Tuesday, September 5, 2017

तलाक के ज्योतिषीय कारण (Astrological Reasons for Divorce)


बृहस्पति एवं शुक्र का दाम्पत्य जीवन पर प्रभाव
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बृहस्पति और शुक्र दो ग्रह हैं जो पुरूष और स्त्री का प्रतिनिधित्व करते हैं.मुख्य रूप ये दो ग्रह वैवाहिक जीवन में सुख दु:ख, संयोग और वियोग का फल देते हैं बृहस्पति और शुक्र दोनों ही शुभ ग्रह हैं (Venus and Jupiter are benefic planets).सप्तम भाव जीवन साथी का घर होता है (7th House is of the spouse).इस घर में इन दोनों ग्रहों की स्थिति एवं प्रभाव के अनुसार विवाह एवं दाम्पत्य सुख का सुखद अथवा दुखद फल मिलता है.पुरूष की कुण्डली में शुक्र ग्रह पत्नी एवं वैवाहिक सुख का कारक होता है और स्त्री की कुण्डली में बृहस्पति.ये दोनों ग्रह स्त्री एवं पुरूष की कुण्डली में जहां स्थित होते हैं और जिन स्थानों को देखते हैं उनके अनुसार जीवनसाथी मिलता है और वैवाहिक सुख प्राप्त होता है.
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ज्योतिषशास्त्र का नियम है कि बृहस्पति जिस भाव में होता हैं उस भाव के फल को दूषित करता है (Jupiter has bad effect on the house it is in) और जिस भाव पर इनकी दृष्टि होती है उस भाव से सम्बन्धित शुभ फल प्रदान करते हैं.जिस स्त्री अथवा पुरूष की कुण्डली में गुरू सप्तम भाव में विराजमान होता हैं उनका विवाह या तो विलम्ब से होता है अथवा दाम्पत्य जीवन के सुख में कमी आती है.पति पत्नी में अनबन और क्लेश के कारण गृहस्थी में उथल पुथल मची रहती है.
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दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने में बृहस्पति और शुक्र का सप्तम भाव और सप्तमेश से सम्बन्ध महत्वपूर्ण होता है (Jupiter & Venus relationship with seventh house).जिस पुरूष की कुण्डली में सप्तम भाव, सप्तमेश और विवाह कारक ग्रह शुक बृहस्पति से युत या दृष्ट होता है उसे सुन्दर गुणों वाली अच्छी जीवनसंगिनी मिलती है.इसी प्रकार जिस स्त्री की कुण्डली में सप्तम भाव, सप्तमेश और विवाह कारक ग्रह बृहस्पति शुक्र से युत या दृष्ट होता है उसे सुन्दर और अच्छे संस्कारों वाला पति मिलता है.
शुक्र भी बृहस्पति के समान सप्तम भाव में सफल वैवाहिक जीवन के लिए शुभ नहीं माना जाता है.सप्तम भाव का शुक्र व्यक्ति को अधिक कामुक बनाता है जिससे विवाहेत्तर सम्बन्ध की संभावना प्रबल रहती है.विवाहेत्तर सम्बन्ध के कारण वैवाहिक जीवन में क्लेश के कारण गृहस्थ जीवन का सुख नष्ट होता है.बृहस्पति और शुक्र जब सप्तम भाव को देखते हैं अथवा सप्तमेश पर दृष्टि डालते हैं (Jupiter & Venus aspect the seventh lord) तो इस स्थिति में वैवाहिक जीवन सफल और सुखद होता है.लग्न में बृहस्पति अगर पापकर्तरी योग (Papkartari Yoga) से पीड़ित होता है तो सप्तम भाव पर इसकी दृष्टि का शुभ प्रभाव नहीं होता है ऐसे में सप्तमेश कमज़ोर हो या शुक्र के साथ हो तो दाम्पत्य जीवन सुखद और सफल रहने की संभावना कम रहती है.
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तलाक के ज्योतिषीय कारण (Astrological Reasons for Divorce)
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वर्तमान समय में जब स्त्री-पुरुष कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे हों वहाँ अब तलाक शब्द ज्यादा सुनाई देने लगा है. इसका एक कारण सहनशीलता का अभाव भी है. इस भाग-दौड़ भरी जिन्दगी में सभी मशीन बन गये हैं. काम की अधिकता ने सहनशक्ति में भी कमी कर दी है. लड़कियाँ अपने पैरों पर खड़े होने लगी है और उन्हें भी लगता है कि वह आजीविका में बराबर की हिस्सेदार है तो वह अपने साथी के सामने क्यूँ झुके! हालांकि यह एक तरह से अहंकार है और कुछ नहीं. बहुत बार पुरुष की मनमानी से तंग होकर घर में क्लेश बढ़ जाते हैं. बहुत से कारण बन जाते हैं तलाक के, जिन्हें अलग रहना हो वह कोई ना कोई बहाना ढूंढ ही लेते हैं.
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तलाक के कारणों का आज हम ज्योतिषीय
आधार पर विश्लेषण करने का प्रयास करते हैं.
कुंडली में ऎसे कौन से योग हैं जिनके आधार व्यक्ति का तलाक हो जाता है या किन्हीं कारणो से पति-पत्नी एक-दूसरे से अलग रहना आरंभ कर देते हैं.
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1. जन्म कुंडली में लग्नेश व चंद्रमा से सप्तम भाव के स्वामी ग्रह शुक्र ग्रह की स्थिति से प्रतिकूल स्थिति में स्थित हों.
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2. कुंडली में चतुर्थ भाव का स्वामी छठे भाव में स्थित हो या छठे भाव का स्वामी चतुर्थ भाव में हो तब यह अदालती तलाक दर्शाता है अर्थात पति-पत्नी का तलाक कोर्ट केस के माध्यम से होगा.
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3. बारहवें भाव के स्वामी की चतुर्थ भाव के स्वामी से युति हो रही हो और चतुर्थेश कुंडली के छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो तब पति-पत्नी का अलगाव हो जाता है.
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4. अलगाव देने वाले ग्रह शनि, सूर्य तथा राहु का सातवें भाव, सप्तमेश और शुक्र पर प्रभाव पड़ रहा हो या सातवें व आठवें भावों पर एक साथ प्रभाव पड़ रहा हो.
जन्म कुंडली में सप्तमेश की युति द्वादशेश के साथ सातवें भाव या बारहवें भाव में हो रही हो.
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5. सप्तमेश व द्वादशेश का आपस में राशि परिवर्तन हो रहा हो और इनमें से किसी की भी राहु के साथ हो रही हो.
सप्तमेश व द्वादशेश जन्म कुंडली के दशम भाव में राहु/केतु के साथ स्थित हों.
जन्म लग्न में मंगल या शनि की राशि हो और उसमें शुक्र लग्न में ही स्थित हो, सातवें भाव में सूर्य, शनि या राहु स्थित हो तब भी अलगाव की संभावना बनती है.
जन्म कुंडली में शनि या शुक्र के साथ राहु लग्न में स्थित हो. जन्म कुंडली में सूर्य, राहु, शनि व द्वादशेश चतुर्थ भाव में स्थित हो.
जन्म कुंडली में शुक्र आर्द्रा, मूल, कृत्तिका या ज्येष्ठा नक्षत्र में स्थित हो तब भी दांपत्य जीवन में अलगाव के योग बनते हैं
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6. कुंडली के लग्न या सातवें भाव में राहु व शनि स्थित हो और चतुर्थ भाव अत्यधिक पीड़ित हो या अशुभ प्रभाव में हो तब तब भी अलग होने के योग बनते हैं.
शुक्र से छठे, आठवें या बारहवें भाव में पापी ग्रह स्थित हों और कुंडली का चतुर्थ भाव पीड़ित अवस्था में हो.
षष्ठेश एक अलगाववादी ग्रह हो और वह दूसरे, चतुर्थ, सप्तम व बारहवें भाव में स्थित हो तब भी अलगाव होने की संभावना बनती है.
जन्म कुंडली में लग्नेश व सप्तमेश षडाष्टक अथवा द्विद्वार्दश स्थितियों में हों तब पति-पत्नी के अलग होने की संभावना बनती है.
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बुध केतु भी डालते हैं रिश्तों में दरार
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बुध (Mercury) बुद्धिमत्ता (intelligence) का ग्रह है , वाणी (speech), संवाद (communication) , लेखन (writing), तर्क शक्ति और व्यवसायिक चातुर्य भी बुध के ही अधिपत्य में आते है। व्यक्ति अगर बुद्धि चातुर्य के साथ साथ अच्छा लेखक है , बहुत अच्छा वक्ता है और साथ ही उसकी भाषा पर बहुत अच्छी पकड़ है , तो वो अपनी इन क्षमताओं का उपयोग अच्छे व्यक्तिगत और व्यवसायिक सम्बन्ध बनाने में कर सकता है। बुध प्रधान व्यक्ति हाजिर जवाब होने के साथ साथ अच्छा मित्र भी होता है क्योंकि वो सम्बन्धो को निभाना जानता है।
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केतु एक विभाजित करने वाला (separative) ग्रह , एक संत की तरह जो अकेले रहता है , सुख सुविधाओं और भोग -विलास से पूर्णतः दूर , रिश्तों और उनमे संवाद (communication) की जंहा कोई आवष्यकता नहीं। केतु का स्वभाव बुध से पूर्णतः विपरीत है , केतु जब भी किसी ग्रह के साथ होता है तो उसे उसके फल देने से भटकाता है ,बुध (Mercury) का प्रमुख फल बुद्दि (मति) प्रदान करना है , इसलिए बुध – केतु योग को मति भ्रम योग कहते है। केतु और बुध की युति का भी फल इसी प्रकार बुद्धि को भ्रमित करने वाला होता है , हालांकि किस राशि और कुंडली (horoscope) के किस भाव में ये योग बना है इस बात पर भी फल निर्भर करता है।
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इस योग में बुध (Mercury) के प्रभाव दूषित हो जाते है जैसे बुध की प्रबल होने की परिस्थिति में कोई व्यक्ति बहुत अच्छा वक्ता है तो केतु के साथ आने की परिस्थिति में अर्थ हीन , डींगे हांकने वाला और आवश्यकता से अधिक बोलने वाला हो सकता है , कई बार उसके व्यक्तव्य उसी के लिए परेशानी खड़ी करने वाले हो सकते है (वाणी पर नियंत्रण होना) , यही हाल उसकी वाणिज्यिक योजनाओं का हो सकता है , उसके समीकरण और योजनाएं सत्य से परे हो सकते है जो उसके लिए परेशानी का कारन बन सकते है, या कहे बुद्धि की भ्रमित होने की परिस्थिति का निर्मित होना । उदहारण के लिए आर्थिक परिस्थिति को जांचे बिना व्यापारिक योजना बनाना और आर्थिक स्थिति का ध्वस्त होना । विचारधारा का संकुचित होना पर सोचा का अत्यधिक संवेदनशील होना , हमेशा अज्ञात भय रहना और वाणी पर नियंत्रण न होना
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बुध केतु योग में बुध बहुत कमजोर हो तो व्यक्ति कम बोलने वाला , संकोची और अपने पक्ष या मन की बात को स्पष्ट रूप से नहीं रख पाने वाला होगा। ऐसे लोग बड़े एकाकी होते है , आपसी रिश्तों में संवाद (communication ) की कमी के चलते और संकोच के कारन अपनी योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं कर पाते साथ ही व्यापारिक का क्रियान्वयन भी नहीं हो पता। रिश्तों में कई बार धोखा होने की सम्भावना बनी रहती है , विशेषकर व्यवसायिक।
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बुध – केतु योग में आर्थिक उतार – चढाव बहुत बार देखा गया है , जिसका कारण बिना परिस्थितियों को समझे निवेश या खर्च करना होता है और व्यापारिक दृष्टिकोण का आभाव। कई बार ये लोग मीत व्ययी और कई बार अति व्ययी हो जाते है , बहुत सी परिस्थितियों में जब बुध अत्यन्त ही कमजोर और दुःस्थान में हो तब ये योग गम्भीर एकाकीपन (loneliness), गम्भीर मानसिक अवसाद (depression), जेल योग (या लम्बे समय तक हास्पिटल /सुधार ग्रह तक में रहने की नौबत ला देता है। इस योग की वजह से व्यक्ति दूसरों की बात और सलाह को स्वीकार करने या समझने की परिस्थिति से अत्यन्त दूर होता है जो उसकी आर्थिक परेशानी और एकाकीपन का कारन भी बनता है।
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इस दुर्योग से बचने के बहुत से तरीके हो सकते है परन्तु मेरी सोच में सबसे सटीक उपाय है , अधिक से अधिक सामाजिक होने की चेष्टा करना और दूसरों की सलाह ले कर आगे बढ़ना , साथ ही धन के निवेश या कोई भी योजना बनते समय सतर्क रहना।

