्रमा पर किसी भी अशुभ ग्रह का स्थिति अथवा दृष्टि के माध्यम से अशुभ प्रभाव नहीं होना चाहिए क्योंकि चन्द्रमा पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव कुंडली में बनने वाले दुर्धरा योग के शुभ फलों को कम अथवा बहुत कम कर सकता है। कुंडली में बनने वाले दुर्धरा योग के बारे में फलादेश करने से पहले कुंडली में चन्द्रमा की स्थिति तथा बल भी देख लेना चाहिए क्योंकि सुनफा योग की भांति ही दुर्धरा योग के शुभ फलों में भी चन्द्रमा के बल तथा स्थिति के आधार पर बहुत अंतर आ सकता है।*

Wednesday, September 20, 2017

कुंडली में कुछ बुरे योग जिनका निवारण जरुरी है

कुंडली में कुछ बुरे योग जिनका निवारण
जरुरी है,,,,
कुंडली में हम सामान्यतः राज
योगों की ही खोज करते हैं, किन्तु कई
बार स्वयं ज्योतिषी व कई बार जातक इन
दुर्योगों को नजरअंदाज कर जाता है,जिस कारण बार बार संशय
होता है की क्यों ये राजयोग फलित
नहीं हो रहे.आज ऐसे ही कुछ
दुर्योगों के बारे में बताने का प्रयास कर रहा हूँ,जिनके प्रभाव से
जातक कई योगों से लाभान्वित होने से चूक जाते हैं.सामान्यतः पाए
जाने वाले इन दोषों में से कुछ इस प्रकार हैं..
१. ग्रहण योग:
कुंडली में कहीं भी सूर्य
अथवा चन्द्र की युति राहू या केतु से
हो जाती है तो इस दोष का निर्माण होता है.चन्द्र
ग्रहण योग की अवस्था में जातक डर व घबराहट
महसूस करता है.चिडचिडापन उसके स्वभाव का हिस्सा बन
जाता है.माँ के सुख में
कमी आती है.किसी भी कार्य
को शुरू करने के बाद उसे सदा अधूरा छोड़ देना व नए काम के बारे में
सोचना इस योग के लक्षण हैं.अमूमन
किसी भी प्रकार के
फोबिया अथवा किसी भी मानसिक
बीमारी जैसे डिप्रेसन ,सिज्रेफेनिया,आ
दि इसी योग के कारण माने गए
हैं.यदि यहाँ चंद्रमा अधिक दूषित हो जाता है या कहें अन्य
पाप प्रभाव में
भी होता है,तो मिर्गी ,चक्कर व
मानसिक संतुलन खोने का डर भी होता है. सूर्य
द्वारा बनने वाला ग्रहण योग पिता सुख में
कमी करता है.जातक का शारीरिक
ढांचा कमजोर रह जाता है.आँखों व ह्रदय
सम्बन्धी रोगों का कारक
बनता है.सरकारी नौकरी या तो मिलती नहीं या उस
में निबाह मुस्किल होता है.डिपार्टमेंटल
इन्क्वाइरी ,सजा ,जेल,परमोशन में रुकावट सब
इसी योग का परिणाम है.
२.गुरु चंडाल योग:
गुरु की किसी भी भाव में
राहू से युति चंडाल योग बनती है.शरीर
पर घाव का एक आध चिन्ह लिए ऐसा जातक
भाग्यहीन होता है.आजीविका से जातक
कभी संतुष्ट नहीं होता,बोलने में
अपनी शक्ति व्यर्थ करता है व अपने सामने
औरों को ज्ञान में कम आंकता है जिस कारण स्वयं धोखे में
रहकर पिछड़ जाता है.ये योग जिस भी भाव में
बनता है उस भाव को साधारण कोटि का बना देता है.मतान्तर से
कुछ विद्वान् राहू की दृष्टी गुरु पर
या गुरु की केतु से युति को भी इस योग
का लक्षण मानते हैं.
३.दरिद्र योग:
लग्न या चंद्रमा से चारों केंद्र स्थान
खाली हों या चारों केन्द्रों में पाप ग्रह हों तो दरिद्र
योग होता है.ऐसा जातक अरबपति के घर में
भी जनम ले ले तो भी उसे
आजीविका के लिए भटकना पड़ता है,व दरिद्र
जीवन बिताने के लिए मजबूर होना पड़ता है.
४. शकट योग
:चंद्रमा से छटे या आठवें भाव में गुरु हो व ऐसा गुरु लग्न से
केंद्र में न बैठा हो तो शकट योग का होना माना गया है.
ऐसा जातक जीवन भर किसी न
किसी कर्ज से दबा रहता है,व सगे
सम्बन्धी उससे घृणा करते हैं.वह अपने
जीवन में अनगिनत उतार चढ़ाव देखता है.ऐसा जातक
गाड़ी चलाने वाला भी हो सकता है.
५.उन्माद योग:
(a) यदि लग्न में सूर्य हो व सप्तम में मंगल हो, (b)
यदि लग्न में शनि और सातवें ,पांचवें या नवें भाव में मंगल हो (c)
यदि धनु लग्न हो व लग्न- त्रिकोण में सूर्य-चन्द्र
युति हों साथ ही गुरु तृतीय भाव
या किसी भी केंद्र में
हो तो गुरुजनों द्वारा उन्माद योग
की पुष्टि की गयी है.जातक
जोर जोर से बोलने वाला ,व गप्पी होता है.ऐसे में
यदि ग्रह बलिष्ट हों तो जातक पागल हो जाता है.
६. कलह योग:
यदि चंद्रमा पाप ग्रह के साथ राहू से युक्त हो १२ वें ५ वें
या ८ वें भाव में हो तो कलह योग माना गया है.जातक के सारे
जीवन भर किसी न
किसी बात कलह
होती रहती है व अंत में
इसी कलह के कारण तनाव में
ही उसकी मृत्यु
हो जाती है.
नोट:लग्न से घड़ी के विपरीत गिनने पर
चौथा-सातवां -दसवां भाव केंद्र स्थान होता है.पंचम व नवं भाव
त्रिकोण कहलाते हैं. साथ ही लग्न
की गिनती केंद्र व त्रिकोण दोनों में
होती है.