बुद्धिके देवता भगवान श्री गणेश की आराधना इस दुर्योग से बचाने का कार्य करती है, अतः विघ्न हर्ता बुद्धि के दाता श्रीगणेश की आराधना करते रहे। ऐसे योग में हाथीदाँत से निर्मित सिल्वर रिंग को धारण करने से बुध केतु के दुष्प्रभाव को कम किया जा सकता है।


कुंडली में मंगल शुक्र युति का फल


कुंडली में मंगल शुक्र युति का फल
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आज के आधुनिक युग में जितना महत्व इन दोनों के योग को दिया जाता है उतना शायद अन्य किसी के योग को नही | जैसा की आपको पता चल रहा है और वर्तमान समय में भक्ति के स्थान पर काम भावना भोग विलास ज्यादा हावी है | ऐसे में लगभग हर इंसान एक अच्छे भोग विलास का आनन्द लेना चाहता है तो इन दोनों का योग जातक के अंदर ज्यादा काम भावना देता है | शुक्र जातक को हर प्रकार का भोतिक सुख देता है और मुख्य रूप से काम सुख का कारक होता है लेकिन जब तक शरीर में मंगल की उतेजना न हो उस सुख का पूर्ण आनन्द जातक के द्वारा नही लिया जा सकता | शुक्र पुरुष की कुंडली में पत्नी का कारक होता है तो मंगल स्त्री की कुंडली उसके पुरुष मित्र का कारक होता है और इसी कारक यदि पुरुष की कुंडली में ये योग हो और शुभ सिथ्ती में हो तो उसे स्त्री वर्ग से विशेष सुख दिलाता है जबकि स्त्री की कुंडली में उसके पुरुष मित्रों से सुख दिलवाता है लेकिन स्त्री की कुंडली में ये पति पत्नी के विचार आपस में बहुत कम मिलने देता है और दोनों में आपसी तनाव पैदा करता है क्योंकि मंगल अंहकार कका कारक ग्रह भी होता है ऐसे में महिला जातक में अंहकार की भावना सामान्य से ज्यादा होती है ।
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मंगल हमारे शरीर में खून का कारक ग्रह है और शुक्र वीर्य का | जब तक शरीर में खून की उचित मात्रा नही होगी वीर्य की कमी का सामना जातक को करना पड़ जाता है।
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शुक्र घी तो मंगल शहद होता है और जैसे अलग अलग बीमारियों में इन दोनों का अनुपान भेद से प्रयोग किया जाता है लेकिन जब इन दोनों को समान मात्रा में मिला दिया जाता है तो वो जहर बन जाता है इसीप्रकार जैसे इन दोनों का योग लाभ देता है तो इन दोनों का योग हानिकारक भी बन जाता है और जब इनका योग दुष्फल दे रहा हो तो जातक चरित्र हीन हो जाता है | इन दोनों की युति लग्न में हो और त्रिसांस कुंडली में भी इनका सम्बन्ध बन रहा हो तो जातक या जातिका के पराये मर्द स्त्री से सम्बन्ध बनने के चांस बहुत ज्यादा रहते है \ शुक्र शरीर में वीर्य है तो वीर्य बढाने वाली बहुत सी दवाइयां शहद {मंगल } के साथ ली जाती है | शरीर में उतेजना जोश मंगल ही देता है |
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इन दोनों का योग हो और उसे बृहस्पति देखें तो बहुत ही उत्तम लक्ष्मी होगी जो सभी के काम आएगी इसी प्रकार इन दोनों के योग पर चन्द्र की नजर हो तो भी उत्तम फल मिलेगा | लेकिन इन दोनों के साथ ही चन्द्र भी आ जाए तो जातक को अंत्यंत चंचल परवर्ती का बना देता है और जातक पर स्त्री या पर पुरुष की तरफ बहुत जल्दी आकर्षित हो जाता है।
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यदि इन दोनों के साथ ही बुद्ध हो या फिर पापी ग्रह शनी राहू या केतु की दृष्टी हो तो इन दोनों का योग शुभ फल देने में सक्षम नही रहता | ऐसे में जातक को अवैध सम्बन्ध के कारण कई बार बदनामी तक का सामना करना पड़ जाता है।
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रिश्तोंमें हम देखें तो शुक्र पत्नी तो मंगल भाई यानी की देवर भाभी का साथ और आपको पता है की इन दोनों का रिश्ता समाज में कैसा माना जाता है |
ऐसे हम इस प्रकार समझे की जैसे देवर भाभी इस साथ बैठे हुवे है उनको माता जी चन्द्र या दादा जी गुरु देख रहे है तो उनको किसी भी प्रकार की परेशानी नही होगी और दोनों अच्छी तरह से काम करेंगे लेकिन यदि उन्हें कोई नीच परवर्ती का इंसान राहू देख रहा हो तो वो उन दोनों के बारे गलत अफवाह भी उड़ा सकता सकता है और इन दोनों के मन में भी भी रहेगा की ये इंसान बदनामी करवा सकता है | इसी प्रकार यदि कुंडली में मंगल बद्द हो तो भी इनका योग शुभ फल नही मिलता जैसे की भट्टे की जली हुई मिटटी किसी काम में नही आती \इन दोनों के योग को तंदूर की मिटटी भी कारक होता है इसिलिय जब कुंडली में मंगल या इन दोनों का योग खराब फल दे रहा हो तो तंदूर पर बनी हुई मीठी रोटी कुतों को डालने का उपाय बताया जाता है |
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शरीर में इन दोनों के योग का खराब फल मिलने पर खून का बहना जैसे की लेडीज को मासिक धर्म अधिक आना या किसी भी तरह से खून का अधिक बहना जैसे की नकसीर आदि की समस्या हो जाती है \ पुरुष जातक को ये अत्याधिक कामुक स्वभाव का बना देता है जिस से जातक समय से पहले अपनी ऊर्जा को खत्म कर शारीरिक कमजोरी का सामना करता है |
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यदि हम कालपुरुष की कुंडली देखें तो मंगल लग्न का मालिक होता है और शुक्र धन परिवार और पत्नी के भाव का मालिक होता है इसिलिय इन दोनों के अधिकतर शुभ फल ही माने जाते है लेकिन हमे ये भी ध्यान रखना पड़ता है की दूसरा और सप्तम दोनों भाव मारक भाव भी होते है तो मंगल साथ में अस्ठ्म भाव का भी मालिक होता है ऐसे में इनका योग जितना शुभ फल दे सकता है उतना ही अशुभ फल भी | ये फल कुंडली में इस बात पर निर्भर करेगा की किस भाव में किस राशि में ये योग बन रहा है और अन्य ग्रहों से इनका कैसा सम्बन्ध बन रहा है |

Monday, September 4, 2017

कैसा फल देता है शनि का अन्य ग्रहों से योग


कैसा फल देता है शनि का अन्य ग्रहों से योग -
खगोलीय दृष्टि से शनि हमारे सोलर सिस्टम में सूर्य से सबसे दूर स्थित ग्रह है। ज्योतिष में वर्णित बारह राशियों में शनि को "मकर" और "कुम्भ" राशि का स्वामी मना गया है   शनि की उच्च राशि "तुला" तथा नीच राशि "मेष" मानी गयी है शनि को एक क्रोधित ग्रह के रूप में दर्शाया गया है। शनि का वर्ण काला है। शनि की गति नवग्रहों में सबसे धीमी है इसी लिए शनि एक राशि में ढाई वर्ष तक रहता है और बारह राशियों के चक्र को तीस साल में पूरा करता है। ज्योतिष में शनि को - कर्म, आजीविका, जनता, सेवक, नौकरी, अनुशाशन, दूरदृष्टि, प्राचीन-वस्तु, लोहा, स्टील, कोयला, पेट्रोल, पेट्रोलयम प्रोडक्ट, मशीन, औजार, तपश्या और अध्यात्म का करक मन गया है। स्वास्थ की दृष्टि से शनि हमारे पाचन-तंत्र, हड्डियों के जोड़, बाल, नाखून,और दांतों को नियंत्रित करता है। जन्मकुण्डली में यदि शनि का यदि अन्य ग्रहों से योग हो तो भिन्न भिन्न प्रकार के फल व्यक्ति को प्राप्त होते हैं आईये उन्हें जानते हैं …………

शनि + सूर्य -
कुण्डली में शनि और सूर्य का योग बहुत शुभ नहीं माना गया है यह जीवन में संघर्ष बढ़ाने वाला योग माना गया है फलित ज्योतिष में सूर्य, शनि को परस्पर शत्रु ग्रह माना गया है कुंडली में शनि और सूर्य का योग होने पर व्यक्ति को आजीविका पक्ष में संघर्ष का सामना करना पड़ता है विशेष रूप से करियर का आरंभिक पक्ष संघर्षपूर्ण होता है और यदि शनि अंशों में सूर्य के बहुत अधिक निकट हो तो आजीविका में बार बार उत्तर चढाव रहते है, शनि और सूर्य का योग होने पर जातक को या तो पिता के सुख में कमी होती है या पिता के साथ वैचारिक मतभेद रहते हैं, यदि शनि और सूर्य का योग शुभ भाव में बन रहा हो तो ऐसे में संघर्ष के बाद सरकारी नौकरी का योग बनता है।
शनि + चन्द्रमाँ -
कुंडली में शनि और चन्द्रमाँ का योग होने पर व्यक्ति मानसिक रूप से हमेशा परेशान रहता है मानसिक अस्थिरता की स्थिति रहती है, इस योग के होने पर नकारात्मक विचार, डिप्रेशन, एंग्जायटी और अन्य साइकैट्रिकल समस्याएं उत्पन्न होती हैं व्यक्ति एकाग्रता की कमी के कारण अपने कार्यों को करने में समस्या आती है, यह योग माता के सुख में कमी या वैचारिक मतभेद भी उत्पन्न करता है पर यदि शनि चन्द्रमाँ का योग शुभ भाव में बन रहा हो तो ऐसे में विदेश यात्रा या विदेश से जुड़कर आजीविका का योग भी बनता है।
शनि + मंगल -
कुंडली में शनि मंगल का योग करियर के लिए संघर्ष देने वाला होता है करियर की स्थिरता में बहुत समय लगता है और व्यक्ति को बहुत अधिक पुरुषार्थ करने पर ही करियर में सफलता मिलती है शनि मंगल का योग व्यक्ति को तकनीकी कार्यों जैसे इंजीनियरिंग आदि में आगे ले जाता है और यह योग कुंडली के शुभ भावों में होने पर व्यक्ति पुरुषार्थ से अपनी तकनीकी प्रतिभाओं के द्वारा सफलता पाता है, शनि मंगल का योग यदि कुंडली के छटे या आठवे भाव में हो तो स्वास्थ में कष्ट उत्पन्न करता है शनि मंगल का योग विशेष रूप से पाचनतंत्र की समस्या, जॉइंट्स पेन और एक्सीडेंट जैसी समस्याएं देता है।
शनि + बुध -
शनि और बुध का योग शुभ फल देने वाला होता है कुंडली में शनि बुध एक साथ होने पर ऐसा व्यक्ति गहन अध्ययन की प्रवर्ति रखने वाला होता है और प्राचीन वस्तुओं, इतिहास और गणनात्मक विषयों में रुचि रखने वाला होता है और व्यक्ति प्रत्येक बात को तार्किक दृष्टिकोण से देखने वाला होता है, कुंडली में शनि बुध का योग व्यक्ति को बौद्धिक, गणनात्मक और वाणी से जुड़े कार्यों में सफलता दिलाता है।
शनि + बृहस्पति -
शनि और बृहस्पति के योग को बहुत अच्छा और शुभ फल देने वाला माना गया है कुंडली में शनि बृहस्पति एक साथ होने पर व्यक्ति अपने कार्य को बहुत समर्पण भाव और लगन के साथ करने वाला होता है यह योग आजीविका की दृष्टि से बहुत शुभ फल देने वाला होता है व्यक्ति अपने आजीविका क्षेत्र में सम्मान और यश तो प्राप्त करता ही है पर शनि बृहस्पति का योग होने पर व्यक्ति अपने कार्य क्षेत्र में कुछ ऐसा विशेष करता है जिससे उसकी कीर्ति बहुत बढ़ जाती है। कुंडली में शनि और बृहस्पति का योग होने पर ऐसे व्यक्ति के करियर या आजीविका की सफलता में उसके गुरु का बहुत बड़ा विशेष योगदान होता है, यह योग धार्मिक, समाजसेवा और आध्यात्मिक कार्यों से व्यक्ति को जोड़कर परमार्थ के परग पर भी ले जाता है।
शनि + शुक्र -
शनि और शुक्र का योग बहुत शुभ माना गया है कुंडली में शनि और शुक्र का योग होने पर व्यक्ति रचनात्मक या कलात्मक कार्यों से सफलता पाता है जीवन में आजीविका के द्वारा अच्छी धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है, व्यक्ति विलासिता पूर्ण कार्यों से आजीविका चलाता है यदि पुरुष जातक की कुंडलीं में शनि शुक्र का योग हो तो ऐसे व्यक्तियों के जीवन में उनके विवाविवाह के बाद विशेष उन्नति और भाग्योदय होता है तथा उनकी पत्नी जीवन निर्वाह में विशेष सहायक होती है।
शनि + राहु -
शनि और राहु का योग कुंडली में होने पर व्यक्ति चातुर्य और तर्क से अपने कार्य सिद्ध करने वाला होता है ऐसे में व्यक्ति को आकस्मिक धन प्राप्ति वाले कार्यों से लाभ होता है व्यक्ति अपनी मुख्य आजीविका से अलग भी गुप्त रूप से धन लाभ प्राप्त करता है और शुभ प्रभाव के आभाव में यह योग व्यक्ति को छल के कार्यों से भी जोड़ देता है।
शनि + केतु -
शनि और केतु का योग बहुत संघर्षपूर्ण योग माना गया है कुंडली में यदि शनि और केतु एक साथ हों तो ऐसे में व्यक्ति की आजीविका या करियर बहुत संघर्ष पूर्ण होता है व्यक्ति को पूरी मेहनत करने पर भी आपेक्षित परिणाम नहीं मिलते, कई बार व्यक्ति अपनी आजीविका का क्षेत्र बदलने पर मजबूर हो जाता है, यह योग व्यक्ति में आध्यात्मिक दृष्टिकोण भी उत्पन्न करता है, यदि कुंडली में अन्य अच्छे योग भी हों तो भी व्यक्ति के करियर की स्थिति तो अस्थिर ही बनी रहती है, शनि केतु का योग व्यक्ति को पाचनतंत्र, जोड़ो के दर्द और आंतो से जुडी समस्याएं भी देता है।
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जन्म-समय और आपका सूर्य