Monday, September 18, 2017

पुरूष की कुंडली में स्त्री सुख का कारक शुक्र होता है उसी तरह स्त्री की कुंडली में पति सुख का कारक ग्रह वॄहस्पति होता है. स्त्री की कुंडली में बलवान सप्तमेश होकर वॄहस्पति सप्तम भाव को देख रहा हो तो ऐसी स्त्री को अत्यंत उत्तम पति सुख प्राप्त होता है.
जिस स्त्री के द्वितीय, सप्तम, द्वादश भावों के अधिपति केंद्र या त्रिकोण में होकर वॄहस्पति से देखे जाते हों, सप्तमेश से द्वितीय, षष्ठ और एकादश स्थानों में सौम्य ग्रह बैठे हों, ऐसी स्त्री अत्यंत सुखी और पुत्रवान होकर सुखोपभोग करने वाली होती है.
पुरूष का सप्तमेश जिस राशि में बैठा हो वही राशि स्त्री की हो तो पति पत्नि में बहुत गहरा प्रेम रहता है.
[9/13, 13:06] ‪+91 82859 28687‬: दस अचूक उपाय



ज्योतिष में ग्रह गणना और कुंडली की ग्रहस्थिति के अनुसार किये जाने वाले फलित के अतिरिक्त ज्योतिष की उपाय शाखा अपना एक बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है ज्योतिषीय उपायों में किसी भी कमजोर ग्रह को बल प्रदान करने के लिए उपाय, ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव से बचने के उपाय तथा जीवन की विभिन्न विपरीत परिस्थितियों के लिए बहुत से उपायों का वर्णन है, पर आज हम यहाँ विशेष रूप से बुध ग्रह को बली करने या मजबूत करने के लिए दस बहुत विशेष सरल और सटीक उपाय बता रहे हैं, वैसे तो ज्योतिष में प्रत्येक ग्रह का अपना अलग विशेष महत्व है पर बुध आज के समय में प्रत्येक व्यक्ति के लिए बहुत विशेष भूमिका निभाता है क्योंकि...