जन्म-समय सुबह 4 से 6 बजे
आपका सूर्य पहले घर में मौजूद है। यह आपको अच्छा
स्वास्थ्य और आत्मविश्वास दे रहा है। आप किसी
भी बात को लेकर दृढ़ संकल्पित रहते हैं और आपका
भविष्य अच्छा है।
जन्म समय सुबह 6 से 8 बजे
आपका सूर्य 12वें घर में है, यह आपकी
जिंदगी में ऐसे रहस्यपूर्ण बदलाव लाएगा
जिसकी व्याख्या करना मुश्किल है। सख्त दिनचर्या
अपनाएं और अपने दिमाग को शांत बनाए रखें। आय के मुकाबले
खर्च अधिक हो सकते हैं।
जन्म समय सुबह 8 से 10 बजे
आपका सूर्य 11वें घर में है। इसके मायने हैं कि आपके ढेर सारे
दोस्त होंगे, सामाजिक संबंध बनाने के लिए आपको पैसों
की जरूरत होगी। ज्यादातर समय
शुभचिंतकों और दोस्तों से हाल-चाल जानने में ही
बीतेगा। आपको लगेगा कि आप जितने के हकदार हैं,
उससे कहीं अधिक हासिल कर रहे हैं।
जन्म समय सुबह 10 से 12 बजे
आपका सूर्य 10वें घर में मौजूद है। पश्चिमी और
भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह सूर्य का
सबसे महत्वपूर्ण स्थान है। आप अपने प्रोजेक्ट्स और
प्लान्स को सफलतापूर्वक पूरा करेंगे। आप सर्वश्रेष्ठ साबित होंगे।
शक्ति का दुरुपयोग आपको परेशानी में डाल सकता है।
जन्म समय दोपहर 12 से 2 बजे
आपका सूर्य 9वें घर में है। यह स्थिति आपके यात्रा से
भरी जिंदगी जीने, दार्शनिक,
धार्मिक, तेज दिमाग, परोपकारी स्वभाव और प्रसिद्ध
होने की ओर संकेत करती है। 9वां घर
अच्छे भविष्य का है और आप भाग्य को अपने ऊपर मुस्कुराता
महसूस कर सकते हैं। आपका स्वभाव परोपकार और दयालुता से
भरा है।
जन्म समय दोपहर 2 से शाम 4 बजे
आपका सूर्य आठवें घर में है जो कि मुद्रा संबंधी
मामलों जैसे ऋण, ट्रस्ट, सार्वजनिक फंड, बैंक आदि में खास
दखल होने का संकेतक है। कई ज्योतिषी इसे सेक्स
और दुर्घटनाओं से भी जोड़कर देखते हैं।
कानूनी मसलों का सामना करना पड़ सकता है।
जन्म समय शाम 4 से 6 बजे
आपका सूर्य सातवें घर में है, जिसे सामान्यत: साझेदारियों का घर
कहा जाता है। शादी आपको दूसरे लोगों के मुकाबले
अधिक प्रभावित करेगी। इसलिए इसे सफल बनाने का
प्रयास करें, भले ही इसके लिए आपको कठिन
मेहनत क्यों न करनी पड़े। ऐसे पेशे या व्यवसाय को
चुनें जो आपको लोगों से सीधे संपर्क करने
की आजादी देता हो। चूंकि सातवां घर
आपके दुश्मनों का भी है, ऐसे में कानूनी
दिक्कत आ सकती हैं।
जन्म समय शाम 6 से रात्रि 8 बजे
आपका सूर्य छठवें घर में है, इसका मतलब यह है कि
आपकी जिंदगी का बहुत कुछ साथियों और
अधीनस्थों से आपको मिलने वाले सहयोग पर निर्भर
करेगा। यह समाजसेवा की ओर भी संकेत
करता है और आपको लोगों के स्वास्थ्य पर ध्यान देना होगा।
अत्यधिक सतर्कता और परिश्रमी होने
की आपकी आदत आपको लंबे समय तक
कामयाबी और सम्मान दिलाएगी।
जन्म समय रात्रि 8 से 10 बजे
आपका सूर्य पांचवें घर में मौजूद है जो आपको कलाकार
वाली क्षमता और कौशल देगा। यह आपको
जिंदगी के प्रति आशावादी नजरिया और मौके
तलाशने की इच्छाशक्ति देगा। आपकी रुचि
व्यवसाय में तब्दील हो सकती है। आप
स्टेज और वास्तविक जिंदगी, दोनों में अभिनय करने वाले
महान प्रेमी साबित हो सकते हैं, लेकिन इसके
अतिरेक से बचें।
जन्म समय रात्रि 10 से 12 बजे
आपका सूर्य चौथे घर में है जो घर और संपत्ति के लिहाज से
बेहतरीन स्थान है। आप जमीन, रियल
एस्टेट से लाभ अर्जित कर सकते हैं। आपके अभिभावक
आपकी जिंदगी को बनाने या बिगाड़ने में
उल्लेखनीय भूमिका निभा सकते हैं।
जन्म समय रात्रि 12 से 2 बजे
आपका सूर्य तीसरे घर में मौजूद है जो
आपकी बौद्धिक क्षमता, यात्रा करने की
चाहत और उच्च स्तर के रोमांच को दर्शाता है। आप पत्रकारिता या
टीवी जर्नलिज्म से जुड़ सकते हैं।
आपके भाई-बहन और पड़ोसी या तो आपको बना देंगे
या बिगाड़ देंगे, लेकिन यह निश्चित है कि इनका आपके
जीवन पर गहरा प्रभाव रहेगा। सूर्य की
स्थिति आपको बेहतरीन सामाजिक जीवन
देगी।
जन्म समय रात्रि 2 से तड़के 4 बजे
आपका सूर्य दूसरे घर में है। यह वित्त और परिवार का घर है।
इसका मतलब है कि आप पैसे बनाने में कामयाब होंगे, भले
ही आप इसे संभाल न पाएं। भारतीय
ज्योतिष में दूसरे घर को वाककला और भोजन का घर माना जाता है।
आप एक महान वक्ता हो सकते हैं, आपके पास पैसा
भी होगा।

Saturday, September 2, 2017

द्वादस भावों मे शनि फलित


द्वादस भावों मे शनि फलित
जन्म कुंडली के बारह भावों मे जन्म के समय शनि अपनी गति और जातक को दिये जाने वाले फ़लों के प्रति भावानुसार जातक के जीवन के अन्दर क्या उतार और चढाव मिलेंगे, सबका वृतांत कह देता है।

प्रथम भाव मे शनि
शनि मन्द है और शनि ही ठंडक देने वाला है,सूर्य नाम उजाला तो शनि नाम अन्धेरा, पहले भाव मे अपना स्थान बनाने का कारण है कि शनि अपने गोचर की गति और अपनी दशा मे शोक पैदा करेगा,जीव के अन्दर शोक का दुखमिलते ही वह आगे पीछे सब कुछ भूल कर केवल अन्धेरे मे ही खोया रहता है।शनि जादू टोने का कारक तब बन जाता है, जब शनि पहले भाव मे अपनी गति देता है, पहला भाव हीऔकात होती है, अन्धेरे मे जब औकात छुपने लगे, रोशनी से ही पहिचान होती है और जब औकात छुपी हुई हो तो शनि का स्याह अन्धेरा ही माना जा सकता है। अन्धेरे के कई रूप होते हैं, एक अन्धेरा वह होता है जिसके कारण कुछ भी दिखाई नही देता है, यह आंखों का अन्धेरा माना जाता है, एक अन्धेरा समझने का भी होता है, सामने कुछ होता है, और समझा कुछ जाता है, एक अन्धेरा बुराइयों का होता है, व्यक्ति या जीव की सभी अच्छाइयां बुराइयों के अन्दर छुपने का कारण भी शनि का दिया गया अन्धेरा ही माना जाता है, नाम का अन्धेरा भे होता है, किसी को पता ही नही होता है, कि कौन है और कहां से आया है, कौन माँ है और कौन बापहै, आदि के द्वारा किसी भी रूप मे छुपाव भी शनि के कारण ही माना जाता है, व्यक्ति चालाकी का पुतला बन जाता है प्रथम भाव के शनि के द्वारा.शनि अपने स्थान से प्रथम भाव के अन्दर स्थिति रख कर तीसरे भाव को देखता है, तीसरा भाव अपने से छोटे भाई बहिनो का भी होता है, अपनी अन्दरूनी ताकत का भी होता है, पराक्रम का भी होता है, जो कुछ भी हम दूसरों से कहते है, किसी भी साधन से, किसी भी तरह से शनि के कारण अपनी बात को संप्रेषित करने मे कठिनाई आती है, जो कहा जाता है वह सामने वाले को या तो समझ मे नही आता है, और आता भी है तो एक भयानक अन्धेरा होने के कारण वह कही गयी बात को न समझने के कारण कुछ का कुछ समझ लेता है, परिणाम के अन्दर फ़ल भी जो चाहिये वह नही मिलता है, अक्सर देखा जाता है कि जिसके प्रथम भाव मे शनि होता है, उसका जीवन साथी जोर जोर से बोलना चालू कर देता है, उसका कारण उसके द्वारा जोर जोर से बोलने की आदत नही, प्रथम भाव का शनिसुनने के अन्दर कमी कर देता है, और सामने वाले को जोर से बोलने पर ही या तो सुनायी देता है, या वह कुछ का कुछ समझ लेता है, इसी लिये जीवन साथी के साथ कुछ सुनने और कुछ समझने के कारण मानसिक ना समझी का परिणाम सम्बन्धों मे कडुवाहट घुल जाती है, और सम्बन्ध टूट जाते हैं। इसकी प्रथम भाव से दसवी नजर सीधी कर्म भाव पर पडती है, यही कर्म भाव ही पिता का भाव भी होता है।जातक को कर्म करने और कर्म को समझने मे काफ़ी कठिनाई का सामना करना पडता है, जब किसी प्रकार सेकर्म को नही समझा जाता है तो जो भी किया जाता है वहकर्म न होकर एक भार स्वरूप ही समझा जाता है, यही बातपिता के प्रति मान ली जाती है,पिता के प्रति शनि अपनी सिफ़्त के अनुसार अंधेरा देता है, और उस अन्धेरे के कारणपिता ने पुत्र के प्रति क्या किया है, समझ नही होने के कारणपिता पुत्र में अनबन भी बनी रहती है,पुत्र का लगन या प्रथम भाव का शनि माता के चौथे भाव मे चला जाता है, और माता को जो काम नही करने चाहिये वे उसको करने पडते हैं, कठिन और एक सीमा मे रहकर माता के द्वारा काम करने के कारण उसका जीवन एक घेरे में बंधा सा रह जाता है, और वह अपनी शरीरी सिफ़्त को उस प्रकार से प्रयोग नही कर पाती है जिस प्रकार से एक साधारण आदमी अपनी जिन्दगीको जीना चाहता है।

दूसरे भाव में शनि
दूसराभावभौतिक धन का भाव है,भौतिक धन से मतलब है,रुपया,पैसा,सोना, चाँदी ,हीरा,मोती,
जेवरात आदि, जब शनिदेव दूसरे भाव मे होते है तो अपने ही परिवार वालो के प्रति अन्धेरा भी रखते है, अपने ही परिवार वालों से लडाई झगडाआदि करवा कर अपने को अपने ही परिवार से दूर कर देते हैं,धन के मामले मै पता नही चलता है कितना आया और कितना खर्च किया, कितना कहां से आया,दूसरा भाव ही बोलने का भाव है, जो भी बात की जाती है, उसका अन्दाज नही होता है कि क्या कहा गया है, गाली भी हो सकती है और ठंडी बात भी, ठंडी बात से मतलब है नकारात्मक बात, किसी भी बात को करने के लिये कहा जाय, उत्तर में न ही निकले.दूसरा शनि चौथे भाव को भी देखता है, चौथा भाव माता, मकान, और वाहन का भी होता है, अपने सुखों के प्रति भी चौथे भाव से पता किया जाता है, दूसरा शनि होने परयात्रा वाले कार्य और घर मे सोने के अलावा और कुछ नही दिखाई देता है। दूसरा शनि सीधे रूप मे आठवें भाव को देखता है, आठवा भाव शमशानी ताकतों की तरफ़ रुझान बढा देता है, व्यक्ति भूत,प्रेत,जिन्न और पिशाची शक्तियों को अपनाने में अपना मन लगा देता है, शमशानी साधना के कारण उसका खान पान भी शमशानी हो जाता है,शराब,कबाब और भूत के भोजन में उसकी रुचि बढ जाती है। दूसरा शनि ग्यारहवें भाव को भी देखता है, ग्यारहवां भावअचल सम्पत्ति के प्रति अपनी आस्था को अन्धेरे मे रखता है, मित्रों और बडे भाई बहिनो के प्रति दिमाग में अन्धेरा रखता है। वे कुछ करना चाहते हैं लेकिन व्यक्ति के दिमाग में कुछ और ही समझ मे आता है।