ज्योतिष में बुध को बुद्धि, कैचिंग पॉवर, तर्कशक्ति, निर्णय क्षमता, याददास्त, सोचने समझने की क्षमता, वाणी, बोलने की क्षमता, उच्चारण, व्यव्हार कुसलता, सूचना, संचार, यातायात, व्यापार, वाणिज्य, गणनात्मक विषय, लेखन, कम्युनिकेशन और गहन अध्ययन का कारक माना गया है और ये सभी घटक हमारे जीवन में बहुत अहम भूमिका निभाते हैं विशेषतः बुद्धि क्षमता की तो आज के समय में सर्वाधिक और हर जगह आवश्यकता होती है, इस के अलावा बुध का हमारे स्वास्थ और शरीर पर भी बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है बुध हमारे शरीर के बहुत विशेष घटकों को नियंत्रित करता है ज्योतिष की चिकित्सीय शाखा में बुध को मष्तिष्क, नर्वस-सिस्टम, गला, नसें, त्वचा, बोलने की क्षमता, याददाश्त आदि का प्रतिनिधित्व बुध ही करता है इसलिए यदि कुंडली में बुध कमजोर या पीड़ित हो तो व्यक्ति को कुछ विशेष स्वास्थ समस्यायों का सामना करना पड़ता है –

यदि कुंडली में बुध नीच राशि (मीन) में हो, छटे या आठवे भाव में स्थित हो, केतु या मंगल से पीड़ित हो, सूर्य के साथ समान अंश पर होने से पूर्णासत हो, षष्टेश अष्टमेश से पीड़ित हो या अन्य किसी भी प्रकार जब बुध बहुत कमजोर या पीड़ित हो ऐसे में व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता अधिक अच्छी नहीं होती सोचने समझने में समस्या होती है, शिक्षा में बाधा आती है, व्यक्ति व्यव्हार कुसाहल नहीं बन पाता और बहुत सी स्वास्थ समस्याएं जैसे त्वचा संबंधी समस्याएं हकलाहट या शब्दों को स्पष्ट रूप से ना बोल पाने की समस्या, नर्वससिस्टम और नसों से जुडी समस्याएं आदि भी संभावित होती है . . .

तो इस प्रकार यदि कुंडली में बुध कमजोर होने पर विभिन्न समस्याओं का सामना हो तो ऐसी में ये दस उपाय आपकी कुंडली में स्थित बुध को बली करने में बहुत सहायक होते हैं और चमत्कारिक प्रभाव दिखाते हैं –

दस अचूक उपाय –

1. प्रत्येक बुधवार को मोतीचूर के दो लड्डू गणेश जी को मंदिर में अर्पित करें।

2. ॐ ब्राम ब्रीम ब्रोम सः बुधाय नमः की एक माला रोज जाप करें।

3. हरी इलायची का दिन में दो तीन बार सेवन करें।

4. प्रत्येक बुधवार को गाय को हरा चारा खिलाएं।

5. घर में हरे पौधे लगाएं और उनकी देखभाल करें।

6. पक्षियों को रोज भोजन दें।

7. घर के पूजास्थल में बुद्धयान्त्र स्थापित करें।

8. महीने के एक बुधवार को साबुत मूंग की खिचड़ी गरीबों में बाटें।

9. प्रत्येक बुधवार को अपने घर की उत्तर दिशा में गाय के घी का दिया जलाएं।

10. किसी ज्योतिषी की सलाह के बाद पन्ना रत्न भी धारण कर सकते हैं।

तो यदि आपकी कुंडली में बुध कमजोर या पीड़ित स्थिति में है तो निश्चित ही ये उपाय आपके लिए बहुत सहायक होंगे और आपके बुध को बहुत बल प्रदान करेंगे।

।।श्री हनुमते