तीसरे भाव में शनि
तीसरा भाव पराक्रम का है, व्यक्ति के साहस और हिम्मत का है, जहां भी व्यक्ति रहता है, उसके पडौसियों का है। इन सबके कारणों के अन्दर तीसरे भाव से शनि पंचम भाव को भी देखता है, जिनमे शिक्षा,संतान और तुरत आने वाले धनो को भी जाना जाता है, मित्रों की सहभागिता और भाभी का भाव भी पांचवा भाव माना जाता है, पिता की मृत्यु का औरदादा के बडे भाई का भाव भी पांचवा है। इसके अलावा नवें भाव को भी तीसरा शनि आहत करता है, जिसमे धर्म, सामाजिक व्यव्हारिकता, पुराने रीति रिवाज और पारिवारिक चलन आदि का ज्ञान भी मिलता है, को तीसरा शनि आहतकरता है। मकान और आराम करने वाले स्थानो के प्रति यह शनि अपनी अन्धेरे वाली नीति को प्रतिपादित करता है।ननिहाल खानदान को यह शनि प्रताडित करता है।

चौथे भाव मे शनि
चौथे भाव का मुख्य प्रभाव व्यक्ति के लिये काफ़ी कष्ट देने वाला होता है, माता, मन, मकान, और पानी वाले साधन, तथा शरीर का पानी इस शनि के प्रभाव से गंदला जाता है, आजीवन कष्टदेने वाला होने से पुराणो मे इस शनि वाले व्यक्ति का जीवन नर्क मय ही बताया जाता है। अगर यह शनि तुला,मकर,कुम्भ या मीन का होता है, तो इस के फ़ल में कष्टों मे कुछ कमी आ जाती है।

पंचम भाव का शनि
इस भाव मे शनि के होने के कारण व्यक्ति को मन्त्र वेत्ता बना देता है, वह कितने ही गूढ मन्त्रों के द्वारा लोगो का भला करने वाला तो बन जाता है, लेकिन अपने लिये जीवन साथी के प्रति,जायदाद के प्रति, और नगद धन के साथ जमा पूंजी के लिये दुख ही उठाया करता है।संतान मे शनि की सिफ़्त स्त्री होने और ठंडी होने के कारण से संतति मे विलंब होता है,कन्या संतान की अधिकता होती है, जीवन साथी के साथ मन मुटाव होने से वह अधिक तर अपने जीवन के प्रति उदासीन ही रहता है।

षष्ठ भाव में शनि
इस भाव मे शनि कितने ही दैहिक दैविक और भौतिक रोगों का दाता बन जाता है, लेकिन इस भाव का शनि पारिवारिक शत्रुता को समाप्त कर देता है,मामा खानदान को समाप्त करने वाला होता है,चाचा खान्दान से कभी बनती नही है। व्यक्ति अगर किसी प्रकार से नौकरी वाले कामों को करता रहता है तो सफ़ल होता रहता है, अगर किसी प्रकार से वह मालिकी वाले कामो को करता है तो वह असफ़ल हो जाता है। अपनी तीसरी नजर से आठवें भाव को देखने के कारण से व्यक्ति दूर द्रिष्टि से किसी भी काम या समस्या को नही समझ पाता है, कार्यों से किसी न किसी प्रकार से अपने प्रतिजोखिम को नही समझ पाने से जो भी कमाता है, या जो भी किया जाता है, उसके प्रति अन्धेरा ही रहता है, और अक्स्मात समस्या आने से परेशान होकर जो भी पास मे होता है गंवा देता है। बारहवे भाव मे अन्धेरा होने के कारण से बाहरी आफ़तों के प्रति भी अन्जान रहता है, जो भी कारण बाहरी बनते हैं उनके द्वारा या तो ठगा जाता है या बाहरी लोगों की शनि वाली चालाकियों के कारण अपने को आहत ही पाता है। खुद के छोटे भाई बहिन क्या कर रहे हैं और उनकी कार्य प्रणाली खुद के प्रति क्या है उसके प्रति अन्जान रहता है। अक्सर इस भाव का शनि कही आने जाने पर रास्तों मे भटकाव भी देता है, और अक्सर ऐसे लोग जानी हुई जगह पर भी भूल जाते है।

सप्तम भाव मे शनि
सातवां भाव पत्नी और मन्त्रणा करने वाले लोगो से अपना सम्बन्ध रखता है।जीवन साथी के प्रति अन्धेरा और दिमाग मेनकारात्मक विचारो के लगातार बने रहने से व्यक्ति अपने को हमेशा हर बात में छुद्र ही समझता रहता है,जीवन साथी थोडे से समय के बाद ही नकारा समझ कर अपना पल्ला जातकसे झाड कर दूर होने लगता है, अगर जातक किसी प्रकार से अपने प्रति सकारात्मक विचार नही बना पाये तो अधिकतर मामलो मे गृह्स्थियों को बरबाद ही होता देखा गया है, और दो शादियों के परिणाम सप्तम शनि के कारण ही मिलते देखे गये हैं,सप्तम शनि पुरानी रिवाजों के प्रति और अपने पूर्वजों के प्रति उदासीन ही रहता है, उसे केवल अपने ही प्रति सोचते रहने के कारण और मै कुछ नही कर सकता हूँ, यह विचार बना रहने के कारण वह अपनी पुरानी मर्यादाओं को अक्सर भूल ही जाता है, पिता और पुत्र मे कार्य और अकार्य की स्थिति बनी रहने के कारण अनबन ही बनी रहती है। व्यक्ति अपने रहने वाले स्थान पर अपने कारण बनाकर अशांति उत्पन्न करता रहता है, अपनी माता या माता जैसी महिला के मन मे विरोध भी पैदा करता रहता है, उसे लगता है कि जो भे उसके प्रति किया जा रहा है, वह गलत ही किया जा रहा है औऔर इसी कारण से वह अपने ही लोगों से विरोध पैदा करने मे नही हिचकता है। शरीर के पानी पर इस शनि का प्रभाव पडने से दिमागी विचार गंदे हो जाते हैं, व्यक्ति अपने शरीर में पेट और जनन अंगो मे सूजन और महिला जातकों कीबच्चादानी आदि की बीमारियां इसी शनि के कारण से मिलती है।

अष्टम भाव में शनि
इस भाव का शनि खाने पीने और मौज मस्ती करने के चक्कर में जेब हमेशा खाली रखता है। किस काम को कब करना है इसका अन्दाज नही होने के कारण से व्यक्ति के अन्दर आवारागीरी का उदय होता देखा गया है।

नवम भाव का शनि
नवां भाव भाग्य का माना गया है, इस भाव में शनि होने के कारण से कठिन और दुख दायी यात्रायें करने को मिलती हैं, लगातार घूम कर सेल्स आदि के कामो मे काफ़ी परेशानी करनी पडती है, अगर यह भाव सही होता है, तो व्यक्तिमजाकिया होता है, और हर बात को चुटकुलों के द्वारा कहा करता है, मगर जब इस भाव मे शनि होता है तो व्यक्ति सीरियस हो जाता है, और एकान्त में अपने को रखने अपनी भलाई सोचता है, नवें भाव बाले शनि के के कारण व्यक्ति अपनी पहिचान एकान्त वासा झगडा न झासा वाली कहावत से पूर्ण रखता है। खेती वाले कामो, घर बनाने वाले कामोंजायदाद से जुडे कामों की तरफ़ अपना मन लगाता है। अगर कोई अच्छा ग्रह इस शनि पर अपनी नजर रखता है तो व्यक्तिजज वाले कामो की तरफ़ और कोर्ट कचहरी वाले कामों की तरफ़ अपना रुझान रखता है। जानवरों की डाक्टरी और जानवरों को सिखाने वाले काम भी करता है, अधिकतर नवें शनि वाले लोगों को जानवर पालना बहुत अच्छा लगता है। किताबों को छापकर बेचने वाले भी नवें शनि से कही न कही जुडे होते हैं।

दशम भाव का शनि
दसवां शनि कठिन कामो की तरफ़ मन ले जाता है, जो भीमेहनत वाले काम,लकडी,पत्थर, लोहे आदि के होते हैंवे सब दसवे शनि के क्षेत्र मे आते हैं, व्यक्ति अपने जीवन मे काम के प्रति एक क्षेत्र बना लेता है और उस क्षेत्र से निकलना नही चाहता है।राहु का असर होने से या किसी भी प्रकार से मंगलका प्रभाव बन जाने से इस प्रकार का व्यक्ति यातायात का सिपाही बन जाता है, उसे जिन्दगी के कितने ही काम और कितने ही लोगों को बारी बारी से पास करना पडता है, दसवें शनि वाले की नजर बहुत ही तेज होती है वह किसी भी रखी चीज को नही भूलता है, मेहनत की कमाकर खाना जानता है, अपने रहने के लिये जब भी मकान आदि बनाता है तो केवल स्ट्रक्चर ही बनाकर खडा कर पाता है, उसके रहने के लिये कभी भी बढिया आलीशान मकान नही बन पाता है।गुरु सही तरीके से काम कर रहा हो तो व्यक्ति एक्ज्यूटिव इन्जीनियर की पोस्ट पर काम करने वाला बनजाता है।

ग्यारहवां शनि
शनि दवाइयों का कारक भी है, और इस घर मे जातक को साइंटिस्ट भी बना देता है, अगर जरा सी भी बुध साथ देता हो तो व्यक्ति गणित के फ़ार्मूले और नई खोज करने मे माहिर हो जाता है। चैरिटी वाले काम करने मे मन लगता है, मकान के स्ट्रक्चर खडा करने और वापस बिगाड कर बनाने मे माहिर होता है, व्यक्ति के पास जीवन मे दो मकान तो होते ही है। दोस्तों से हमेशा चालकियां ही मिलती है, बडा भाई या बहिन के प्रति व्यक्ति का रुझान कम ही होता है। कारण वह न तोकुछ शो करता है और न ही किसी प्रकार की मदद करने मे अपनी योग्यता दिखाता है, अधिकतर लोगो के इस प्रकार के भाई या बहिन अपने को जातक से दूर ही रखने म अपनी भलाई समझते हैं।

बारहवां शनि
नवां घर भाग्य या धर्म का होता है तो बारहवा घर धर्म का घर होता है, व्यक्ति को बारहवा शनि पैदा करने के बाद अपने जन्म स्थान से दूर ही कर देता है, वह दूरी शनि के अंशों पर निर्भर करती है, व्यक्ति के दिमाग मे काफ़ी वजन हर समय महसूस होता है वह अपने को संसार के लिये वजन मानकर ही चलता है, उसकी रुझान हमेशा के लिये धन के प्रति होती है और जातक धन के लिये हमेशा ही भटकता रहता है, कर्जा दुश्मनी बीमारियो से उसे नफ़रत तो होती है मगर उसके जीवन साथी के द्वारा इस प्रकार के कार्य कर दिये जाते हैं जिनसे जातक को इन सब बातों के अन्दर जाना ही पडता है।

Friday, September 1, 2017

कुंडली विश्लेषण करते समय ध्यान देने योग्य बातें


कुंडली विश्लेषण करते समय ध्यान देने योग्य बातें



कुंडली का विश्लेषण करते हुए कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों जैस  सभी ग्रहों की स्थिति, डिग्री, दृष्टि, गति, नवांश और चलित की स्थिति आदि को अवश्य ही ध्यान में रखना चाहिए और उन्हीं के अनुसार भविष्यकथन करना चाहिए। इन सभी पहलुओं को देख कर अगर भविष्य कथन होगा तो निश्चित रूप से ज्योतिष के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को हम सार्थक कर सकते हैं।

ज्योतिष शास्त्र मनुष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है और अपरा तथा परा विद्याओं को जोड़ने वाले पुल की तरह कार्य करता है।

इस शास्त्र से ही हम किसी के प्रारब्ध और भविष्य के बारे में कुछ जान सकते हैं। हर व्यक्ति का जन्म उसके प्रारब्ध के अनुसार ही होता है और इस जन्म के लेखे-जोखे के अनुसार ही अगला जन्म होता है। प्रायः इसी तरह यह जीवन चक्र चलता रहता है।

ज्योतिष शास्त्र जो खगोलीय शास्त्र पर आधारित है हमारे भविष्य कथन में बहुत सहायक सिद्ध होता है। इसमें कोई संशय नहीं है कि खगोल शास्त्र की तरह ज्योतिष भी विज्ञान है परंतु इसमें कुछ अपवाद भी हैं। यह एक संभावनाओं का शास्त्र अधिक है। कोई भी भविष्यवाणी पूर्ण सत्यता से करना असंभव तो नहीं पर काफी कठिन है। जहां एक ओर कुंडली में ग्रहों की स्थिति दृष्टि, दशा, गोचर आदि के आधार पर भविष्यवाणी की जाती है वहीं ज्योतिषी की छठी इंद्री अर्थात अंतर्ज्ञान तथा उसकी ईश्वरीय शक्ति भी बहुत महत्वपूर्ण होती है। कुछ ज्योतिषी केवल कुंडली से ही देख कर बता देते हैं तो कुछ कुंडली के प्रत्येक पहलू को अच्छी तरह परख कर बताते हैं।

अलग-अलग ज्योतिषियों के भविष्यकथन में भी काफी फर्क होता है क्योंकि उनके अनुभव व तरीके भी भिन्न होते हैं। भविष्य कथन के व्यवहारिक पक्ष को देखें तो कुछ बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए जैसे -

1. देश काल परिस्थिति

2. चलित

3. नवांश

4. राजयोग, दशा व गोचर का समन्वय

5. षड्बल

6. नीच भंग राज योग

7. वक्री ग्रह

8. स्तंभित ग्रह

9. शनि शुक्र दशा का विचित्र नियम

10. दृष्टि संबंध

11. ग्रहों का परस्पर परिवर्तन योग (विनिमय)

12. काल सर्प योग

13. पंचमहापुरुष योग

14. पुरुष जातक या स्त्री जातक

1. देश, स्थान, काल, परिस्थिति का महत्व
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भविष्यकर्ता को देश, काल, स्थान व परिस्थितियों के अनुसार ही भविष्यकथन करना चाहिए। हर देश/समाज व्यक्ति विशेष की संस्कृति, वैभव, समृद्धि आदि का ध्यान रख कर ही कुंडली देखनी चाहिए। किसी धनाढ्य व्यक्ति की कुंडली का लक्ष्मी योग या राजयोग उसे अरबपति बना देगा जबकि गरीब व्यक्ति की कुंडली का वही योग उसे लखपति बनाएगा।

इसी प्रकार सामाजिक स्थिति और संस्कृति भी भविष्य कथन में जरूरी है क्योंकि विदेश में सप्तम भाव में यदि पाप ग्रह स्थित हों और किसी भी शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो तलाक की भविष्यवाणी काफी सही सिद्ध होगी। पर भारत में इस विषय पर काफी सोच समझ कर बोलना चाहिए क्योंकि अब भी प्रौढ़ उम्र के व्यक्ति तलाक के बारे में नहीं सोचते।

2. चलित का महत्व
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कुंडली का आकलन करते हुए चलित को अवश्य देखना चाहिए क्योंकि लग्न कुंडली में ग्रह त्रिकोण या केंद्र में होते हुए भी यदि चलित में षष्ट, अष्टम या द्वादश में चले जाएं तो फलादेश भिन्न हो जाता है और उसमें न्यूनता आ जाती है; अथवा अष्टम या द्वादश में स्थित शुभ ग्रह सप्तम या केंद्र में आ जाएं तो फल की शुभता में वृद्धि होती है। लग्न कुंडली में ग्रह उसी भाव के फल देता है जिसमें कि चलित में जाता है।

3. नवांश की महत्ता
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जन्मकुडली के अतिरिक्त नवांश कुंडली को देखना अत्यंत आवश्यक है। सप्तम भाव के अतिरिक्त अन्य ग्रहों की नवांश में स्थिति जैसे उच्च, नीच, स्वगृही या मूलत्रिकोण आदि को देखने से कुंडली के अतिरिक्त बल का ज्ञान होता है जिससे सही फलादेश में बहुत सहायता मिलती है।

4. ग्रह बल
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फलादेश करते हुए ग्रह बल का ध्यान रखना भी आवश्यक है क्योंकि कई बार कुंडली में योग होते हुए भी ग्रह के हीन बली होने से योग फलीभूत नहीं होता और भविष्यकथन की सटीकता प्रभावित होती है जैसे- अनेक बार ऐसी कुंडली देखने को मिलती है जिसे देख कर कहा नहीं जा सकता कि विवाह नहीं होगा। विवाह कारक ग्रह की स्थिति अच्छी होते हुए भी विवाह नहीं होता क्योंकि कलत्र कारक ग्रह शुक्र/गुरु सप्तमेश होकर कहीं भी शून्य अंश में हों, शुभ ग्रह की दृष्टि में न हो, पाप ग्रह की दृष्टि या युति में हां अथवा पापकर्तरी से पीड़ित हो तो विवाह की संभावना कम हो जाती है।

5. स्थान परिवर्तन का राजयोग तथा दशाफल का विचित्र नियम
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कवि कालिदास द्वारा रचित उत्तरकालामृत के अनुसार शुक्र और शनि यदि दोनों उच्च, सउच्च, स्वक्षेत्री तथा वर्गोत्तमी होकर बलवान स्थिति में हों, तो एक दूसरे की दशा तथा अंतर्दशा में खराब फल देते हैं। लेकिन दोनों में से एक बलवान और दूसरा बलहीन हो तो अपने योग का फल देते हैं।

6. नीच भंग राज योग
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इसी तरह से भविष्य कथन करते हुए नीच ग्रह और उच्च ग्रह का काफी विचार किया जाता है। उसमें भी नीच भंग राज योग का ध्यान रखना चाहिए। यदि नीच ग्रह वक्री हो जाए तो उच्च ग्रह के समान फल देता है और उच्च ग्रह वक्री हो जाए तो वह अपने बल में क्षीण हो जाता है और अपेक्षित फल नही देते

7. स्तम्भित ग्रह
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गुरु बलवान होने के बावजूद अगर स्तम्भित होता है तो भी फल नहीं देता। जैसे अर्जुन सिंह जी को गुरु की महादशा में विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ा और इनके राजनैतिक कैरियर को बड़ा झटका लगा।

8. वक्री ग्रह
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कालिदास के अनुसार उच्च ग्रह वक्री होकर क्षीण फल देते हैं।

इनके अतिरिक्त ग्रहों के अंश, अस्त अथवा परास्त स्थिति, दृष्टि संबंध तथा दशाफल व गोचर का ध्यान भी रखना चाहिए। क्योंकि उचित दशा आने पर जन्मकुंडली के योगों द्वारा बनाई गई कर्मफल की पोटली लाने का काम गोचर ही करता है। बहुत बार ऐसा भी होता है कि अच्छे योग देने वाले ग्रहों की दशा आने पर भी सही गोचर के अभाव में पूर्ण रूप से संतोषजनक फल नहीं मिल पाते।

निष्कर्ष👉 भविष्य कथन करते हुए यदि ज्योतिष के इन महत्वपूर्ण नियमों का पालन किया जाए और सभी तथ्यों का ध्यान रखा जाए तो निश्चित रूप से फलकथन में सटीकता आ जाएगी

कर्ज की समस्या के ज्योतिषीय कारण और समाधान


कर्ज की समस्या के ज्योतिषीय कारण और समाधान -

हमारा जन्म होते ही हम सभी अपने प्रारब्ध के चक्र से बंध जाते हैं और जन्मकुंडली हमारे इसी प्रारब्ध को प्रकट करती है हमारे जीवन में सभी घटनाएं नवग्रह द्वारा ही संचालित होती हैं।  आज के समय में जहाँ आर्थिक असंतुलन हमारी चिंता का एक मुख्य कारण है वहीँ एक दूसरी स्थिति जिसके कारण अधिकांश लोग चिंतित और परेशान रहते हैं वह है "कर्ज" धन का कर्ज चाहे किसी से व्यक्तिगत रूप से लिया गया हो या सरकारी लोन के रूप में ये दोनों ही स्थितियां व्यक्ति के ऊपर एक बोझ के समान बनी रहती हैं कई बार ना चाहते हुये भी परिस्थितिवश व्यक्ति को इस कर्ज रुपी बोझ का सामना करना पड़ता है वैसे तो आज के समय में अपने कार्यो की पूर्ती के लिए अधिकांश लोग कर्ज लेते हैं परन्तु जब जीवन पर्यन्त बनी रहे या बार बार सामने आये तो वास्तव में यह भी हमारी कुंडली में बने कुछ विशेष ग्रहयोगों के कारण ही होता है -

" हमारी कुंडली में "छटा भाव" कर्ज का भाव माना गया है अर्थात कुंडली का छटा भाव ही व्यक्ति के जीवन में कर्ज की स्थिति को नियंत्रित करता है जब कुंडली के
★छठ्टे भाव में कोई पाप योग बना हो या षष्टेश ग्रह बहुत पीड़ित हो तो व्यक्ति को कर्ज की समस्या का सामना करना पड़ता है जैसे -
★यदि छठ्ठे भाव में कोई पाप ग्रह नीच
    राशि में भावस्थ हो,
★छठ्ठेे भाव में राहु-चन्द्रमाँ की युति या
★राहु-सूर्य के साथ होने से ग्रहण योग
    बन रहा हो,
★छठ्ठेे भाव में राहु मंगल का योग हो,
★छठ्ठे भाव में गुरु-चाण्डाल योग बना हो,
★शनि-मंगल या केतु-मंगल की युति छठ्ठे भाव में हो तो ...ऐसे पाप या क्रूर योग जब कुंडली के छटे भाव में बनते हैं तो व्यक्ति को
★कर्ज की समस्या बहुत परेशान करती
   है और
★री-पेमेंट में बहुत समस्यायें आती हैं।
★छठ्ठे भाव का स्वामी ग्रह भी जब नीच राशि में हो अष्टम भाव में हो या बहुत पीड़ित हो तो कर्ज की समस्या होती है । ★इसके अलावा "मंगल" को कर्ज का नैसर्गिक नियंत्रक ग्रह माना गया है !!
अतः यहाँ मंगल की भी महत्वपूर्ण भूमिका है यदि कुंडली में ...
★मंगल अपनी नीच राशि(कर्क) में हो आठवें भाव में बैठा हो, या ...
★अन्य प्रकार से अति पीड़ित हो तो भी कर्ज की समस्या बड़ा रूप ले लेती है"  

विशेष: -
💥
यदि छठ्ठे भाव में बने पाप योग पर *बलि बृहस्पति की दृष्टि पड़ रही हो तो कर्ज का रीपेमेंट संघर्ष के बाद हो जाता है या व्यक्ति को कर्ज की समस्या का समाधान मिल जाता है परन्तु बृहस्पति की शुभ दृष्टि के आभाव में समस्या बनी रहती है l*
 🔺छठ्ठे भाव में पाप योग जितने अधिक होंगे उतनी समस्या अधिक होगी, अतः
 *🔺कुंडली का छठा भाव पीड़ित होने पर लोन आदि लेने में भी बहुत सतर्कता बरतनी चाहिये l*
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बहुत बार व्यक्ति की कुंडली अच्छी होने पर भी व्यक्ति को कर्ज की समस्या का सामना करना पड़ता है जिसका कारण उस समय *कुंडली में चल रही अकारक ग्रहों की दशाएं या गोचर ग्रहों का प्रभाव होता है जिससे अस्थाई रूप से व्यक्ति उस विशेष समय काल के लिए कर्ज के बोझ से घिर जाता है l* उदाहरणार्थ : अकारक षष्टेश और द्वादशेश की दशा व्यक्ति कर्ज समस्या देती है l अतः प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में ★अलग अलग ग्रह-स्थिति  और
★अलग अलग दशाओं के कारण व्यक्तिगत  रूप से तो ★गहन विश्लेषण के बाद ही किसी व्यक्ति के लिए चल रही कर्ज समस्या के सटीक ज्योतिषीय उपाय निश्चित किये जा सकते हैं lअतः यहाँ हम कर्जमुक्ति के लिए ऐसे कुछ मुख्य उपाय बता रहे हैं  जिन्हें कोई भी व्यक्ति कर सकता है l
🕉उपाय :-

🔺1. मंगल यन्त्र को घर के मंदिर में लाल वस्त्र पर स्थापित करें और प्रतिदिन इस मंत्र का एक माला जाप करें -

*ॐ क्राम क्रीम क्रोम सः भौमाय नमः।*
🔺2. प्रति दिन *ऋणमोचन मंगल स्तोत्र* का पाठ करें।
🔺3. *हनुमान चालीसा* का पाठ करें।